बंद खिड़कियाँ - 12 S Bhagyam Sharma द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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बंद खिड़कियाँ - 12

अध्याय 12

सहूलियत कम हो जाने वाली स्थिति में दिनकर का परिवार कितनी परेशानियों में रहा होगा सोचकर उसके मन में दया आई और दुख भी हुआ । उसके मन में इन सब के लिए स्वयं के दोषी होने का दुख भी महसूस हुआ। उनके आगे के इलाज के लिए रुपए की मदद हो सके तो देकर उनके उधार को चुकाने पर एक भार कम होगा जैसे उसे लगा । कार्तिक और नलिनी इसके लिए मानेंगे क्या? 40 साल तक कोई संपर्क ना रहने के बाद, जिसे देखा ही नहीं उसके लिए चिकित्सा का खर्चा क्यों वहन करेंगे ? क्या दान देने के लिए हम धार्मिक ट्रस्ट है पूछ सकते हैं?

सोच-सोच कर उसके मन में अनेकों विचार आ रहे थे।

अरुणा अभी तक नहीं आई। पक्षियों की आवाजें उसके कानों को बहुत तेज लग रही थी। और कुछ देर अपने अंदर विचारों में मग्न होकर अंधेरा होते समय अपने कमरे में वापस आ गई।

शाम की प्रार्थना को पूरा करके जब उसने सिर उठाया तो उसके कमरे में कार्तिकेय खड़े थे।

"क्या बात है अम्मा ? आज कौन आए थे?" मुस्कुराते हुए पूछा।

"अपने गांव के आदमी दिनकर थे। वे तुम्हारे पिताजी के अच्छे दोस्त थे। वे यहां आए हैं। उनको आपसे मिलने की बड़ी इच्छा है। उनकी दोहिती आई थी।" सरोजिनी ने साधारण ढंग से कहा।

"उस आदमी को मैंने देखा है क्या ?" 

"नहीं, परंतु वह तुम्हारे अप्पा के बहुत..…"

"दोस्त बोल रही हो। अजीब बात है। एक दिन अप्पा जब बीमार थे उस समय बताया था, कि मेरा एक विरोधी है दिनकर । उसके पास तुम कभी मत जाना।" कहकर कार्तिकेय हंसे।

"मैं उसे उसी समय ही भूल गया !"

सरोजिनी को अपने नीचे के पेट में से कुछ निकल गया ऐसा महसूस हुआ।

कार्तिकेय के चेहरे पर कोई विशेष भाव दिखाई नहीं दिया। ऐसे ही कह दिया जैसे लगा।

वह जल्दी से अपने को संभालकर गंभीर हुई। एक हल्की सी मुस्कान अपने होंठों पर लाई।

"तुम्हारे अप्पा के बारे में तो तुम्हें मालूम है ना कार्तिकेय ? किस पर कब गुस्सा आएगा। उनका कोई भरोसा है क्या? दिनकर साथ पैदा हुए जैसे थे। आखिर के दिनों में तुम्हारे अप्पा को गलतफहमी हो गई थी।"

"क्यों ?" बिना किसी उत्साह के कार्तिकेय बोले "व्यापार में पार्टनर थे क्या?"

"वह कुछ नहीं।"

"फिर ?"

सरोजिनी खिड़की के बाहर देखने लगी।

"मालूम नहीं" धीरे से बोली।

"उनके गुस्से का तो कोई ठिकाना था नहीं यह मैं शुरू के दिनों से ही समझ गई थी। उसके लिए कारण जानना बेकार का विषय है ऐसे सोच कर मैं चुप रहती। इसके लिए भी ऐसी थी !"

