बंद खिड़कियाँ - 4 S Bhagyam Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बंद खिड़कियाँ - 4

अध्याय 4

नलिनी को तेजी से अंदर जाते सरोजिनी ने देखा। 'सब परेशानियों के लिए इस लड़के को जिम्मेदार यदि नलिनी मानती है तो यह उसकी बेवकूफी है' ऐसा उसने सोचा।

शंकर के चेहरे पर आज खुशी नहीं थी उसने इसे महसूस किया। "नमस्कार बड़ी अम्मा" कहकर एक हल्की मुस्कान के साथ नमस्कार किया। 

"नमस्कार। आओ बेटा" वह बोली।

"हेलो" कहकर आगे आकर कार्तिकेय ने उससे हाथ मिलाया।

"अमेरिका एंबेसी में अरुणा का एक अपॉइंटमेंट है। मैं काउंसलर को जानता हूं। उसे लेकर जाने के लिए आया हूं" शंकर बोला।

"अरुणा अभी आ जाएगी, आप बैठिए। मुझे ऑफिस के लिए रवाना होना है।"

"आप रवाना होइए। अरुणा के आने तक मैं बड़ी अम्मा से बात करता हूं।"

"आप कैसी हो बड़ी अम्मा?" पूछा।

"मैं अच्छी हूं" सरोजिनी हंसी। "उम्र हो गई इसके अलावा और कोई परेशानी नहीं, समय पर खाती हूं सोती हूं ।"

"बहुत खुशी हो रही है आपकी बात को सुनकर बड़ी अम्मा। साधारणत: इस उम्र को पकड़ने के पहले ही बहुत से लोगों को अपने जीवन से विरक्ति हो जाती हैं। उनकी बातों में शिकायतों के सिवाय और कुछ नहीं होता।"

वह मुस्कुराकर बिना बोले बैठी थी। देखने में तो यह एक योग्य लड़का लगता है। इसकी आंखों में कोई भी बुराई नजर नहीं आती है। अरुणा के साथ इसका साधारण संबंध हो सकता है नहीं तो ज्यादा भी हो तो इसको या अरुणा को दोष देने से कोई फायदा नहीं ऐसा वह अपने मन में सोच रही थी । 

"अरुणा कैसी है बड़ी अम्मा ?" धीमी आवाज में उसने पूछा।

"वह ठीक ही है" उसने भी धीमी आवाज में जवाब दिया।

उसने कुछ सोचते हुए सिर को झुका लिया।

"सुबह फोन पर बात करते समय "अपसेट" है ऐसा मुझे लगा" वह बोला।

"हां.... थोड़ा इधर-उधर हुए बिना रहेगा क्या ?" सरोजिनी बोली।

"इस घटना के बिना भी रह सकते थे? जीवन में दो साल व्यर्थ हो गये ऐसा ही तो है। व्यर्थ ही नहीं मन में जो घाव हुआ है उसे भरने में और कुछ दिन समय लगेगा।"

शंकर ने उन्हें असमंजस में देखा।

"आप ही तो उसके साथ अपनत्व से हैं उसने बताया।"

सरोजिनी हंसी।

"मेरा जीवन काल तो समाप्त हो गया। मेरा अपनत्व और मदद होने पर भी उसके लिए कोई फायदा नहीं है। इस तरह के विषयों में किसी से मदद की उम्मीद रखने की जरूरत नहीं। मन को जो ठीक लगे उसे करना चाहिए। हमने जो अनुभव किया है वह सिर्फ हमें ही पता है।"

"बिल्कुल ठीक कहा आपने" शंकर मुस्कुराकर "अभी मुझे समझ में आ रहा है। अरुणा भी आपके जैसे स्वभाव की है।"

'इसको मेरे स्वभाव के बारे में क्या पता ?' ऐसा सोच कर उसे हंसी आई।

सीढियों से चलने की आवाज आई। अरुणा उतर रही थी। हैंडलूम की साड़ी पहने गंभीर मुद्रा में बड़ी अच्छी लग रही थी। सुबह उसके चेहरे पर जो तनाव था वह अब नहीं है। नहाकर क्रीम और पाउडर लगाकर आई थी।

उसको आते देख शंकर उठकर खड़ा हुआ।

"हाय!" कहते हुए अरुणा पास में आई।

"हम चलते हैं दादी" बोलकर सरोजिनी को देखा। "अम्मा से कह देना। वह नहीं दिख रही है। मैं बाहर खाना खाऊंगी। पक्का आज सिनेमा चलेंगे। शाम का 'शो'”

“और कोई बात तो नहीं है ना?"

