भयानक यात्रा - 2 - बर्मन लापता हुआ। नंदी द्वारा डरावनी कहानी में हिंदी पीडीएफ

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भयानक यात्रा - 2 - बर्मन लापता हुआ।

हमने देखा की बर्मन अचानक से चाय की टपरी से वाशरूम जाने के बाद वापिस नही आया तो सब बर्मन को ढूंढ ने लग गए,फिर भी बर्मन का कोई अता पता नही था,बर्मन कहीं चला गया था या बर्मन मजाक कर रहा था!!?? अब आगे,,,,,

डिंपल और जूली बहुत ही ज्यादा परेशान थे,सब फिर से वही चाय की टपरी के पास जाके देखा लेकिन बर्मन वहां नही था।
चाय की टपरी का मालिक प्रेमसिंह सबको परेशानी में देख के पूछा ,क्या हुआ साहेब???
अरे,,अरे हमारा दोस्त बर्मन,,अभी यहां था वाशरूम करने गया था आभितक वापिस नही लौटा।प्रेमसिंह ने कहा साहेब आपका दोस्त अब शायद ही वापिस लौट पाएगा।

सबने प्रेमसिंह के सामने बड़े आश्चर्य से देखा और विवान ने बोला,,,,,क्या ??भाई मजाक क्यू कर रहे हो??
अरे!! हमे डरा क्यू रहे हो? डिंपल ने चिल्ला के बोला।
यार मुझे तो लग रहा है बर्मन को गायब करने में इसी का हाथ है–हितेश ने सबके बीच में फुसफुसाया।
प्रेमसिंह लोगो के सामने देख के समझ गया था की सबको लगता है की वो बर्मन को गायब करने में वो मिला हुआ है,,,उसमे धीरे से कहा यहां आओ,उसने उसकी उंगली टपरी के कोने में लगे 2 फोटो की तरफ उठाई और बोला वो मेरा बेटा भूपतसिंह और बेटी मेघल बा।दोनो हर रोज मेरे चाय की टपरी पे दोपहर में आया करते थे,हमारी जोरू भी दोपहर का खाना लेकर आती तो उसके साथ बच्चे भी आ जाते थे।
एक दिन जब हमारी जोरू खाना देने के लिए यहां पहुंची तब बच्चे भी साथ में ही खेलते खेलते आ रहे थे।बच्चे शैतान तो थे ही लेकिन होशीयार भी बहुत थे। उस दिन हमारे जोरू की तबियत कुछ ठीक नहीं थी तो वो आके टपरी पे सो गई थी,बच्चे बाहर ही खेल रहे थे।
दोपहर का समय था और टपरी पे कुछ लोग बाहर थे सबको चाय देके मैं खाना खाने बैठ गया।बच्चे बाहर ही खेल रहे थे,फिर खाना खाने के बाद मैं हाथ मुंह धोने के लिए गया टपरी के पीछे की तरफ और जब में आया तो बच्चे वहां नही थे।मैने सोचा कि यही कहीं आसपास खेल रहे होंगे,बच्चे हमेशा ऐसे खेलते रहते और शाम के समय पे टपरी पे आ जाते थे,बीमार होने के कारण मेने अपनी जोरू को भी नही उठाया।
2 घंटे बीत चुके थे लेकिन बच्चे कही आसपास दिख नही रहे थे, मैने जोरू को उठाया और उसको बोला की 2 घंटे से बच्चे यहां कही दिख नही रहे तो देख के आओ,उसको भी लगा की बच्चे यही कहीं होंगे ,वो सब जगह ढूंढ कर वापिस आई लेकिन बच्चे कहीं दिख नही रहे थे।उसके मुंह पे चिंता के भाव साफ दिख रहे थे,और मुझे भी घबराहट सी हो रही थी।शाम तो वैसे भी हो चुकी थी लेकिन मैने टपरी को समेटा और ढूंढने लग गया बच्चो को,आधा घंटे के बाद जोरू ने बोला की बच्चे खेलते खेलते वहीं तो नही चले गए ना।

मेरे दिल में थोडा सा डर आ गया ,मेने उसको बोला शुभ शुभ बोलो बच्चे है हमारे।समय बीत ता जा रहा था लेकिन बच्चे कही नही मिल रहे थे,और अब किल्ले के द्वार भी बंध किए जा रहे थे,सबको सूचना दी जा रही थी की जल्दी से जल्दी किल्ले से बाहर निकल जाए।और एक सिपाही ने आके मुझे भी बोला की समय हो चुका है आप ये स्थान छोड़ दे,वो सिपाही मुझे अच्छे से जानता था,नाम था अबिरल,,,नेपाली था। बाहोस सैनिक वो भी रात को किल्ले के आसपास नही रुकता था।मैंने उसको बताया कि बच्चे दोपहर से खेलते खेलते कही चले गए है,सब जगह ढूंढ लिया है लेकिन मिल नही रहे है।

