Devil की दास्तान - 15 Sonam Brijwasi द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 15

(हवेली के अँधेरे कमरे में सिमरन बैठी है। उसका चेहरा डर और असहायपन में डूबा हुआ है। करण उसके सामने बैठा है। उसके लाल आँखे जल रही हैं, पंख फैल चुके हैं।)

"करण की प्यास…
उसका जूनून…
अब सीमा पार कर चुका था।
सिमरन की मासूमियत उसके लिए जैसे जहर और मिठास दोनों थी।"

(सिमरन कांपती है, अपने हाथ जोड़कर करण की ओर देखती है।)

Simran (घबराकर, धीमी आवाज़ में) बोली - 
"कृपया… मुझे मत मारिए …
मैं तो आपकी पत्नी हूं ना। 
मैं… मैं डर गई हूँ…"

(लेकिन करण की लाल आँखों में अब नियंत्रण कम दिखता है। उसकी प्यास उसे तेजी से खींच रही है।)

Karan (धीमी, खतरनाक आवाज़ में) बोला - 
"तुम मेरी हो…
और अब…
तुमसे दूर कोई नहीं जा सकता।"

(करण धीरे-धीरे सिमरन के पास आता है। उसके हाथ सिमरन की ओर बढ़ते हैं। लेकिन भीतर से वह खुद को रोकने की कोशिश कर रहा है।)

"करण अपने जूनून को रोकने की कोशिश कर रहा था।
हर अंग उसके अंदर कह रहा था—‘पी लो…’
लेकिन सिमरन की मासूम आँखें…
उसके अंदर की लड़ाई को बढ़ा रही थीं।"

(सिमरन डर के मारे काँपती है। उसका चेहरा डर और आंसू से भीग चुका है।)

Simran (मन ही मन, धीरे से) बोली - 
"कृपया… मुझे मत छुओ…
मैं डर रही हूँ… मैं… मैं कुछ नहीं कर सकती…"

(कमरे में सन्नाटा छा जाता है। केवल सिमरन की कांपती साँसें और करण की धीमी, तेज़ धड़कती धड़कन सुनाई देती हैं।)

"अब हवेली में केवल
सिमरन का डर और
करण की प्यास के बीच की खामोशी थी।
दोनों की लड़ाई—डर और जूनून की—
शुरू ही हुई थी।"

(करण उसका हाथ पकड़ता है और उसे अपने पास खींचता है। उसकी लाल आँखों में अब पूरा जूनून झलकता है।)

"करण की प्यास और जूनून अब पूरी तरह उभर आए थे।
लेकिन सिमरन की मासूमियत और डर ने उसे रोकने की कोशिश की।
दोनों के बीच एक खौफनाक संतुलन बन गया—
प्यास vs मासूमियत।"

(सिमरन काँपती है, उसकी आँखों में आँसू हैं। करण उसका चेहरा देखकर भीतर से लड़ रहा है, पर बाहरी रूप में उसने नियंत्रण खो दिया है।)

(कमरे का अँधेरा और भी गहरा हो जाता है। हवेली के हर कोने में लाल छाया और पंख फैलते दिखाई देते हैं।)

"अब हवेली में केवल डर और जूनून का खेल था।
सिमरन अब पूरी तरह असहाय थी।
करण की प्यास उसे नियंत्रित करने लगी थी।
और कहानी की खतरनाक लहर अभी शुरू ही हुई थी।"

(हवेली के कमरे में अँधेरा गहरा है। सिमरन बिस्तर पर बैठी है, काँप रही है। करण उसके सामने बैठा है। उसके लाल आँखे अब पूरी तरह जल रही हैं, पंख फैल चुके हैं।)

"करण की प्यास अब चरम पर थी।
सिमरन की मासूमियत…
उसके लिए अब केवल चुनौती नहीं,
बल्कि शिकार बन चुकी थी।"

(करण धीरे-धीरे सिमरन के पास आता है। उसका हाथ पकड़कर उसे अपनी ओर खींचता है।)

Karan (धीमी, खतरनाक आवाज़ में) बोला - 
"तुम अब मेरी हो…
कोई तुम्हें बचा नहीं सकता।
मेरी प्यास… अब पूरी होगी।"

(सिमरन डर से काँपती है। उसका चेहरा डर और रोने में भीग चुका है।)

Simran (रोते हुए, घबराकर) बोली - 
"कृपया… मत करो…
मैं डर गई हूँ…"

(करण सिमरन को पूरी तरह अपने पास रखता है। उसका जूनून अब किसी भी रोक से मुक्त है।)

