Devil की दास्तान - 14 Sonam Brijwasi द्वारा नाटक में हिंदी पीडीएफ

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Devil की दास्तान - 14

(शादी का हॉल सज चुका है। लाल जोड़े में सिमरन खड़ी है। उसका चेहरा दुःख और डर से फीका पड़ा है।)

"सिमरन… लाल जोड़े में, मासूमियत की आड़ में
डर और निराशा छिपाए हुए किसी परी की तरह लग रही थी।
करण के रिश्तेदार आए थे,
पर सिमरन उन्हें असली रूप में देख सकती थी…
वो सब शैतान थे।
बाकी लोग उन्हें केवल इंसान समझ रहे थे।
18 साल की मासूम बच्ची के साथ ये सब हो रहा था।
और लोग खुश हो रहे थे, नाच रहे थे, गा रहे थे। "

(सिमरन अपने हाथ जोड़कर खड़ी है। उसकी आँखें फैल रही हैं। उसका हृदय तेज़ी से धड़क रहा है।)

Simran (मन ही मन) बोली - 
"ये सब… ये सब… कैसे हो सकता है?
मैं… मैं कहाँ फंस गई हूँ…"

(वो धीरे-धीरे करण की ओर झुकती है, आँखों में आँसू हैं।)

"सिमरन का डर इतना गहरा था कि उसका दिल तेज़ी से धड़क रहा था।
उसकी मासूमियत… उसकी कमजोरी…
करण के लिए सिर्फ़ लालच और प्यास बढ़ा रही थी।"

( सिमरन भी हर दुल्हन की तरह स्टेज पे रखे सोफे पे बैठी है। और सबको देख रही है। करण धीरे-धीरे उसके पास आता है। उसका हाथ सिमरन की कमर पर टिकता है। लाल आँखों की आग अब भी शांत नहीं हुई है।)

Karan (धीमी, खतरनाक आवाज़ में) बोला - 
"डर मत…
लेकिन ये याद रखो…
आज से तुम हमेशा मेरे साथ हो।
और कोई तुम्हें छू भी नहीं सकता।"

(सिमरन कांपती है, लेकिन उसकी आँखों में डर और घबराहट साफ़ झलकती है।)

"करण ने उसे हौले-हौले संभाला,
लेकिन उसकी लाल आँखों में प्यास और जूनून…
सिमरन को हर पल महसूस हो रहा था।
वो डर रही थी…
लेकिन अब भागने का कोई रास्ता नहीं था।"

(रिश्तेदारों की ओर कैमरा घूमता है। वे सब इंसान के रूप में खड़े हैं, लेकिन सिमरन उन्हें असली रूप में देख सकती है—लाल आँखें, सींग, और छिपे हुए पंख।)

"सिमरन अकेली थी…
उसकी नजरों के सामने असली शैतान खड़े थे,
पर कोई और उन्हें नहीं देख सकता था।
वो पूरी तरह घबराई हुई थी…
और केवल करण की बाँहों में सुरक्षित महसूस कर रही थी।"

(करण उसका हाथ पकड़कर उसे धीरे-धीरे अपनी ओर खींचता है। उसकी लाल आँखों में आज भी प्यास की आग जल रही है। पंडित जी ने मंत्र पढ़े। करण ने पहले उसे मंगलसुत्र पहनाया। फिर सिन्दूर लगाया। सिमरन घबराई सी उसे देख रही थी। फिर दोनों ने फेरे लिए। सिमरन की नजर बार बार करण के रिश्तेदारों पे चली जाती जिन्हें देखकर वो सहम जाती। )

(शादी का समारोह संपन्न हुआ। सिमरन लाल जोड़े में खड़ी है। उसका चेहरा मासूम है, लेकिन मुस्कान की जगह डर है।)

"शादी हो चुकी थी।
सिमरन… लाल जोड़े में किसी परी की तरह लग रही थी,
पर उसकी मासूम मुस्कान अब डर में बदल चुकी थी।
करण की प्यास और जूनून अब और बढ़ चुके थे।

(करण सिमरन का हाथ पकड़कर हवेली की ओर ले जाता है। हवेली विशाल और डरावनी है। बड़े-बड़े झूमर, काले पर्दे, और लंबी सीढ़ियाँ हैं।)

Simran (मन ही मन, काँपते हुए) बोली - 
"इतनी बड़ी… इतनी डरावनी…
मैं… मैं कैसे रहूँगी यहाँ?"

