Devil की दास्तान - 18 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 18

(रात का गहरा सन्नाटा… चारों ओर बस पेड़ों की सरसराहट, चाँद की हल्की रौशनी, और झींगुरों की आवाज़ें। सिमरन निकल पड़ी अपने पति को ढूंढने। )

“सिमरन को नहीं पता था कि वो जिस राह पर निकली है, वहाँ वापसी का कोई रास्ता नहीं।
वो बस एक ही चीज़ जानती थी — करण को ढूँढना है… चाहे जान चली जाए।”

(सिमरन लाल साड़ी पहने किसी सुहागन की तरह जंगल के बीच चल रही है। उसके कदमों की आहट सूखे पत्तों पर गूंज रही है। हवा ठंडी है, पर उसके माथे पर पसीना है।)

सिमरन (धीरे-धीरे बुदबुदाते हुए) बोली - 
“करण जी… कहाँ चले गए आप?
आपने कहा था कि मुझे अकेला नहीं छोड़ोगे… फिर ये सन्नाटा क्यों है?”

(अचानक पीछे से सरसराहट होती है। सिमरन मुड़ती है — कोई नहीं।
फिर बायीं ओर पेड़ के पीछे कोई साया हिलता है।)

सिमरन (सहमी आवाज़ में) बोली - 
“ क कौन है वहाँ…?”

(अचानक चारों ओर से और आवाज़ें आने लगती हैं — फुसफुसाहटें, हँसी, हवा में सरसराती परछाइयाँ।)

पहली चुड़ैल (तेज हँसी के साथ) बोली - 
“इंसान की खुशबू… कितनी मीठी होती है ना! और ये तो बच्ची है।”

(सिमरन पीछे मुड़ती है — एक लंबी चुड़ैल, बिखरे बाल, काले दाँत, और लाल आँखें उसके सामने है। उसके पीछे दो और चुड़ैलें और तीन वैम्पायर खड़े हैं — उनके पंख आधे खुले, चेहरे पर भयानक मुस्कान।)

दूसरी चुड़ैल बोली - 
“देखो बहनों… करण का शिकार आज खुद हमारे पास चला आया है। बेचारी मासूम बच्ची।”

पहला वैम्पायर (गरजते हुए) बोला - 
“इसका लहू… करण को तो नहीं मिलेगा। आज इसका हर कतरा हमारा होगा!”

चुड़ैल बोली - 
और इसका नर्म मांस भी। बच्चों का मांस बहुत टेस्टी होता है।

(सिमरन पीछे हटती है, पेड़ से लग जाती है। उसकी साँसें तेज़ हैं, हाथ काँप रहे हैं।)

सिमरन (घबराकर) बोली - 
“please… मुझे जाने दो। मु मुझे please नुकसान मत पहुंचाओ। मुझे अपने पति को ढूंढना है। मुझे अपने पति से बात करनी है। …”

Vaimpair बोला - तेरा पति! हाहा......! अरे वो इंसान नहीं शैतान है। वो तुझसे प्यार नहीं करता बस तेरा खून पीना चाहता है। तू उससे बात करके करेगी क्या। वैसे भी आज नहीं तो कल वो तुझे मार है डालेगा। 

तीसरी चुड़ैल (हँसते हुए):
" पर तुम्हारा खून हमें ज़रूर ज़िंदा रखेगा!”

(वो सभी मिलकर सिमरन की ओर बढ़ने लगते हैं। सिमरन चीखती है।
सिमरन चिल्लाते हुए बोली - 
नहीं.......

वो भागती है। उसके पैरों में काँटे चुभते हैं, कपड़े फँसते हैं, पर वो रुकती नहीं।)

“वो भाग रही थी — मौत से, डर से, और उस दुनिया से जो अब इंसान नहीं रही थी…”

(वो जंगल के बीच एक खुली जगह पर पहुँचती है। चारों ओर से चुड़ैलें और वैम्पायर उसे घेर लेते हैं।
आसमान में बादल गरजते हैं, चाँद काला पड़ जाता है।)

पहला वैम्पायर (दाँत दिखाकर) बोला - 
“अब भाग कहाँ जाओगी, नन्ही शिकार…”

(सिमरन आँखें बंद करती है, डर से काँपते हुए भगवान का नाम लेती है।

सिमरन बोली - 
हे भगवान जी बचा लो....

तभी अचानक तेज़ रोशनी की एक लहर चारों ओर फैलती है। हवा का तूफ़ान उठता है। सबकी नज़रें ऊपर जाती हैं — आकाश में करण उड़कर नीचे आता है, पंख खुले हुए, आँखों में आग, और चेहरे पर गुस्सा।)

करण (गरजती आवाज़ में) बोला - 
“सिमरन को कोई हाथ नहीं लगाएगा!”

