Devil की दास्तान - 16 Sonam Brijwasi द्वारा महिला विशेष में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 16

(रात का अँधेरा हवेली में फैला है। तभी बिजली कड़कती है और तेज़ आवाज होती है। सिमरन डर के मारे करण के सीने से चिपक जाती है।)

"सिमरन सहमी-सहमी थी।
अपने डर और असहायपन में वह करण के सीने से चिपक गई।
उसकी मासूमियत ने उसे इस तरह अपने पास खींच लिया कि करण पहली बार हड़बड़ाया।"

(सिमरन किसी बच्चे की तरह पूरी तरह से सो गई। उसके छोटे हाथ करण की तरफ फैले हुए हैं।)

"सिमरन ने पूरी तरह नींद में जाकर अपने डर को भुला दिया।
किसी बच्चे की तरह वह सो गई—
बेबस, मासूम और पूरी तरह निर्भर।"

(करण उसकी नींद को देखते हुए बैठा है। उसके लाल आँखों में जूनून और प्यास अभी भी छिपी हुई है।)

"लेकिन करण सो नहीं सका।
उसके भीतर की प्यास, जूनून और जिम्मेदारी
सिमरन की मासूमियत के साथ उसे बेचैन कर रही थी।
रात भर वह उसके पास बैठा रहा,
सिर्फ उसे सुरक्षित देखते हुए,
पर खुद को नियंत्रित करते हुए।"

(हवेली में केवल सिमरन की हल्की साँसें और करण की धीमी धड़कनें सुनाई देती हैं।)

"रात का अँधेरा, हवेली की खामोशी,
सिमरन की मासूम नींद और करण की बेचैनी—
इस पल ने दोनों के बीच
अद्भुत और खतरनाक संतुलन बना दिया।

(सिमरन नींद में है, और करण उसके पास बैठा है। उसकी लाल आँखों की आग अब धीरे-धीरे शांत हो रही है।)

"करण अब पूरी तरह अपनी प्यास पर काबू रख रहा था।
सिमरन की मासूमियत और निर्भरता उसे अंदर से छू रही थी।
अब उसका जूनून केवल प्यास नहीं—
बल्कि उसकी सुरक्षा और देखभाल में बदल रहा था।"

(करण धीरे-धीरे सिमरन का हाथ पकड़ता है, उसे आराम देने के लिए हल्का सहलाता है।)

Karan (धीमी, गंभीर आवाज़ में, खुद से) बोला - 
"तुम… तुम सच में अलग हो।
मेरी लाल आँखों की आग भी तुम्हारे सामने शांत हो जाती है।
मैं अब तुम्हें डराना नहीं चाहता।"

(सिमरन नींद में हल्की मुस्कान देती है।)

"सिमरन के छोटे-छोटे हावभाव और मासूम मुस्कान ने करण को बदल दिया।
उसके भीतर का डर और जूनून अब धीरे-धीरे संवेदनशीलता में बदलने लगा।"

(धीरे-धीरे सुबह की किरण कमरे में दाखिल होती है। हवेली में खामोशी और सुरक्षा की अनुभूति फैलती है।)

"अब हवेली में डर केवल बाहर का था।
अंदर, सिमरन और करण के बीच धीरे-धीरे विश्वास और संवेदनशीलता बन रही थी।
मासूमियत और जूनून का यह संतुलन
नई कहानी की शुरुआत का प्रतीक बन गया था।"

(सूरज की हल्की रोशनी हवेली के कमरे में दाखिल होती है। सिमरन नींद से जागती है और महसूस करती है कि वह रातभर करण के बेहद करीब रही।)

"सिमरन की आँखें खुलीं।
उसने महसूस किया…
वह करण के बेहद करीब थी।
उसकी धड़कन, उसकी गर्मी…
सभी कुछ उसके भीतर डर और आश्चर्य भर गया।"

(सिमरन धीरे-धीरे पिछे हटती है। उसका चेहरा डर और शर्म से लाल है।)

Simran (मन ही मन, धीमी आवाज़ में) बोली - 
"नहीं… मैं… मैं यहाँ नहीं रह सकती।
यह सही नहीं है… मुझे अभी यहाँ से जाना होगा…"

(वह डर के मारे उठती है और कमरे से बाहर चली जाती है। उसकी चाल में हल्की हड़बड़ाहट है।)

"सिमरन का डर अब भी कायम था।
उसने महसूस किया कि करण के पास रहना उसके लिए सुरक्षित नहीं,
लेकिन डर और जूनून के बीच का खेल अब और जटिल हो गया था।"

(कमरा खाली हो जाता है। केवल सूरज की हल्की रोशनी और हवेली में खामोशी रहती है।)

