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गुड़ की मिठास

बाल कहानी—गुड़ की मिठास
मेरठ के पास एक छोटे से गॉंव में एक गुड़ बेचने वाला अपनी पत्नी और दो बेटों के साथ रहता था । उसका नाम रामलाल और पत्नी का नाम शांति था । रामलाल बहुत ही सज्जन व्यक्ति था और पत्नी पूजा पाठ करने वाली कोमल स्वभाव की महिला थी।वह मंडी से लाकर, अपने गॉंव से दूसरे गॉंव में गुड़ बेचने ज़ाया करता था । वह सब परिवार में हँसी -ख़ुशी रहा करते थे ।
दुर्भाग्य से उसकी पत्नी का स्वास्थ्य ख़राब होने के कारण वह चल बसी। रामलाल बहुत ही उदास रहने लगा।
उसने सोचा ईश्वर को यही मंज़ूर था,मेरा और शांति का इतने दिनों का ही साथ होगा और वह दोबारा गुड़ बेचने पास के गॉंव में जाने लगा।
रामलाल को पूजा करनी नहीं आती थी तो वह गुड़ बेचने जाने से पहले गुड़ का एक टुकड़ा लड्डू गोपाल के पास रखकर चला जाता ।
बच्चे अब बड़े हो गए थे काम करने लगे तो पिता से घर पर आराम करने को कहते लेकिन रामलाल को तो घर बैठना अच्छा नहीं लगता था, वह गुड़ बेचने चला जाता ।
एक दिन बच्चों ने रामलाल से कहा- “पिताजी हमें घर में साफ़ सफ़ाई कराने के लिए कुछ सामान हटाना होगा।”
रामलाल ने कहा- “ठीक है सामान हटाने की आवश्यकता है तो कोई बात नहीं, तुम हटा लेना;मैं गुड़ बेचने जा रहा हूँ।”
बच्चों ने सारा सामान हटाने के बाद लड्डू गोपाल को भी अलमारी में बंद करके रख दिया ।
अगले दिन रामलाल फिर गुड़ बेचने निकला तो लड्डू गोपाल को अपने स्थान पर न पाकर वह ऐसे ही चला गया। जब वह जा रहा था तो थोड़ी दूर चलने के बाद एक बालक उसके पास आया और बोला—“बाबा आज गुड़ नहीं दोगे ।”
रामलाल ने देखा और सोचा,मैंने तो इसे कभी गुड़ दिया ही नहीं ।
वह बालक फिर बोला— “बाबा आज गुड़ नहीं खिलाओगे ।”
रामलाल को लगा कोई गॉंव का ही बालक है और गुड़ दे दिया ।
बालक— “बहुत मीठा है,बहुत मिठास है ।” कहता हुआ भागता चला गया ।
अब प्रतिदिन वह बालक रास्ते में मिलता तो रामलाल उसे गुड़ देता,बालक गुड़ ख़ुश होकर खाता और कहता —“बहुत मीठा है बहुत मिठास है “और भागता हुआ चला जाता ।
रामलाल के बच्चों ने पूरे घर की सफ़ाई करा कर सभी सामान यथा स्थान रख दिया और लड्डू गोपाल को भी उनके स्थान पर रख दिया ।पूजा का कार्यक्रम बनाया ।
घर में पूजा कराने के कारण रामलाल गुड़ बेचने नहीं गया घर पर पूजा सम्पन्न हुई तो वह भी भोजन करने के बाद सो गया । स्वप्न में उसे दिखाई दिया कि वह बालक उससे गुड़ मॉंग रहा है ।
दूसरे दिन वह जब गुड़ बेचने गया तो वह गॉंव में उस बालक को ढूँढने लगा लेकिन वह बालक वहाँ कहीं नहीं मिला ।
रामलाल ने अपने गॉंव के पास वाले गॉंव में भी उसे तलाश किया लेकिन वहॉं पता करने पर उस हुलिया का कोई बालक उसे नहीं मिला। गॉंव वालों ने बताया कि जैसा तुम बता रहे हो यहाँ तो कोई नहीं रहता ।लौट कर घर पर आया तो काफ़ी थक चुका था तभी उसकी नज़र लड्डू गोपाल पर पड़ी , देखा तो ऐसा लगा कि वह मंद- मंद मुस्कान के साथ
रामलाल को देख रहे हैं और जो गुड़ पूजा करके भोग लगाया था वह वहाँ है ही नहीं ।
शायद तभी कहते हैं भोले भक्त के वश में हैं भगवान, वह सोचने लगा कि लोग क्यों कहते हैं कि भगवान खाते नहीं,मेरे हाथ से गुड़ भी खाया…सोचते-सोचते , लड्डू गोपाल को देखते उसकी कब ऑंख लग गई पता ही नहीं चला ।

आशा सारस्वत ✍️

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