कार्तिकेय कुछ क्षण मौन रहे।

"अप्पा के मरने पर यह दिनकर आएं थे क्या ?" पूछा।

यह क्या इतना प्रश्न पूछ रहा है सरोजिनी को सोचकर आश्चर्य हुआ।

"नहीं, वे गांव को छोड़कर कहीं और चले गए थे बोला ना ! उनको समाचार देने के लिए भी किसी को उनका पता मालूम नहीं था।"

कार्तिकेय का कुछ देर मौन बैठे रहना उसे अजीब सा लगा।

उसके मन में एक धीमा विषाद फैला।

नलिनी इससे क्या बोली होगी ऐसा सोचने लगी ‌। बिना आदत के एक चिडचिड़ापन उसकी आवाज में दिखाई दिया।

"तुम्हारे अप्पा के शब्दों को बचाना है तुम्हें ऐसा लगता है तो मैं तुमसे जबरदस्ती नहीं करूंगी, मुरूगन को साथ लेकर मैं चली जाऊंगी।"

कार्तिकेय घबराया और पास में आकर उनके कंधे पर हाथ को रखा।

"माफ करना अम्मा। मैंने उस विचार से नहीं बोला। आपको अकेले जाने की जरूरत नहीं। कल मैं आपको लेकर जाऊंगा।"

स्वयं भावना में बहकर थोड़ा गुस्से में आने के लिए सरोजिनी को शर्म आई।

"तुम्हें जैसे सहूलियत होगी वैसे ही जाएंगे" समाधान के तौर पर बोली।

थोड़ी देर और विषयों के बारे में बात कर कार्तिकेय उठे।

"आपकी तबीयत ठीक है ना ?"

"हां ठीक हूं?" कहकर मुस्कुराते हुए सरोजिनी खिड़की को देखते हुए आराम कुर्सी पर बैठी।

अम्मा अब अकेला रहना ही पसंद करेगी ऐसा महसूस कर कार्तिकेय बाहर चले गए।

खिड़की के बाहर से मोगरे की खुशबू के साथ आने वाली ठंडी हवा अच्छी लग रही थी। अब अंधेरा खत्म होना शुरू हो गया। पक्षियों का कलरव कानों में जोर-जोर से सुनाई दे रहा था।

सरोजिनी के होठों पर मुस्कान खिली।

शाम के समय होने पर सरोजिनी का इन पक्षियों की आवाज सुनना ही एक मनोरंजन का साधन था। पिछवाड़े में कुंए के नीचे बैठकर आम के पेड़ के ऊपर तोते के झुंड के झुंड आकर कोलाहल करते थे उनकी तीव्र आवाज को बड़ी उत्सुकता से सुनना उस समय की बात सरोजिनी को अच्छी तरह याद है।

सरोजिनी ने गर्दन को ऊपर करके देखा।

पूरा पेड़ फूलों से भरा था। पूरे वातावरण में खुशबू फैल गई थी। उसने अपनी आंखों को बंद करके एक दीर्घ श्वास खींचा। इस पेड़ ने कभी धोखा नहीं दिया। कोई सत्य का शपथ लिया हो ऐसे समय पर फूलता, फलता है । आस-पड़ोस के लड़के पत्थर मारकर जो गिरा दे उससे जो बच जाता उसका वह स्वयं भी हर साल अचार बनाती और कच्ची कैरियों को पका कर आम में बदलती। सरोजिनी ने बगीचे पर अपनी निगाहों को घुमाया। बगीचे के कोने में एक बांझ पेड़ था। उसके जैसे वह सिर्फ छाया के लिए खड़ा था। उसकी कोई भी परवाह नहीं करता। छाया चाहिए तब सिर्फ खड़े रहने के सिवाय.....

यहां भी उसकी याद सिर्फ खाने के समय के अलावा कहाँ आती ?

"भूख को शांत करने के लिए मेरी याद आती है।" ऐसा उसने अपने मन में सोचा। जम्बूलिंगम के याद आते ही एक तीखी नफरत उसके मन में उबलने लगती। 'किसी भी तरह की भूख लगे' वह अपने आप में कहने लगी।

यह लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं? मेरे गले में मंगलसूत्र पहनाने के कारण मेरा मान-अपमान सब कुछ चला जाता है ऐसा सोचते हैं?

