"तोड़ी दोस्ती"
-----------------मुक्तेश्वर मुकेश
अब फिर भेंट नहीं होगी। उसने क्यूं इतनी जल्दबाजी की ? क्यों छोड़ गया अपने यार दोस्त और परिवार को ? बड़ी निष्ठुरता दिखायी।
हां, सुरेन्द्र की बात कर रहा हूं।मंहत सुरेन्द्र,भजन गायक सुरेन्द्र, हारमोनियम वादक सुरेन्द्र,मेरा बाल सखा सुरेन्द्र!
समूचा जीवन चक्र घूम रहा मेरी आंखों में। पल पल विपत्तियों का सामना करने, फिर भी मुस्कुराते रहने वाला इंसान, संकटों की आग में तिल तिल जलने वाला, आज श्मसान की आग में भस्म हो गया।
खबर मिलते ही रो पड़ा। गांव की हर घटनाओं से लेकर सामाजिक विखंडन पर चर्चा होती थी। मैं अभी कतरा कतरा बिखर गया हूं।
लेकिन उन संघर्षों को कभी नहीं भूलूंगा जिनसे उबरने के लिए सुरेन्द्र गायक - वादक बना और बिखरे हालात को समेटा।
कुछ वर्षों पीछे ले जाता हूं। गांव में साथ साथ पढ़ते थे तो स्वाभाविक रूप से दोस्ती थी।हम उम्र बाल मंडली में कई थे। स्कूल में छुट्टी के बाद परन्तु सुरेन्द्र , वीरेंद्र,अनिल,विलायती,लालो, रामबिलास जैसे करीबी एक साथ कबड्डी ,फुटबॉल,दोल पत्ता,गुली-डंडा, कौड़ी और गोलियां भी खेला करते। हालांकि रोज़ रोज़ नहीं खेल पाते थे।पिता जी का मेरी पढ़ाई पर खास ध्यान था।इस लिए फ्री टाइम कम मिलता था। किताब- कापियां भी सयम समय पर सुरेन्द्र को देते।पढ़ाई और खेल दोनों में वह तेज था।स्कूली जीवन की अनगिनत यादें मानस पटल में अंकित हैं।
मिडिल पास के बाद वह दोनों जुड़वां भाई सुरेन्द्र वीरेंद्र अपनी बहन के पास जाकर पढ़ने लगा।खेती बाड़ी परम्परागत रहने के कारण अनाज दलहन की कमी तो थी ही।गरीबी काफी थी।
इधर मैं अपने पास के हाई स्कूल में पढ़ रहा था। मेरी मैट्रिक की परीक्षा हो चुकी थी।
परीक्षा देकर कुछ पुनः गांव में ही सुरेन्द्र वीरेंद्र रहने लगा। दोनों भाइयों ने हारमोनियम और ढ़ोलक बजाना सीख लिया।इलाका का ही जवाहर महंत एवं अन्य ने गायन वादन सिखा दिया। धीरे धीरे गांव और बाहर जाकर फिल्मी धुनों पर पैरोडी भजन कीर्तन के गीत बनाकर गाने का काम शुरू किया। इस प्रकार कुछ नवयुवकों की एक गायन मंडली बन गयी।इससे कुछ आर्थिक प्राप्ति हो जाती।इसी दौरान सुरेन्द्र के पिता जगदीश चा नेशनल हाईवे पर पैदल जाने के क्रम में ट्रक के पलटने से कुचले गये। मृत्यु के तीन चार दिन बाद घटना की खबर उनलोगों को हुई। दुखों का पहाड़ टूट पड़ा।
सुरेन्द्र तीन भाइयों को अब मजदूरी करने की नौबत आ गयी। सड़क के रिंग बांध में मिट्टी काटने लगे।सिर पर मिट्टी का छिट्टा ढ़ोते, दैनिक पारिश्रमिक पाते।फिर भी गायन वादन रूका नहीं।एक भाई देवेन्द्र कलकत्ता कमाने चला गया।
कालेज से छुट्टियों में घर आता तो मैं भी अपने बाल सखा का कभी हारमोनियम, तो कभी ढ़ोलक बजाने की कोशिश करता।इसी क्रम में सुरेन्द्र कहता मैं अब गाने बजाने के लिए दूसरे गांवों में जाने लगा हूं।रूपये पैसों के अलावा काफी स्वागत,इज्जत मिलता है। अब यही मेरे जीवन यापन का साधन है।मेरे गायन पर तो युवतियां मुग्ध हो जाती हैं।
