चुड़ैल गायब हो चुकी है। सिमरन काँपते हुए उस पेड़ के पास खड़ी है जहाँ से पानी की हल्की सरसराहट सुनाई दे रही है। उसका चेहरा पीला, आँखें फैल गई हैं।)
Simran (धीमी, डरती आवाज़ में) बोली -
"आ… आप कौन हो? क्यों… क्यों मुझे डराते हो आप?"
(करण उसके पास खड़ा है। उसकी लाल आँखों में अब भी आग है, पंख अभी भी फैले हैं।)
Karan (धीमे स्वर में, गंभीर होकर) बोला -
"मैं… मैं सिर्फ़ तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचने देता।
लेकिन ये… ये सिर्फ़ तुम्हारे लिए नहीं है।
ये मेरी प्यास है… मेरी ताक़त।
और कोई इसे नहीं छू सकता।"
(सिमरन अपने हाथों से अपना सिर पकड़ती है। उसके होंठ काँप रहे हैं।)
"सिमरन अब पहली बार समझ रही थी…
करण का डर, उसका लाल रंग, उसकी ताक़त…
सब सिर्फ़ उसकी प्यास और जूनून का हिस्सा थे।
प्यार? नहीं… सिर्फ़ खून और शक्ति।"
(करण थोड़ी दूरी पर खड़ा है। उसका चेहरा ठंडा, लेकिन आँखों में आग। वह गहरी साँस लेता है।)
Karan बोला -
"सुन लो… अगर तुमने कभी मेरी प्यास का मज़ाक उड़ाया…
या मुझे रोकने की कोशिश की…
तो मैं… तुम्हें छोड़ूंगा नहीं।
बस याद रखना… ये खेल मेरे नियमों से चलता है।"
(सिमरन डर के मारे जमीन पर बैठ जाती है। उसका मासूम चेहरा लाल आँखों के सामने और भी छोटा और कमजोर लगता है।)
(समंदर की धूप-सी हल्की लहरें और जंगल की हवा में एक डरावनी खामोशी। करण अपनी पंख फैलाए पास खड़ा है। सिमरन अब पूरी तरह उसकी ताक़त और प्यास को समझ चुकी है।)
"अब सिमरन जान चुकी थी —
करण कोई इंसान नहीं,
और उसका प्यार नहीं…
उसकी दुनिया सिर्फ़ उसकी प्यास और शिकार की थी।"
(सिमरन जंगल के किनारे खड़ी है। उसका चेहरा अभी भी मासूम और डरा हुआ दिखता है, उसके लंबे बाल हवा में लहरा रहे हैं। लेकिन उसकी आँखों में अब अजीब सी चमक है।)
"सिमरन… जो बाहर से मासूम और भोली लगती थी,
वो अब सिर्फ़ इतनी नहीं थी।
उसने ठान लिया था—
वो इस शैतान को… एक इंसान बनाएगी।
उसकी प्यास… उसके जूनून…
सबको बदलकर, उसे खुद के करीब लाएगी।"
(सिमरन अपने हाथ जोड़कर धीरे-धीरे कहती है।)
Simran (धीमी, गंभीर आवाज़ में) बोली -
"आप जो भी हो… आप कितने भी शक्तिशाली हों…
मगर मैं… आपको बदल दूँगी।
आपको इंसान बनाना… मेरा काम है।"
(करण पास ही खड़ा है। वह सिमरन की मासूमियत में डूबा हुआ सोचता है कि उसे डर और सहमना चाहिए। लेकिन सिमरन की आँखों में जो चमक है, उसे कुछ समझ नहीं आता।)
Karan (मन ही मन, गहरी लाल आँखों से) बोला -
"तुम… इतनी मासूम दिखती हो…
पर कुछ तो है…
ये बच्ची… डरती नहीं…
ये शिकार नहीं… ये मेरे खेल का हिस्सा नहीं…"
(करण पंख फैलाकर थोड़ा पीछे हटता है। उसकी लाल आँखों में अब चिंता और उत्सुकता दोनों झलकती हैं।)
(सिमरन धीरे-धीरे करण के पास आती है। वह डरती नहीं, बल्कि उसकी चाल में अजीब आत्मविश्वास है।)
Simran (धीमे स्वर में) बोली -
"मैं डरती नहीं…
मैं सिर्फ़ आपको समझना चाहती हूँ।
और अगर आप मुझे मौका दोगे…
मैं आपको इंसान बना दूँगी।"
(करण के पंख थोड़े सिकोड़े जाते हैं। वह सोचता है कि ये बच्ची कैसी है जो डरती नहीं और उसके जूनून के सामने भी ठहर गई।)
"अब कहानी का नया मोड़ आ गया था।
मासूम दिखने वाली लड़की…
शैतान को बदलने की जिद में…
अपने डर को ताक़त बना चुकी थी।"
सिमरन अपने छोटे से कमरे में बैठी है। नौकरी में उसने जल्दी सफलता पा ली है। पर वो अब भी मासूम और थोड़ी डरी हुई है।)
"सिमरन… छोटी थी शादी के लिए,
पर नौकरी जल्दी लग गई थी।
करण का जूनून… उसका शिकार बनने का प्यास…
हर दिन और बढ़ रही थी।
उसकी बिरादरी वाले भी लगातार उसे परेशान कर रहे थे।"
(करण अपने कमरे में बैठा है। लाल आँखों में आग और पंख फैलाए हुए। उसके चेहरे पर गंभीरता है।)
Karan (मन ही मन) बोला -
"अब… कोई रास्ता नहीं।
चाहे दिन हो या रात…
सिमरन हमेशा मेरे पास रहेगी।
कोई उसे मेरे हाथों से नहीं छीन सकता।
पर दिन में तो वो मेरे पास रह सकती है , पर रात में कैसे?"
