बंद खिड़कियाँ - 1 S Bhagyam Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बंद खिड़कियाँ - 1

मूल तमिल लेखिका: वासंती

अनुवादक: एस. भाग्यम शर्मा

 

मूल तमिल लेखिका वासंती का परिचय

6.7.1941 में मैसूर में जन्मी वासंती शादी हो कर पति के साथ भारत के विभिन्न राज्यों में रही हुई है। इनकी उपन्यास 'आकाश के मकान' पर यूनेस्को के सरकार ने पुरस्कृत किया है। इसके अलावा इस उपन्यास का अंग्रेजी, चेक, जर्मन, हिंदी, आदि भाषाओं में अनुवाद हुआ है। पंजाब साहित्य अकादमी ने और उत्तर प्रदेश के साहित्य अकादमी ने इन्हें सम्मानित किया है। वे इंडिया टुडे (तमिल) का दस सालों तक संपादन किया। विभिन्न देशों में आपको भारत के प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है। इनके डेढ़ सौ से ज्यादा उपन्यास और कहानी संग्रह भी है । वासंती जी ने जयललिता करुणानिधि और रजनीकांत के बायोपिक भी लिखे हैं। इसका अनुवाद कई भाषा में हुआ है। अंग्रेजी और तमिल दोनों भाषाओं में लिखती हैं। अभी भी निरंतर लिख रही हैं।

वासंती एक बड़ी साहित्यकार और पत्रकार भी हैं। आपने डेढ़ सौ के करीब उपन्यास लिखे हैं। कहानियां भी खूब लिखी हैं । आपके पति की इंडिया के विभिन्न जगहों पर पोस्टिंग रहती थी। जहां-जहां वे रही उन सभी जगहों का उन्होंने वर्णन किया है। वहां के लोगों पर कहानियां लिखी है। चाहे मोजोरीम हो या नागालैंड क्या राजस्थान, दक्षिण भारत, दिल्ली सब जगह आप रहीं हैं और आपकी सभी कहानियों और उपन्यासों में उसकी झलक मिलती है। आप दस साल तक इंडिया टुडे तमिल की संपादिका भी रही हैं। आपका एक उपन्यास ‘बांस के फूल’ बहुत प्रसिद्ध हुआ सभी भाषाओं में उसका अनुवाद भी हुआ और उस पर एक फिल्म भी बनी। मेजोरीम की एक प्रेम कहानी है। वहां पर मिलिट्री वाले और पुलिस वाले वहां के लोकल लोगों को परेशान करते थे। वहां के लड़कियों को बाहर भेजते थे। उसी पर आधारित उपन्यास है।

इनका दूसरा उपन्यास ‘जननम’ जिसे मैंने हिंदी में अनुवाद किया। वह मातृभारती में धारावाहिक के रूप में चला। उस पर भी फिल्म बनी।

‘मुखौटा’ आपके उपन्यास में पुराने पीढ़ियों और नई पीढ़ियों की लड़कियों में जो सोच में बदलाव आया है उस पर आधारित है । शारीरिक पवित्रता की सोच में भी बहुत बदलाव हुए हैं। उसी पर ही पूरा उपन्यास आधारित है। इसे भी मैंने अनुवाद किया है अभी मातृभारती पर है।

मंदबुद्धि के बालक की समस्या और उनके घरवालों की समस्या पर आधारित एक उपन्यास ‘आलू बुखारा’ है।

उनकी कहानियां भी मर्म पर चोट पहुंचाने वाली सूक्ष्म अर्थ लिए हुए होती हैं।

वासंती एक बड़ी लेखिका हैं। आपने डेढ़ सौ के करीब उपन्यास लिखे हैं। कहानियां भी खूब लिखी हैं । आपके पति की इंडिया के विभिन्न जगहों पर पोस्टिंग रहती थी। जहां-जहां वे रही उन सभी जगहों का उन्होंने वर्णन किया है। वहां के लोगों पर कहानियां लिखी है। चाहे मोजोरीम हो या नागालैंड क्या राजस्थान, दक्षिण भारत, दिल्ली सब जगह आप रहीं हैं और आपकी सभी कहानियों और उपन्यासों में उसकी झलक मिलती है। आप दस साल तक इंडिया टुडे तमिल की संपादिका भी रही हैं। आपका एक उपन्यास ‘बांस के फूल’ बहुत प्रसिद्ध हुआ सभी भाषाओं में उसका अनुवाद भी हुआ और उस पर एक फिल्म भी बनी। मेजोरीम की एक प्रेम कहानी है। वहां पर मिलिट्री वाले और पुलिस वाले वहां के लोकल लोगों को परेशान करते थे। वहां के लड़कियों को बाहर भेजते थे। उसी पर आधारित उपन्यास है।

