कैसा ये इश्क़ है.... - (भाग 25) Apoorva Singh द्वारा उपन्यास प्रकरण में हिंदी पीडीएफ

कैसा ये इश्क़ है.... - (भाग 25)

अर्पिता किरण के इस व्यवहार को इग्नोर कर देती है।वो दोबारा उठ कर किरण के पास जाती है और उसे दोबारा से गले लगा लेती है।किरण और अर्पिता दोनो बहने जार जार चीखते चिल्लाते हुए जोर से रोने लगती हैं।उनके करुण क्रन्दन की गूंज पूरे घर में गूंजने लगती है।आरव भी आकर पीछे से उन दोनों के गले लग जाता है।हेमंत जी बच्चों को इस तरह रोता बिलखता परेशान देख आकर उनके पास बैठ जाते है।दया जी की अर्पिता की मां उसके पिताजी सभी रोने लगते हैं।

गुजरते समय के साथ सभी सम्हलते जाते है।हेमंत जी दया जी आरव सभी अर्पिता और किरण से इस अनहोनी का कारण पूछते है।किरण रोते रोते धीरे धीरे सारी बात बताती है।कैसे अर्पिता का अपहरण हुआ, उसने मदद के लिए कहा कैसे हम लोग वहां पहुंचे,और....कह फूट फूट कर रोने लगती है।

आगे अर्पिता बताती है , हमने पीछे नही देखा था कि उन लोगो के हाथ मे बंदूक है।हमे ठोकर लगी हम नीचे गिर पड़े और गोली हमारी मासी को लग गयी..! सब हमारी वजह से हुआ है न् हमे ठोकर लगती न् हम नीचे झुकते और न ही मासी हमे छोड़कर जाती।।सब हमारी गलती है।अर्पिता अपने चेहरे पर हाथ रख रोने लगती है।किरण अर्पिता के पास आती है और उसके गले लग कहती है तुम झल्ली हो क्या।ऐसा कुछ नही है मैं थी वहां मैने देखा सब अपनी आंखों से।तुम खुद पर दोष मत दो जो हुआ वो एक एक्सीडेंट के अलावा कुछ नही है अर्पिता।बस कर।।

कहते हुए किरण अर्पिता के गले लग रोने लगती है।अर्पिता की बात सुन हेमंत जी और दया जी दोनो उसकी ओर देखते हैं।

दया जी किरण से कहती है, ' किरण' लाली मुझे पूरी बात जाननी है साफ साफ़ बताओ हुआ क्या? ये अर्पिता का अपहरण क्यों कैसे किसने मैं कुछ समझ नही पा रही हूं।साफ साफ़ बताओ मुझे..?

दया जी की बात सुन किरण कहती है दादी! बताया जो जितना मुझे पता है उतना बता दिया।बाकी अब मुझे कुछ नही पता।कहते हुए किरण चुप हो जाती है।दया जी अर्पिता की ओर हिकारत से देखती है और वहां से उठ कर चली जाती हैं।अर्पिता की मां बाबूजी आरव सब हॉल में जाकर बैठ जाते हैं।एक एक कर सभी रिवाज कर लिए जाते हैं।अर्पिता सभी का ध्यान रखते हुए इस कठिन समय मे किरण और आरव का साथ देती है।शांति पाठ के बाद अर्पिता के माता पिता आगरा वापस चले जाते हैं। सब कुछ धीरे धीरे सही हो रहा है इन सब मे केवल एक चीज बदल गयी।वो है दया जी का अर्पिता के प्रति व्यवहार!! जितना किरण ने बताया जैसा बताया उसे सत्य मान दया जी ने खुद सोच विचार करते हुए अर्पिता को इन सब का दोषी ठहरा दिया।अब उन्हें अर्पिता से पहले जैसा लगाव नही रह गया था।बल्कि अब तो वे उसके प्रत्येक कार्य मे मीन मेख निकालने लगती हैं।

उनके मन की पीड़ा समझ अर्पिता इस बात को इग्नोर कर अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती है कि दया जी के साथ उसका रिश्ता ठीक हो जाये।लेकिन नाकामयाबी ही उसे मिलती है।

कभी साफ सफाई को लेकर दया जी अर्पिता पर भड़क जाती तो कभी मिर्च ज्यादा कर दी है, नमक कम है।कोई काम नही आता।जैसे बताते है वैसे ही क्यों नही करती हो।कोई भी मौका नही छोड़ती है।

कुल मिला कर उनका व्यवहार अर्पिता के लिए ऐसा हो गया था जैसे वो उनकी बेटी न् होकर बहू हो।अर्पिता सब कुछ बर्दाश्त करती है क्योंकि इस घर मे उसे हमेशा एक बेटी की तरह समझा गया।बीना जी ने उसे किरण से बढ़कर ही समझा।फिर क्यों वो दया जी की बात का बुरा माने।। किरण अगर दादी से कुछ कहती भी तो अर्पिता किरण को चुप करा देती।