"अब हवेली में केवल खामोशी थी…
और सिमरन का डर,
जो धीरे-धीरे उसकी मासूमियत और हिम्मत से संतुलित होने लगा था।
लेकिन करण की लाल आँखें और उसकी प्यास…
अभी खत्म नहीं हुई थी।"

(हवेली का बड़ा कमरा। खिड़की से हल्की धूप अंदर आ रही है। सिमरन पहली बार शादी के बाद साड़ी पहनती है। उसकी लंबी काली ज़ुल्फ़ें खुले हैं, माथे पर सिंदूर है और आँखों में सिर्फ डर।)

"शादी के बाद की यह पहली सुबह थी।
सिमरन ने पहली बार साड़ी पहनी थी।
उसकी सादगी और सुंदरता…
उसकी मासूम आँखें और लहराते लंबे बाल…
उसे किसी अप्सरा जैसा बना रहे थे।
लेकिन चेहरे पर मुस्कान का नामोनिशान नहीं था।
सिर्फ डर… और खामोशी।"

(करण कमरे में दाखिल होता है। उसकी लाल आँखें सिमरन पर टिक जाती हैं।)

Karan (धीमी, भारी आवाज़ में, मन ही मन) बोला - 
"ये… इंसान… कितनी अलग है।
इसकी मासूमियत… इस सादगी में भी आग है।
मेरी प्यास… इसे देखकर और बढ़ रही है।"

(करण की आँखों की लाल चमक और गहरी हो जाती है। वह धीरे-धीरे सिमरन के और करीब बढ़ता है।)

(सिमरन करण को आते देख एकदम पीछे हट जाती है। उसका दिल तेजी से धड़क रहा है।)

Simran (सहमकर, कांपती आवाज़ में) बोली - 
"प..पास मत आइए… प्लीज़…!"

(उसकी आँखों से डर साफ झलक रहा है। वह घूंघट से अपने चेहरे को ढक लेती है।)

(करण उसके करीब आकर रुक जाता है। उसकी आँखों में आग और होंठों पर हल्की मुस्कान है।)

Karan (खुद से, दबे स्वर में) बोला - 
"सिर्फ एक बूंद… सिर्फ एक बार…"

(वह आगे बढ़ने ही वाला होता है, लेकिन सिमरन की मासूम आँखों का डर देखकर अचानक ठिठक जाता है और गुस्से में दीवार पर हाथ मार देता है।)

"करण की प्यास अब असहनीय हो चुकी थी।
सिमरन की मासूमियत और उसकी मासूम सूरत
उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन चुकी थी।

करण सिमरन के और करीब झुकता है, उसकी लाल आँखें और नुकीले दाँत चमकते हैं। अचानक सिमरन की मासूम आँखों से डर और आँसू देखकर करण ठिठक जाता है।)

"उसकी प्यास चरम पर थी… पर सिमरन की मासूमियत ने उसे रोक लिया।
पहली बार करण ने अपने भीतर के राक्षस से लड़ना सीखा।"


(सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आती है। सिमरन नीली साड़ी में है, उसके गीले बाल कंधों पर बिखरे हैं। वो आईने के सामने खड़ी है, लेकिन उसके चेहरे पर मुस्कान नहीं, सिर्फ़ गहरी सोच और डर है।)


. (करण दरवाज़े पर खड़ा उसे देख रहा है। उसकी लाल आँखें धीरे-धीरे काली हो जाती हैं, जैसे वो अपने असली रूप को छुपाने की कोशिश कर रहा हो।)

"वो उससे दूर भी नहीं रह सकता था… और पास आकर उसे चोट भी नहीं पहुँचाना चाहता था।
यह जंग अब सिर्फ़ प्यास और प्यार की नहीं थी… बल्कि आत्मा और राक्षस की थी।"


(सिमरन कमरे से निकलकर आँगन में जाती है। उसकी साड़ी की पल्लू हवा में लहराता है। करण उसके पीछे-पीछे आता है, लेकिन सिमरन उसकी ओर बिना देखे तेज़ क़दम बढ़ा देती है।)

(करण उसका हाथ पकड़ लेता है। सिमरन घबराकर उसकी आँखों में देखती है। करण की आँखों में गुस्सा, प्यास और एक अजीब-सी लाचारी झलकती है।)

करण (धीमी, भारी आवाज़ में) बोला - 
"भागकर कहाँ जाओगी सिमरन? अब तुम मेरी हो… सिर्फ़ मेरी।"

"सिमरन का डर और करण की प्यास… दोनों आमने-सामने खड़े थे।
पर दिल की गहराई में सिमरन जानती थी कि यही जंग उसकी किस्मत तय करेगी।"