बंद खिड़कियाँ - 16 S Bhagyam Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

Featured Books
श्रेणी
शेयर करे

बंद खिड़कियाँ - 16

अध्याय 16

उस दिन मन कैसे पंख लगाकर उड़ रहा था? किस कारण से उड़ रहा था?

इन प्रश्नों को कई बार अपने अंदर वह पूछती और भ्रमित होडर जाती। उसको जवाब नहीं मिला। उसका दिल धड़कने लगा। कपकपी सी लगी... नए संचारों के लिए निडर होकर खड़े हुए जैसे। इस बात से ही उसे डर सा लगा। परंतु उस डर के बीच उसका निडर होकर उस पूरी रात दिनकर के साथ अकेले बैठकर उसकी बातें उसके हंसी मजाक की सुंदर यादें आकर एक सुख की अनुभूति प्रदान करती है।

सब तरह से निशब्दताथी उस रात। पत्ते और पक्षी अपनी सांस को रोके कुछ प्रतीक्षा कर रहे जैसे वह मौन था। सफलता के रास्ते में नीचे मिट्टी दबी हुई थी।

"इतने अंधेरे में फिर से आप गिर जाएंगी"उसके साथ ही दिनकर चले। सचमुच में डगमगा कर गिरने वाली थी तो उसने उसके हाथ को पकड़ लिया और"विपत्ति में कोई दोष नहीं"हंसते हुए बोला।

"घर पर आ गए"कहकर बाहर बरामदे के लाइट को उसने जलाया। बत्ती की रोशनी में अपने हाथ को छुड़ाकर उसे देख हंसा।

"किस तरह इतने निडर होकर आप गुप्त अंधेरे में बैठी थीं? मैं नहीं आया होता तो क्या हुआ होता?"

उसको भी हंसी आ गई।

"कुछ भी नहीं हुआ होगा। नीचे गिर कर अपने आप उठ गई होती।"

"चोट के साथ...."

एक क्षण उसी हंसी वाले निगाहों से सरोजिनी ने देखकर सिर को झुका लिया।

"कितनी भी चोट लग जाए उससे किसी को भी कोई परेशानी नहीं होगी साहब!"धीमी आवाज में बोली।

वह थोड़ा रुक कर धीरे बोला।

"दूसरों को परेशान होने की जरूरतहै ऐसा क्यों सोचती हैं? आपको तो परेशानी होती ना?"

"हां परेशानी होती है? मुझे कुछ भी हो जाए तो फिक्र करने वाला एक भी आदमी नहीं है यह बात मुझे परेशान करती है चोट नहीं।"

उसे स्वयं को भी पता न लगा अचानक उसके आंखों से आंसू गिरने लगे। वह स्तंभित होकर परेशानी से उसे देखने लगा।

"आप बुरा नहीं मानो तो एक बात कहता हूं। आपके बारे में मुझे फिक्र है।"

वह चकित होकर गर्दन ऊपर कर उसे देखा। इस घर में किसी के पास भी दिखाई नहीं देने वाला दया भाव उसके आंखों में दिखा। 'इनकी फिक्र करने से मेरा क्या होने वाला है?' वह सोचने लगी। फिर भी उस शब्दों को सुनकर कारण नासमझ आने पर भी उसके मन को वह छू गया।

"जंबूलिंगम मेरा करीबी दोस्त है इसलिए मुझे आपके लिए दुख होता है....."वह बोला। "कितना भी करीबी दोस्त हो फिर भी कुछ बातों के बारे में बात नहीं कर सकते। उसे अच्छी सलाह दे नहीं सकते। यदि बोले तो उसे गलत लगेगा। आपके साथ उनका व्यवहार ठीक नहीं मुझे मालूम होने के बावजूद मैं आपके पक्ष में बात करूं तो वह गलत ढंग से ले सकता है। दोस्ती ही खत्म हो जाएगी। इसलिए उसे ठीक करना आपके हाथ में हैं बहुत दिन पहले आपसे मैंने कहा था।"

अब उसका संकोच थोड़ा दूर हो गया "उन्हें सुधारना मेरे लिए संभव नहीं है!" बड़े दुख से बोली। "मुझमें रोष अधिक है। ढोंग करना मुझे नहीं आता। उन्हें तृप्त करना मुझे नहीं आता यहमेरी ही कमी है ना?"

