पण्डित हरनारायण बोहरे का समग्र साहित्य ramgopal bhavuk द्वारा पुस्तक समीक्षाएं में हिंदी पीडीएफ

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पण्डित हरनारायण बोहरे का समग्र साहित्य

पण्डित हरनारायण बोहरे का समग्र साहित्य
राम गोपाल भावुक
इस समय काव्य कलाधर पं.हरनारायण बोहरे की आठ पुस्तकें सामने हैं। उनसे उनकी रचनायें सुनने का मुझे सौभाग्य मिला हैं। उनकी ज्योतिष में गहरी पैठ थी। ज्योतिष विषय पर उनसे उनके प्रयोग किये गये अनेक दोहे मुझे सुनने को मिले हैं। यदि वह संकलन भी सामने आ पाता तो निश्चय ही ज्योतिष जानने वालों को इससे बहुत आसानी होती। उनकें पुत्र भागवताचार्य पं. विश्वेश्वर दयाल बोहरे इस ओर ध्यान दें।
किसी की कोई बस्तु खो जाये या किसी के यहां चोरी हो जाये तो लोग उनके पास पूछने भागते चले आते। उनकी भविष्य वाणियां सत्य निकलतीं। वे जो कुछ कह देते वह सत्य हो जाता। यह उनकी तपस्या का ही प्रभाव रहा होगा।
मैं सबसे पहले आदि गुरु श्री शंकराचार्य द्वारा प्रणीत चर्पट पंजरिका के सत्रह श्लोकों का पद्यानुवाद पण्डित हरनारायण बोहरे द्वारा किया गया है। कठिन विषय को सरल पद्यानुवाद के माध्यम से पिपासु जनों को समझाने का प्रयास किया हैं।
इसकी बानगी के तौर पर देखे जिससे आप भी इसे पढ़ने के लिये उत्सुक हो उठेंगे-
अंग गलितं पलितं मुण्डं दशन विहीनं जातं तुण्डम्।
वृद्धो याति गृहीत्वा दण्डं तदपि न मुन्चत्याशा पिण्डम्।।
अंग है सिथिल प्रत्यंग ही शिथिल भये
कंपत है मुण्डी शिर श्वेत- श्वेत वाल हैं।
आंखन से दीखत नांहि मुख के सब दांत गिरे]
लेकर के लाठी चलें टेढ़ी-मेड़ी चाल है।
फिर भी आशा लगाये अभिलाष बड़ी
बढ़ जाय उमर मम दस बीस साल है।
तन-धन भवन संग्रह की प्रबल चाह
ईश्वर के भजन का मन में न ख्याल है।
मरण समय पर डुकृय करणे नहीं करेगी मोक्ष गते।
भज गोविन्दम् भज गोविन्दम् गोविन्दम् भज मूढ़मते।
इस तरह यह समपूर्ण कृति साधकों को नित्य पठनीय हैं।
अब मैं पण्डित हरनाराण बोहरे द्वारा पद्यानुवाद की गई दूसरी कृति रम्भा षुक सम्वाद के काव्य रूपान्तर की चर्चा करूं। इस कृति में देव लोक की प्रसिद्ध अप्सरा रम्भा द्वारा जन्म जात योगी शुकदेव जी से जीवन में उतारने योग्य महत्वपूर्ण सम्वाद को पाठकों के समक्ष रखा हैं। रम्भा ने उन जन्मजात योगी को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिये अपनी बात रखी। शुक देव जी ने उसको समझाइस दी है। इसतरह के कुल उन्तालीस छन्दों में पद्यानुवाद द्वारा समझाने का सफल प्रयास किया है। प्रसंग बहुत ही रोचक है। रम्भा द्वारा शुकदेव जी के समक्ष रखे श्लोक का पद्यानुवाद देखें-त्रिवल उदर पतली कमर हंस मदमती चाल।
सुन्दर सुभगा चंचला चपला जैसी लाल।।
निर्भय होकर रमो नहीं जो इच्छा अनुसार।
आयु गंवाई जन्म लै वृथा नर संसार।।
इसके उत्तर में परम योगी शुकदेव जी के श्लोक का पद्यानुवाद देखें-
संसारी सद्भाव से भगवत भक्ति विहीन।
चित्त चुरायो नरन को जीव दया नहिं चीन।।
योग लीन लख अस तिया मन को लयो निकार।
आयु गंवाई जन्म ले वृथा नर संसार।।
ऐसे दुरुह विषय पर कलम चलाना पण्डित हरनारायण  बोहरे जी द्वारा ही सम्भव थी।
