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अथगूँगे गॉंव की कथा - 16

उपन्यास-  

रामगोपाल भावुक

 

 

 

                         अथ गूँगे गॉंव की कथा 16

               अ0भा0 समर साहित्य पुरस्कार 2005 प्राप्त कृति

 

 

 

16

                          

      समाज में दो वर्ग स्पष्ट दिख रहे हैं। एक शोषक वर्ग दूसरा शोषित वर्ग। आज समाज में ऐसे जनों की आवश्यकता है जो पीड़ित जन-जीवन में जूझने के प्राण भर सकें। यह काम कर सकता है बुद्धिजीवी, किन्तु ये बुद्धिजीवी तो चन्द टुकड़ों की खातिर शाषकों के हाथों बिक गये हैं। इसी कारण मौजी को किसी सलाह पर विश्वास नहीं हो रहा है। वह अपने-पराये की ही पहचान नहीं कर पा रहा है। उसका इस धरती पर कौन है? जो उसके अपने बनते हैं उनमें उसके बनने के पीछे शोषण की भावना छिपी है। वह करै तो क्या करै! इस बारे में सोच-सोच कर कुन्दन को नींद ही नहीं आ रही है।

        इधर रातों-रात सारे गाँव में खबर फैल गई कि जाटव मोहल्ले में मौजी को बुलाकर पंचायत की गई है। गाँव का हर आदमी मौजी से डरने लगा। कहीं मौजी थाने में उसका नाम न ले दे। गाँव भर में इस मुद्दे को लेकर नई-नई अटकलें लगाई जाने लगीं। लोगों को अपने किये अत्याचार याद आने लगे। वे सोचने लगे कहीं मौजी उस बात का बदला न ले डाले। सरपंच कों अपनी करतूतें याद हो आई। ठाकुर लालसिंह सुमरणी लेकर भगवान से प्रार्थना करने लगे। वे अपने लड़के बलजीत के कारण दुःखी हो रहे थे। अमीन अवतार नारायण का खून सूख रहा था। कहीं जाटव लोग उनका नाम न लिखवा दें।

      सरपंच रात भर इसी सोच में डूबे रहे। चैन न पड़ा तो दिन उगते ही मौजी के शहर निकल जाने से पहले उसके दरवाजे पर पहुँच गये। मौजी बाहर चबूतरे पर ही बैठा मिल गया। उसे देखते ही सरपंच बोले-‘ मौजी तें तो आराम से बैठो है, चल उठ तेरी रिपोट थाने में करवा आऊँ। जासे तोय कछू सरकारी मदद मिल जायेगी। कमी परैगी तो मैं गाँव में से चन्दा करा दंगों। तोय नेकउ चिन्ता करिबे की जरूरत नाने।’

      मौजी समझ गया, जेऊ नाटक करिबे आये हैं। उन्हें देख मौजी ने ऐसे मुँह बना लिया जैसे उसे उनके आने से उसे साँन्त्वना मिली हो ,उनकी बात के उत्तर में बोला-‘महाराज तुम्हाये होत मोय का चिन्ता, अरे! झें आकें तों मैं तुम सब के कारण पल गओ।’

      सरपंच ने अपनी बात जारी रखी-‘ तें चिन्ता छोड़ और शहर चल , तेरी रिपोट करवा आऊँ। भेंई एस0डी0ओ0 साहब से मिल लंगे। तेरी रिपोट तें कहेगो तैसें लिखवा दंगो।’

      मौजी को लगा-अब कैसे मना रहे हैं? यह सोचकर बोला-‘तो महाराज तुमहू नेक जल्दी निपट लेऊ। तुम्हाये बिना तो मेरी कोऊ रिपोट हू नहीं लिखेगो। भाँसे जल्दी निपट आये तो तुम्हाओ काम नहीं बेंड़ायगो।’

      सरपंच के जाते ही वह दिशा मैदान को चला गया। जब वह लौटा तो गाँव के चार-पाँच प्रमुख-प्रमुख आदमी उसी चबूतरे के पास खड़े मिले। उन्हें देख मौजी सोचने लगा-ससुरके घडियाली आँसू बहावे आये हैं। तासे जों पतो पज्जाय कै मुजिया कौन के नाम सो रिपोट लिखा रहो है। मौजी को चुपचाप देख अमीन अवतार नारायण बोले-‘मौजी रिपोट जरूर लिखा आ। अरे ! जावे-आवे कों दाम पइसा न होय तो मैं दऊँ।’