वह कैसे,मेरे पूछने पर बताता है -गाना बजाना खतम कर जब बुलाने वाले के दालान पर रात में रुकता हूं,तब गीत लिखाने आ जाती हैं कई।बोलती हैं,जब आप गाते हैं तो लगता है सुनती ही रहूं। बहुत अच्छा गाते हैं।पता भी मांगती है।
यह सुन मन में मुझे भी गाना गाने का शौक होता। पर वापस कालेज जाने के बाद फिर सब इच्छाएं गायब हो जातीं।
अब सुरेन्द्र-वीरेंद्र की टोली में छह सात लड़के और शामिल हो गये। उसमें दो नृत्य भी करते। विलायती,अनिल,प्रभु दा,जगदेव का, सुधीर,ललन कुछ दूसरे गांव के युवक भी शामिल थे।अब दोनों भाई लाल तिलक भी लगाने लगा। सुरेन्द्र सिंह मंडली का महंत कहलाने लगा।
जल्दी शादी भी हो गयी। बच्चे भी हुए। परिवार बढ़ने से जीवन यापन में कठिनाइयां आने लगी। आवश्यकता पूर्ति के लिए खेतों में, भट्ठों पर ,बांध में मिट्टी कटाई कर मजदूरी करनी ही करनी पड़ती।जरा सा आराम नहीं।पत्नी बीमार रहती,बच्चे बीमार रहते तो दवाई आदि में काफी व्यय होता।मेरा मित्र था इसलिए मैं भी उसके कष्ट को अपना कष्ट समझ मदद के लिए तत्पर रहता।
मेरे गांव में राम-जानकी विवाहोत्सव मनाया जाता है,हर साल अग्रहण शुक्ल पक्ष पंचमी को।अब गांव के मेरे भाइयों समेत गांव के युवकों ने "किसलय नाट्य संस्था" बनाया और निर्णय लिया गया कि दो रात के कार्यक्रम में दो नाटक का मंचन किया जाय।मेरी और सुरेन्द्र की अगुवाई में इस काम को शुरू करने की पहल हुई। मैं पड़ोस के समस्तीपुर ग्राम के अपने मित्र देवेन्द्र राय को और सुरेन्द्र अपने बहनोई सबदल पुर गांव के राम शरण सिंह को नाटक में अभिनय करना सिखाने के लिए बुला लिये।दिन में सभी पात्र अपना पाठ याद करते और रात में दोनों निर्देशकों से अभिनय सीखते।रात में आठ बजे से ग्यारह बजे तक कभी अनिरुद्ध का के,तो कभी त्रिगुण का या स्कूल कमरा में रिहर्सल चलता।पचास से अधिक युवकगण,अधेड़ विष्णुदेव का, राम पुकार का , गोपाल जी का, गजेन्द्र दादा सहित कई छोटे- छोटे बच्चे जमे रहते। उनके समक्ष ही रिहर्सल होता।पहली बार जो नाटक मंचन की शुरुआत होने वाली थी।यह साल था 1979 का। नाटक के लिए पर्दा सबदल पुर गांव से रामशरण बाबू के सहयोग से लाया गया।मेकअप की सामग्रियां देवेन्द्र राय ने खगड़िया और मूर्तिकार रामशरण पंडित द्वारा लाया गया।दृश्य सज्जा के लिए बड़े बड़े पत्थरों को,जो सड़क किनारे बिछे थे दो चार जमा कर लिए सभी पात्र मिलकर कर । जंगली दृश्य के लिए सिनुआर की पत्तियां लगी टहनियां,बघन्डी की टहनियों का इंतजाम दिन में ही कर लिया गया।नाटक में पीछे से प्रांट करने का भार रामशरण बाबू और दिवाकर भाई को मिला।" पांच डाकू" नाटक होना था।रामशरण और देवशरण ने मेकअप किया।ललन,संजय नारी पात्र थे।
नाटक के बेहतरीन प्रदर्शन से इलाका में शोर मच गया। दूसरे दिन नाटक देखने के लिए अपार भीड़ लग गयी। अखबारों में समाचार छपा। नवयुवकों में जोश भर आया।
इस सफलता पर युवकों में गजब की एकजुटता आयी। कुछ नया कर गुजरने की ठान ली।चन्दा कर राम मंदिर निर्माण का कार्य युवकों नेश् शीघ्र पूरा कर दिखाया।