उसे सोच-सोच कर उसे दुख हुआ। जब रस्सी को खींचे तो भेडें कैसे पीछे पीछे जाती हैं ऐसा सोचने के लिए क्या मैं भेड़ हूं? पहले मैं ऐसे ही जाती, 'इनकी पत्नी हूं मैं' ऐसा मेरे अंदर मैंने एक सम्मान बना रखा था। उसका भी कुछ अर्थ नहीं था। उस स्थान से उतरने के लिए एक क्षण ही लगेगा ऐसा कह रहे जैसे एक दूसरी औरत को लेकर आएं फिर मेरी इस पदवी का क्या सम्मान है? एक काम वाली जैसे सम्मान?

सरोजिनी अपमान के बारे में सोच-सोच कर आंसू बहने लगे।

शादी का क्या मतलब है? अम्मा-अप्पा ने ज्योतिषी के पास जाकर जन्मपत्री बनाकर, उसका मिलान करके लड़का ढूंढ के गहनों और सामान के साथ बड़े तामझाम से मुझे यहां भेजा उसका क्या अर्थ है? यह मरगथम यहां पर आकर रह रही जैसे पहनी हुई साड़ी के साथ मैं भी आ सकती थी ना? झाड़ू के लिए सिल्क के झालर की क्या जरूरत ?

नाम बहुत बड़ा। जमींदार जंबूलिंगम की पत्नी ! यहां किस तरह का रहना है आकर देखें तभी तो पता चले? पिछले महीने दूसरे जिले के जमींदार और उसकी पत्नी आए थे। खूब गहने कीमती सिल्क की साड़ी रानी जैसे आई थी। उसके बराबर बैठ कर बात करने वाली यह रत्नम थी। उन्हें कॉफी और नाश्ता देने के लिए ही मैं थी । मुझे उस जमींदार की पत्नी ने देख कर, रत्नम के कान में धीरे से कुछ कहा,

"इतनी सुंदर खाना बनाने वाली हो तो आफत है रत्नम, संभल कर रहना।"

अभी ही मेरे चेहरे को देखा जैसे रत्नम एक अहंकार की नजर मुझ पर डाली और सिर झुका लिया।

मैं जल्दी-जल्दी अंदर जाने लगी तो सुनाई दिया।

"ये उनकी पहली पत्नी हैं। सुंदर है तो क्या हुआ ? है तो बांझ! परेशान होकर ही मुझसे इन्होंने शादी की और वे कहते यह तो सिर्फ लकड़ी है ।"

उनका जोर से खिलखिला कर हंसना मुझ पर आग को उठा कर फेंक दिया हो ऐसा लगा ।

रसोई में जाने के बाद उसके हाथ पैरों में इतना कंपन होने लगा कि वह खड़ी भी नहीं रह पाई और सरोजिनी नीचे ही बैठ गई। बिना कारण समझे ही अपमान के कारण उसकी आंखों से अश्रु धारा बहने लगी।

सिर्फ लकड़ी.....

चिकने-चिकने गुदगुदे सोने जैसे चमकने वाले अपने हाथों और पैरों को एक बार देखने लगी।

"सुंदर होने से क्या फायदा ?"

'उस रत्नम में क्या सुंदरता है यह सोचकर उससे शादी की' उसके गुस्से का यही जवाब है मालूम होने पर उसे एक दोषी होने का एहसास होने लगा। पति को संतुष्ट ना कर सकना मेरा ही दोष नहीं है क्या ? ऐसे ही अम्मा बोलती थी। "पुरुष के चेहरे का भाव न बिगड़े ऐसा तुम्हें रहना चाहिए" अम्मा के इस उपदेश का यही अर्थ है। बढ़िया रुचिकर खाना बनाने इतने बड़े घर को ठीक तरह से देखभाल करने से ही कुछ ना होगा। वह तो वह काम वाली बाई भी कर लेंगी.....