किरण अर्पिता दोनो ने मिल कर घर को सम्हाल लिया था।साथ मिल कर दोनो सारे काम करती और बचे हुए समय मे अपनी पढ़ाई करती है।धीरे धीरे बीना जी को गए हुए एक महीना हो जाता है।प्रशांत शिव और श्रुति ने मिलकर उन चारों के विरूद्ध अपहरन् करने की साजिश के तहत पोलिस में लिखित शिकायत कर दी थी जिस कारण उन चारों को कुछ समय के लिए जेल हो जाती है।और इस एक महीने में एक भी दिन ऐसा नही गया जिस दिन दया जी ने अर्पिता को डांटा न् हो।अर्पिता के चुपचाप सह लेने पर उस के कुछ न कहने पर वो और चिढ़ जाती है।एक दिन उन्होंने अर्पिता को अपने पास बुलाया और कहा, ' अर्पिता! किरण, हेमंत, आरव भले ही तुम्हे दोषी न मानते हो  लेकिन मेरे लिए मेरी बीना की मौत की जिम्मेदार तुम ही हो।तुम्हारे ही कारण बीना  की असमय मृत्यु हो गयी।सो मैं बस इतना चाहती हूं कि तुम यहाँ से चली जाओ।मैं जब भी तुम्हे देखती हूँ तव तब मुझे यही एहसास होता है कि तुम्हारे कारण मेरे घर का आधार बिगड़ गया।तुम्हारे कारण अर्पिता! मेरे बच्चे बिन मां के हो गए। चली जाओ यहाँ से मेरे घर और  मेरे  बच्चों से दूर कहीं।वैसे भी तीन महीने बाद किरण की शादी है और मैं नही चाहती हूं कि तुम इस शादी में शिरकत करो।सो कल सबके साथ तुम भी यहाँ से अपने घर चली जाना।मैने तुम्हारे घर फोन कर तुम्हारे मां पापा को यहां घूम जाने के लिए बोला है उनके साथ ही जिद कर तुम भी यहां से चली जाना ठीक है और शादी में नही आना बाकि सब मैं देख लूंगी, किससे क्या कहना है क्या जवाब देना है मैं सब सम्हाल लूंगी।दया जी ने निष्ठुरता से कहा।उनकी बात सुन अर्पिता की आंखे छलक आती है और वो हां में गर्दन हिला वहां से कमरे में चली आती है।कमरे में किरण गंभीरता से अपनी पढ़ाई कर रही है।इस एक हादसे ने किरण और अर्पिता दोनो को ही बचपन से निकाल समय अनुसार परिपक्व बना दिया है।

मुस्कुराहट और चुहलबाजी के स्थान पर समझदारी और गंभीरता ने इनके व्यक्तित्व में जगह बना ली है।अर्पिता किरण को पढ़ाई करते हुए देखती है तो दरवाजे से ही नीचे चली जाती है।और रसोई से किरण के लिए कॉफी बना कर ले आती है और लाकर मुस्कुराते हुए किरण की टेबल पर रख देती है।किरण अर्पिता को देख हल्का सा मुस्कुराती है और फिर अपनी पढ़ाई में लग जाती है।अर्पिता भी अपना फोन उठा कर उस पर नेट सर्फिंग करने लगती है।कुछ घण्टो बाद शाम हो जाती है और अर्पिता के माता पिता भी वहां आ जाते है।किरण आरव हेमंत जी दया जी सभी उनसे मिल कर प्रसन्न होते है।अर्पिता चाय नाश्ता लेकर आती है सभी मुस्कुराते हुए चाय नाश्ता करते हैं।सबसे बात करते हुए अर्पिता की नजर दया जी पर पड़ती है।जो  सबसे हंसते मुस्कुराते हुए बात कर रही है।

अर्पिता लाली जरा यहां आना ये कप ले जाओ रसोई में रख दो दया जी ने अर्पिता से कहा।अर्पिता जी दादी कह उठकर कप ले चली जाती है।अरे अर्पिता वो जरा .. चली गयी मैं अभी आती हूँ सबसे कह दया जी भी उसके पीछे पीछे चली आती है।

दया जी : बात कर ली तुमने अपने माँ पिताजी से।
अर्पिता - जी हम शाम को कर लेंगे।नही तो कल सीधे ही उनके साथ निकल जाएंगे

ठीक है ये तुम्हारी परेशानी है क्या कैसे करना है कैसे नही।दया जी अर्पिता से कहती है।अर्पिता जी दादी कह कप धुल देती है औऱ वाहर सबके पास आ जाती है।आकर किरण के पास बैठ जाती है।