इस तरह गांव की आपसी संघर्षों को मिटाने, लड़ाई झगड़ा रोकने के लिए भी एक संघ बनाया गया। इसमें सुरेन्द्र और मैं काफी सक्रिय था।यह सत्य भी है, इस कारण हमारे गांव से एक भी मामले थाने नहीं जाते।हम सब मिलकर समाप्त करा देते।
सुरेन्द्र का परिवार कुछ बढ़ गया था।दो बेटी और पांच बेटा का लालन पालन संकट में डाले रहता। इसलिए शरीर पर बिना ध्यान दिए रात दिन परिश्रम करता। विशेष परिस्थितियों में रूपये की तंगी भी आती रहती।इधर उधर से पूरा कर फिर लौटाता। वैसे वह बहुत खुद्दार था।हाथ पसारना तो सीखा ही नहीं।खर्चे पूरे करने के लिए अपने गांव और पड़ोस के गांव जाकर सुबह से शाम तक तीन चार घंटे ट्यूशन पढ़ाता था।
मैं जब नौकरी के सिलसिले में बाहर दूसरे शहर में रहने लगा। तो मेरे लिए सुरेन्द्र पूरे गांव की छोटी बड़ी खबर, घटनाओं की विस्तार से जानकारी देता। घंटों साथ में बैठे रहते। ईर्ष्या करने वाले कहते-दोनों गुरु घंटाल बैठ कर कितनी देर से खुसर फुसर कर रहा है। लेकिन वास्तव में हम दोनों गांव की समस्याओं से व्यथित रहते। मैं गांव के विकास में राजनीतिक और प्रशासनिक मदद पहुंचाने की हरसंभव प्रयास करता। इसमें मेरे मित्र का बहुत सहयोग रहता।
अब उसके बेटे भी बड़े हो गये। सुरेन्द्र ने इस मंहगाई और बेरोज़गारी के युग में अपनी कला सिखायी।बड़ा बेटा राज किशोर ने विरासत संभाला।वह नाल बजाने लगा।दो मंडली बन गयी।एक सुरेन्द्र की, दूसरी राजकिशोर की।इस तरह घर में गायन वादन के बीच बड़े हो रहे सभी भाइयों ने गाना बजाना सीख लिया और अर्जन करने लगे।सभी बेटे बेटियों की शादियां भी हो गयी।
आर्थिक संकट से निकलने के बावजूद सुरेन्द्र ने आराम नहीं किया।विषय कीर्तन और गायन जारी रखा। हमेशा बाहर के भोजन में खीर,मिठाई की अधिकता,रात में जगना,तान उठाकर गाने से अचानक डायबिटीज का शिकार हो गया।और वह भी टाइप 2 से अधिक। मैं गांव जाता, समझाता, हिदायत देता। कहां कहां, क्या दिखाया, चिकित्सक का चिट्ठा भी देखता। दवाई ठीक से चलती रहती तो डायबिटीज नियंत्रण में रहता।परन्तु, कुछ स्वस्थ होते ही दवाई छोड़ देता।यही आदत रोग को गंभीर बनाता गया।
दो बार होस्पीटलाइज हुआ।जब गांव गया बहुत समझाया।एक दिन सुरेन्द्र बोला - लगता है,अब मैं अधिक दिन नहीं बचूंगा।
मैंने कहा, पागल हुए हो, डायबिटीज ठीक रखो। वैसे संयमित खाना खाते ही हो।तुम तो तीन चार किलोमीटर बचपन से आजतक चलते हो, कुछ नहीं होगा।फिर पूछा गांव का हाल चाल। दोनों दोस्त हंसते रहे, बतियाते रहे।समूचे गांव की छोटी बड़ी बातें सुनता रहा।
अचानक उसके ब्रेन हेमरेज होने की खबर मिली।पता चला की डायबिटीज 800 हो गया था।नाक से खून आया। डाक्टर के पास खगड़िया आया। सभी बेटे चिकित्सा के लिए एक जुट थे। खगड़िया से भागलपुर चिकित्सा महाविद्यालय अस्पताल रेफर कर दिया गया स्थानीय डाक्टर द्वारा। भागलपुर में ही सुरेन्द्र हम सबों को छोड़ गया।
मेरा बाल सखा,गायक,वादक, ख़बरी,सुख दुख बतियाने वाला ,अब मेरे गांव में,मेरे इंतजार में नहीं है। अलविदा किसे कहूं। गांव में किसे ढ़ूढ़ूं। छोड़ कर चला गया दोस्त।"साथी तू बदल गया,आगे तू निकल गया।तोड़ी दोस्ती।"
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