(उसकी एंट्री के साथ ही हवा तेज़ बहने लगती है, पेड़ झूमते हैं, और बाकी सब पीछे हटने लगते हैं।)

पहली चुड़ैल (गुस्से में) बोली - 
“करण! तू इंसान के लिए अपनी बिरादरी के खिलाफ जा रहा है?”

करण (क्रोध में) बोला - 
“ हां जाऊंगा! मैं दानव हूँ… पर अभी उसका रक्षक भी हूं और उसका खून बस मेरा है!”

(वो एक-एक कर चुड़ैलों और वैम्पायरों पर झपट पड़ता है। हवा में लड़ाई शुरू हो जाती है। सिमरन नीचे खड़ी काँप रही है, आँखों में डर और विश्वास दोनों हैं।)

“इस बार दानव नहीं लड़ा था अपने शिकार के लिए…
वो लड़ा था अपने वजूद के लिए — अपनी इंसानियत के लिए
वो लड़ा अपनी पत्नी के लिए, अपनी मुहब्बत के लिए।…”

(करण हवा में, पंख फैले हुए, नीचे सिमरन, और चारों ओर जलते जंगल की लपटें!)

(जंगल के बीच घोर अंधेरा… चारों ओर धुआँ, टूटी डालियाँ, और जलती ज़मीन।
करण हवा में लड़ते हुए बुरी तरह घायल हो चुका है। उसके पंखों से खून टपक रहा है।)

“हर वार उसके जिस्म को तोड़ रहा था,
पर वो रुक नहीं रहा था — क्योंकि उस रात कोई और नहीं,
बल्कि उसकी इंसानियत दांव पर थी…”

(करण एक वैम्पायर को हवा में उठा कर पटक देता है, लेकिन तभी पीछे से एक चुड़ैल उस पर वार करती है।
करण ज़मीन पर गिर जाता है — उसके पंख झुलस गए हैं।)

सिमरन (चीखते हुए) बोली - 
“ क करण जी!!”

(वो दौड़कर उसके पास आती है। करण की आँखें लाल हैं, पर अब उसमें कमजोरी झलक रही है।
वो धीरे से बोलता है —)

करण (टूटी आवाज़ में) बोला - 
“ स सिमरन भाग जाओ… सिमरन… ये तुम्हारी दुनिया नहीं। ये लोग तुमको मार देंगे। भाग जाओ सिमरन।…”

(करण थककर बैठ गया। सिमरन की आँखों से आँसू बहने लगते हैं। वो डरते हुए भी उसके ज़ख्मों पर हाथ रखती है।
जैसे ही उसका हाथ करण के खून को छूता है — अचानक एक तेज़ नीली रौशनी चमकती है।)

“वो पल… जब एक मासूम लड़की ने एक दानव को छुआ,
तो किस्मत ने खुद अपने नियम तोड़ दिए…”

(सिमरन के हाथों से नीली ऊर्जा निकलती है, करण के ज़ख्म भरने लगते हैं।
वो आश्चर्य से उसे देखता है। उसके भीतर की ताकतें शांत होने लगती हैं।)

करण (धीरे से) बोला - 
“ये… क्या किया तुमने सिमरन…?”

सिमरन (काँपते हुए) बोली - 
“मु मुझे नहीं पता… बस मैंने चाहा कि आप ठीक हो जाओ…”

(करण उसकी आँखों में देखता है — वहाँ डर नहीं, सिर्फ सच्चाई थी।
पहली बार करण के चेहरे पर हैरानी और भावनाओं का मिला-जुला असर था।)

पहली चुड़ैल (गुस्से में चिल्लाते हुए) बोली - 
“ये नहीं हो सकता!! एक इंसान हमारी ताकतों को कमजोर नहीं कर सकती!”

(वो फिर सिमरन की तरफ बढ़ती है, पर करण अब उठ खड़ा होता है।
उसकी आँखों का रंग लाल गहरा हो जाता है।)

करण (गर्जन भरी आवाज़ में) बोला - 
“अब ये सिमरन नहीं… मेरा वचन है, मेरी पत्नी है!”

(वो अपने पंख फैलाता है, ज़मीन पर आग की रेखा बनती है।
चुड़ैलें पीछे हटती हैं, और करण उन सबको राख में बदल देता है।)

(चारों ओर सन्नाटा छा जाता है। सिर्फ हवा और सिमरन की धड़कनें सुनाई देती हैं।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“आ आप… आखिर हो क्या हो क करण जी?”