"कोई बात नहीं !"

अरुणा हंसते हुए सरोजिनी से हाथ मिलाकर शंकर के साथ बाहर निकल गई।

वे आपस में हंसते हुए अंग्रेजी में बात करते हुए गाड़ी के अंदर बैठे, उनको अंदर बैठे ही सरोजिनी ने देखा।

दो साल पहले ऐसे ही अरुणा और प्रभाकर जोड़ी से हंसते हुए जाने की बात उसे याद आई। बड़े घर से संबंध, खूब पढ़ा लिखा सब मालूम करके ही शादी की थी। पढ़ने वाले दिनों में अरुणा पढ़ाई पर ही ध्यान देती थी। वह किसी प्रेम-व्रेम  में नहीं फंसी। एम.ए. पूरा करने तक हम रुके रहेंगे ऐसा अम्मा-अप्पा ने कहा | नलिनी के पसंद किए हुए लड़के के लिए उसने हामी भरी। उसकी शादी बड़े धूम-धाम से की जो अभी तक सरोजिनी की आंखों के सामने फिल्म जैसे दिखाई देता है। कितनी सुंदर लग रही थी जोड़ी! मेरी ही तो नजर नहीं लग गई? यह लड़की पढ़ी-लिखी है। होशियार है खुशी से अपनी गृहस्थी चलाएगी मैंने सोचा। होशियार होने के कारण ही इसने ज्यादा तकलीफ पाई, अपमानित हुई आखिर में अलग होकर आ गई....

सरोजिनी उठी। नलिनी कही दिखाई नहीं दे रही है‌? अभी भी वह कोपगृह में होगी। 'उसे अपने आप ही शांत होने दो' इस तरह की बात सोचकर थकी हुई सी सरोजिनी बाहर के बरामदे में आई। बगीचे में काम कर रहे हैं वेल्लस्वामी "नमस्कार अम्मा" बोला।

"वेल्लेस्वामी उस बैंत की कुर्सी को थोड़ा नीम के पेड़ की छाया में डाल दोगे?" वह बोली‌ |

उसने तुरंत उठकर कुर्सी को छाया में डाल दिया। छाया में ठंडी-ठंडी हवा आ रही थी। आगे की तरफ तेज धूप थी। वह उस ठंडी सांस को अपने अंदर आराम से आंखें बंद कर खींच रही थी।

शादी होकर सिर्फ तीन महीने के अंदर उसका सपना मिट गया उसे पता चला। उसका चेहरा मुरझाया हुआ काला पड़ गया.... सरोजिनी को उसे देखते ही घबराहट हो गई थी। पहले किसी ने भी उससे कुछ भी नहीं कहा। सभी प्रश्नों को उन्होंने टाल दिया। अरुणा ने भी उसके प्रश्नों का टालमटोल जवाब दिया। "अच्छी हूं मैं दादी!" उसके बोलते समय ही बोलने दो ऐसा सोचकर मैं चुप रही | एक दिन इसी बरामदे में अपनी सोच में बैठी हुई थी तो उसके वहां होने से अनजान कार्तिकेय  बैठक में अपनी लड़की को हिदायत दे रहे थे।

"यह देखो अरुणा, थोड़ा सहन करो जल्दबाजी में कोई फैसला मत लो। प्रभाकर पढ़ा लिखा है, पैसे वाला है। अच्छी नौकरी में है। काफी रुपए होने से आदमी अपने रास्ते से भटक जाता है। तुम्हें ही उसे ठीक रास्ते पर लाने की कोशिश करनी है। तुरंत ही यह ठीक नहीं होगा करके छोड़ने का केस नहीं है?"

"अप्पा मुझमें इतनी सहनशक्ति नहीं है। उस आदमी का स्वभाव भी अच्छा नहीं है" अरुणा बोली।

"शादी हो कर तीन महीने ही हो रहे हैं इतनी जल्दी उसके स्वभाव का तुमने पता लगा लिया ?" 

"तीन दिन में ही मुझे पता चल गया। आपसे कुछ भी ना कह के मैं मुंह बंद करके रही वही बड़ी बात है। मैं क्यों कष्ट उठाऊं ? मैं इतनी बेकार हो गई क्या?"

