श्रेयस और प्रेयस भारतीय दर्शन के दो महत्वपूर्ण विचार हैं। ये उपनिषदों की शिक्षाओं से लिए गये हैं। श्रेयस का अर्थ है, दीर्घकालिक लाभ या जो वास्तव में लाभकारी हो। प्रेयस का अर्थ है, अल्पकालिक सुख या जो वर्तमान में अच्छा लगे। इन्हीं विचारों के अंतर्गत मानव जीवन को अभ्युदय की और प्रस्थ कर उसे महापुरुष की श्रेणी तक ले जा सकता है।
आस्था से सम्पन्न मन जब विश्वासयुक्त चरणों द्वारा सत्यपथ पर अग्रसर होता है, तब वही मानव संसार में “महापुरुष” कहलाता है। महापुरुष की कोई सुनिश्चित परिभाषा नहीं होती - उसकी पहचान उसका जीवन होता है। सत्यनिष्ठ आचरण में रूपांतरित जीवन ही उसकी प्रथम पहचान है। जो भोग प्रधान संस्कृति से विमुख होकर, संयम के आवरण में संतुलित हो जाता है, वही सत्यमेव की राह पर प्रतिष्ठित होकर महापुरुष के तुल्य दृष्टिगोचर होता है।
संसार के मायाजाल को समझना साधारण जन के लिए असंभव है - यह कहना पूर्णतः मिथ्या है। इतिहास साक्षी है कि बहुगुण सम्पन्न अधिकांश महापुरुष साधारण परिवेशों से ही उद्भूत हुये हैं। इसका कारण केवल इतना है कि उनमें जीवन के प्रति गहरी आस्था, अपने अस्तित्व का सजग बोध और सत्य के प्रति अडिग निष्ठा रही है।
वर्तमान युग विषमताओं को सर्वाधिक पोषित कर रहा है। अपने-अपने क्षेत्रों में त्वरित प्रसिद्धि के असंख्य उदाहरण मिल जाते हैं, पर महापुरुष विरले ही दृष्टिगोचर होते हैं। इसका कारण स्पष्ट है - पूर्णता का अभाव, नैतिकता से दूरी और मानवता के प्रति सच्ची प्रतिबद्धता का क्षीण होना।
वैज्ञानिक दृष्टि से महापुरुष कोई दैवी चमत्कार नहीं, बल्कि विशिष्ट मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और नैतिक गुणों का विकसित रूप होते हैं। उनका निर्माण अचानक नहीं होता, बल्कि दीर्घकालीन अभ्यास, अनुभव और आत्म-संयम की प्रक्रिया से होता है।
मनुष्य के जीवन में श्रेयस और प्रेयस का द्वंद्व उतना ही प्राचीन है, जितना स्वयं मानव चेतना। भारतीय दार्शनिक परंपरा ने इस सत्य को अत्यंत सूक्ष्मता से समझा और व्यक्त किया। कठोपनिषद में स्पष्ट कहा गया है कि मनुष्य के सामने सदैव दो मार्ग उपस्थित रहते हैं- श्रेयस और प्रेयस। प्रेयस वह है जो मन को तत्काल प्रिय लगे, इन्द्रियों को सुख दे और क्षणिक संतोष प्रदान करे; जबकि श्रेयस वह है जो दीर्घकालिक कल्याण, आत्मिक उन्नति और जीवन की वास्तविक सार्थकता का मार्ग प्रशस्त करे।
मानव जीवन की दिशा इसी चयन से निर्धारित होती है। जो मनुष्य प्रेयस के आकर्षण में बंध जाता है, वह बाह्य सुखों की चकाचौंध में भटकता रहता है; परन्तु जो श्रेयस का वरण करता है, वह धीरे-धीरे अपने जीवन को साधारणता से उठाकर उच्चता की दिशा में ले जाता है। यही चयन अंततः मनुष्य को उस अवस्था तक पहुँचा सकता है जहाँ उसका व्यक्तित्व केवल व्यक्तिगत अस्तित्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक मानवता के लिए प्रेरणा बन जाता है।