"अब सिमरन पूरी तरह असहाय थी।
करण की प्यास ने उसे अपने नियंत्रण में ले लिया।
मासूमियत और डर के बीच का संतुलन टूट चुका था।
अब हवेली में केवल लाल आँखें और जूनून का खेल बचा था।"

(सिमरन काँपती हुई उसके हाथों में फँसी रहती है।)

(कमरे की खिड़कियों से रात की ठंडी हवा आती है। हवेली में छायाएं और भी डरावनी हो जाती हैं।)

"सिमरन अब पूरी तरह करण के नियंत्रण में थी।
लेकिन हवेली में अभी भी खतरा था।
और कहानी की खतरनाक लहरें अभी खत्म नहीं हुई थीं।"

(हवेली के कमरे में रात गहरी है। सिमरन काँपते हुए बैठी है, लेकिन धीरे-धीरे उसकी आँखों में डर के साथ थोड़ी हिम्मत दिखने लगती है।)

"सिमरन....
जो डर और असहायपन में डूबी थी,
उसकी मासूमियत अब उसकी ताक़त बन चुकी थी।
वह जानती थी… केवल डर के दम पर वह अपने पति के जूनून को कम कर सकती है।
और ना ही उसे वो छोड़कर जा सकती थी क्योंकि ये उसके संस्कारों के खिलाफ था।"

(सिमरन धीरे-धीरे अपनी छोटे-से हाथ उठाती है और करण की लाल आँखों के सामने अपने मासूम चेहरे से उसे देखती है।)

Simran (धीमी, पर हिम्मत भरी आवाज़ में) बोली - 
"कृपया…
मैं डरती हूँ…
लेकिन मैं आपको… आपका जूनून बढ़ाने नहीं दूँगी…"

(करण की आँखों में जलती आग अचानक धीमी पड़ती है। उसका जूनून और प्यास थमते हुए महसूस होती है।)

"सिमरन की मासूमियत… उसका डर और ईमानदार चेहरा…
करण के भीतर की प्यास और जूनून को रोकने लगा।
उसकी लाल आँखों की आग धीरे-धीरे कम होने लगी।"

(करण सिमरन को अपने पास रखते हुए अब उसे डराने के बजाय देखता है। उसकी प्यास भीतर ही रह जाती है।)

Karan (धीमी, गंभीर आवाज़ में) बोला - 
"तुम… तुम सच में अलग हो…
तुम्हारी मासूमियत…
मेरी प्यास को रोक रही है…"

"अब हवेली में केवल डर नहीं…
बल्कि मासूमियत और जूनून का अजीब सा संतुलन बन गया था।
सिमरन की हिम्मत ने पहली बार करण पर असर डाला।"

(हवेली के कमरे में सिमरन बैठी है। उसका चेहरा डर और आश्चर्य के मिश्रित भाव में है। करण उसके सामने बैठा है, लेकिन अब डराने के बजाय उसकी तरफ धीरे-धीरे झुकता है।) 

"करण अपनी प्यास को रोकने की पूरी कोशिश कर रहा था।
लेकिन सिमरन की मासूमियत उसे रोक रही थी।
अब वह उसके करीब आ रहा था… धीरे-धीरे, बिना खतरे के।"

(करण धीरे-धीरे सिमरन के पास बैठा  है। उसके लाल आँखों में अब भी आग है, लेकिन वह उसे नियंत्रित करने की कोशिश कर रहा है।)

Karan (धीमी, गंभीर आवाज़ में) बोला - 
"तुम… तुम्हारी मासूमियत…
मेरी प्यास को रोक रही है।
मैं अब तुम्हें डराना नहीं चाहता।
लेकिन… अपनी प्यास को पूरी तरह रोक पाना आसान नहीं है…"

(सिमरन काँपती है, पर अब डर के साथ उसके चेहरे पर थोड़ी हिम्मत भी दिखाई देती है।)

Simran (धीमी आवाज़ में) बोली - 
"मैं… मैं डरती हूँ…
लेकिन मुझे पता है… आप… केवल अपनी प्यास को रोकने की कोशिश कर रहे हो।"

"अब हवेली में केवल डर नहीं…
बल्कि धीरे-धीरे विश्वास भी जन्म लेने लगा।
सिमरन की मासूमियत और उसकी छोटी-सी हिम्मत…
करण की लाल आँखों में जूनून को कम कर रही थी।
दोनों के बीच एक अजीब-सा संतुलन बन गया था—
डर और सुरक्षा, प्यास और नियंत्रण।"