बंद खिड़कियाँ - 9 S Bhagyam Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बंद खिड़कियाँ - 9

अध्याय 9

मन में उबलता हुआ गुस्सा चावल को फटकारते समय हाथों की उंगलियों के किनारों में कंपन हुआ। मन के अंदर "ओ" ऐसा एक अहंकार आवाज देने लगी। थोड़ी दूर पर बैठकर चौपड़ खेल रही लक्ष्मी मुझे ही देख रही थी यह महसूस होते ही उसने अपने को संभाला।

लक्ष्मी की शादी होकर वह पोंगल के लिए पीहर आई हुई थी। घर में बड़ा भाई और नई भाभी ने जो तूफान और अन्याय खड़ा किया हुआ था | उसे और लोगों के साथ वह भी प्रेम से देख रही थी । किसी एक को भी मुझ पर हमदर्दी नहीं होगी? यह कितने एहसान फरामोश लोग हैं? मुंह बंद करके रहो तो बिना जबान की है ऐसे सोच कर इसको ऐसा ही रखना है ऐसे सबके मन में आ गया क्या?

पोंगल के लिए सिर्फ एक हफ्ता ही है। अभी बहुत सा काम है। मरगदम और उसका पति पोन्नयन के अलावा घर में रहने वाले कोई भी लोग उसकी मदद नहीं करतें। सासू मां का तो सबको आदेश देने का काम ही होता है।

सरोजिनी की रसोई और बाहर के काम के कारण कमर टूट जाती है । इसके बीच उसे रत्नम की सेवा-सुश्रुषा भी करनी पड़ती है।

"उसको गैस की तकलीफ है शायद उसे पीपली का रसम बना कर दो" ऐसा उसके लिए सास मनुहार करती थी ।

अपने अंदर उठे क्रोध को वह अपने आंसुओं के साथ पी लेती। सास की बात की अवहेलना करो तो वह सबके सामने अपमानित करेगी इसलिए खूब मिर्ची डालकर रसम बनाकर चावलों को फटकाने के लिए बैठ गई थी।

ऊपर-नीचे चावलों के आने के बीच में काली आकृति बड़ी-बड़ी छातियों के साथ और व्यंगात्मक आंखें जम्बूलिंगम के अहंकार की कल्पना चढ़-उतर रही थी। यदि इसने एक लड़के को पैदा करके दे दिया फिर तो यह महारानी बन जाएगी और मुझे इस घर में जो मर्यादा मिल रही है वह भी नहीं मिलेगी।

उसके अंदर से दुख उमड़ा। फिर तो जच्चा को तेल लगाकर नहलाने उसके बच्चे को देखना सब काम मेरे सिर पर ही आ जाएगा! वह इस सोच में डूबी।

ऐसी भयंकर कल्पना में वह मग्न हो गई थी। वह उसमें ही डूब गई। "तुमने क्या उसे दवाई पिला दी‌" रत्नम से लड़ाई की। "आदमी के साथ सोने के लिए तुम एक बेशर्म औरत हो" उसने उसे श्राप दिया। "धत तेरी की बेशर्म लोग हैं" उसे उनके ऊपर थूकने की इच्छा हुई।

"पोंगल के लिए सब लोग कपड़े पसंद कर रहे हैं। आप नहीं जा रही हो क्या ?"

उसे बड़ा आश्चर्य हुआ उसने सिर ऊपर कर देखा । सामने हल्के मुस्कान के साथ दिनकर खड़ा था। यह कहां से आया? आंगन में उसके सिवाय और कोई नहीं था।

"दुकान से बहुत सारे कपड़े लेकर आए हैं। सब लोग अपने लिए चुन रहें हैं।" उसने स्पष्ट किया | "आप नहीं गई ?"

उसकी आवाज बड़ी नम्र थी। उसके देखने से उसका शरीर पुलकित हुआ और वह घबराई।

घुटने के ऊपर हो गई साड़ी को ठीक करके कांपते हुए आवाज में बोली "मुझे किसी ने बताया भी नहीं। किसी ने देखने के लिए बुलाया भी नहीं।"

एक क्षण चुप रहने के बाद वह नम्रता से बोला। "मैं आपको बुला रहा हूं ना?"

