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घुटन - भाग ८ 

दरवाज़े के बाहर खड़े रागिनी के पिता यह सब सुनकर बरसों से अपनी आँखों में थमे हुए आँसुओं को आज रोक नहीं पाए। जिन आँसुओं को उन्होंने आज से पहले कभी आँखों से बाहर आने की इजाज़त ही नहीं दी थी; अपनी बेटी की हिम्मत बँधाने के लिए इतने वर्षों से यह आँसू उनकी कैद में थे। लेकिन आज वह आज़ाद हो चुके थे और वर्षों से भरी हुई आँखों को हल्का कर रहे थे। आँखों के साथ ही आज उनका मन भी हल्का हो रहा था क्योंकि कहीं ना कहीं उन्हें भी यह चिंता खाये जा रही थी कि जब तिलक जवान होगा, समझदार होगा और यह सब जानेगा तब उसकी प्रतिक्रिया क्या होगी। उसके शब्दों में घुला शहद उनके कानों में मीठी- मीठी ध्वनि छोड़ रहा था। वह आज अपनी दबी हुई सिसकियों की आवाज़ को भी रोक ना पाए। उनकी सिसकियाँ ही उनकी उपस्थिति बता रही थीं।

रागिनी और तिलक उठ कर उनके पास आए। उन्हें देखते ही रागिनी के पिता की सिसकियाँ ऐसे रुदन में बदल गईं जिसमें विलाप था, अपनी बेटी के लिए दर्द था, जिसमें त्याग था, बलिदान था, घुटन थी और वीर प्रताप के लिए क्रोध था। तिलक ने अपने नाना को सीने से लगा लिया फिर उनके आँसू पोंछते हुए कहा, "नाना जी मुझे आप जैसे पिता क्यों नहीं मिले,” इतना कहते हुए तिलक भी रो पड़ा।

फिर उसने अपने आँसुओं को पोंछते हुए रागिनी से पूछा, "माँ उस इंसान की कोई तस्वीर आपके पास है क्या?"

" तिलक वह तस्वीर तो मेरी आँखों के पटल पर ऐसी छपी है कि कभी मिट ही नहीं सकती। आँसुओं के अंदर रहते हुए भी उसका रंग फीका नहीं हो सकता। ऐसी तस्वीर को काग़ज़ के पन्नों पर रखकर मैं क्या करती; जो फट भी सकती है और वक़्त के साथ फीकी भी पड़ सकती है। लेकिन हाँ तुम्हें यदि उनकी तस्वीर देखनी ही है तो आओ मैं तुम्हें दिखाती हूँ।" 

अठारह साल के जवान तिलक का हाथ पकड़कर रागिनी उसे आईने के सामने ले गई और कहा, "तिलक यह देखो लगभग ऐसा ही दिखता था वह, जैसे तुम दिखते हो। मुझे तो बरसों हो गए उसे देखे। अब कैसा दिखता होगा मालूम नहीं पर उन दिनों लगभग तुम्हारे जैसा ही दिखता था।" 

तिलक ने ड्रेसिंग टेबल पर रखी कांच की परफ्यूम की बोतल को इतनी जोर से आईने पर मारा कि कांच का शीशा टूट कर बिखर गया। रागिनी डर गई, वह तिलक का क्रोध देखकर हैरान थी। उसने कहा, "तिलक यह क्या किया तुमने? माँ मुझे यह शक्ल नहीं चाहिए थी। मैं आपके जैसा दिखना चाहता था। अब तो मुझे मेरी शक्ल से भी नफ़रत. . . "   

"तिलक बेटा सूरत मिलने से कुछ नहीं होता। अपनी सीरत अपनी पहचान अलग होनी चाहिए। वीर प्रताप के बारे में यह सब सुनकर तुम्हें यह सीखना चाहिए कि तुम्हारे जीवन में कोई लड़की आए तो उसके प्रति तुम आजीवन वफ़ादार रहना। विवाह के पहले कुंवारी माँ बनना, नौ महीने तक अपने आपको समाज के तानों से बचाना कितना मुश्किल होता है यह मैंने सहा है बेटा। तुम जीवन में कभी ऐसी कोई ग़लती मत करना।"

"माँ मैं कभी ऐसी ग़लती नहीं करूँगा कि किसी नारी का अपमान हो। कोई बच्चा अपनी माँ की आँखों में छिपे हुए आँसुओं को हर रोज महसूस करे। वह अपने नाम के पीछे पिता का नाम ना लिख पाए," इतना कहते हुए तिलक रो पड़ा और बोला, " वीर प्रताप सिंह ने मेरे और आपके साथ जो व्यवहार किया है उसके लिए मैं उसे कभी माफ़ नहीं करूँगा।"

 

रत्ना पांडे, वडोदरा (गुजरात)

स्वरचित और मौलिक

क्रमशः

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