इनका दूसरा उपन्यास ‘जननम’ जिसे मैंने हिंदी में अनुवाद किया। वह मातृभारती में धारावाहिक के रूप में चला। उस पर भी फिल्म बनी।

‘मुखौटा’ आपके उपन्यास में पुराने पीढ़ियों और नई पीढ़ियों की लड़कियों में जो सोच में बदलाव आया है उस पर आधारित है । शारीरिक पवित्रता की सोच में भी बहुत बदलाव हुए हैं। उसी पर ही पूरा उपन्यास आधारित है। इसे भी मैंने अनुवाद किया है अभी मातृभारती पर है।

मंदबुद्धि के बालक की समस्या और उनके घरवालों की समस्या पर आधारित एक उपन्यास ‘आलू बुखारा’ है।

उनकी कहानियां भी मर्म पर चोट पहुंचाने वाली सूक्ष्म अर्थ लिए हुए होती हैं।

 

बंद खिड़कियां

सारांश

“बंद खिड़कियां" सदियों से चले आ रहे पुरुष प्रधान समाज में पुरुषों के अहं और दंभ के कारण स्त्रियों के प्रति दुर्व्यवहार और अत्याचार तथा स्त्री के विरोध की कहानी है । यह कहानी एक नवयुवती, पोती तथा उसकी वृद्ध दादी के बीच समानान्तर रूप से चलती है । पति के दुर्व्यवहार का जो दंश पचास वर्ष पूर्व अनपढ दादी ने झेला, वही अपमान और तिरस्कार आज उसकी उच्च शिक्षित पोती भी झेल रही है । फर्क केवल इतना है, जहां दादी के पास इसको झेलने के अलावा कोई विकल्प नहीं था वहीं पोती को माता-पिता की नाराजगी के बावजूद उस घर में आश्रय मिला है ।लेकिन दोनो ही परिस्थितियों में औरत, यानि दादी और पोती ने अत्याचार के विरुद्ध बगावत कर दी । दादी ने पति के घर में रहते हुए उसके अनैतिक कार्यों का विरोध किया, वहीं पोती अपने पति का घर इसी कारण छोड़ आई । चूंकि दादी पचास वर्ष पूर्व इस दौर से गुजर चुकी है इसलिये वह पोती की वेदना को समझती है, और उसे नैतिक रूप से संबल दे पति के साथ संबंध विच्छेद के फैसले पर कायम रहने की हिम्मत बंधाती है ।वह नहीं चाहती कि जो अपमान और तिरस्कार उसने झेला वह उसकी पोती को झेलना पड़ें।

 

संक्षिप्त जीवन परिचय एस.भाग्यम शर्मा

एस.भाग्यम शर्मा एम.ए अर्थशास्त्र.बी.एड. 28 वर्ष तक शिक्षण कार्य किया। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानियां प्रकाशित। तमिल कहानियों का हिन्दी में अनुवाद एवं विभिन्न प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, जैसे नवनीत, सरिता, कथा-देश, राष्ट्रधर्म, दैनिक भास्कर, राजस्थान पत्रिका, डेली न्यूज, मधुमती, सहित्य अमृत, ककसाड, राज. शिक्षा -विभाग की पत्रिका आदि। बाल-साहित्य लेखन, विभिन्न बाल-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएं व कहानियां प्रकाशित, जैसे नंदन, बाल भास्कर, बाल हंस, छोटू-मोटू आदि। वेणु, महाश्वेता देवी, साहित्य-गौरव, हिन्दी भाषा विभूषण, स्वयं सिद्धा आदि विभिन्न सम्मान मिला। 2017 वुमन ऑफ 2017 का जोनल अवार्ड मिला । राज.की मुख्य मंत्री वसुंधरा जी से यह सम्मान प्राप्त करने का सौभाग्य मिला। कई कहानियां प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत भी हुई।

1 नीम का पेड़ कहानी संग्रह 2 प्रतिनिधि दक्षिण की कहानियां 3 बाल कथाएं 4 समकालीन तमिल प्रतिनिधि कहानियां 5 झूला 6 राजाजी की कथाएं 7 एक बेटी का पत्र कहानी संग्रह 8 श्रेष्ठ तमिल कहानियाँ 9 आर. चूडामणी का उपन्यास दीप शिखा का अनूवाद किया और इसका बोधि प्रकाशन से 2019 में प्रकाशित | मैंने इन दिनों 10 उपन्यासों का तमिल से हिंदी में अनुवाद किया है।

उनके मैंने पांच उपन्यासों का अनुवाद किया। 1. करोड़ों करोड़ों बिजलियां किंडल में है। 2. यहां- वहां- कहां 3. विवेक और 41 मिनट 4. माचिस की पहली तीली 5. रात की सूरजमुखी

6 दीप शिखा यह सभी उपन्यास मेरे मातृभारती में हैं।

7. टूटन shopizen में है।

उसके अलावा 8. शरणागति 9. विवेक तुमने बहुत सहन किया बस! 