      ठाकुर लालसिंह बोले-‘अरे! तें दिये मत। तेरो सब जल गओ। चार-छह दिना को जिनसे काम चल जायगो।’यह कहकर उन्होंने एक सौ रुपये का नोट जेब में से निकाल कर उसे दिया,। उनके देखा-देखी अमीन अवतार नारायण ने भी उसकी ओर एक सौ रुपये का नोट बढ़ा दिया। दोनों ने वे रुपये चुपचाप मौजी के हाथ पर रख दिये। मौजी को रुपये लेते में लगा- इन से का होयगो। इतैक से तो आज के काजें हीं नाज नहीं आ पायगो।’ देने वाले भी उसकी इस ‘ बेबसी को समझते हुये अपने घर लौट आये।

     इधर जयराज ग्वालियर शहर से अपने घर की खबर-दबर लेने लौट आया था। उसके ससुराल वालों ने छोटे बच्चे का बहाना लेकर उसकी पत्नी को भेजने से मना कर दिया था। कह दिया -‘ अभी बच्चा छोटा है, थोड़ा सँभल जाने दो, फिर लिवा ले जाना। उन्होंने उसकी बहन की सगाई के लिये एक जगह बात करवा दी थी। वे लड़की देखने गाँव आ रहे हैं। जब यह समाचार घर के लोगों ने सुना तो वे लता बहू के माता-पिता को, उनके इस सहयोग के लिये धन्यवाद देने लगे। इन दिनों उनके प्रति जो विष घुल रहा था, वह तिरोहित सा होगया।

       इन दिनों एक ही बात सभी के मन में चलने लगी, वे शहरी लोग है, लड़की देखकर मना भी कर सकते हैं। इससे बड़ी बदनामी होगी। गाँव वाला मामला है। गाँव में आज तक ऐसा हुआ नहीं है। कुन्दन अपने पिता लालूराम जी से बोला-‘उनकी आवभगत ठीक ढंग से होनी चाहिये। इन बातों से आदमी प्रभावित होता है।’

       बात सुनकर जयराज बोला-‘खाने-पीने का प्रबन्ध शहरी ढंग से हो जाये। नहीं समझेंगे, हम ठेट गाँव के हैं, सभ्यता क्या चीज होती है? हम जानते ही नहीं हैं।’

       लालूराम झट से बोले-‘अरे! इसमें क्या परेशानी है, बैठक सजा दो। उसमें दो-चार फिल्मी कलेन्डर टाँग दो। चार-पाँच कुर्सियाँ बैठक में डाल दो। शहर से बिस्कुट मँगा लो। बस हो गई शहरी व्यवस्था। सोई हम सभ्य बन गये।’

        कुन्दन ने शहरी सभ्यता से दहेज को जोड़ा-‘मुझे तो लगता है, शहरी सभ्यता का अर्थ है खूब दहेज का लेन देन। क्यों जयराज दहेज के बारे में उनसे क्या बातें हुई हैं?’

        ‘भैया, लता के पापा से कुछ बातें तो हुई हैं,उन्होंने मुझ कुछ कहा ही नहीं।’

        कुन्दन को लगा-इस मामले में गोलमाल बातें, बाद में तू-तू मैं-मैं होने से अच्छा है पहले ही साफ कर ली जाये। ऐसीं छोटी-छोटी बातें बहू-बेटियों की जान पर आ पड़ती है।

         कुन्दन को सोचते हुये देखकर लालूराम बोले-‘लेन-देन की बात साफ हो जाये हम तो ही सम्बन्ध करैंगे। शहरी लोगों का क्या भरोसा? मिट्टी का तेल डालकर बहुओं को जला देते हैं।चन्दन पाँन्डे की लड़की शान्ति का क्या हुआ?हरे राम! इससे तो लड़की घर में कुँवारी बैठी रहे तो ही अच्छा।’

          कुन्दन की माँ चित्रा इनकी बातों को चुपचाप सुन रहीं थी। अब उनसे रहा न गया तो बोलीं-‘तुम लोग इतैक बातें कर रहे हो, का पतो वे आ भी रहे हैं या नहीं!’

         जयराज ने आत्मविश्वास उड़ेला-‘मोसे आवे को बिन्ने बादा करो है। कल जई वखत तक आजाँयेंगे।’     

        जिस बैठका में यह बातें चल रहीं थीं, हनुमान चौराहे की दृष्टि से वह बहुत ही महत्वपूर्ण जगह है। दिनभर में कोई न कोई उसमें बैठा मिल जायेगा। सर्दी-गर्मी और वर्षा में हनुमान आश्रय का काम भी यही बैठका करता है। इनकी घर की बातें चल ही रहीं थी कि बैठका में कुढ़ेरा काछी आगया । उसे देख बात का विषय ही बदल गया।

