में ओर मेरे अहसास - 7 Darshita Babubhai Shah द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

में ओर मेरे अहसास - 7

में ओर मेरे अहसास

भाग-७

घर में सब कैद है लोग मेरे शहर के l
पिंज मे बंध है लोग मेरे शहर के ll

साँस लेने से भी डर गया है इन्सांन l
देख के दंग है लोग मेरे शहर के ll

जिंदा रहने की कोई वज़ह भी नहीं है l
स्वयं से तंग है लोग मेरे शहर के ll

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तस्वीर देख कर जी नहीं भरता l
रुबरु मिले तो कोई बात बने ll

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इन्सांन सिर्फ कठपुतली है खुदा की l
वो जब चाहे जैसे चाहे खेल लेता है ll
खुद को तीसमारखाँ ना समज तू l
सब से बड़ा उपरवाला है l
सब की दौर उसके हाथो मे है ll

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कल जो भूतकाल बन गया है l
आज पे उस भूत ना हामी हो ll

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किसी और नहीं
तो
सिर्फ
कुदरत के कहर
से
डरो
क्योंकि
उसकी
लाठी मे
दुनिया को
खत्म की
करने की ताकत है ll

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जिस घर से भाग रहा था l
जिस अपनों से भागा था l
आज उस अपनों के बीच l
उनके साथ जीने का अवसर मिला है l
जी ले जी भरके प्यार से, खुशी खुशी l
कल ये पल फिर मिले ना मिले ll

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जो सच सामने आया है वहीं सत्य है l
हो सके खुद को ठूंठ मे वक्त बिता दे ll

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जिंदगी जीत ने का पासवर्ड है l
खुद और खुदा पे भरोसा ll

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हर एक पल की गरिमा होती है l
उसे स्वीकारे और लुफ्त उठाए ll
वो पल नहीं रहे हैं, ये पल भी बीत जाएगे l
बस धीरज और हिम्मत रखनी पड़ेगी हमे ll

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जीत जाएगे हम l हम सब संग है ll

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घर को धर्मशाला बना दिया था l
ना जाने कहां कहां भटकता था l
जितनी मनुष्य को घर की जरूरत है l
उतनी ही घर को मनुष्य की जरूरत है l
अभी भी वक़्त है देर नहीं हुई है l
लौट कर घर चला जा,
जी ले जिंदगी अपने लिए, अपनों के साथ ll

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पीछे मूड के क्या देख रहा है कुछ नहीं छूट रहा है l
आगे बढ़ मंजिल बाहें फैलाए तेरा रास्ता देख रही हैll

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परिस्थिति को हम नहीं बदल सकते l
तू चाहे तो खुद को बदल सकता है ll

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हवा में सन्नाटे का शोर है l
फिज़ाए खामोश हो गई है ll
क्या सुंग लिया है सब ने l
दिन रात विरान हो गये हैं ll
खुद को सिकंदर ना समज l
खुदा सिकंदर का सिकंदर है ll
४-३-२०२०

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चांद अपने आप को क्यों समझता है अलग l
तारो की बारात वो क्यों सजाता है अलग ll

दुनियाको अपनी कथा क्यों बताता है अलग l
चांदनी के साथ इद क्यों मनाता है अलग ll
३ -४ - २०२०

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माँ भौम को बहोत कष्ट दिया है l
उसे आराम की जरूरत है ll
देख लो उसे परेशान करने का नतीज़ा l
एक ही पल मे तू कहीं का ना रहा ll

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निष्क्रियता का भी अपना एक वजूद होता है l
हर वक्त की व्यस्तता इन्सां को तोड़ देती है ll

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कुछ सवाल के जवाब कभी नहीं मिलते l
मंज़िल तक पहोचने के रास्ते नहीं मिलते ll

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हर एक पल की गरिमा होती है l
उसे स्वीकारे और लुफ्त उठाए ll
वो पल नहीं रहे हैं, ये पल भी बीत जाएगे l
बस धीरज और हिम्मत रखनी पड़ेगी हमे ll

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कौन कहता है कुदरती ताकत - शक्ति नहीं है l
मैं तो हर पल हर लम्हा उसे महसूस करती हूं ll

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नशे में रहा बिना कुछ सोचे समझे l
हक़ीक़त से पाला पड़ा, दंग रह गये ll

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कही ना कहीं आज के दिन के लिए हम जिम्मेदार हैं l
वक्त से आगे जाना चाहते थे, सबकुछ पा लेना था l
कुदरत के एक ही लाठी से लक्ष्मण रेखा खींच ली ll

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भावुकता मे बह कर किया l
कभी पछता ना मत l
वहीं पल सच्चे होते हैं l
जो अपनी मर्जी से जिए है l।

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प्रेम मेरा धर्म है l
धर्म मेरा प्रेम है ll

कर्म मेरा धर्म है l
धर्म मेरा कर्म है ll

सेवा मेरा धर्म है l
धर्म मेरा सेवा है ll

मानवता मेरा धर्म है l
धर्म मेरा मानवता है ll

निष्ठा मेरा धर्म है l
धर्म मेरा निष्ठा है ll
५-४-२०२०

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परिस्थिति को हम नहीं बदल सकते l
तू चाहे तो खुद को बदल सकता है ll

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हवा में सन्नाटे का शोर है l
फिज़ाए खामोश हो गई है ll
क्या सुंग लिया है सब ने l
दिन रात विरान हो गये हैं ll
खुद को सिकंदर ना समज l
खुदा सिकंदर का सिकंदर है ll

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Prahlad Pk Verma

Prahlad Pk Verma मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

Shivangi  Sutharia

Shivangi Sutharia 2 साल पहले

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pradeep Kumar Tripathi

pradeep Kumar Tripathi मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले

SENTA SARKAR

SENTA SARKAR 2 साल पहले