में और मेरे अहसास - 55 Darshita Babubhai Shah द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

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में और मेरे अहसास - 55

मैं नारी हूँ , अपराजिता हूँ l

न झुकुंगी, न रुकूंगी, न रोउंगी, न डरूँगी l 

हौसलों के साथ आगे कदम बढाउंगी l

कोई जंजीरें मेरे पाँव बाँध नहीं सकतीं l

कोई तूफ़ाँ, कोई आँधी मुझे नहीं रोक सकती l

न थकुंगी न हार मानूंगी, लक्सय पाऊँगी l 

रण में रणचंडी, घर में बच्चों की माँ बनुँगी ll 

हाँ मैं नारी हूँ, अपराजिता ही बनी रहूँगी ll

१७-५-२०२२ 

 

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धूप में पेड़ की छाया में रुकना है l

आज सूर्य के ताप को भूलना है ll

 

क़ायनात मे किसी से डरना नहीं l

सिर्फ़ ख़ुदा के सामने झुकना है ll

 

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अच्छा बूरा सभी यहां भुगतना l

कर्मों के हिसाबो से डरना है ll

 

मुहब्बत मे मिला जो गम तो l

ममता की गोद मे फ़सना है ll

 

कईं ग़मों से घिरे हुए हैं लोग l

सब को हसाके अब हसना है ll

१६-५ -२०२२ 

 

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आज ज़िंदगी की तलाश में निकल पड़े है l

जहां जहां कदम ले जा रहे हैं चल पड़े है ll

 

इश्क को इबादत समझता रहा ताउम्र l

आशिक को फकीर देख छल पड़े है ll

 

आज छत पर कपड़े सुखाते आए हुए l

हुश्न को बेपर्दा देख के बहल पड़े हैं ll

१५-५-२०२२ 

 

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खुदा से दुआओं में कुछ कमी सी है l

इसलिए फ़िर आँखों में नमी सी है ll

 

क़ायनात मे कोहराम सा छाया है l

मिजाज भारी होने से गर्मी सी है ll

 

जूठा गुस्सा भरके बेठे महफिल मे l

सूरमे वाली आँखें शबनमी सी है ll

 

कुछ ज़्यादा ही ख़ास तौर मे है l

जुबा और चहेरे पे बेशर्मी सी है ll

 

इश्क ने निकम्मा बना दिया है l

अब मुहब्बत मे नाफ़रमी सी है ll

१४-५-२०२२ 

 

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मैंने तो इश्क़ की इबादत की है l

दिल ने छोटी सी शरारत की है ll

 

बेठे बिठाए खुदा को क्या सूझा l

खूबसूरत तोहफ़े इनायत की है ll

 

ज़माने की हवाए इस तरह बदली l

मुफ़लिसने आज मुरव्वत की है ll

 

कई युगों से तन्हाई पाली थी l

मुद्दतों के बाद रफ़ाक़त की है ll

 

बेशरम होकर देखते ही रहे l

अब नज़रों ने शराफ़त की है ll

१३-५-२०२२ 

 

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जिंदगी जीने का मार्ग दिखलाया है l

किस तरह जिये ये सिखलाया है ll

 

फूल के साथ हमेशा काटे होते हैं l

दुख में भी मुस्कुराना समझाया है ll

 

प्यार से बारबार हौंसला बढ़ाकर l

ज़मीं से आसमान तक पहुंचाया है ll

 

राहबर ने सही राह पर लाने के लिए l

सब के ठुकराए हुए को अपनाया है ll

 

फ़िजा ने मनभावन गीत सुनाया और l

उड़ती उमड़ती पतंग संग लहराया है ll

१२-५-२०२२ 

 

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खानाबदोश सी जिंदगानी है l

देश परदेश यही कहानी है ll

 

सालों बाद महफ़िल सजी हैं l

नई ताजा गजलें सुनानी है ll

 

गा रहा है जो प्रभात फेरी l

सुनले तेरी मेरी कहानी है ll

 

युगों तक खामोश रहे तेरे लिए l

अब बात दिल की बतानी है ll

 

आज किसी की परवाह नहीं हमे l

खुल्ले आम मुहब्बत जतानी है ll

११-५-२०२२ 

 

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दुनिया में घूमता है मुझमें जो सैलानी है l

जी ले जिंदगी जीवन तो आनी जानी है ll

 

जी छोटा मतकार मुहब्बत तो फानी है l

सुन सब के दिलों की एक ही कहानी है ll

 

हर लम्हा आखिरी है समझकर ज़ी ले l

देख रफ़्ता-रफ़्ता ढल रहीं जवानी है ll

 

यहां हर पल मसर्रत से भरा हुआ है l

वक़्त की हर मौसीक़ी मे रवानी है ll

 

जहा से भी गुज़र खुशियाँ बटता रहे l

गम न कर ए दिल दुनिया तो फानी है ll

१०-५-२०२२ 

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माँ के बेटे को बद्दुआ नहीं लगती हैं l

कभी ज़माने की हवा नहीं लगती हैं ll

 

हमारे बेह्तरीन मुस्तकबिल के लिए l

अपनों ने दी हुईं सज़ा नहीं लगती है ll

 

मुहब्बत मे जरा सी छेड़खानी हुई l

बातों मे रूठना अदा नहीं लगती है ll

 

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मेरी सारी कविताएं तेरी बदोलत है l

मेरी यही तो जिंदगीभर की दौलत है ll

 

मुहब्बत मे मिला जो दर्द मुझको सो l

ग़ज़लें - कलाम उसी की नौबत है ll

 

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क्यूँ प्यारी आँखों में नमी है l

आज शायद खली कमी है ll

 

मुहब्बत मे गुजारे हुए लम्हे l

दिल मे यादों की ज़मीं है ll

 

चाहते हैं भुला दे सब पर l

इश्क़ मे दुनिया थमी है ll

 

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पत्थर दिल से मोहब्बत हो गई है l

बैठे बिठाए यू शरारत हो गई है ll

 

प्यार किया है कोई गुनाह तो नहीं l

आज दुनिया से बग़ावत हो गई है ll

 

ग़म-ए-जुदाई दे गया नादाँ साजन l

क्या कहें ख़ुद से नफरत हो गई है ll

 

ख़ुद की पहचान तक मिटा दी लो l

अपने आप से शराफत हो गई है ll

 

इश्क ने पूरी तरह पागल हो चुके हैं l

हररोज दीदार की आदत हो गई है ll

 

रूह का रिश्ता जुड़ गया है सखी l

बेपनाह इश्क़ से इबादत हो गई है ll

५-५-२०२२ 

 

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चलो बात अंजाम तक पहुंचाये l

ग़र कोई इलाज हो तो बताइये ll

 

आज मौसम भी बेक़रार भी है l

अफ़साना प्यार भरा सुनिये ll

 

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ख्वाबों का शीशमहल था टूट गया l

हाथों में हाथ था कहीं छूट गया ll

 

दिल फेंक, दिल ए नादान, दिलबर l

दिल का खिलौना लुटेरा लूट गया ll

 

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