उसकी आंखों में फिर से आंसू भर आए।

"नहीं आप में कमी नहीं है" उसे ध्यान से देखकर दिनकर बोले।

"वीणा को बजाओ तो ही स्वर आएगा। उसे तोड़ो तो स्वर आएगा क्या ?"

उसने असमंजस में उसे देखा। वीणा में और अपने में क्या संबंध है उसे समझ में नहीं आया। वह मेरी बढ़ाई कर रहा है यही समझ में आया। उसे शर्म भी आई।

"आप कुछ भी बोलो उनके लिए तो मैं कुछ भी नहीं हूं। घर की रसोई को संभालने वाली एक बाई हूं। मेरा भी मन है मेरी भी कुछ इच्छाएं होगी..."

"वह मुझे समझ में आता है।"

वह एकदम से उसे घूर कर देखी। 

"आपके समझने से मुझे क्या फायदा है बताइए?"

उसने अपने सर को झुका लिया।

"फायदा नुकसान देखने का विषय नहीं है यह। मैं आपका दोस्त हूं इसे आपको समझना चाहिए। मैं विशेष रुप से आपकी मदद नहीं कर सकता तो भी आपके लिए बोलने के लिए मैं एक हूं ना...."

उसका शरीर एकदम से रोमांचित हो गया। इन्हें सचमुच में अपने ऊपर दया और अपनत्व है ऐसा उसे लगा। वह अपने को संभाल कर बोली "आपको बहुत धन्यवाद। आप मेरे लिए बोले तो फिर एक विपत्ति आ जाएगी। आप बोले तो भी यहां सुनने वाला कोई नहीं है?"

"यही वास्तविकता है" दुखी होकर वह बोला। फिर उसे देखकर थोड़ा मुस्कुराकर पूछा "पर आपके पक्ष में कोई आदमी है यह आपके लिए बल तो है?"

उसने हिचकते हुए उसे देखा। उस हंसी में दया की भावना से उसे कुछ होने लगा। अभी तक महसूस नहीं किया ऐसी एक भावना से रोमांचित होकर दिल में एक भावना उठी। जंबूलिंगम से आने वाली बदबू और काले शरीर को देखते ही उसे डर और घृणा के कारण अकड़ जाने वाला उसकाशरीर दिनकर के सानिध्य में पिघल कर खड़ा है ऐसा उसे लगा। उसके गालऔर कान इस ठंड में भी गर्म हो गए।

'सुंदर होने से क्या यह तो सिर्फ लकड़ी है ऐसा यह बोलते हैं!' रत्नम की हंसी उसे याद आई।

'गलत ! यह झूठ है मैं लकड़ी नहीं हूं...'

शरीर के सारे अंग एक तरह से एक प्रतीक्षा में खड़े थे। आंखें मोहित होकर अपने होश खो रहे थे।

"आपको अभी तक मुझ पर विश्वास नहीं हुआ ऐसा लगता है..."

वह हिचकिचाकर अपने को संभाल लिया। 

'ओफ ! क्या हो गया मुझे? ऐसा उसे एक डर लगा। 'मैं एक शादीशुदा औरत हूं। ऐसे होश खोकर रहूं तो ठीक है?' एक डर उसे उत्पन्न हुआ। 'मैं क्यों इस आदमी से बात करती हुई खड़ी हूं?' उसका मन घबराया।

"आपके ऊपर विश्वास नहीं है ऐसा नहीं" ऐसा वह हिचकते हुए संकोच से बोली। "आपकी मित्रता तो मेरे लिए विपत्ति ही लेकर आएगी..."

"फिकर मत करिए। ऐसी आफत आने जैसा मैं व्यवहार नहीं करूंगा।"

"आपकी पत्नी को एक बार यहां ले कर आइए ना?" ऐसा कहकर उसने बात को बदला।

"मेरी तो शादी ही नहीं हुई है फिर पत्नी कहां से होगी?"

वह आश्चर्य से उसे देखी।

"अभी तक शादी नहीं हुई? क्यों? आपके दोस्त की तो दो शादी हो गई है!"

वह हंसा।

"सोलह साल में ही उसको बंधन में बांधना है उसकी अम्मा के समझ में आ गया था। मैं तो बिना बाप का हूं। मुझ पर घर की जिम्मेदारी बहुत है‌। अभी हीसबसे छोटी बहन की शादी की । अब मुझे मेरे बारे में सोचना है। आप कोई अच्छी लड़की को जानते हैं तो बताइए?"