"सिमरन डर रही थी।
वह छोटी और मासूम थी,
और इस विशाल हवेली की छाया में उसका डर और बढ़ गया।"

(करण लाल आँखों से सिमरन को देखता है। उसकी प्यास अब और बढ़ गई है। पंख फैलते हैं और उसकी शक्ति हवेली में झलक रही है।)

Karan (धीमी, गंभीर आवाज़ में) बोला - 
"अब… तुम हमेशा मेरे पास हो।
दिन हो या रात…
तुम मेरी हो।
और तुम्हारी मासूमियत… बस़ मेरी प्यास को और बढ़ा रही है।"

(सिमरन काँपती है, उसकी आंखों में आँसू हैं। वह करण के हाथों में मजबूर है।)

"शादी के बाद भी सिमरन का डर कम नहीं हुआ था।
करण की प्यास और शक्ति…
हर पल उसे महसूस हो रही थी।
अब हवेली उसका नया कैदखाना बन चुकी थी।"

(सिमरन कमरे में खड़ी है। बाहर हवेली की बड़ी खिड़कियों से रात का अँधेरा झाँक रहा है।)

Simran (धीमी आवाज़ में, खुद से) बोली - 
"मैं डरती हूँ…
पर अब कोई रास्ता नहीं।
ये हवेली… ये लाल जोड़ा…
और वो… मेरी जिंदगी की हकीकत बन गए हैं।"

(करण पास आता है और सिमरन को धीरे-धीरे अपनी ओर खींचता है। उसकी लाल आँखों में अब भी प्यास की आग है।)

"शादी के बाद…
सिमरन की मासूमियत और डर,
करण की प्यास और जूनून…
सब एक साथ हवेली में बंद हो गए थे।"


(सिमरन हवेली के गलियारे में धीरे-धीरे पीछे मुड़ते हुए भागने की कोशिश करती है। उसका चेहरा डर और हिम्मत के मिश्रण में है।)

"सिमरन… भागने की कोशिश कर रही थी।
पर हवेली की विशालता और डरावनी छायाओं ने उसका मन में डर बढ़ा दिया था।"

(वह अचानक करण से टकरा जाती है। उसका संतुलन बिगड़ जाता है और वह जमीन पर गिर पड़ती है।)

Simran (दर्द में, रोते हुए) बोली - 
"आह… मेरा पैर! मैं… मैं नहीं चल सकती…"

(सिमरन की नज़रों में निराशा और डर साफ़ दिखाई दे रहा है।)

"उसके पैर में मोच आ गई थी।
अब उसके पास रोने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा था।
मासूम सिमरन पूरी तरह असहाय हो गई थी।"

(करण धीरे-धीरे उसके पास आता है। लाल आँखों में आग और जूनून है। वह सिमरन को उठाता है और अपने मजबूत हाथों में संभालता है।)

Karan (धीमी, गंभीर आवाज़ में) बोला - 
"अरे… डरने की कोई जरूरत नहीं।
अब तुम हमेशा मेरे पास हो।
और किसी भी हाल में… तुम मुझे छोड़ नहीं सकती।"

(सिमरन उसकी बाँहों में डर और रोने के मिश्रण में सुरक्षित महसूस कर रही है।)

"सिमरन अब पूरी तरह असहाय थी।
उसकी मासूमियत और डर ने करण की प्यास को और बढ़ा दिया था।
और हवेली का हर कोना अब उसका कैदखाना बन चुका था।"L

(करण सिमरन को अपने कमरे में ले जाता है। कमरे की हल्की रोशनी में लाल पर्दे और गहरे फर्नीचर दिखते हैं। सिमरन अब बैठकर रो रही है।)

Simran (धीमी आवाज़ में, रोते हुए) बोली - 
"मैं… मैं कैसे बचूँगी…? वो मुझे मार देंगे।"

"अब हवेली में, रात और लाल आँखों के बीच…
सिमरन की असहाय स्थिति और करण की प्यास
दोनों एक साथ थे।
इस खेल का अगला कदम अब तय होना था।"


(सिमरन कमरे में लाल जोड़े में बैठी है। उसका चेहरा मासूम, लेकिन डर से भरा हुआ है। लाल जोड़े का रंग उसकी मासूमियत के साथ-साथ उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहा है।)

"सिमरन… लाल जोड़े में बैठी थी।
लाल रंग उसकी मासूमियत और खूबसूरती को और बढ़ा रहा था।
करण… जिसकी प्यास कई दिनों से बढ़ रही थी…
अब खुद पर काबू नहीं रख पा रहा था।"

(करण धीरे-धीरे उसके पास आता है। उसकी लाल आँखों में आग है। हाथ बढ़ाकर वह सिमरन को काटने की कोशिश करता है।)

Simran (घबराकर, रोते हुए) बोली - 
"नहीं… मत काटिए मुझे… please…!"