वह छ: महीने के बाद अचानक आकर आज बहुत अधिकार के साथ बात करने से उसे संकोच हुआ। अचानक सीधी होकर "तुम इस घर के कौन हो?" ऐसी एक नजर उस पर डालकर अपने सर को नीचा कर लिया।

"जंबूलिंगम ने बोलने के लिए कहा।"

उसने आश्चर्य से उसे सिर उठाकर देखा। यह यहाँ आकर बहस क्यों कर रहा है? इसका कहना सच होगा क्या?

"मुझे काम है" सिर झुकाए हुए वह बोली। उनको जो अच्छा लगे उसे लेने दो। रसोई में रहने वाली कोई भी हो क्या फर्क पड़ता हैं ?"

"रसोई में रहो तो भी लाल रंग अच्छा रहेगा।"

उसने घबराते हुए सिर उठाकर उसे देखा तो वह जल्दी से जा रहा था।

अचानक उसका दुख, सहन-शक्ति से बाहर होकर आंसुओं में तब्दील हो गया। मैं कितनी असहाय और बेकार हो गई उसके मन में प्रलाप होने लगा। "इस घर में मेरा कोई सम्मान नहीं है इस कारण ही यह ऐसा कह रहा है।" उसके शरीर में सिहरन हुई।

घर के बैठक में बहुत चहल-पहल थी। उससे अपना कोई संबंध नहीं है ऐसे एक विषाद में वह जल्दी-जल्दी से चावल को फटकारने लगी और चावल को बोरी में भरकर उसे बांधकर रखा। आंगन को साफ करके रसोई की तरफ गई।

खोलते हुए पानी में चावल को धोकर डालते समय पुराने शब्द उसे याद आए।

"जम्बूलिंगम एक बेवकूफ है ! अपने पास जो हीरा है उसके बारे में उसे पता नहीं।"

स्वयं के पश्चाताप में उसकी आंखों में आंसू भर आए। अपने आदमी को कोई बेवकूफ कहें ऐसी परिस्थिति आई इस पर उसे गुस्सा आया।

मुझसे रत्ना किस बात में अच्छी है ऐसा सोचकर उसे गुस्सा आया। उसके मदमस्त शरीर को देखकर यह बच्चा पैदा करके देगी ऐसी एक आशा से उसे लेकर आए हैं। जो काम मुझसे नहीं हुआ वह उसे करने आई है। इस मामले में वह मुझसे महान है। दूसरों की आंखों में, मैं कैसे भी लगूं तो उससे क्या फर्क पड़ा ?

"भाभी!" लक्ष्मी की आवाज सुन वह मुडी।

लक्ष्मी के हाथ में दो प्योर सिल्क की साड़ियां थी। एक लाल दूसरी नीली।

"इसमें से आपको जो पसंद हो उसे आप रख लो ऐसा बोला है" वह बोली।

सरोजिनी को आश्चर्य हुआ। उसकी इच्छा को आज तक किसी ने भी नहीं पूछा। उसका मन एकदम से हल्का हुआ। उसके होठों पर एक मुस्कान भी खिली। कुछ सोचते हुए उसकी आंखें थोड़ी नम भी हुई।

"लाल अच्छी है" वह बोली ।".