अबिरल एक ने कहा यहां रुकना आपके लिए भी खरानक हो सकता है लेकिन आप किल्ले के बाहर चले जाइए ,जबतक में यहां हूं बच्चे को ढूंढूंगा,आप पुलिस में अपनी कंप्लेन दर्ज करवाए।मैंने अबिरल की बात मानी और किल्ले से 2 किलोमीटर दूर पुलिस स्टेशन में जाके बच्चो की माहिती दी और कंप्लेन दर्ज करवाई।लेकिन पुलिस का कहना था की किल्ले के आसपास की जांच पड़ताल है तो कल सुबह ही वहां वो जा सकेंगे,उनकी बात भी सही थी क्यू की सरकार ने रात मे वहा जाने के लिए रोक लगा के रखी थी।

रात को अबिरल वहां से लौट गया होगा वो सोच के हम सुबह तक पुलिस स्टेशन के बाहर ही बैठे रहे ।हालत ठीक न होने के कारण जोरू की हालत रो रो के और खराब हुए जा रही थी, एक तरफ बच्चे नही मिल रहे थे और दूसरी तरफ जोरू की हालत खराब थी।मन में इतनी परेशानियां चल रही थी की खुद को खुद से लड़ने पे ताकत नहीं मिल पा रही थी।मेरी जोरू ने तो जैसे प्रण ले लिया हो की बच्चे नही आयेंगे तब तक खाना नही खायेगी,खाए भी कैसे वो बच्चो की मां है।मेरा मन भी कुछ खाने को नहीं कर रहा था।पूरी रात में अपनी जोरू को अपनी गोद में लिए बैठा रहा आश्वासन देता रहा की बच्चे मिल जायेंगे,वो से नही पा रही थी न उठ पा रही थी।
सुबह के 5 बजे के आसपास उसकी तबियत इतनी ज्यादा खराब हो चुकी थी की उसकी पास के सरकारी दवाखाने में दाखिल करना पड़ा ,वो बेहोश हो चुकी थी।उसको दवाखाने में छोड़कर में पुलिस स्टेशन पहुंच गया।डॉक्टर ने बोला था की उसको होश आने में और ठीक होने में 8 घंटा तो कम से कम लग ही जायेगा।
और उतना समय मेरे पास था नही ,अगर उसके पास बैठा रहता तो बच्चो को ढूंढने में समय खराब हो जाता,मुझे ही पुलिस के साथ जाना था किल्ले तक।
मन में बहुत सारी विडंबना चल रही थी एक तरफ पत्नी का बीमार होना दूसरी तरफ बच्चे का गायब होना।आसमान में देखकर ऊपरवाले से बस प्रार्थना की कर सकता था की सब ठीक कर दे ।

सुबह 7 बज चुके थे,और पुलिस स्टेशन में रात्रि के पुलिस अपना ड्यूटी चेंज करके जा रहे थे,तब दिन वाला पुलिस में जो चार्ज लेने आता था रमनसिंह वो आ चुका था।रमनसिंह ने आते ही एक नजर मेरे सामने देखा और बोला ,कोई इमरजेंसी केस है क्या गोखले???
जा साब इस बेचारे के बच्चे कल से किल्ले से गायब हो गए है।रात को कंप्लेन लिख दिया है बस अभी जांच पड़ताल करना है की हुआ क्या है!!!!

रमनसिंह से जल्दी से रिपोर्ट फाइल को अच्छे से पढ़ा और बच्चो के नाम और सब अपने डायरी में लिखा और मुझे उनके पास बुलाया।
आपका नाम?
,,प्रेमसिंह,
क्या करते हो?
चाय की टपरी चलाता हूं साब,
कहा?
किल्ले के बाहर ही साब,

कुछ इनफॉर्मेशन लेने के बाद रमनसिंह ने मुझे बोला आप बाहर राह देखिए,जल्दी से हम किल्ले की तरफ जायेंगे।

अब देखना ये है की रमनसिंह बच्चो को ढूंढ पाता है या नहीं,और अबिरल के पास कोई माहिती मिलती है या नही??

पढ़ते रहिए,,, आगे के भाग में!!!!