वह मैत्री भाव से हंसी।

"आपको किस तरह की लड़की चाहिए?"

"आपके जैसे होना चाहिए"

फिर से उसके पूरे शरीर खून तेजी से दौड़ने लगा और गर्मी से वह रोमांचित हुई।

उसने हिचकती हुए सिर नीचे कर लिया।

"नहीं, नहीं मेरी जैसी आपको नहीं चाहिए। आप भी बिना तृप्ति के थक कर फिर दूसरी शादी करेंगे।"

वह उसे घूर कर देखने लगा।

"जम्बूलिंगम और मैं दोनों ही एक तरह के आदमी है आप कह रही है क्या!"

वह जवाब दिए बिना मौन खड़ी रही।

अचानक उसे कमजोरी लगी। स्वयं पर पश्चाताप से आंखों में आंसू उमड़ पड़े।

"घर में बहुत अंधेरा है। मैं जाकर लाइट जला कर आता हूं।" वह उसे ना देख सके इसलिए उसने पीठ पीछे कर ली।

"मरगथम को तुम्हारी सहायता के लिए लिए बैठने के लिए बोलूं !" धीरे नम्रता से बोला "इतनी बड़े घर में रात के समय अकेले बैठे रहना डर नहीं लगता?"

"डर तो लगता है!" वह बोली,"मरगथम के पति को बुखार हो रहा है उसे खाने को कुछ देकर आती हूं उसने बोला है।"

"फिर ठीक है। उसके आने तक मैं बैठ जाऊं?"

"नहीं"बोलने में उसे संकोच हो रहा था।

"मैं बरामदे में ही बैठा रहता हूं। आप अंदर जाकर किवाड़ लगा कर बैठ जाओ"वह मुस्कुराते हुए बोला। वह सकुचाई।

"अंदर बिजली के लाइट को जला कर बैठे तो सासु मां को पसंद नहीं आता। तेल डाल के लटकने वाले दीपक को ही जलाने को बोलती हैं। उसे ही जलाना है। रोज मरगथम का पति ही उसे जलाता है। ऊंचा होने के कारण मैं नहीं जला सकती।

"बस यही बात है। मैं जलाता हूं।" कह कर वह अंदर गया। अंधेरे में मुश्किल से बिजली का स्विच से दिखाई दिया तो उसे ऑन किया। माचिस की डिबिया को निकालकर कुर्सी पर चढ़कर दो दीपकों को जलाया। "और दीपक भी जलाना है?"पूछा। "हां रसोई जाने के रास्ते में एक बरामदा है। वहां बिजली नहीं है।"

उसके पीछे गया। वह आदत के कारण बड़े आराम से गई। वह किसी से टकराकर "अरे बाप रे" बोला तो उसने अनजाने में ही उससे "हाथ को दीजिए" बोली। 

उसके जवाब के बिना उसके हाथ को पकड़ लिया।

"यही पीछे का बरामदा है" वह बोली।

"माचिस का डिब्बा दीजिए" उसनेआले में से उठा कर दिया।

"अरे बाप रे अंधेरे में आप की निगाहें बड़ी तेज हैं?" कहकर उसने आश्चर्य प्रकट किया।

"अंधेरे की मुझे आदत है!"कहकर वह हंसी।

वह मौन होकर माचिस को जलाकर उसने जिस दिशा में कहा वहां के दीपक को जलाया।

"आपको बहुत धन्यवाद। आप कुछ खाएंगे?" पूछी ‌।

"नहीं नहीं आप खा लीजिए। मैं बाहर बैठता हूं। मरगथम को आने के लिए बोल कर मैं रवाना होता हूं" बोला।

उस धीमी रोशनी में उसे अच्छी तरह देखा।

"आप चाहे या ना चाहे मैं आपका दोस्त हूं। उसे आपको नहीं भूलना चाहिए"कहकर वह तेजी से बाहर चला गया।

बहुत देर तक उसका मन एक अजीब नशे में तैरने लगा। यह गलत है यह गलत है ऐसा मन के दिमाग में एक आवाज आ रही थी फिर भी एक लाजमी लक्ष्य उसके सामने घूमने लगा।

बैलगाड़ी की आवाज सुनाई दे रही थी शादी में से वापस आए लोगों की भीड़ घर के अंदर घुसते समय, आज कुछ आश्चर्यजनक एक नई शक्ति आये जैसे उसका मन भरा हुआ था।

    ****