टापुओं पर पिकनिक - 3 Prabodh Kumar Govil द्वारा फिक्शन कहानी में हिंदी पीडीएफ

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टापुओं पर पिकनिक - 3

जैसे ही अनलॉक होने के बाद स्कूल फ़िर से खुले, आर्यन और उसके साथी ख़ुशी से फूले न समाए। क्योंकि अब उन्हें काफ़ी दिनों तक घर में बंद रह कर ऑनलाइन क्लास करने के बाद आपस में मिलने का मौक़ा मिलने वाला था।
अगले दिन सोमवार था और उनका स्कूल कई महीनों के बाद फ़िर से शुरू हो रहा था। पिछ्ले कितने ही महीनों से सब मित्र केवल मोबाइल पर ही संपर्क में रहे थे।
- ओए, तू तो मोटा हो गया बे!
- तू कौन सा कम हुआ है, देख टाई कहां जा रही है तेरी?
- अरे, तेरे फुल टाइम ग्लासेज़? क्या लैपटॉप में घुसा ही रहता था क्या?
इस तरह स्वागत किया दोस्तों ने एक दूसरे का। लेकिन इन अचंभा भरे जुमलों में भी सब भीतर से एकदम ख़ुश नज़र आ रहे थे। आते भी क्यों न? महीनों बाद सड़क, बाजारों और स्कूल के दर्शन हुए थे। वरना घर में बैठे- बैठे तो सब कैदियों जैसे ही हो गए थे। घर के कंपाउंड में भी खेलो तो मुंह पर मास्क लगाओ, बार- बार हाथ क्लीन करो।
गनीमत ये थी कि इस समय छुट्टियां मम्मी- पापा- बहन या भाई, सबको एकसाथ मिली थीं तो सब दिनभर घर में ही रहते थे। कम से कम अकेलेपन या सन्नाटे का सामना तो किसी को भी नहीं करना पड़ा। और घर पर रोज़ मम्मी के हाथ के स्वादिष्ट व्यंजन। मज़ेदार।
आज स्कूल बस से वापस लौटते समय आर्यन ने अपने दोस्तों के साथ वो प्रोग्राम शेयर कर ही डाला जो कई दिनों से उसके दिमाग़ में चल रहा था।
अपनी बर्थडे वाले दिन से ही उसने सोच रखा था कि इस बार वो पापा से बर्थडे गिफ्ट् के रूप में इसी प्रोग्राम की परमीशन मांगेगा, जो उसने अभी- अभी चहक कर अपने सब दोस्तों को बताया था।
आर्यन के जो पांच ख़ास दोस्त थे वो सभी इस समय बस में ही थे। ये अच्छा मौक़ा था सबसे बात कर लेने का। आर्यन का इशारा पाकर कुछ दूरी पर पीछे बैठे हुए उसके सब दोस्त इकट्ठे हो गए। तीन की सीट पर आर्यन के साथ एक लड़की भी थी। उससे रिक्वेस्ट करके उसे पीछे जाने को बोल दिया और उनके ग्रुप के पांचों सिर से सिर जोड़ कर आर्यन की बात सुनने लगे।
बस के बाक़ी साथियों और ख़ास कर लड़कियों को ये आश्चर्य तो हो रहा था कि ये क्या खिचड़ी पक रही है इन सब के बीच। मगर सब अपने अपने में मगन थे और ख़ुश थे क्योंकि महीनों बाद सबको घर से निकलने का मौक़ा मिला था।
आर्यन का प्लान सबको पसंद आया। लेकिन इसके लिए सबको अपने अपने घर से अनुमति लेना जरूरी था। इसलिए ये तय किया गया कि आज सब अपने अपने पापा से पूछ कर आयेंगे और यदि सबको परमीशन मिल जाती है तो कल बात करके पूरा प्रोग्राम बना लेंगे।
मनन को छोड़ कर बाकी सभी को आशा थी कि परमीशन मिल ही जाएगी। सिद्धांत के पापा ने तो उसे काफी छूट पहले से ही दे रखी थी। वो अक्सर उसे किसी भी बात के लिए मना नहीं करते थे।
आगोश के यहां तो जैसे रामराज्य ही था। उसके डॉक्टर पिता घर की किसी भी बात में दखल नहीं देते थे। उन्होंने घर की सारी व्यवस्था आगोश की मम्मी पर ही छोड़ रखी थी। यहां तक कि उन्हें तो ख़ुद भी अगर शाम को क्लब जाना होता तो वो आगोश की मम्मी से परमीशन मांग कर ही निकलते थे।
और आगोश के लिए मम्मी को पटाना बाएं हाथ का खेल था। उसकी मम्मी पापा को चाहें किसी बात के लिए इनकार कर भी दें, आगोश को कभी नहीं टोकती थीं। आगोश घर में था भी तो इकलौता।
अब रह गया साजिद। साजिद इन सब में सबसे बड़ा था। उसे यकीन था कि अगर वो अपने अब्बू को बताएगा कि उसके सब साथियों को किसी बात की अनुमति उनके पैरेंट्स से मिल गई है तो उसे भी मिल ही जाती।
लेकिन बेचारे बच्चे क्या जानें कि उनकी दुनियां अलग है और बड़ों की अलग!