"इतनी उतावली मत करो अरुणा। इतनी बेकार हो गई हो इसका ऐसा अर्थ नहीं है । अरे पति पत्नी के संबंध को इतने आराम से तोड़ के आना संभव नहीं। अभी तक अपने कुटुंब में ऐसा नहीं हुआ हैं । तुम्हारी दादी कितनी तकलीफ में भी मुंह को बंद करके रही थी इसीलिए यह परिवार अभी तक गर्व से सिर ऊंचा करके खड़ा है, एक अच्छे नाम…...."

"दादी का जमाना दूसरा था मेरा जमाना दूसरा है... मैं दादी जैसे रहूंगी आप उम्मीद कर रहे हैं क्या ?"

"दादी जैसे तुम रहोगी ऐसा मैं नहीं सोच रहा। मेरे अप्पा जैसा प्रभाकर निश्चित ही नहीं होगा। तुम्हें बोलने का अधिकार है। पीहर में आकर अपनी समस्या को बता रही हो। जब चाहती हो तो बाहर जाती हो। तुम्हारी दादी को इस में से कोई एक भी अधिकार उनके पास था तुम ऐसा सोचती हो ?"

"अप्पा आपका मेरी और दादी की तुलना करके देखना मूर्खता है। उनको अधिकार ना देने के कारण वे मुंह बंद करके रहीं। वे अभी मेरी उम्र में होती तो निश्चित रूप से मुंह बंद करके नहीं रहतीं...."

"उसके बारे में मुझे नहीं पता। तुम कुछ समय और सहन करके रहो। उसे अपने रास्ते पर लाने के लिए बदल कर देखो। कुछ औरतें कितना साहस दिखाती है ! पीना कोई बहुत बड़ी गलती है? प्राइवेट कंपनियों में तो काम करने वाले थोड़ा बहुत पीते ही हैं ‌। इन सब को नजरअंदाज करके रहना नहीं सीख सकती तो उसे अपने रास्ते में लाने की देखो।"

"यहां सिर्फ पीना ही नहीं है अप्पा । उसका सहवास भी गलत है ऐसा मेरा अनुमान है।"

"अनुमान के नाम पर अलग रह सकते हैं क्या ? अरुणा और कुछ दिन प्रयत्न करके देखो। प्रेम को उत्पन्न करने के लिए समय भी नहीं देने से उसे एक अपनत्व कैसे आएगा?"

अरुणा ने बहुत देर तक जवाब नहीं दिया।

"ओह इस बच्ची को इस तरह की तकलीफ है ?" ऐसा सोच सरोजिनी घबरा गई।

"थोड़ा सहन करके देखो अरुणा" कार्तिकेय हमदर्दी के साथ बोले। "दादी पुराने जमाने की बातों पर विश्वास करने वाली है। तुम इस तरह से अलग होकर आ रही हो उन्हें पता चले तो उन्हें सदमा लगेगा।"

"आपसे ज्यादा दादी मुझे अच्छी तरह समझेंगीं।"

"हो सकता है। परंतु उन्हें आघात लगे बिना नहीं रहेगा। कुछ समय और इसे संभालो देखते हैं। उसमें कोई बदलाव ना मालूम हो तो फिर कुछ सोचते हैं।"

इस बार और इसके अगले दो बार भी अरुणा ने संधि के लिए मानकर पति के घर वापस चली गई। तीसरी बार जाते समय सरोजिनी के कमरे में आकर उसके हाथों को पकड़कर बोली "मुझमें और सहनशक्ति नहीं है दादी! अब मैं सहन नहीं कर पा रही हूं। मैं कितना भी झुकु उनकी हेकड़ी और बढ़ती है! आत्मसम्मान भी कुछ है ना दादी ? किसी भी औरत से इतनी ज्यादा दोस्ती ! इसके ऊपर मुझ पर संदेह। किससे बात की, कहां गई थी...."

फिर अचानक हंसने लगी।

"मुझे कभी कुछ ऐसा भी लगता है दादी ? सचमुच में किसी के साथ भाग जाऊं तो क्या है!"

अरुणा निश्चित रूप से ऐसी बातों को अपनी मां से भी नहीं बोली होगी ऐसा अब सोचने पर मन में एक बात याद आ रही है।

'अरुणा आपके जैसे स्वभाव की है।'

शंकर के शब्दों की याद आते ही अचानक मन खुल गया।