10. रेडीमेड स्वर्ग 11. रुपया, पद और बलि | यह मेरे अनूदित उपन्यास है इसके अलावा मैंने दो उपन्यास “तुम्हारे दिल में मैं हूँ ?” और “ये ज़िंदगी” मेरा स्वरचित उपन्यास है जो मातृभारती में भेजी हैं | इसके अलावा ‘ये ज़िंदगी’ मेरी अपनी लिखी दूसरी उपन्यास है।

एस. भाग्यम शर्मा बी-41 सेठी कालोनी जयपुर 302004 मो 9351646385

बंद खिड़कियां

अध्याय 1 

सरोजिनी ने ऊपर देखा, आकाश सफेद और नीले रंग का दिखाई दे रहा था। घड़ी के हिसाब से और 15-20 मिनट में अंधेरा होना शुरू हो जाएगा। थोड़ी देर में ही इस आराम कुर्सी को अगर अंदर नहीं रखें तो पक्षी इसके ऊपर गंदगी फैला देंगे।

पक्षियों का कोलाहल शुरू हो गया। भले ही आकाश में अभी प्रकाश था पर उससे नहीं डरकर जैसे घड़ी को देखकर उन्होंने समय मालूम कर लिया हो वैसे झुंड के झुंड पक्षियों ने उड़ना शुरू कर दिया। हरे, काले, सफेद सभी एक-दूसरे के बीच में ना जाकर लाइन से जा रहे थे।

सरोजिनी ने उत्सुकता से ऊपर देखा। मुझमें और इन पक्षियों में कोई संबंध है ऐसा उसे भ्रम हुआ। कितने वर्षों से इन पक्षियों को देखती आई है ! समय जब नहीं कटता तब यही उसके शाम के मनोरंजन का साधन है।

आज उसका मन निर्मल है। ऊपर सिर उठाकर देखते हुए उसके होठों पर एक स्वाभाविक मुस्कान खिली।

कितनी मजेदार मन:स्थिति है यह ! वही मन में आज अचानक घबराहट हुई। फिर भी आज के समाचार से मन दुखी नहीं हुआ। मन को लगा उसके विपरीत कोई साधन की पूर्ति हो गई जैसे । इसी में सफलता मिल गई जैसे उसे खुशी भी हुई।

उसने फिर से आकाश को देखा। उसे हंसी आई। यह मेरी सभी भावनाएं अपनी निजी बातों को जो सिर्फ मुझे ही पता होनी चाहिए।

अपनी मन की खिड़कियों को किसी के लिए भी खोल नहीं सकते।

खोलने की जरूरत भी नहीं।

"अम्मा, अंधेरा हो गया ! बरामदे में आकर बैठेंगे क्या?"

मुरुगन की आवाज सुनकर सरोजिनी यादों में खोई अपने वर्तमान में आई।

अरे, अंधेरा होने पर भी मैंने कैसे ध्यान नहीं दिया?

वह मुस्कुराते हुए बगीचे में से उठकर घास को पारकर बरामदे में आकर फिर से एक आराम कुर्सी पर बैठ गई।

अब उसे हर बात पर हंसी आ जाती है, जैसे ज्ञानियों को आती है वैसे ही।

मैं ज्ञानी हूं?

मैं हां बोलूं तो भी क्या संसार उसे मानेगा। पहले मुझे लोगों ने भगवान ही बोला?

उसे फिर हंसी आई।

"अम्मा !"

मुरूगन सामने खड़ा हुआ। "अम्मा, साहब और अरुणा के आने में देर होगी लगता है। आ भी जाएं तो खाना खाएंगे कि नहीं पता ही नहीं मन ठीक नहीं है कहकर सोने भी जा सकते हैं, आप आकर खा लीजिएगा?"

"आज क्या बनाया है ?"