किरण का फोन रिंग होता है तो वह वहां से उठ कर चली जाती है।दया जी भी अर्पिता की ओर इशारा करती है और अपने कमरे में चली जाती है।

हेमंत जी अर्पिता के माता पिता को आराम करने के लिए कहते है।और उन्हें लेकर अतिथि कक्ष में चले जाते हैं।

सबके जाने के बाद अर्पिता सोचती है कल हम यहां से इस शहर से चले जायेंगे।फिर शायद ही हम यहां आएंगे।यानी हम प्रशांत जी को कभी नही देख पाएंगे।काश जाने से पहले हम एक बार उन्हें देख सकते।।अर्पिता सोच ही रही होती है तभी उसके अंतर्मन से आवाज आती है अर्पिता इसमें कौन सी बड़ी बात है देखना ही तो है न् उन्हें।तो एक बार श्रुति को वीडियो  कॉल कर ले,अगर वहीं कही होंगे तो उन्हें देख लेना।
दिमाग - नही अर्पिता! श्रुति क्या सोचेगी।कभी वीडियो कॉल की नही तुन्हें और आज करने लगी।कोई तो वजह होगी।

मन - लो कौन सी बड़ी बात हो गयी इसमें।अरे याद आई तो कर ली।

दिमाग - ए लो सुबह ही तो मिले थे।बड़ी जल्दी याद आ गयी।

हम आइडिया अच्छा है खुद से कहते हुए अर्पिता श्रुति को वीडियो कॉल लगाती है एवम श्रुति से बातचीत करने लगती है।

अर्पिता - हेल्लो! श्रुति।
श्रुति - हाइ! अप्पू।क्या बात है आज पहली बार तूने मुझे वीडियो कॉल की है तुम ठीक तो हो।

श्रुति की बात सुन अर्पिता उससे कहती है हम ठीक है बस कल सुबह की ट्रेन से घर जा रहे है तो सोचा तुझसे ही बात कर लूं।

क्या .. कहा तुमने अर्पिता।श्रुति ने एकदम से छूटते हुए कहा।और तुरंत उठ कर बैठ गयी।

उसके रिएक्शन देख अर्पिता उससे पूछती है , क्या
हुआ।जो ऐसे एकदम से उठ कर बैठ गयी।अरे घर ही जा रहीं हूं।बहुत दिनों से गयी नही न।मां पापा आये हैं तो सोचा उनके साथ ही चली जाऊं घूम आउंगी।

यार।तू जा रही है।श्रुति ने उदास होते हुए कहा।अर्पिता के जाने की बात वही हॉल में सोफे पर बैठे प्रशांत जी भी सुन लेते हैं।वो एक दम से चौंकते हुए श्रुति की ओर देखता है।जो फोन हाथ में पकड़े हुए अर्पिता से बात करने में लगी होती है।

अर्पिता : हां।श्रुति।
श्रुति - ओके तो जाने की बात छोड़ो ये बताओ फिर कब आओगी।

श्रुति के इस सवाल पर अर्पिता एकदम से चुप हो जाती है।और फिर सोचते हुए कहती है श्रुति अभी तो हम यहां से निकल ही न पाये और तुम आने का पूछ रही हो।
आने के लिए पहले पहुंचने तो दो श्रुति।कहते हुए अर्पिता श्रुति की बात टाल देती है।

ओके।।ओके।श्रुति ने कहा।और दोनों ही बातों में लग जाती है।
अर्पिता के जाने के बारे में सुन प्रशांत जी एकदम से बैचेन हो जाते है।वो सोचते है अर्पिता जा रही है यानी कल से मैं न् जाने कितने दिन तक उसे न देख पाऊं।अभी तक तो चोरी चोरी श्रुति को छोड़ने के बहाने से उसे देख लेता था।अब मुझे न जाने कितने दिन इंतज़ार करना पड़े।इंतज़ार तो मैं कर लूंगा लेकिन अभी इस गोल्डन मौके को नही जाने देना चाहिए।चोरी चुपके एक दीदार तो बनता है।वैसे भी वो इश्क़ ही क्या जिसमे चोरी चुपके दीदार करना शामिल न हो।इस चोरी चोरी की तो बात ही कुछ और है।सोचते हुए प्रशांत जी अपना लैपी लेकर जानबूझ कर श्रुति के पीछे से गुजरते है और एक नजर उठा श्रुति के फोन की ओर देखते है।अर्पिता जो श्रुति को ही देख रही होती है वो प्रशांत जी को देख मन ही मन कहती है 'थैंक गॉड' आपने इतनी कृपा तो की जो हम प्रशांत जी को देख सके।हमारे लिए तो यही बहुत है।वही प्रशांत जी भी एक नज़र अर्पिता को चुपके से देख वहां से आगे बढ़ जाते है।और अपने कमरे में चले जाते है।

