Devil की दास्तान - 17 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 17

हवेली का कमरा। बाहर अँधेरी रात है। लाल परदों से छनकर आती चाँदनी कमरे को और भी रहस्यमयी बना देती है। करण खिड़की के पास खड़ा है, उसकी आँखें खून की प्यास से लाल हो रही हैं।)

"करण के मन में बस एक ही जंग चल रही थी…
वो जानता था कि अगर उसने सिमरन का खून नहीं पिया, तो उसकी शैतानी शक्तियाँ कमज़ोर हो जाएँगी,
पर सिमरन की मासूमियत उसकी प्यास पर बार-बार लगाम लगा रही थी।"

(करण अचानक मुट्ठियाँ भींच लेता है, उसकी नज़रों में जुनून चमक उठता है।)

करण (अपने आप से बड़बड़ाता हुआ) बोला - 
"नहीं… मुझे उसका खून पीना ही होगा… किसी भी हाल में। वरना… मैं सब कुछ खो दूँगा।"


(उधर सिमरन आईने के सामने बैठी है। उसकी आँखों में आँसू हैं पर चेहरा अब भी मासूम और भोला है। वो धीमी आवाज़ में अपने दिल से बात करती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
"मुझे पता है एक दिन… ये मेरा खून पीकर मुझे मार डालेंगे।
पर… न जाने क्यों मेरा दिल एक शैतान के लिए धड़कने लगा है।
क्या मैं पागल हो गई हूँ? या ये कुछ और है?"

(सिमरन की आँखें बंद हो जाती हैं। उसके होंठ कांपते हैं, जैसे वो अपने दिल का राज़ खुद से भी छुपाना चाहती हो।)

"सिमरन का दिल जानता था कि उसका पति ही उसका कातिल बनेगा…
पर उसकी मासूम मोहब्बत, उस डर से भी बड़ी थी।
क्योंकि सच्चा प्यार, मौत से भी नहीं डरता।"

(रात का सन्नाटा।  बाहर बिजली चमकती है। अंदर करण के भीतर का तूफ़ान और भी खतरनाक हो चुका है।)

"सिमरन एक इंसान थी — नाज़ुक, मासूम, डर से भरी हुई…
और करण… एक ऐसा शैतान जो अपने ऊपर से धीरे-धीरे काबू खोता जा रहा था।"

(करण दालान में चलता है, उसके कदमों की आहट गूंजती है। उसके नाखून लंबे और धारदार हो गए हैं, आँखें और ज़्यादा लाल।)

करण (गुस्से और बेचैनी में खुद से) बोला - 
"क्यों नहीं रुकती ये प्यास… क्यों नहीं मिटती ये आग अंदर की?
वो इंसान है… पर उसका खून मेरी नसों में बिजली बनकर दौड़ता है! क्यों मैं उसका खून नहीं पी पा रहा? आखिर क्या है उसमें ऐसा?"

(सिमरन कमरे में है, मोमबत्ती की लौ कांप रही है। वो दरवाज़े के बाहर से करण की आहट सुनती है। उसके चेहरे पर डर साफ झलकता है।)

सिमरन (धीरे से खुद से) बोली - 
"फिर से वही आवाज़ें… क्या वो…?
नहीं, भगवान! उन्हें आज नहीं आना चाहिए… मैं अब और नहीं सह सकती। मुझे डर लगता है।"

(दरवाज़ा अचानक खुलता है। करण अंदर आता है। उसके चेहरे पर शैतानी छाया है, लेकिन आँखों में कहीं न कहीं एक इंसान भी छिपा है।)

करण (भारी आवाज़ में) बोला - 
"डरो मत सिमरन… मैं तुम्हें कुछ नहीं करूंगा…"

(वो आगे बढ़ता है। सिमरन पीछे हटती है, लेकिन कमरे की दीवार से टकरा जाती है।)

सिमरन (कांपती हुई आवाज़ में) बोली - 
"करण जी… आप खुद को संभालिए… ये आप नहीं हो… ये आपके अंदर का शैतान है!"