दार्शनिक दृष्टि से श्रेयस का मार्ग आत्मचेतना की जागृति का मार्ग है। यह वह स्थिति है जहाँ मनुष्य केवल भोग का उपभोक्ता नहीं रहता, बल्कि अपने जीवन के उद्देश्य और उत्तरदायित्व को समझने लगता है। इसी बोध से वह संयम, सत्य और करुणा को अपने जीवन का आधार बनाता है।
इतिहास में जिन व्यक्तित्वों को महापुरुष कहा गया, उनके जीवन में यही चेतना स्पष्ट दिखाई देती है। गौतम बुद्ध ने राजसुख को त्यागकर मानव दुःख के समाधान की खोज को जीवन का लक्ष्य बनाया। महात्मा गांधी ने सत्य और अहिंसा को केवल उपदेश नहीं, बल्कि अपने जीवन का प्रत्यक्ष प्रयोग बनाया। स्वामी विवेकानन्द ने मानव सेवा को ईश्वर सेवा का स्वरूप बताते हुए आत्मोन्नति और समाजोन्नति को एक सूत्र में बाँध दिया।
इन सभी उदाहरणों में एक समान तत्व दिखाई देता है—स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यापक मानव कल्याण को अपनाना। यही वह बिंदु है जहाँ साधारण मनुष्य का जीवन महापुरुषत्व की दिशा में रूपांतरित होने लगता है। यदि इसी सत्य को वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो आधुनिक विज्ञान भी इस दार्शनिक निष्कर्ष का समर्थन करता प्रतीत होता है। आधुनिक तंत्रिका विज्ञान यह सिद्ध कर चुका है कि मनुष्य का मस्तिष्क स्थिर नहीं है; वह निरंतर अनुभवों, विचारों और व्यवहारों के अनुसार बदलता रहता है। इस क्षमता को न्यूरोप्लास्टिसिटी कहा जाता है।
जब मनुष्य संयम, करुणा और आत्मनियंत्रण का अभ्यास करता है, तब उसके मस्तिष्क के वे क्षेत्र अधिक सक्रिय और विकसित होने लगते हैं जो विवेकपूर्ण निर्णय, सहानुभूति और दूरदर्शिता से जुड़े होते हैं। इसके विपरीत यदि जीवन केवल तात्कालिक सुखों और उत्तेजनाओं के इर्द-गिर्द केंद्रित हो, तो मस्तिष्क उसी दिशा में ढलने लगता है। इस प्रकार विज्ञान भी यह संकेत देता है कि श्रेयस और प्रेयस का चयन केवल नैतिक नहीं, बल्कि जैविक और मानसिक विकास की दिशा को भी प्रभावित करता है।
मनोविज्ञान की दृष्टि से भी महापुरुषों के व्यक्तित्व में कुछ विशेष गुण अत्यंत प्रबल होते हैं। उनमें आंतरिक प्रेरणा अत्यधिक विकसित होती है। वे बाहरी प्रशंसा या पुरस्कार से प्रेरित नहीं होते, बल्कि अपने भीतर के मूल्यबोध से प्रेरित होकर कार्य करते हैं। उनकी भावनात्मक बुद्धिमत्ता भी अत्यंत उच्च होती है, जिसके कारण वे दूसरों के दुःख और पीड़ा को गहराई से अनुभव कर पाते हैं।
विकासात्मक मनोविज्ञान यह भी बताता है कि कठिन परिस्थितियाँ व्यक्तित्व को परिष्कृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। संघर्ष, त्याग और अनुशासन मनुष्य के भीतर मानसिक दृढ़ता का निर्माण करते हैं, जिसे आधुनिक विज्ञान resilience कहता है। यही शक्ति व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों से विचलित नहीं होने देती।