(वह अपनी बिरादरी को बुलाता है और योजना बताता है।)
Karan (गंभीर स्वर में) बोला -
"सुनो…
हमेशा ध्यान रखना।
सिमरन… सिर्फ़ मेरी है।
जो भी उसे मेरे पास आने से रोकेगा…
उसे रास्ते से हटा दो।"
(बिरादरी वाले सिर झुकाकर सहमति देते हैं। हवा में उनकी आँखों में लाल चमक और शक्ति झलकती है।)
(सिमरन अब धीरे-धीरे महसूस करती है कि उसके सामने केवल दो रास्ते हैं — या तो वो अपनी ज़िंदगी गंवा देगी या करण की इच्छा के अनुसार चलेगी।)
"सिमरन के सामने एक रहस्य भरा रास्ता था —
शादी… या करण के पास हमेशा रहने का फ़ैसला।
मासूम दिखने वाली लड़की… अब समझ चुकी थी
कि उसके लिए खेल और जूनून में कोई फ़र्क़ नहीं।"
(सिमरन खिड़की से बाहर देखती है। उसकी आँखों में डर और संकल्प दोनों हैं।)
Simran (धीमे स्वर में, खुद से) बोली -
"मैं डरती हूँ…
पर मैं ये तय करूँगी कि…
मैं अपनी ज़िंदगी के लिए लड़ूँगी…
चाहे रास्ता कितना भी खतरनाक क्यों न हो।"
(सिमरन अपने कमरे में बैठी है। उसका चेहरा डर और घबराहट से फीका पड़ गया है। दरवाज़े पर अचानक लाल आँखों वाला करण खड़ा होता है।)
"करण… अपनी प्यास और जूनून के आगे
किसी को भी नहीं छोड़ता था।
इस बार उसने… सिमरन के माता-पिता को वश में कर लिया।
अब सिमरन अकेली थी…
और उसके सामने केवल डर और मजबूरी थी।
(करण सिमरन के माता-पिता से बात कर रहा है। उनके चेहरे पर कोई इशारा नहीं है, आँखें लाल और खाली दिख रही हैं।)
Karan (ठंडी आवाज़ में) बोला -
"मैं सिर्फ़ इतना चाहता हूँ…
कि आप अपनी बेटी को मेरी तरफ़ आने दें।
शादी… और अब कोई बहाना नहीं चलेगा।"
(माता-पिता धीरे-धीरे सिर झुकाते हैं। उनकी आँखों में अब कोई विरोध नहीं है। करण की शक्ति और वश में होने का असर साफ़ दिख रहा है।)
"सिमरन की कोशिशें, उसके रोने और मिन्नतें…
कुछ भी असर नहीं कर पाईं।
उसके माता-पिता… अब करण के वश में थे।"
(सिमरन खड़ी है, हाथ जोड़कर मिन्नत करती है। उसकी आँखों में आँसू हैं।)
Simran (डरी हुई, रोते हुए) बोली -
"नहीं… मम्मी पापा… मैं… मैं नहीं चाहती…
कृपया ऐसा मत होने दो…"
(मगर माता-पिता शांत और खाली नजरों से उसे देख रहे हैं। उनके हाथ और आँखें स्पष्ट रूप से करण के नियंत्रण में हैं।)
"अब सिमरन पूरी तरह फंस चुकी थी।
वो डर रही थी…
लेकिन कुछ भी कर पाने की हिम्मत नहीं थी।
करण की प्यास, उसकी ताक़त और बिरादरी के वश ने
उसके लिए रास्ता तय कर दिया था।"
(करण सिमरन के पास आता है। उसकी लाल आँखों में आग और पंख फैलाए हुए।)
Karan (धीमे, गंभीर स्वर में) बोला -
"देखा… अब तुम्हारे पास कोई विकल्प नहीं।
चाहे दिन हो या रात…
तुम हमेशा मेरे पास रहोगी।
और शादी… बस़ एक औपचारिकता है।"
(सिमरन काँपती है। उसका मासूम चेहरा डर और निराशा में डूबा हुआ है।)
"अब कहानी का एक नया मोड़ आया था—
जहाँ सिमरन का डर,
करण की प्यास,
और उसके माता-पिता की मजबूरी
सब एक-दूसरे में उलझ गए थे।"