में और मेरे अहसास - 50 Darshita Babubhai Shah द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

में और मेरे अहसास - 50

इश्क की पाती आई है l
आंख मे पानी लाई है ll

सालों से अनकही हुईं l
बात दिल की समाई है ll

मिरी दिल बहलाने के लिए l
ख़ुद की तस्वीर बनाई है ll

पढ़ते ही उसे तू मुस्कुराए l
अलंकारों से उसे सजाई है ll

प्यारे तोहफ़े का प्रतीक l
गुलाबी रिबन लगाई है ll
२४-२-२०२२

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देख दिल से बगावत हो गयी है।
मुझे तुझसे मुहब्बत हो गयी है।

किसी के भी काम के ना रहे l
मुहब्बत में हालत हो गयी है ll

आवज सुनें बिना चैन नहीं l
फोन की आदत हो गयी है ll

प्यार मे हद से गूजर गये l
मुझ से हिमायत हो गयी है ll

तुझ से नाराज नहीं हो सकते l
खुदा से शिकायत हो गयी है ll
२४-२-२०२२

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कोई अनहोनी होने की आहट है l
मुहब्बत मे होने वाली लगावट है ll

सितारें भी शिद्दत से चमकते और l
खुशी से आसमाँ मे जगमगाहट है ll

फ़िजा ने सुरीला गीत सुनाया तो l
देखो सारे बदन में थरथराहट है ll

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साथी साथ रहते हैं चाहें मुकाम कोई भी हों l
निभाने वाले निभाते हैं हालत कोई भी हों ll

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जिंदगी की यादगार मस्तानी शाम हो तुम l
प्यास बढ़ाने वाला नशेमन जाम हो तुम ll

महबूब की याद मे हर लम्हा गुमशुदा बेनाम l
पागल शायर का खूबसूरत कलाम हो तुम ll

आशिकी की तलाश में बहोत दूर निकल चुके l
आखरी सफ़र के मंजिल का अंजाम हो तुम ll

सखी भूले से भी न आया कभी होठों पर वो l
जन्मों जन्म से जाना पहचाना नाम हो तुम ll

प्यार को बंदगी मान लिया दिलों जान से l
खुदा को इबादत मे दिया सलाम हो तुम ll
२०-२-२०२२

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समंदर मिलाता है साहिल से l
काश ख़ुदाई हो आदिल मे ll

ढूंढ़ते रहे ताउम्र जिसे काश l
वो साथी मिल जाए मंजिल मे ll

तहजीब संस्कार भुला दिया l
क्या देख लिया है संगदिल मे ll
१९-२-२०२२
आदिल- न्यायकर्ता

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दिल तोड़ना दस्तूर बना दिया है सजना तुमने l
आदत ने मजबूर बना दिया है सजना तुमको ।l

बेवफा का इल्ज़ाम पे इल्ज़ाम लगाए जा रहे हैं l
ज़ख्मों को नासूर बना दिया है सजना तुमने।l

मौका देखकर चोगे और छग्गे लगाते रहते हो l
खुद को बेकसूर बना दिया है सजना तुमने।l

अपनों के साथ अपनी बात मनवा मनवा के l 
हालत ने मगरूर बना दिया है सजना तुमने।l

सुबह शाम हुश्न के घर हाजरी पुराने जाते हो l
प्यार ने मजदूर बना दिया है सजना तुमने।l

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बुरा ना मानो आदत से मजबूर है l
वफ़ा पे उनकी नाझ ओ गुरूर है ll

छलावे मे जी रहे हैं हर लम्हा वो l
किस बात पर इतने मगरूर है ll

न जाने कौन से नशे में रहते हैं l
नशीली अदाओं से मशहूर है ll

नहीं जानते मतलबी दुनिया को l
हक़ीक़त से भी कोसों दूर है ll

रूह वाकिफ़ है फ़ितरत से उनकी l
ईमानदारी से बेईमानी मंजूर है ll
१७-२-२०२२
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उजाला खत्म होने को है l
एक युग खत्म होने को है ll

