भयानक यात्रा - 8 - वीरान इमारत में प्रेमसिंह । नंदी द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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भयानक यात्रा - 8 - वीरान इमारत में प्रेमसिंह ।

पिछले भाग में हमने देखा की रमनसिंह एक मंदिर की तरफ जाता है , उसके साथ साथ सब लोग वहां जाते है, वो अदभुत मंदिर का नजारा देखकर लोग अचंबित हो जाते है , वह कोई इंसान पूजा कर रहा होता है जिसकी आवाज बुलंद होती है को सबको अपनी तरफ आकर्षित करती है, दिखने में वो इंसान सबसे अलग दिखता है और शांत भी होता है । विद्यासिंह के पूछ ने पर भी वो इंसान अपनी पहचान नहीं बताता है और मुस्कुराकर गर्भगृह की तरफ चला जाता है । अंधेरा हो जाने के कारण सब मंदिर से लौट जाते है जहां प्रेमसिंह के रहने की व्यवस्था पुलिस क्वाटर्स में करवा के रमनसिंह अपने घर की तरफ चल देता है ।

अब आगे ....
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मन में चल रही मंदिर की अद्भुत घटना उसके आंखो के सामने अभी भी चली जा रही थी , वो अपने घर की तरफ तो जा रहा था लेकिन उसका मन मंदिर में हुई चमत्कारिक घटना को भूलने नही दे रहा था । रमनसिंह सोच रहा था की वो आदमी कौन था जो अलग सा लग रहा था उसके चेहरे पर अलग सी शांति थी , और वहां से वो बिना अपना परिचय दिए चला गया था ।
जहां दूसरी तरफ प्रेमसिंह गाड़ी में बैठ के चरणसिंह और विद्यासिंह के साथ पुलिस क्वाटर्स की तरफ साथ में चल दिया था । प्रेमसिंह गाड़ी में पीछे की सीट में कोने पे रास्ते को देखते हुए बैठा हुआ था । उसकी आंखे रास्ते को देख रही थी और उसका मन उसके बच्चे और बीवी को ।

अरे ! क्या प्रेमसिंह ? कहां खोए हुए हो ? – एक आवाज ने प्रेमसिंह को अपने विचारो से थोड़ा सा अलग किया ।
वो आवाज चरणसिंह की थीं ।
कुछ नही साब , बस अब सोच रहा था की सब ठीक होगा की नही ? – प्रेमसिंह ने कहा ।

चिंता न करो प्रेमसिंह ऊपरवाला सब अच्छा ही करता है ! – एक धीमी आवाज में विद्यासिंह ने बोला ।
साब , हमारे बच्चे तो हमे छोड़कर चले गए है , अब ये अच्छा कैसे हो सकता है ? मेरी जोरु बीमार है ये कैसा अच्छा है ? –प्रेमसिंह ने उदास होते हुए कहा ।
प्रेमसिंह की बात सुनके विद्यासिंह को लगा की अभी प्रेमसिंह को समझाने का कोई फायदा नही होगा तो वो चुप हो गया ।

चरणसिंह ने उसका उत्तर देते हुए कहा हां प्रेमसिंह तुम्हारी तकलीफ ज्यादा है लेकिन तुम ही हो जो तुम्हारी पत्नी को ठीक कर सकते हो , डॉक्टर बस इलाज कर सकता है लेकिन तुम उसके पति हो और तुमको ही उसका साथ दे के तुम्हारी पत्नी को बीमारी से दूर करना पड़ेगा ।
प्रेमसिंह को जैसे चरणसिंह की बाते समझ नहीं आ रही थी , वो बिना पलक झपकाए चरणसिंह को देख ने लगा फिर एक हुंकार करके चुप हो गया ।
गाड़ी चल रही थी और उसके अंदर एक गाना चल रहा था , चरणसिंह साथ में गाना गुन – गुनाए जा रहा था । अंधेरा होने की वजह से गाड़ी की हैडलाइट जैसे सूरज की तरह रोशनी दे रही थी और रास्ते रोशनी की वजह से साफ दिख रहे थे ।

थोड़ी दूर तक चलने के बाद चरणसिंह ने ड्राइवर को होटल की तरफ ले जाने बोला , और नजदीक में एक होटल की तरफ ड्राइवर ने गाड़ी को मोड़ दिया । बांस से बना हुआ दरवाजा और लकड़े की चारपाई जैसे होटल की शान बढ़ा रही थी । गाड़ी में से सब नीचे उतरे और चारपाई पे बैठ गए , विद्यासिंह ने खाने का ऑर्डर दिया और सब वहीं बाते करने लगे ।

चरणसिंह ने प्रेमसिंह से पूछा – कितने सालों से किल्ले के बहार चाय बेचते हो तुम ?
प्रेमसिंह ने कहा – चाय बेचते बेचते मुझे १७ साल हो गए साब।
चरणसिंह ने फिर से पूछा – तो किल्ले के बंध हो जाने के बाद कितने बजे तक रुकते हो टपरी पे?
किल्ला बंध हो जाने के बाद तुरंत ही टपरी को बंध करना पड़ता है , सरकारी अफसर का आदेश है– प्रेमसिंह ने बोला ।

तो फिर रहते कहां हो तुम ? – विद्यासिंह ने बोला ।
यहीं किल्ले से लगभग 1 किलोमीटर दूर जहां पुराना वटवृक्ष है , उसके पीछे छोटी बस्ती में रहते है साब । –
प्रेमसिंह ने कहा ।