(करण अचानक रुक जाता है। उसकी साँसें भारी हैं। उसके दाँत बाहर आने लगे हैं, पर सिमरन की आवाज़ उसके अंदर तक उतरती है।)

"उस वक्त सिमरन एक डरती हुई औरत नहीं, बल्कि करण के अंदर के अंधेरे के सामने खड़ी एक रौशनी थी।
वो जानती थी कि अगर उसने डर दिखाया, तो वो हमेशा के लिए उसे खो देगी।"

(सिमरन आगे बढ़ती है, डर के बावजूद करण के गाल को छूती है। करण की साँसें ठहर जाती हैं।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
"आप चाहे जितने भी शैतान बन जाइए करण जी… मैं आपको फिर भी इंसान बनाऊँगी।"

(करण की आँखों से एक  आँसू गिरता है। सिमरन चौंक जाती है, क्योंकि उसने करण की आंखों में पहली बार आंसु देखा। पर पीछे नहीं हटती।)

"शायद पहली बार किसी इंसान की मासूमियत ने एक शैतान को छू लिया था…"

रात का वही माहौल। हवेली की दीवारों पर छायाएँ नाच रही हैं। बाहर तूफ़ान, बिजली और हवा की सिटी सी गूँजती है।)

"कभी-कभी राक्षस इंसान से नहीं डरते… पर करण डर गया था — खुद से।
उसे डर था कि कहीं उसका अगला शिकार वही न बन जाए जिससे वो अब नफरत नहीं, मोहब्बत करने लगा था।"

(करण कमरे के कोने में बैठा है। उसके हाथ काँप रहे हैं। आँखें लाल हैं, लेकिन उनमें दर्द है, प्यास नहीं।)

करण (अपने आप से बड़बड़ाते हुए) बोला - 
"नहीं… नहीं, मैं उसे नहीं छू सकता।
वो मेरी कमज़ोरी है… और कमज़ोरी ही विनाश बनती है।
अगर वो मेरे पास रही… तो मैं उसे खो दूँगा… हमेशा के लिए।"

(वो उठता है, शीशे में खुद को देखता है। उसका प्रतिबिंब अब इंसान जैसा नहीं रहा। चेहरा विकृत, आँखें गहरी लाल, और पीछे हल्की पंखों की परछाई।)

करण (गुस्से में खुद से) बोला - 
"तुम क्या बन गए हो करण!
तुम्हारे अंदर जो दानव है, वो अब तुमसे बड़ा हो चुका है!
क्यों हूं मैं ऐसा?
काश मैं भी इंसान होता।"

(दूसरी ओर सिमरन मंदिर के सामने बैठी है। उसके हाथ में लाल चुनरी है। उसकी आँखें आँसुओं से भरी हैं।)

सिमरन (धीरे से भगवान से) बोली - 
"मैं नहीं जानती वो कौन हैं… पर मैं ये जानती हूँ कि उनके अंदर भी एक दिल है।
भगवान… अगर आपने उन्हें बनाया है, तो उनके अंदर इंसानियत भी कहीं तो होगी , भले ही वो इंसान नहीं हैं।
मुझे उन्हें बचाना है, चाहे कुछ भी हो जाए।"

(करण छत पर खड़ा है, हवेली के ऊपर। हवा उसके चारों ओर घूमती है। उसके पंख खुलते हैं। नीचे सिमरन मंदिर में बैठी है।)

"वो उससे भागना चाहता था… पर भाग नहीं पा रहा था।
क्योंकि अब जो बंधन बना था, वो किसी शिकार का नहीं, किसी रिश्ते का था।"

(करण अचानक उड़ान भरता है, लेकिन तभी अंदर से सिमरन की आवाज़ गूँजती है — “करण जी!”
वो रुक जाता है।)

सिमरन (रोती हुई आवाज़ में) बोली - 
"अगर जाना ही है, तो मुझे बताकर जाइए!
क्या मैं इतनी भी बुरी हूँ कि आप अपनी सच्चाई मुझसे छुपा लें?

(करण नीचे उतरता है, आँखों में आँसू और दर्द। उसके चेहरे पर इंसान और दानव दोनों की झलक।)

करण (धीरे से, टूटे हुए स्वर में) बोला - 
"तुम नहीं जानती सिमरन… अगर मैं रुका, तो तुम ज़िंदा नहीं रहोगी।
मुझे खुद से लड़ना है… और शायद ये लड़ाई मेरी आख़िरी होगी।"

(वो मुड़ता है, और धीरे-धीरे हवेली से बाहर चला जाता है। सिमरन वहीं गिरकर रोने लगती है।)

सिमरन बोली - करण जी ! Please मत जाइए। आप जैसे भी हैं, मुझे बहुत पसंद हैं। मैं आपसे प्यार करती हूं । 

पर करन तब तक जा चुका था।

"कभी-कभी मोहब्बत किसी को पास नहीं लाती…
बल्कि दूर जाने की हिम्मत देती है — ताकि वो ज़िंदा रहे…"