       कुछ बातें व्यक्तिगत होतीं हैं। कुछ पारिवारिक और कुछ सामाजिक होतीं हैं। व्यक्तिगत बातें परिवार से भी छिपाकर रखी जाती हैं। परिवारिक बातें समाज से छिपाई जातीं हैं। परिवारिक बातों का जब सनैः-सनैः सामाजीकरण होने लगता है, तब उन्हें लोग रोकने का प्रयास करते है किन्तु रोक नहीं पाते।

      आते ही कुढ़ेरा ने मौजी के घर में आग लगाने की घटना का पता चलाना चाहा। उसे पता है, तिवारी जी को सच्चाई पता चल ही गई होगी। उसने उनसे पूछा-‘भज्जा,मोय तो जों लगते कै आदमी न मजाय।’

        लालूराम तिवारी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुये पूछा-‘ कुढ़ेरा, ज तेनें कैसें जानी।’

        कुढ़ेरा ने आत्मविश्वास के साथ उत्तर दिया-‘अरे! मौजी ने ताको नाम ले दओ, ते मुजिया कों छोड़वे बारो नाने।’

       लालूराम ने कुढ़ेरा की बात को महत्वपूर्ण नहीं माना, बोले-‘आदमी मारिवो खेल नाने। तापे 302 धारा लग गई, व हरो पेड हू सूख जातो। ज संकट से तो राम जी बचायें। आज के जमाने में मर्डर केश में लाख-दो लाख रुपइया फेंकिवो मामूली बात है।’

       कुढ़ेरा ने सहज बनते हुये उत्तर दिया-‘ऐसो घनोरी झाँ कोऊ नाने। सब झें- भाँ से काम चला रहे हैं। झें की जमीन इतैक कमजोर होगई, कै नोना उछर आओ है। लग्गत बढ़ गई है और पैदावार घट गई है । आदमी अपओ काम कैसें चलाये?’

       यह कहते हुये कुढ़ेरा को आत्मबोध हुआ। पुनः बोला-‘तिवाई महाराज सुनतयें जाटव मोहल्ला में गंगा उठ गई है।’

       जयराज इन बातों को मनोयोग से सुन रहा था। बोला-‘कक्का, उनको गंगा पर विश्वास रहा कहाँ हैं? सुना है वे सब बौद्ध बन रहे हैं।’

       कुन्दन ने भाई को समझाया-‘यहाँ के हिन्दू लोग उन्हें अपना मानने को तैयार ही नहीं हैं। उनसे छुआछूत मानते हैं। बताओं, ऐसे अमानवीय व्यवहार से कौन तुम्हारे साथ बना रहेगा? अब सभी लोग मानवीय ढंग से सोचना सीख गये हैं।’

       खुदाबक्स उर्फ लल्ला मियाँ हर रोज की तरह बैठक में आ गया था। उसने उनकी बातें सुन लीं थीं। वह हर बार की तरह देहरी का सहारा लेकर बैठ गया। उसने अपने सुने समाचार का बखान किया-‘ सुन्तयें, कल ठाकुर साहब के खेत में भड़िया हतये!’

      ललूराम तिवारी ने झट से प्रश्न किया-‘ तोय कैसें पतो है?’

      खुदाबक्स ने अपनी बात को बजन देने के लिये कहा-‘ चिन्टू तेली बितें चारो काटिवे गओ। बाय टकरा गये। विन्ने बाय मार-पीट कै भगा दओ।’

      जयराज ने डाकुओं के बारे में अपना अनुभव सुनाया-‘आजकल लूटने-पाटने का लोगों ने धन्धा बना लिया है। इससे पुलिस और नेताओं की चाँदी है।’

      कुन्दन ने जयराज की बात का समर्थन किया-‘ इस प्रजातंत्र ने हमें क्या दिया?इस युग में सत्ता का भय नाम की कोई चीज ही दिखाई नहीं देती।लूटपाट, चोरी, डकैतीं इतनी बढ़ गई हैं कि समस्या का कोई हल दिखाई ही नहीं देता। आतंकवाद संस्कृति बन कर उभर रहा है। गरीब और गरीब हो रहा है, पूँजी चन्द हाथों में कैद होती जा रही है। सारी समस्यायें गरीब के लिये हैं।सारी की सारी व्यवस्था पूँजीपतियों का पोषण करने में लगी है।’

      तिवारी लालूराम को लड़के की ये बड़ी-बड़ी बातें खल रहीं थीं।उन्होंने उसकी बातों में दखल दिया, बोले-‘मुझे तो इस युग में सभी सुखी दिखाई दे रहे हैं। गरीब से गरीब आदमी टेरीकोट पहने दिखाई दे रहा है। गरीबी है तो आदमी के अपने मन की।’

       कुन्दन ने पुनः अपनी बात रखी-‘पिताजी न्याय उन्हें मिलता है जो उसे खरीद सकते हैं। अत्याचार बड़े करते हैं और लाद दिया जाता है गरीब आदमी पर। श्रमिक का पूरा हक उसे नहीं मिल पा रहा है।न्याय के नाम पर उसे छला जा रहा है।’