तभी होटल का वेटर खाना लेकर आ गया , खाना सबको परोसा गया और सब खाना खाने लगे । लेकिन प्रेमसिंह खाने को देखता रहा , उसको अपनी जोरु के हाथ का खाना खाने की आदत थी , होटल के खाने से ज्यादा उसको अपनी जोरु के हाथ का खाना मीठा लगता था । उसको देख के चरणसिंह ने उसको बोला – प्रेमसिंह क्या हुआ ? खाना क्यू नही खा रहे हो?
प्रेमसिंह ने बोला – अरे साब ! ऐसा नहीं है बस हमे हमारी जोरु के हाथ का खाना याद आ गया । वो अभी कैसी होगी ?
चरणसिंह ने बोला – देखो प्रेमसिंह तुम ठीक रहोगे तो ही तुम उसको सम्हाल पाओगे , और ठीक रहने के लिए तो खाना तो खाना ही पड़ेगा ना ।
प्रेमसिंह ने सिर को हां में हिलाके खाना खाने लग गया ।

खाना खतम करने के बाद सब गाड़ी में बैठ गए और गाड़ी क्वाटर्स की तरफ चल दी । हवा तेज चल रही थी और सबके मन में चल रहे विचार भी , सुनसान सा रास्ता भी और सुन्न सा सबका मन भी ।

ड्राइवर ने चरणसिंह से पूछा – आपको क्या लगता है मंदिर में वो इंसान कौन था ?
चरणसिंह बोला – वो इंसान कोई आम नही लग रहा है, जोरावर ।
जोरावरसिंह ने बोला – हां, उसकी आभा दूसरे से अलग थी , सरल और शांत मुखमुद्रा ,आंखो में अलग सी चमक ... और उसका असामान्य देह ।
चरणसिंह बोला – वो कहां रहता है , कहां से आया कुछ पता नही है, एक टिमटिमाते तारे की तरह हमारे सामने आया और चला गया ।
वैसे भी किल्ला भूतिया माना जाता है , तो आसपास के लोग भी असामान्य ही होंगे ।

कुछ देर बाद गाड़ी क्वाटर्स में आ गई , चरणसिंह और विद्यासिंह गाड़ी से उतरे और प्रेमसिंह को लेकर अंदर चले गए । क्वाटर्स में एक बड़े से हॉल में वो प्रेमसिंह को ले गए ।
विद्यासिंह बोला – प्रेमसिंह आज हम यहीं सोएंगे । हॉल एक कमरे से थोड़ा बड़ा था , उसके अंदर दीवारों पे मकड़ी के जाले लगे हुए थे , आसपास के खेतों से झींगुर की आवाजे झीं – झीं कर रही थी ।
नीचे सोने की जगह पे थोड़ी मिट्टी जमी हुई थी , हॉल के दूसरे छोर पे सीढियां थी जो हॉल के छत पे जाती थी । सीढ़िया भी कुछ टूटी हुई थी और जो थी वो भी जीर्ण – शीर्ण हो रही थी ।
हॉल की हालत एक वीरान इमारत जैसी थी ।
चरणसिंह ने और विद्यासिंह ने अपने क्वाटर्स में नही जाके प्रेमसिंह के साथ सोना बेहतर समझा ।
थोड़ी साफ सफाई के बाद विद्यासिंह ने वहीं पे सबकी चारपाई लगाई , और प्रेमसिंह को खाट पे आराम करने बोला ।
रात के अंधेरे में वही झींगुर की आवाजे तेज होती जा रही थी , विद्यासिंह और चरणसिंह अपने अपने खाट पे सोए हुए थे और प्रेमसिंह खुली आंखों से छत को देख रहा था । अंधेरे में मशक प्रेमसिंह के कान में गुनगुना रहे थे और उसको काट भी रहे थे , हालांकि प्रेमसिंह को इसकी आदत थी लेकिन परिवार से दूर रहकर सोने की आदत नही थी ।
कुछ देर बाद नींद न आने की कारण प्रेमसिंह अपने खाट से खड़ा हो जाता है और हॉल की सीढ़ियों की तरफ जाने लगता है । सीढ़ियों से वो हॉल की छत पे चला जाता है और छत पे बने हुए रेलिंग पे बैठ जाता है । वो आसमान में टिमटिमाते तारों की तरफ देखके अपने बच्चों को और अपनी जोरु को याद करने लगता है, कैसे भूपतसिंह और मेघालबा उसकी गोद में खेलते रहते थे , शाम को बच्चो के साथ खेलना और उनको अपने हाथों से खाना खिलाना प्रेमसिंह को याद आ रहा था । अपनी जोरु का काम में हाथ बटाना , उसके साथ बातें करना और छोटी छोटी बातों में उसके साथ खुशियां मनाना ये यादें अब उसके मन को ज्यादा विषाद – ग्रस्त बना रही थी।

प्रेमसिंह की आंखो से अश्रु धारा एक जल – प्रपात की भांति बह रही थी , उसका घमछा उसके आंसुओ से गिला हो चुका था और उसका चेहरा दुख की शिकनों से भरा हुआ था । उसकी आंखे बंध हो रही थी , और उसका सिर भारी होता जा रहा था । वो जहां बैठा था वो रेलिंग से उतर के वो छत की फर्श पे लेट गया । फर्श पे टाइल नही लगी हुई थी , सीमेंट से बने हुए फर्श में गढ्ढे हो गए थे और वो गढ्ढे में मिट्टी के छोटे–मोटे कण फसे हुए थे जो प्रेमसिंह के चेहरे पे कोई नुकीली चीज की तरह चुभ रहे थे । किंतु बेहोश जैसी स्थिति में प्रेमसिंह को दर्द का अनुभव नहीं होता है और वो वहीं पे सो जाता है ।

क्या प्रेमसिंह का पूरा परिवार बिखर जायेगा ? क्या रमनसिंह वो अजनबी इंसान के बारे में जान पाएगा या नहीं ? क्या होगा आगे ?
पढ़ते रहिए ,, और जुड़े रहिए हमारे साथ।