"रत्नम भाभी ने नीला लिया है।"

"मेरे लिए लाल रहने दो" वह तपाक से बोली।

"आपकी मर्जी" कहकर चली गई।

त्यौहार के दिन पिछवाड़े आंगन से लेकर बाहर तक घर को त्यौहार के लिए चमकाया हुआ था। उस कोलाहल में सरोजिनी अपने स्वयं की पसंद और नफरत सब भूल गई थी। इस बार तुम दोनों को मिलकर पोंगल बनाना है।" रत्नम और उसको देखकर उसकी सास ने कहा। भोगी (पोंगल के पहले दिन का त्यौहार) त्यौहार के दिन और दिनों से जल्दी उठकर, मरगथम को जगा कर, गर्म पानी का चूल्हा जलाने के लिए बोल कर, स्वयं कुएं के नीचे ठंड में सरोजिनी ठंडे पानी से नहा कर आई। पूजा के कमरे में दीपक जलाकर आते समय सास दिखी।

"रत्नम उठी नहीं क्या ?"पूछा ।

"मैंने नहीं देखा" बिना सिर ऊपर किए अपने काम की तरफ ध्यान दे रही थी।

"इतनी देर सोएगी त्यौहार के दिन ?" ऐसे भुनभुनाते हुए अंदर की तरफ गई।

थोड़ी देर बाद कठोर सा मुंह बनाकर वापस आई।

"सुबह होते ही वह कोने में बैठ गई। तुम्हें ही हमेशा की तरह सब कुछ करना है।"

सरोजिनी को बिना बात की एक खुशी और तृप्ति मिली।

"ठीक है" उसने जवाब दिया।

एक नई उत्साह से उसने बाहर से लेकर पिछवाड़े तक रंगोली बनाई। हंसमुख चेहरे के साथ त्योहार के सारे व्यंजन बनाए । आज सास भी उसके साथ आराम से अच्छी तरह व्यवहार कर रही थी।

दूसरे दिन पोंगल बनाने के लिए पिछवाड़े में बड़े सारे चूल्हे के ऊपर उसने और जंबूलिंगम दोनों ने पूजा कर पोंगल के लिए बर्तन को चढ़ाया। उस दिन सरोजिनी ने अपना श्रृंगार अच्छी तरह से किया। सिर पर फूल लगाया और आंखों में काजल लगाया। लाल साड़ी को पहनने से उसमें एक नई आभा आ रही थी जिसे उसने स्वयं महसूस किया। आधी पूजा के समय ही दिनकर आया उसने देखा। बीच में जब उसकी नजर मिली तब उसके आंखों में हमेशा की तरह मित्रता का भाव है उसकी समझ में नहीं आया। उसे एक अजीब सा डर लगा। यह दो दिन और तेरे लिए है यह समझे बिना खेल रही हो ऐसा वह बोल रहा है उसे लगा।

कुछ नया हुआ है जैसे उसे लगा। आज यदि रत्नम इस पूजा में शामिल होने की स्थिति में होती तो आज मेरी कौन परवाह करता उसे आज पहली बार ऐसा लगा। रसोई से बाहर आने का भी आज उसे समय नहीं मिला होता...

"छी.... मैं भी कितनी बेशर्म हूं" अपने आप को दोष देने लगी। यह सब कोलाहल सुबह से मेरे मन अंदर उफनता हुआ उत्साह का कोई अर्थ नहीं है बेकार है उसे लगा।

उस दिन हॉल में बहुत भीड़ होने के कारण रात को वह सामान वाले जगह में ही सोई‌। नींद ना आने से करवटें बदल रही थी तो किसी ने उसे जगाया। तो वह चिल्ला कर उठ बैठी। खिड़की में से आ रही चांद की रोशनी में जंबूलिंगम आया हुआ है उसे पता चला।

"आ मेरे साथ सोने चल" बोला |

अचानक अपमान की एक ज्वाला उसके नाभि में से उठी उसे महसूस हुआ। आज तक वह जो फैसला न कर पाई आज अचानक, "पास मत आना" चिल्लाई।

"शर्म नहीं आई आपको, दो दिन के लिए मुझे ढूंढ कर आने की ?"

"ठीक है री, मैं तुम्हारा ही पति हूं याद है ना ? मैं जब बुलाऊं तो तुम्हें आना पड़ेगा।"

"नहीं आऊंगी" उसने जोर देकर बोला।

"उसके लिए दूसरे को देखो।"

उसके बाद वह एकदम से उसे नज़र अंदाज़ कर हॉल में बच्चों के बीच में जाकर लेट गई।

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