"इडली चटनी ही है।'

"ठीक है आ रही हूं।"

वह उठी। उसकी चाल अभी भी ठीक है। उसकी निगाहें अभी भी तेज है। छोटी उम्र में और युवा अवस्था में, इतना परिश्रम कोल्हू के बैल जैसे उसने काम किया है उससे मन में और शरीर में एक दृढ़ता आ गई है। अतः इसीलिए 70 की उम्र में भी रुपयों को अपनी बीमारी के लिए खर्च करने की जरूरत उन्हें नहीं पड़ती ।

कोल्हू का बैल ‌।

मुरूगन ने दो नरम इडलियों को चांदी के प्लेट में चटनी के साथ लाकर रखा। दही को भी साथ में रखकर "खाइए" कहा।

उस समय कोल्हू के बैल जैसे रहने के कारण अब तक उसे सम्मान मिल रहा है।

उसे अपने आप में हंसी आ गई। यह कोल्हू का बैल भी कभी-कभी नियंत्रण से बाहर हो जाता है इन लोगों को तो पता नहीं।

वह पता भी कैसे हो ?

किसी को नहीं पता। वह मेरा अपना रहस्य है।

वह खाना खाकर बैठक में सोफे पर आकर बैठी। 9:00 बज गए थे।

अभी तक कार्तिकेय, उसकी पत्नी नलिनी और पोती अरुणा घर वापस नहीं आए थे। 

टीवी में एक हिंदी धारावाहिक नाटक आ रहा था। भाषा समझ में नहीं आई फिर भी नाटककारों के चेहरे सुंदर थे। उसे देखने की इच्छा हुई। जमीन पर बैठकर टीवी देखने वाला मुरूगन जल्दी से उठ कर खड़ा हुआ।

"आ गए" बोला।

"टीवी को बंद कर दूं क्या ?" पूछा।

"कर दो" सरोजनी ने कहा, उसकी समायोजित बुद्धि को जान उसे आश्चर्य हुआ।

उसने जल्दी से बाहर का दरवाजा खोला तो चुपचाप तीनों अंदर आए। कार्तिकेय का चेहरा एकदम कसा हुआ था। नलिनी के चेहरे से शोक टपक रहा था। अगले ही क्षण रो देगी ऐसा लग रहा था। सिर्फ अरुणा ने कुछ भी नहीं हुआ जैसे चेहरे पर एक मुस्कान लिए हुए सरोजिनी के पास में आकर उनके कंधे पर हाथ रखा।

"सब कुछ खत्म हो गया दादी, मैं केस जीत गई ‌। अब मैं स्वतंत्र हूं!"

सरोजिनी ने कार्तिकेय और नलिनी की तरफ बिना मुड़े ही मौन अरुणा के हाथों को सहलाया। अरुणा के होठों पर मुस्कान होने पर भी आंखों में चोट लगे जैसे दिख रहा था।

‘मेरी पोती अपने आप संभल जाएगी’ अपने अंदर कहते हुए हंसी।

अरुणा को देखकर,"जाकर खाना खाओ। चेहरा तुम्हारा मुरझाया हुआ है" बोली।

"चेहरे का मुरझाना भूख से नहीं है" नलिनी बोली।

"कौन कह रहा है ? मुझे भूख है ! जो कुछ है वह सब लेकर आओ" कहते हुए अरुणा खाने के मेज के पास गई।

मुरूगन ने बिना बोले जल्दी-जल्दी मेज पर सब सामान लाकर रखा।

"बड़ी अम्मा ने खा लिया!" बोला।

"अम्मा-अप्पा आप दोनों खाना खाने नहीं आ रहे हो ?" थोड़ी जोर से अरुणा बोली‌।

कार्तिकेय किसी पत्रिका को पलटाते हुए "मुझे भूख नहीं है" बोले।

"मुझे भी भूख नहीं है" कहकर नलिनी तेजी से ऊपर जाने लगी।

अरुणा नलिनी के जाते हुए देखकर कार्तिकेय के सामने आकर खड़ी हुई।

"अप्पा, इसका क्या मतलब है ?"

"किसका ?"

"घर पर कोई गलती हो गई है ऐसे दोनों चेहरे को रखकर अभी भूख नहीं है कहने का क्या मतलब है ?"

'उसका कोई गलत अर्थ नहीं है अरुणा!’ कार्तिकेय ने ऐसे धीमी आवाज में कहा "हमारा मन आज विशेष रुप से खुशी की स्थिति में होगा ऐसे सोचती हो क्या ?"

"क्यों नहीं होना चाहिए ? मैं केस नहीं जीतती और मुझे तलाक नहीं मिला होता तब आपको दुखी होना चाहिए था !"

कार्तिकेय ने अपने सिर को नीचे कर लिया।

"वह ठीक है। परंतु तुम्हें एक अच्छा जीवन मिलना चाहिए इस उम्मीद से की गई यह शादी की थी वह खत्म हो गई तो हमें दुख तो होगा ना ?"