     पुत्र की बातें असहनीय हो गई। बोले-‘सब अपने- अपने भाग्य से जीते मरते हैं। भाग्य फले तो सब फले, भीख, बंज, व्यापार।’

      कुन्दन ने पैनी धार से पिता जी की बात काटी-‘सच तो यह है कि कहीं कोई भाग्य-वाग्य नहीं होता। सब इसके नाम पर एक दूसरे को छल रहे हैं।यही मंत्र इस व्यवस्था को जीवित रखे है। जिस दिन ये बातें गरीब आदमी की समझ में आ जायेंगीं। उसी दिन बातें आकर पुरुषार्थ पर ठहर जायेंगीं। यह व्यवस्था उसी दिन चरमराकर खत्म हो जायगी। फिर तो मेहनत से जो मंजिल तय होगी वह आदमी का न्याय की धरती पर मानवता का अद्वितीय कदम होगा।’

     जयराज को भाई की बातें रुचिकर लगी,बोला-‘ भइया, मुझे तो नहीं लगता ,कभी शोषण मुक्त समाज की रचना हो सकेगी।’

    कुन्दन ने उसे समझाया-‘तुम देख ही रहे हो,चीन और रूस में इस प्रकार की व्यवस्था ने जन्म ले लिया है। भले ही कुछ व्यवधान आ सकते हैं। हमारे देश की पश्चिमी बंगाल की सरकार एक उदाहरण प्रस्तुत कर रही है किन्तु वहाँ भी व्यक्तिबाद बढ़ रहा है जो इस प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न कर रहा है।’

तिवारी लालूराम को बच्चों की बातें खल रहीं थी। बे झुझलाते हुयें बोले-‘जो सत्ता बन्दूक से आती है ,वह स्थाई कैसे हो सकती है?’

कुन्दन ने पिताजी को समझाया-‘पिताजी, यदि यह बोट के रास्ते से आता है तो वह अधिक स्थाई हो सकता है। बन्दूक की सत्ता मानवीय दृष्टि से गलत हैं। हम प्रगतिशील विचारों का स्वागत करते हैं। ये विचार वैज्ञानिक दृष्टि से संबंधित हैं।’

कुढ़ेरा इन बातों को समझने का प्रयास कर रहा था, किन्तु उसकी समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था। वह उनकी बातों से, बातों का अन्दाज लगाते हुये बोला-‘तुम्हाई बातें हमाई समझ में नहीं आत। हम तो जों जानतयें कै हमाये भाग्य में जो बदो है सो हो के रहेगो। अरे! ज बताऊ मेरो जनम ठाकुर लालसिंह के झाँ काये नहीं भओ। बोलो जे सब बातें भाग्य कीं हैं कै नहीं।’

  कुन्दन ने उसे समझाने का प्रयास किया-‘आदमी के अन्दर पड़े जन्म-जन्मान्तर के संस्कार इस तरह सोचने के लिये मजबूर करते हैं। किसी के पास थोड़ी सी भी पूँजी इकत्रित हुई कि वह बढ़ती ही चली जाती है। ब्याज-त्याज सब गरीबों के सिर पर पड़ता है।’

 कुढ़ेरा ने अपना अजमाया हुआ तर्क दिया-‘गरीबन को चुनाव से इतैकई सम्बन्ध है, जितैक बोट देवै के काजें होनों चहिये। बताऊ चुनाव में को गरीब ठाड़ो हो पातो। अरे !बोटन से राजा-महाराजा ते बन पातयें जिनपै पइसा होतो।’

 कुन्दन ने उसके भेजे में यही बात स्थाई रुप से बैठाना चाही-‘आप ठीक कह रहे हैं। इस अव्यवस्था से हम सब को मिलकर लड़ना पड़ेगा, कै नहीं? अरे !लड़ाई जाति-पाँति की नहीं, धर्म-सम्प्रदाय की भी नहीं, गरीब और अमीर में होना चाहिये। जाति-धर्म, सम्प्रदाय जाने किन-किन नामों पर ये अमीर लोग गरीबों को आपस में बाँटे हुये हैं।’

  कुढ़ेरा को लगा, वह इनकी ये बातें सुनते -सुनते ऊब गया है। उनकी ये बातें उसकी समझ में नहीं घुस रही है। यह सोचकर बोला-‘चलो दुपहरिया ढल चली, बैल सार में मूत रहे होंगे। बिन्ने बाहर नीम की छाया में बाँधनों है।’ यह कह कर वह वहाँ से उठ पड़ा तो सभी उठ पड़े और अपने-अपने काम में लग गये।

 

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