में और मेरे अहसास - 56 Darshita Babubhai Shah द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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में और मेरे अहसास - 56

खुदाया मेरी कब्र पे गुलाब चढ़ाने न आया करो l
दिल मे दफन किये हुए अह्सास जिंदा हो जाते हैं ll
१८-५-२०२२

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तेरा ज़िक्र मेरी रूह तक को हिला देता है l
तेरी फ़िक्र मेरी रूह तक को हिला देती है l

इस तरफ़ नाता जुड़ गया है जमनोमनं का l
तुझसे दूर होने का ख्याल मेरी जान लेती है l

कल क्या होगा मेरे जाने के बाद इस वास्ते l
तेरी लिए एक एक साँस सजोए समेटी है ll
१९-५-२०२२

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फ़िर उसी बेवफ़ा पे मरते हैं l
दिलों जान निसार करते हैं ll

कभी भी बावफा हो न सकें वो l
आज वफ़ा का दम भरते हैं ll

एक लम्हा भी सुकून ना दे सके l
और अब चै न ओ करार हरते है ll

मुहब्बत ने दिया रुस्वाई का गम l
क्यूँ दिल में खास जगह रखते है?

एक बार जी भर के देखने के लिए l
छत पर अड्डा जमाए रहते हैं ll
२०-५-२०२२

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मरहम बेअसर से निकले l
आशिक बेख़बर से निकले ll

मेहबूब को देखने के लिए l
फ़िर उस डगर से निकले ll

इश्क की पाती आई है कि l
डॉली तेरे दर से निकले ll

महफ़िल मे पीने आए हैं l
वजूद अब्तर से निकले ll

दर्द इतना बढ़ गया कि l
गीत भीतर से निकले ll

खुश रहे सदा जानिब l
दुआ अन्दर से निकले ll
२१-५-२०२२

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पिघलाके दर्द को हौसला बनाया l
दिल ने फिर से आशियाँ बनाया ll

वजूद को जैसे तैसे संभाल के l
खुशियों का काफ़िला बनाया ll

खुद को खुद की तलाश कर l
रंज ओ गम से फ़ासला बनाया ll

दिल पे पत्थर रखकर उनसे l
अब जुदाई का फ़ैसला बनाया ll

ख़ुद और खुदा से ज्यादा चाहा l
सखी दुआओ मे पहला बनाया ll
२२-५-२०२२

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आज अँधेरों को दूर भगाकर जायेगे l
चरागों की रौशनी सजाकर जायेगे ll

महफ़िल में आए हैं तय करके l
शमा की लॉ में नहाकर जायेगे ll

चाँद सा चहेरा देखने दूर से आए हैं l
शर्मा हया के पर्दे हटाकर जायेगे ll

सहरा के रण समान जिंदगी में l
प्यार की नदी बहाकर जायेगे ll

अब और परेशान नहीं करेंगे सखी l
दर्द दिल में ही दबाकर जिंदगी ll

आशनाई हो गई है फ़िजाओ से l
तन्हाई को गोद में सटाकर जायेगे ll

वफ़ा की मिशाल कायम करने l
रूहो मे रोशनी बढ़ाकर जायेगे ll
२३-५-२०२२

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प्यार की डोर से बंधे हैं हसीन रिश्ते l
जिंदगीभर सम्भालने है महीन रिश्ते ll

कई सालों तक नहीं मिलते हैं अनीश l
सखी पकड़ के रखने है ज़हीन रिश्ते ll

जहां पे रिस्तों मे ख़ुदाई बरसती है l
सुनो होते है चर्चा में आफ़रीन रिश्ते ll

फ़क़त रूह से अमीर इंसान ही सदा l
दिल से जुड़े रहने को तल्लीन रिश्ते ll

ख़ुद से ज्यादातर चाहते हैं अपनों से l
हमेशा प्यारे लगते हैं पलछिन रिश्ते ll
२४-५-२०२२

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ठीक हो जाएगा सब l
आपके साथ हैं हम ll

न कभी हाथ छोड़ेंगे l
आपको फ़िर क्या है गम?