सामाजिक विज्ञान के अनुसार महापुरुष केवल व्यक्तिगत महानता के उदाहरण नहीं होते; वे समाज की सामूहिक चेतना की अभिव्यक्ति होते हैं। जब समाज किसी संकट या संक्रमण के दौर से गुजरता है, तब कुछ व्यक्ति उस सामूहिक पीड़ा को गहराई से अनुभव करते हैं और उसे अपने जीवन का कर्तव्य बना लेते हैं। ऐसे व्यक्तित्व समाज के लिए मार्गदर्शक बन जाते हैं।
व्यवहार विज्ञान में एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है—delayed gratification। इसका अर्थ है तात्कालिक सुख को त्यागकर दीर्घकालिक और स्थायी कल्याण को स्वीकार करना। मनोवैज्ञानिक प्रयोगों ने यह सिद्ध किया है कि जो व्यक्ति इस क्षमता का विकास कर लेता है, वह जीवन में अधिक संतुलित और सफल होता है। भारतीय दर्शन का श्रेयस मार्ग इसी सिद्धांत का आध्यात्मिक रूप है।
इस प्रकार जब दर्शन और विज्ञान को एक साथ रखा जाता है, तो यह स्पष्ट हो जाता है कि महापुरुष कोई दैवी चमत्कार नहीं होते। वे मानव व्यक्तित्व की उस परिपक्व अवस्था का प्रतीक होते हैं जहाँ बुद्धि, करुणा और चरित्र एक साथ विकसित हो जाते हैं। उनका जीवन यह सिद्ध करता है कि महानता जन्म से नहीं, बल्कि निरंतर साधना और आत्मसंयम से निर्मित होती है।
अत्याधुनिक युग में विज्ञान और तकनीक ने मानव जीवन को अभूतपूर्व सुविधाएँ प्रदान की हैं। परन्तु इसके साथ एक सूक्ष्म संकट भी उत्पन्न हुआ है। आज सफलता का मापदंड प्रायः प्रसिद्धि, संपन्नता और बाहरी उपलब्धियाँ बन गया है। ऐसे वातावरण में चरित्र, संयम और नैतिकता जैसी मूल्यपरक कसौटियाँ धीरे-धीरे कमजोर पड़ती दिखाई देती हैं।
यहीं दर्शन हमें पुनः स्मरण कराता है कि महानता का वास्तविक आधार बाहरी उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि आंतरिक परिपक्वता है। विज्ञान भी यह संकेत देता है कि स्थायी संतोष और मानसिक संतुलन केवल भौतिक साधनों से नहीं, बल्कि उद्देश्यपूर्ण और मूल्याधारित जीवन से प्राप्त होता है।
अतः यह कहना अधिक उचित होगा कि महापुरुषों का अभाव संसार में नहीं हुआ है; अभाव केवल उस दृष्टि का हुआ है जो महानता को पहचान सके। जब समाज पुनः सत्य, करुणा, संयम और उत्तरदायित्व को अपने जीवन का आधार बनाएगा, तब महापुरुषों का प्रादुर्भाव भी उसी प्रकार होगा जैसे अंधकार के बीच दीपक की ज्योति स्वयं मार्ग दिखा देती है।
अंततः महापुरुषत्व कोई दूरस्थ या रहस्यमय स्थिति नहीं है। वह मानवता की सर्वोच्च संभावना का रूप है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर वह क्षमता निहित है कि वह अपने जीवन को केवल व्यक्तिगत सुख तक सीमित न रखकर व्यापक मानव कल्याण की दिशा में विकसित करे।जब मनुष्य प्रेयस के आकर्षण से ऊपर उठकर श्रेयस का मार्ग चुनता है, जब उसकी बुद्धि विज्ञान की प्रज्ञा से प्रकाशित होती है और उसका हृदय करुणा तथा सत्य से आलोकित होता है - तब वही साधारण मनुष्य धीरे-धीरे महापुरुषत्व की दिशा में अग्रसर हो जाता है। "न भोगः मानवम् महान् करोति, अपितु संयम एव तस्य गौरवम् निर्माति।" (भोग मनुष्य को महान नहीं बनाता, संयम ही उसकी महानता का निर्माण करता है।)
✍️ कमल भंसाली