दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग -15) Shivraj Bhokare द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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दुश्मनी के दरमियान इश्क (भाग -15)

Part 15: टूटकर भी बाकी

भरोसा जब टूटता है…
तो आवाज़ नहीं करता।

मगर उसके टुकड़े…
दिल में गहराई तक उतर जाते हैं।
-
कॉलेज का वो दिन…

कबीर और Myra दोनों के लिए
किसी अंत से कम नहीं था।

दोनों एक-दूसरे से दूर हो चुके थे…
मगर असली दूरी अब शुरू हुई थी।
---
Myra…

कॉलेज के कॉरिडोर में अकेली चल रही थी।

हर चेहरा उसे अजनबी लग रहा था।

हर आवाज़…
जैसे दूर से आ रही हो।

उसके हाथ अब भी हल्के कांप रहे थे।

“तुम बताओ…”

कबीर के वो शब्द
बार-बार उसके कानों में गूंज रहे थे।

“उसने मुझसे सवाल भी नहीं किया…”
उसने खुद से कहा।

उसकी आँखें भर आईं।

“अगर उसे मुझ पर भरोसा होता…
तो वो पूछता…”

मगर अब…
वो सब खत्म हो चुका था।
---
उधर…

कबीर कॉलेज के मैदान में खड़ा था।

उसकी नजरें खाली थीं।

“Myra…”
उसने धीरे से नाम लिया।

उसके हाथ में वही फोटो थी।

वो उसे बार-बार देख रहा था।

“ये झूठ हो सकता है…”
उसने खुद से कहा।

मगर फिर…

“Myra ने भी तो यही सोचा होगा…”

उसका दिल भारी हो गया।

“तो फिर उसने मुझ पर भरोसा क्यों नहीं किया?”

ये सवाल…

अब उसके अंदर गूंज रहा था।
---
दोनों एक ही जगह थे…
मगर अब दो अलग दुनियाओं में।
---
शाम…

Myra अपने घर लौट आई।

वो सीधा अपने कमरे में गई।

दरवाज़ा बंद किया…

और खुद को बिस्तर पर गिरा दिया।

उसकी आँखों से आँसू रुक ही नहीं रहे थे।

“मैंने सब खो दिया…”
उसने फुसफुसाया।

उसका दिल अब खाली लग रहा था।
---
उसी समय…

कबीर अपने कमरे में था।

उसने गुस्से में वो फोटो फाड़ दी।

“बस…”
उसने कहा।

“अब और नहीं…”

मगर फोटो के टुकड़े…

उसके दिल के टुकड़ों जैसे थे।
---
रात…

दोनों अपनी-अपनी जगह पर जाग रहे थे।

नींद…
दोनों से दूर थी।
---
Myra ने धीरे से फोन उठाया।

कबीर का नंबर स्क्रीन पर था।

उसकी उंगली कॉल बटन के पास गई…

मगर रुक गई।

“अब क्या फायदा…”
उसने खुद से कहा।

उसने फोन वापस रख दिया।
---
उधर…

कबीर भी फोन को देख रहा था।

“Myra…”
उसने धीरे से कहा।

उसने भी कॉल करने की सोची…

मगर फिर—

“अगर उसे फर्क पड़ता…
तो वो खुद कॉल करती…”

उसने फोन दूर रख दिया।
--
दोनों एक कॉल दूर थे…

मगर वो कॉल
कभी नहीं हुआ।
---
अगले दिन…

कॉलेज में एक अजीब सी खबर फैली।

“Myra की सगाई होने वाली है…”

ये खबर…

धीरे-धीरे हर जगह फैल गई।

कबीर ने ये सुना।

उसका दिल जैसे रुक गया।

“क्या…?”
उसके होंठों से निकला।

अर्जुन उसके पास आया।

“यार… ये सच है क्या?”
उसने पूछा।

कबीर कुछ नहीं बोला।

उसकी आँखों में सिर्फ एक ही सवाल था—

“इतनी जल्दी…?”
-
उधर…

Myra अपने घर में बैठी थी।

उसके सामने विक्रम वर्मा खड़े थे।

“तुम्हारी सगाई तय हो गई है,”
उन्होंने साफ कहा।

Myra का दिल धड़क उठा।

“क्या?”
उसने धीमे से पूछा।

“हाँ,”
विक्रम ने कहा,
“और ये फैसला बदलने वाला नहीं है।”

Myra की आँखों में आँसू आ गए।

“मैं ये नहीं कर सकती…”
उसने कहा।

विक्रम की आवाज़ सख्त हो गई—

“तुम्हें करना होगा।”

कमरे में सन्नाटा छा गया।

“क्यों?”
Myra ने पूछा।

विक्रम ने उसकी आँखों में देखा—

“क्योंकि यही सही है।”
---
Myra ने आँखें बंद कर लीं।

उसे सब समझ आ गया था।

ये सिर्फ एक रिश्ता नहीं था…

ये एक फैसला था—
जो उसके दिल के खिलाफ लिया गया था।
---
उधर…

कबीर को अब सब समझ आने लगा था।

“ये सब प्लान था…”
उसने खुद से कहा।

उसकी आँखों में गुस्सा भर गया।

“उन्होंने हमें अलग किया…
और अब…”

उसने मुट्ठी भींच ली।

“अब वो उसे मुझसे हमेशा के लिए दूर कर देंगे…”
---
उस रात…

दोनों ने एक ही आसमान को देखा।

मगर इस बार…

उनकी दुआएं अलग थीं।

Myra चाहती थी—
सब ठीक हो जाए।

और कबीर…

वो अब लड़ने के लिए तैयार हो चुका था।
--
कहानी अब एक नए मोड़ पर थी…

जहाँ इश्क टूट चुका था…

मगर खत्म नहीं हुआ था।

और जब इश्क टूटकर भी जिंदा रहता है…

तो वो पहले से ज्यादा खतरनाक बन जाता है।