लाईन में खडा़ आदमी DrAnamika द्वारा प्रेरक कथा में हिंदी पीडीएफ

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लाईन में खडा़ आदमी

शीर्षक: “लाइन में खड़ा आदमी”

सुबह के सात बजे थे। मोहल्ले की पानी की टंकी के सामने लगी लाइन में रमेश सबसे पीछे खड़ा था। हाथ में दो पीले कैन, आँखों में नींद और चेहरे पर एक अजीब-सी चुप्पी। शहर में पानी आता तो था, पर सबके लिए नहीं। जिनके पास मोटर थी, उनके लिए हमेशा; जिनके पास नहीं, उनके लिए लाइन।

रमेश एक निजी स्कूल में चपरासी था। तनख़्वाह इतनी कि घर चलता रहे, सपने नहीं। उसकी पत्नी सीमा हर सुबह कहती,
“आज ज़रा जल्दी आ जाना, बच्चों की फीस भरनी है।”
रमेश हर बार सिर हिला देता। जवाब उसके पास भी नहीं होता था।

लाइन में खड़े लोग एक-दूसरे को जानते थे, फिर भी अनजान बने रहते थे। सबके अपने-अपने डर थे—कहीं पानी खत्म न हो जाए, कहीं किसी का कैन आगे न घुस जाए। तभी एक सफ़ेद गाड़ी आकर रुकी। मोहल्ले के पार्षद जी उतरे। उनके साथ दो आदमी और एक बड़ा नीला टैंकर।

“लाइन की ज़रूरत नहीं है,” पार्षद जी बोले, “जिन्होंने कल नाम लिखवाया था, उन्हीं के घर पानी जाएगा।”

रमेश चौंक गया। कल वह देर से आया था। नाम लिखवाने की सूची बंद हो चुकी थी।

“पर साहब,” रमेश ने हिम्मत कर कहा, “हम रोज़ लाइन में लगते हैं। आज बच्चों को स्कूल भेजना है, पानी चाहिए।”

पार्षद जी ने उसकी ओर देखा, जैसे पहली बार किसी इंसान को देखा हो। फिर बोले,
“देखो भाई, व्यवस्था है। सबको नियम मानना पड़ेगा।”

रमेश पीछे हट गया। लाइन टूट चुकी थी। कुछ लोग चुपचाप घर लौटने लगे, कुछ गुस्से में बड़बड़ा रहे थे। तभी रमेश ने देखा—टैंकर का पाइप उस घर की ओर जा रहा था जहाँ महीनों से कोई नहीं रहता था। मालिक शहर से बाहर था।

रमेश ने फिर आवाज़ उठाई,
“साहब, वहाँ तो कोई है ही नहीं। पानी बेकार जाएगा।”

इस बार लोग भी उसकी ओर देखने लगे। पार्षद जी झुँझला गए।
“तुम मुझे सिखाओगे? ज़्यादा बोलोगे तो कल से स्कूल में नौकरी भी नहीं रहेगी।”

डर रमेश की आदत थी, पर आज कुछ अलग था। शायद बच्चों का चेहरा याद आ गया था। उसने ऊँची आवाज़ में कहा,
“नौकरी जाएगी तो जाएगी, पर पानी सबका हक़ है।”

एक पल को सन्नाटा छा गया। फिर एक बूढ़ी औरत बोली,
“यह सही कह रहा है।”
फिर एक युवक, फिर दो और। देखते-देखते लोग फिर से लाइन में खड़े हो गए—इस बार एक साथ।

पार्षद जी ने स्थिति भाँप ली। टैंकर का पाइप घुमा दिया गया। पानी कैनों में भरने लगा।

शाम को रमेश देर से घर पहुँचा। सीमा ने घबराकर पूछा,
“सब ठीक तो है?”

रमेश ने मुस्कराकर कहा,
“आज लाइन में खड़ा आदमी थोड़ा आगे बढ़ गया।”

उस रात बच्चों ने सुकून से पानी पीया। रमेश जानता था—कल फिर लाइन लगेगी। पर अब उसे पता था कि चुप्पी भी एक तरह की कमी है, और आवाज़ भी एक शुरुआत हुई
किसी भी घटना पर लिखने के पहले,देशकाल की परिस्थितियों,संभावनाओं,असंभावनाओं,की सही प्रस्तुति, पर ध्यान देना पड़ता है अन्यथा कहानियों या घटनाओं की मार्मिक परिस्थितियों का ह्रास हो जाता है एवं पात्रों के चरित्र कमज़ोर पड़ जातें हैं नतीजा घटनाएं कल्पनिक लगने लगतीं हैं... कुछ फर्क नहीं पड़ा
कभी मेरे शब्दों को
शब्दों ने अपनी आहट से
लोगों की तासीर बदली
जो बदल गए पूर्ण
जो ना बदले अपूर्ण Dr Reena Anamika