सिर्फ ये दिलासा काफी l
उम्र काट लेगे तेरी कसम ll
२५-५-२०२२

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बात दिल से निकली तो दिल तक पहुंचेगी जरूर l
याद दिल से निकली तो दिल तक पहुंचेगी जरूर ll

मिलन की तड़प इस तरह बढ़ रही है कि सखी l
नाद दिल से निकली तो दिल तक पहुंचेगी जरूर ll
२६-५-२०२२

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सब से ज्यादा तुमपे विश्वास करते हैं l
सदाकत ये य़ह पल खोने से ड़रते है ll

बहोत कुछ गवां दिया दुनिया के डर से l
आज खुल्ले आम कहेगे तुमपे मरते हैं ll

जीस्त को जिंदा रखने के लिए और l
होशमे रहने मुहब्बत का नशा भरते हैं ll

किसी से वफ़ा की उम्मीद नहीं है l
ख़ुद से ज्यादातर चाहते रखते हैं ll

शायद दो चार लम्हा सुकून मिले l
ख्वाबों को पालते और पलते हैं ll
२७-५-२०२२

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हौंसले मेरे फ़लक के सितारे हैं l
यही तो मेरे जीने के सहारे हैं ll

पर्दा नशी जरा पर्दा हटाके देखो l
जहां देखो वहां हसी नज़ारे हैं ll

मेरे जीवन में कदम रखके तूने l
सखी रात और दिन निखारे हैं ll

मुरादोंवाली चाँदनी से भीगी रात मे l
तुझे देख के खुश चांद सितारें हैं ll

ख्वाबों की ताबीर करने के लिए l
सब खुशियों के अरमान पुकारें हैं ll
२७-५-२०२२

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दिल से कहीं हुई बातें बेबस करती हैं l
चाँदनी से भीगी रातें बेबस करती हैं ll

उम्मीदे और आरज़ू से छलकती हुईं l
सखी सुरमई आँखें बेबस करती हैं ll

आसमान को छूने की तमन्नाओं के l
होसलें से भरी पाखें बेबस करती हैं ll

ऊँचे से ऊँची उड़ान भरने की आशा l
घोड़ी से दबी काखें बेबस करती हैं ll

नये जीवन और नव प्रफुल्लित होने l
सुर्ख पत्तों को डालें बेबस करती हैं ll
२९-५-२०२२

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आ तूझे मैं दिल में बसा लूं l
सखी साँसों को महका दूँ ll

दुनियावालों की नज़र से छुपाके l
कशके बाहों में अपनी समा दूँ ll

बेरहम है क़ायनात की रस्मे l
आ ममता की गोद में छुपा दूँ ll

शहंशाह बनाने के लिए तूझपे l
दुआओं की दौलत लूटा दूँ ll

बुरी बला और नज़र से बचाने l
मेरी मुहब्बत का टीका लगा दूँ ll
३०-५-२०२२

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न पूछ की तरह गुज़रे दिन तन्हाई के l
सालों हुए लाले पड गये शानासाई के ll

कई युगों से तलाश थी पहचान की l
आज डर लग रहा है रुसवाई से ll

दिल ने यक़ीन कर लिया था l
बहुत बड़े वादे किये ख़ुदाई के ll

किस तरह जिये इस हाल में l
दिन नहीं बीत रहे हैं जुदाई के ll

सखी एतबार करने को न कहे l
बहोत चर्चे सुने हैं जफ़ाई के ll

कहते हैं कुछ और करते कुछ l
रंग ढंग देख लिये रहनुमाई के ll

मुद्दत के बाद हुस्न बेपर्दा हुआ l
आज शुक्र गुज़र है पुरवाई के ll
३१-५-२०२२

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दिल का आलम किस तरह बयां करे l
अपने हाथों से किस तरह गवां करे ll

एक एक लम्हें को प्यार से संजोया है l
लख्ते जीगर को किस तरह रवा करे ll

गया साल बहोत ही बेरस गुज़रा है l
आने वाला वक्त किस तरह नया करे ll

नादाँ को समजा बहला कर थक चुके l
भेस के आगे किस तरह कथा करे ll

हर बार बच्चा समझकर माफ कर दिया l
ख़ुद के पिंड को किस तरह सजा करे ll
१-६-२०२२

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