उठ जा नई शुरूआत कर l
ये दौर खत्म होने को है ll

वापिस न आएगी लौटकर l
साँस खत्म होने को है ll

हाथ मजबूती से पकड़ना l
साथ खत्म होने को है ll

जल्दी से वापस आ जाओ l
आश खत्म होने को है ll
१६-२-२०२२

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ये तुमने क्या कह दिया l
ये मैंने क्या सुन लिया ll

प्यार को छुपाये रखा l
छुपे रूस्तम हो  पिया ll

बस एक बार नज़रे मिली l
आँखों से दिल लूट लिया ll

तुम्हें जी भर के देखने को l
आज तड़पे है मोरा जिया ll

मिलने का समय नहीं है l
ये तुमने क्या कर दिया ll
१५-२-२०२२

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ख़ुदाई को आजमाने में थोड़ी सी देर हो गयी,
ख़ुद से वादा निभाने में थोड़ी सी देर हो गयी ll

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छलक रहा है प्यार आँखों से l
चमक रहा है प्यार आँखों में ll

नजरों से नज़र मिलाते ही l
धड़क रहा है प्यार आँखों में ll

मुहब्बत का नशा छाया है l
बहक रहा है प्यार आँखों में ll

एक बार जी भरके देखने को l
तड़प रहा है प्यार आँखों में ll

सखी को निगाहों में छुपाने को l
मचल रहा है प्यार आँखों में ll
१४-२-२०२२

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आज तुम अजनबी से क्यूँ लगते हो l
हाल जानकर भी अग्यार रहते हो ll

हमेशा चाँदनी मे रहते हो इस लिए l
अमावस्या मे चाँद की आस रखते हो ll

रात दिन मुसलसल फ़िक्र रहती हैं l
प्यार है तो इज़हार क्यूँ नहीं करते हो ll

यूही बिना कहे चले जा रहे हो फ़िर l
मुहब्बत क्यूँ करने का दम भरते हो ll

किसी भी की परवाह नहीं की कभी l
आज खिलखिलात हसने से ड़रते हो ll
१२-२-२०२२
शब - रात
अग्यार -अजनबी
मुसलसल- लगातार

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प्यार का मौसम बदले करवटें l
है चंचल हर दम बदले करवटें ll

महफिल मे बुझती शमा के साथ l
राग की सरगम बदले करवटें ll

दिल के तयखानो मे बंध पड़ा l
बरसो पुराना ग़म बदले करवटें ll
११ -२-२०२२

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आज एक कोशिश करे जीने की l
जिंदगी के दर्दो गम को पीने की ll

खुद को खुद से मिलाकर आज l
तौफ़ीक़ करे तन्हाई को सीने की ll

मौजों से लड़ते लड़ते थक चुके हैं l
जरूरत है आबे-हयात सफ़ीने की ll

ख़ैरमक्दम है जीस्त मे हमदम की l
पहचान हो गई है प्यारे नगीने की ll

मुहब्बत निभाने के लिए बहाए हुए l
आज हिसाब लेगे उस पसीने की ll

१०-२-२०२२
आबे-हयात - अमृत
तौफ़ीक़ - हिम्मत
मौजें  - लहरें
सफ़ीने- नाव
जीस्त - ज़िंदगी
ख़ैरमक्दम -स्वागत

 

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एक हाथमे नमक और दुजे हाथ मे मरहम होता है l
आपका यह सिलसिला हर रोज हरदम होता है ll

सुन कोई बार बार फ़िर दस्तक नहीं देने वाला l
बात ख़ुद के दिल की न सुने वो बेशरम होता है ll

चाँदनी रात मे मिलन की तड़प बढ़ने लगे तब l
दीदार ए यार हो जब खुदा का करम होता है ll

सखी बंध देख दरवाजा कहीं लौट ना जाए वो l
आने वाले है सजना दिन रात यहीं भरम होता है ll

कई सालों के बाद पैग़ाम आया है ज़ालिम का l
तब जाके कहीं दिल आज थोड़ा नरम होता है ll
९-२-२०२२

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shama parveen

shama parveen मातृभारती सत्यापित 4 महीना पहले