(लेकिन सिमरन की मासूमियत… उसकी डरती हुई पर ईमानदार आँखें… करण को अंदर से रोक देती हैं। उसका हाथ थम जाता है।)

"करण की प्यास… उसके जूनून…
सिमरन की मासूमियत और डर ने उसे रोक दिया।
उसकी लाल आँखें अब भी जल रही थीं,
पर उसका दिल उस मासूम चेहरे के सामने पिघल गया था।"

(सिमरन कांपती हुई बैठी है। करण उसका हाथ पकड़ता है, लेकिन काटने की बजाय धीरे-धीरे उसकी सुरक्षा में खड़ा रहता है।)

Karan (धीमी, गंभीर आवाज़ में) बोला - 
"तुम… इतनी मासूम हो…
और तुम्हारी मासूमियत…
मेरी प्यास को रोक रही है…
पर ये केवल थोड़ी देर के लिए…"

"अब सिमरन की मासूमियत…
करण की प्यास और जूनून के बीच एक अजीब संतुलन बन चुकी थी।
डर और जूनून… दोनों के बीच…
अभी कहानी का अगला खतरा छिपा हुआ था।"


(रात का समय। हवेली में अँधेरा फैला हुआ है। लाल झूमर हल्की रोशनी दे रहे हैं। समय के घड़ी के सुई 12 बजे तक पहुँचते हैं।)

"रात के 12 बज चुके थे।
करण अब अपने असली रूप में आने वाला था।
लेकिन उसे सिमरन को डराना नहीं था।
उसकी मासूमियत को किसी भी हाल में चोट नहीं पहुँचानी थी।

(करण धीरे-धीरे सिमरन के कमरे में आता है। उसकी लाल आँखें अब शांत हैं, पंख पीछे झुके हुए हैं।)

Karan (धीमी, गंभीर आवाज़ में) बोला - 
"सिमरन…
अब तुम सो जाओ।
रात में किसी भी हाल में अपनी आँखें मत खोलना।
अगर तुम जागोगी…
तो तुम्हारे लिए खतरा बढ़ सकता है।"

(सिमरन काँपते हुए बिस्तर पर लेटती है। उसका चेहरा डर और असहायपन में डूबा हुआ है।)

"सिमरन ने उसकी चेतावनी सुनी।
वह धीरे-धीरे आँखें बंद करती है,
पर डर अभी भी उसके दिल में बस गया था।"

(सिमरन सो जाती है, लेकिन उसकी साँसें तेज़ हैं। उसकी आँखें समय-समय पर हल्की खुलती हैं, पर डर से वह फिर बंद कर देती है।)

Simran (मन ही मन, धीरे से) बोली - 
"मैं… मैं सो जाऊँ…
लेकिन डर…
ये डर मेरे साथ रहेगा…"

"रात के 12 बजे…
करण अपने असली रूप में आया।
सिमरन सो गई, लेकिन उसका डर और असहायपन अब भी कायम था।
अब हवेली में केवल अँधेरा, लाल आँखें और जूनून का खेल बाकी था।"

(रात के अँधेरे में हवेली शांत है। घड़ी के सुई आधी रात दिखा रही हैं। सिमरन की नींद अचानक टूटती है।)

"आधी रात थी।
सिमरन की आँखें धीरे-धीरे खुली…
और सामने उसने देखा… करण।
लेकिन अब वह इंसान नहीं था।"

(सिमरन के सामने करण खड़ा है। उसका असली रूप भयानक है। बड़े-बड़े सींग, लंबे नुकीले दांत और लाल आँखें। उसके विशाल काले पंख फैल रहे हैं।)

Simran (घबराकर, चिल्लाते हुए) बोली - 
"आह… ये… ये कौन है…?"

(करण धीरे-धीरे सिमरन की तरफ झुकता है। उसकी प्यास और जूनून अब स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।)

"सिमरन डर से काँप रही थी।
उसकी मासूमियत और डर…
करण के असली रूप के सामने फीकी पड़ गई थी।"

(करण अपने नुकीले दांत दिखाते हुए सिमरन के पास झुकता है।)

Karan (खतरनाक, धीमी आवाज़ में) बोला - 
"तुम… मेरी हो…
और अब…
कोई तुम्हें बचा नहीं सकता।"

( सिमरन घबराकर बैठ जाती है। सिमरन पीछे हटने की कोशिश करती है, लेकिन डर और उसके पैर की चोट की वजह से वह स्थिर  हो जाती है।)

Simran (रोते हुए) बोली - 
"कृपया… मत कीजिए… मैं… मैं डर गई हूँ…"

"करण ने उसे दाँत दिखाकर डराना शुरू किया।
सिमरन पूरी तरह असहाय थी।
उसकी मासूमियत और डर…
करण की प्यास और असली शक्ल के बीच फंस गई थी।"

(हवेली के अँधेरे में केवल लाल आँखें, पंख फैलती छाया और सिमरन का डर दिखाई दे रहा है।)

"आधी रात…
सिमरन और करण की कहानी
असली खतरे, डर और प्यास के बीच
और गहराई तक पहुँच चुकी थी।
अब हवेली केवल उनका कैदखाना नहीं…
बल्कि डर और जूनून का मैदान बन चुकी थी।"