अभी इस पेड़ पर कोलाहल कर रहे मिट्ठू को देखते हुए बैठी सरोजिनी के शरीर में एक गुस्सा फैला। पक्षियों की सरलता से कोलाहल करते देख उसके अंदर एक ज्वाला सुलगने लगी।

'मैं लकड़ी नहीं हूं। मेरे अंदर बहुत सी इच्छाएं हैं। लक्ष्मी और उसके पति को प्रेम से हंसते हुए हाथ में हाथ लिए देखती तो मुझे लगता मेरे पति ने एक दिन भी मुझसे ऐसे बैठकर प्रेम से बात नहीं की तो मुझे बुरा लगता एक कमी सी खलती। मैंने उनके पास जो देखा वह एक पशु के जैसे कामी दीवानापन अजीब सा जुनून। जानवर जैसे झपट्टा मारकर आने वाले शरीर को देखते ही मेरा शरीर डर से ठंडा पड़ जाता था। उस घिनोनेपन के कारण ही मैं लकड़ी हो जाती थी इसके लिए मैं क्या करूं?

रत्नम को ऐसा कुछ नहीं हुआ तो उसका गुण भी ऐसे ही एक कामी पशु शेरनी जैसे होगा शायद!

फिर उस काले शरीर बड़ी-बड़ी छातियों के बारे में सोचते ही उबकाई आने लगती है।

उसके तेल मालिश कर नहलाने मुझे बुलाने का इनका एक विशेष अर्थ होगा क्या? मेरी लकड़ी जैसे होने की वजह से उनको जो धोखा हुआ उसका बदला लेने के लिए ही होगा.....

एकदम से अंधेरा होने लगा पर उसे पता ना होने के कारण वह कुएं के नीचे ही बैठी थी। घर के सब लोग पास के गांव गए थे। किसी रिश्तेदार की शादी में, हमेशा की तरह उसे छोड़कर मरगथम और उसका पति ही उसकी रखवाली के लिए थे | उन दोनों ने भी अपने घर जाकर दरवाजा बंद कर लिया।

"अकेले अंधेरे में बैठकर क्या कर रही हैं ?"

आदमी की मधुर आवाज को सुनकर सरोजिनी हड़बड़ा कर अपने पूर्व स्थिति में आई।

दिनकर खड़ा था। अपनी तहमत को हमेशा की तरह मोड़ कर घुटने तक रखा हुआ था। पूरे हाथ के शर्ट को कोहनी तक मोड़ कर रखा हुआ था।

शरमाते हुए वह उठी, "और क्या कर सकती हूं? बेकार की सोच" वह धीमी आवाज में बोली।

चंद्रमा की चांदनी में उसकी हंसी से उसके सफेद दांत दिखे। आंखों में शरारत दिखाई दी।

"उसे अंधेरे में करने की क्या जरूरत है ? अंदर जाकर रोशनी में कर सकते हैं ना?"

उसने सर झुका लिया!

"घर में कौन हैं ? खाली दीवार को देख कर बैठे रहने से ज्यादा अच्छा है बाहर अपने साथ के लिए यह पेड़ पक्षी है।"

एक क्षण उसने खड़े होकर उसे घूर कर देखा।

"मनुष्य के साथ के लिए मैं आया हुआ हूं, आइए बाहर बरामदे में बैठकर बात करते हैं। मैं घर के अंदर आ सकता हूं ना।"

अच्छा आदमी है यह सोच कर वह चलने लगी। अंधेरे में किसी से टकराकर नीचे गिरने लगी। उसने जल्दी से पकड़ कर उसको सहारा देकर उठा दिया।

"क्या है ? मैं तो अंधी हूँ सोचा?" बोला।

उसे हंसी आ गई। उसी समय सातों स्वरों को छेड़ दिया जैसे स्पर्श से उसके शरीर में एक कंपन उत्पन्न हुआ। जम्बूलिंगम के स्पर्श से उसे कभी ऐसा कंपन नहीं हुआ था इस सोच से उसे एक भ्रम भी हुआ।

"क्यों दादी अंधेरे में बैठकर क्या कर रही हो ?"

सरोजिनी को भूतकाल से बाहर आने में कुछ समय लगा।

साफ ट्यूबलाइट की चमक में खड़ी अरुणा को देखकर धीरे से मुस्कुराई, “आ बेटी!" बोली।

"न कोई काम न कोई काज ? बेकार की सोच।"

फिर से इस शब्द के प्रयोग से मुस्कुराहट हंसी में बदली।

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