अरुणा हंसने लगी।

"यह मजेदार बात आप कह रहे हो ! संबंध को खत्म करने पर ही मेरे लिए छुटकारा था एक साल से आपको भी सब बातें पता थी । और आपने उसके लिए प्रयत्न भी किया। मेरी तरफ केस का फैसला हो जाने से शांति नहीं मिली आप कह रहे हो। आप दोनों कितने नाटककार हो!"

दुबारा कार्तिकेय अपना सिर पेपर में छुपा लिया।

"तुम चाहे जो सोचो" धीमी आवाज में बोले। "किसी बात में हार गए ऐसे ही मुझे लग रहा है। एक समझौते में हार गए ऐसी एक तकलीफ हो रही है...."

"क्योंकि, आप एक नाटककार हो" अरुणा की आवाज तेज हुई।

"तलाक का मतलब घर का गौरव चला गया ऐसा आप सोचते हो इसीलिए सर झुका कर बैठे हो। वह बदमाश जो अन्याय करता था मैं उसे सहन करती रहती तो आप गौरव का अनुभव करते ! बाहरी दुनिया को अपने घर की बातों का पता नहीं चलना चाहिए इसलिए मैं आत्महत्या कर लेती तब आप अपना सर ऊंचा करके चलते, मैं अभी अच्छी तरह हूं इसलिए आप हार गए ?"

"ओ कमऑन अरुणा!" कहते हुए कार्तिकेय उठे। उसे हल्के से गले लगाते हुए "तुम जो कह रही हो उसमें एक भी न्याय नहीं है !" वे बोले। "इस तलाक के लिए मैंने कितना प्रयत्न किया यह तुम्हें पता है !"

"मैं जिद्द पर अड़ी थी आपके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था। अब आपको और अम्मा को दुखी होने का कारण अपने परिवार के गौरव का चले जाना है। आदमी कितना भी अन्याय करें औरतों को मुंह बंद करके रहना ही आपकी परंपरा है । मैं भी दादी जैसे रह जाती तो आपको अच्छा लगता!"

"अरुणा!" कार्तिकेय की सहनशक्ति जवाब दे गई।

"दादी के बिना मुंह खोले रहने से सब लोगों को आराम हो गया था । दादी को एक पदवी "देवी है!” का मिल गया था | सचमुच में उन्होने सिर्फ एक पत्थर जैसे जीवन जिया ऐसे कितने लोगों ने इसे समझा होगा?"

'आज इतना बस है' सोचती हुई सरोजिनी उठी। "मैं अपने कमरे में जा रही हूं।" कहते हुए वह अपने कमरे की तरफ चल दी।

"अभी तुम्हें दादी की बातों को बोलने को किसने कहा?" कार्तिकेय उसे डांट रहे थे।

"उसे नहीं कहूं तो क्या करूं ? दादी का उदाहरण ही तो आप लोगों को परेशान कर रहा है!"

"नॉनसेंस, अभी मैं तुम्हारे साथ खाना खाऊंगा तो तुम्हारा समाधान हो जाएगा सोचती हो ?"

"करीब-करीब !"

"ठीक राइटो ! खाना खाते हैं !"

सरोजिनी हंसती हुई अपने पलंग पर लेट गई |

दादी का उदाहरण।

उनको फिर से हंसी आई। नींद नहीं आने के कारण खिड़की से बाहर दिख रहे नक्षत्रों को टकटकी बांधकर देख रही थी तो अरुणा आकर पास में खड़ी हुई।

सरोजिनी हाथ को आगे करके, हंसकर "आओ!" बोली।

अरुणा उनके हाथों को पकड़कर हिचकते हुए पूछा।

"जो हो गया उसके बारे में आपको दुख है क्या दादी ?"

"नहीं रानी बेटी!" सरोजिनी बोली। "मैं जो नहीं कर सकी तुमने उसे किया इस बात की मुझे बहुत खुशी हो रही है।"

अरुणा ने अपने खिले चेहरे से झुक कर सरोजिनी के गाल को चूमा।

"आपने ही मुझे समझा है मुझे पता है। अम्मा को दुनिया के बारे में फिकर है !"

"वाह री दुनिया ! वह तो बेवकूफ दुनिया है ! उसकी ओर ध्यान नहीं देने के लिए एक विशेष योग्यता की जरूरत है बेटी!"

"उस विशेष योग्यता के बारे में अभी आपको पता चला है क्या ? पहले आपने ऐसा नहीं सोचा!"

सरोजिनी ने जवाब नहीं दिया। इसके बारे में भी बात करने की जरूरत नहीं है सोचा।