अब मेरे सामने उनकी तीसरी कृति शिव ताण्डव स्तोत्र है। इसी स्तोत्र से रावण ने भगवान शंकर जी को प्रसन्न करने के लिये नृत्य करते हुए पाठ किया था। जिससे चौदह सूत्रों का प्रादुर्भाव हुआ। यह बहुत ही कठिन आराधना मानी जाती है। एक उदाहरण देखिये-
जटाटवी गलज्जलं प्रवाह पावितस्थले।
गलेअवलम्ब्य लम्बितां भुजंग तुंग मालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयम्
चकार चण्डताण्डवं तनो तुनः शिवः शिवम्।।1।।
इसका इसी लय में पधानुवाद देखें-
जटन कौ सधन वन मण्डल फेलो चहुं ओर
तदस्थल उद्गम गंग धार हैं।
वही जलधार कण्ठ भाग को पवित्र कर
फरफरात सुजल अंग- अंग करत विहार है।
बड़े- बड़े लम्बधर विकट भुजंग अंग
अंग में उछंग गल माल की सम्हार है।
प्रचण्ड चण्ड ताण्डव नृत्य करत घूमघूम
सदा षिव साम्व रक्षा करियो हमार है।।
उनकी यह कृति भी बारम्बार पठनीय और संग्रहणीय है।
अब मैं उनके पुत्र विष्वेश्वर दयाल बोहरे जी अपने पिता श्री की तरह भागवत पुराण प्रवक्ता हैं उन्होंने भी श्रीमद् भागवतपुराण महात्व पुस्तक में पुराण के महत्व का अपनी तरह से प्रतिपादन किया है। आप भागवत पुराण के श्रेष्ठ प्रवक्ता हैं।मैंने चार- पांच वार भागवत पुराण के प्रंसग सुने हैं। आपके प्रवचन शोध पूर्ण होते हैं। नई- नई उद्भावनायें व्यक्त करने में आप सिद्ध हस्त हैं।
अब हम पण्डित हरनारायण  बोहरे जी द्वारा लिखित चालीसाओं पर दृष्टि डालें।
सबसे पहले मेरे सामने हमारे क्षेत्र की प्रसिद्ध देवी साबर माता स्थल हैं। यह स्थल पण्डित जी की जन्मस्थली कुम्हर्रा के पास ही हैं। पूर्ण सिद्ध शक्ति स्थल हैं। क्षेत्र में मां के तमाम भक्त साबर माता को प्रसन्न करने के लिये इसी पंच चालीसा का पाठ करते हैं।
अब हम श्री गौ माता चालीसा पर दृष्टि डालें। आज गायों की दुर्दषा हो रही हैं। उन्होंने उन्हें दुर्दशा से बचाने के लिये उन पर चालीसा लिखकर उनकी रक्षा में अनूठा प्रयास किया है। गौ भक्तों को इसे एक वार पढ़कर जरूर देखना चाहिए।
अब हम उनके सिद्धेश्वर चालीस पर दृष्टि जरूर डालें- सिद्धेश्वर एक प्राचीन सिद्ध स्थान है इसमें उसी स्थान के बारे में जानकारी दी गई हैं। जब इस विषय पर पण्डित जी की कलम चली है तो निःसन्देह यह एक साधना का केन्द्र जरूर रहा है।
इस समय पण्डित जी का एक तुलसी चालीसा और सामने है। हम प्रकृति से दूर भाग रहे हैं। तुलसी चालीसा के माध्यम से तुलसी का महत्व तो दिया ही है साथ ही तुलसी के सेवन से बीमारियों से निजात अनायास ही मिल जाता है और घर में उनकी उपस्थिति से बातावरण सुवासित बना रहता है। इसकी ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित किया गया हैं। घर के वातावरण को सुवासित बनाना है तो घर में तुलसी का पौधा जरूर लगायें। इस कृति का दैनिक पाठ भी उतना ही लाभकारी है।
पण्डित हरनारायण  बोहरे जी एक और अनूठी कृति कर्म काण्डार्थ प्रकाषिका जो पंच पुष्पों में संग्रहीत हैं। जो प्रकाशन की प्रतीक्षा में हैं।
मेरा सौभाग्य है कि ऐसे व्यक्तित्व के पास घन्टों बैठने का अवसर मिला है। आप सब उनके साहित्य से रू-ब-रू होकर उनकी निकटता का आनन्द जरूर उठायें।
पुस्तक प्राप्ति स्थल- पण्डित विश्वेश्वर दयाल बोहरे
मो0- 94257 57365
पता- कन्या उ.मा. वि. के पीछे सुभाश गंज डबरा भवभूति नगर जिला-
ग्वालियर म.प्र. 475110
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