करण (नीचे देखते हुए, भारी आवाज़ में) बोला - 
“वो जो कभी इंसान नहीं था… और अब बस तुम्हारा रक्षक बन गया है।”

(सिमरन कुछ बोल नहीं पाती। करण उसे अपनी बाहों में उठाता है और चाँदनी में धीरे-धीरे आगे बढ़ जाता है।)

“उस रात जंगल में सिर्फ दो चीज़ें बचीं —
एक घायल दानव… और एक ऐसी इंसान,
जिसकी मासूमियत ने अंधकार को झुका दिया था।”

(आसमान में घोर अंधेरा, बादलों के बीच बिजली चमकती है।
करण अपने काले पंख फैलाए सिमरन को सीने से लगाकर तेज़ी से उड़ रहा है।
नीचे जंगल की घाटियाँ और झरने दिखाई दे रहे हैं।)

“वो रात सिर्फ हवाओं की नहीं थी…
वो रात थी शिकारीयों की — जहाँ एक शैतान अपने शिकार को नहीं,
बल्कि अपने इश्क़ को बचाने भाग रहा था…”

(सिमरन करण के सीने से लगी है, उसकी आँखें कसकर बंद हैं।
हवा इतनी तेज़ है कि उसके बाल उड़ रहे हैं, चेहरा डर से सफेद पड़ चुका है।)

सिमरन (धीरे, काँपते हुए) बोली - 
“ क करण जी… ये… हम कहाँ जा रहे हैं…? बहुत… बहुत ऊपर हैं, मु मुझे बहुत डर लग रहा है।…”

करण (गंभीर, तेज़ आवाज़ में) बोला - 
“चुप रहो, सिमरन… पीछे मत देखना… वो हमारे पीछे हैं…”

(सिमरन डरते हुए सिर झुका लेती है। तभी पीछे से काले धुएँ जैसे तीन दानव —
बिलकुल करण जैसे — लाल आँखों और पंखों वाले,
गर्जना करते हुए करण का पीछा करने लगते हैं।)

पहला शैतान (चीखते हुए) बोला - 
“करण! रुक जा… वो इंसान तेरे लायक नहीं! उसे हमारे हवाले कर दे! तू इंसान से प्यार नहीं कर सकता। भूल मत तू एक शैतान है।”

दूसरा शैतान बोला - 
“तू बिरादरी के नियम तोड़ चुका है करण… अब तुझे सज़ा मिलेगी!”

(करण गुस्से में पीछे देखता है, उसकी आँखों में आग जल रही है।)

करण (गरजते हुए) बोला - 
“मैं किसी को भी उसे छूने नहीं दूँगा!!”

(वो और तेज़ उड़ता है — बादल फटने लगते हैं।
बिजली की चमक में सिमरन डर से और ज़्यादा उसके सीने में छिप जाती है।)

“ऊँचाई बढ़ती गई, हवा चीरती गई, और डर…
डर सिमरन की रगों में जड़ें जमाने लगा।”

(पीछे से एक दानव करण के पंख पर वार करता है — आग की चिंगारी उठती है।
करण कराह उठता है लेकिन सिमरन को कसकर पकड़े रहता है।)

सिमरन (घबराकर) बोली - 
“करण जी! आपको चोट लगी है… नीचे उतर जाइए! मैं आपको ऐसी हालत में नहीं देख सकती।”

करण (कठोर आवाज़ में) बोला - 
“अगर नीचे गए तो हम दोनों ज़िंदा नहीं बचेंगे सिमरन…”

(आसमान में तूफ़ान उठता है —
चारों ओर सिर्फ बिजली की चमक और हवाओं की चीखें सुनाई देती हैं।
करण गोल चक्कर काटते हुए बादलों के भीतर घुस जाता है।)

“वो दोनों बादलों में खो गए — पर मौत अब भी उनके पीछे थी…”

(पीछे के शैतान अभी भी पीछा कर रहे हैं।
करण तेज़ झटके से नीचे की ओर गोता लगाता है।
सिमरन चीख उठती है —)

सिमरन (डरी हुई) बोली - 
“करण जी!! हम गिर जाएँगे!!”

करण (धीरे से, उसकी आँखों में देखकर) बोला - 
“जब तक मैं ज़िंदा हूँ, तुम नहीं गिरोगी…”

(वो पंख फैलाकर ज़मीन से कुछ इंच ऊपर रुक जाता है।
चारों ओर धुंध है, बारिश की बूँदें गिर रही हैं।
पीछे से तीनों शैतान फिर पास आ रहे हैं।)

“अब न आसमान उनका था, न ज़मीन…
सिर्फ मौत, और उस पर खड़ा एक शैतान —
जो पहली बार किसी इंसान के लिए लड़ रहा था।”

(करण सिमरन को ज़मीन पर सुरक्षित रखता है और पीछे पलटकर देखता है।
उसकी आँखें फिर से लाल हो जाती हैं,
पंख फैलते हैं — और वो तीनों शैतानों की तरफ उड़ान भरता है।)

सिमरन (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोली - 
“मत जाइए… करण जी…”

(लेकिन करण अब सुन नहीं रहा —
वो आसमान की तरफ बढ़ चुका है,
जहाँ उसका इंतज़ार है उसकी अपनी ही बिरादरी से जंग का…
पर करन की हालत और खराब हो गई। 
सिमरन डर गई।)