अर्पिता और श्रुति कुछ देर और बात करती है एवम समय ज्यादा होने पर वो दोनो एक दूसरे को बाय कह फोन रख देती हैं।

अर्पिता उठकर अपने कमरे में चली आती है।लेकिन कमरे में उसका मन ही नही लगता।वो बैचेनी से इधर उधर टहलने लगती है और थक हार कर वो छत पर चली जाती है।जहाँ बीना जी ने छोटा सा रूफ गार्डन बना रखा होता है।वहां जाकर वो आसमान में स्वतंत्र विचरण करने वाले अर्ध चंद्र को देखती है और सोचती है पूर्णता कहां सबको नसीब होती है।जीवन भी तो इन्ही चंद्र कलाओ की तरह ही है जिसमे सुख दुख इसके घटने बढ़ने के साथ ही आते जाते रहते हैं।

आज किस्मत ने मोड़ लिया है तो हमे इस शहर से जाना पड़ रहा है लेकिन आप हमेशा हमारे हृदय में रहेंगे।।हमें बहुत कुछ कहना था आपसे।बहुत सी बातें करनी थी,आपकी बातें सुननी थी।संग चलना था कुछ कदम न जाने कितनी ही ख्वाहिशे थी जो शायद कभी पूरी न हो।शायद..! सोचते हुए अर्पिता की आंख भर आती है।उन्हें पोंछ वो मुस्कुराते हुए कहती है ''बहुत जिददी है ये आंसू,लाख रोकने पर भी छलक ही आते हैं'' !!

दूसरी तरफ प्रशांत जी भी अपने रूम की छत पर बैठे हुए अर्द्धचंद्र के नीचे गिटार के साथ छेड़खानी करते हुए कोई धुन बनाने की कोशिश कर रहे है लेकिन बार बार असफल हो रहे है ध्यान ही केंद्रित नही हो पा रहा।थक कर वो गिटार एक तरफ रख अर्ध चंद्र को देखने लगते हैं।

अर्पिता और प्रशांत दो ऐसे लोग जो अपने रहन सहन व्यवहार सभी तरह से आधुनिक है बस मोहब्बत के मामले में थोड़े  पीछे है।इसे हम अपनी भाषा मे कह सकते है रूहानी इश्क़।।जो आंखों से शुरू हो कर रूह पर खत्म होता है, वो इश्क़ जिसमे जीवन का कोई भी रंग आकर बिखर जाए लेकिन् उसका प्रभाव एक ही पड़ेगा, " इश्क़ रंगों से धूमिल होने की बजाय  हर रंग को अपने एक ही रंग में रंग लेगा"।।चांद को देखते देखते दोनो की कब आंख लग जाती है उन्हें खुद पता नही चलता।अगले दिन अर्पिता जल्दी उठती है और जल्दी जल्दी सारा काम  समेट कमरे में आ कर तैयार होने लगती है।किरण जो जल्दी उठ कर योगाभ्यास कर रही होती है अर्पिता को तैयार होता देख उससे पूछती है --

अर्पिता कहीं तुम भी तो मौसा मौसी जी के साथ घर तो नही जा रही जो इतना सुबह सुबह तैयार होने लगी।

अर्पिता : तुम्हारा अनुमान बिल्कुल सही है किरण हम घर जा रहे है बहुत दिनों से गये नही घर की याद आ रही थी तो सोचा एक बार जाकर घूम आती हूँ।

ओके अर्पिता।जाओ लेकिन जल्दी आना।मुझे तुम्हारे आने का इंतज़ार रहेगा।किरण ने कहा।

उसकी बात सुन अर्पिता किरण के गले लग जाती है।और उससे कहती है अपना ध्यान रखना।।

किरण बस हल्का सा मुस्कुरा देती है।अर्पिता तैयार हो नीचे आ जाती है।उसके माता पिता उसे तैयार देख समझ जाते है कि अर्पिता भी घर जाना चाहती है।अर्पिता आकर अपनी मां के पास खड़ी हो जाती है।सभी हेमंत जी दया जी किरण और आरव को बाय कहते हैं।दया जी इशारे से अर्पिता को अपने पास बुलाती है एवम अर्पिता के पास जाने पर वो उससे कहती है मेरी बात याद रखना लाली।यहां इस घर मे कभी वापस नही आना।।

जी दादी! हम अब इस घर मे कभी नही आएंगे।।आप इस बात को लेकर बिल्कुल निश्चिंत रहे।
अर्पिता ने बुझे मन से कहा।और सभी से बाय कह वो अपने माता पिता के साथ रेलवे स्टेशन के लिए निकल जाती है।

कुछ ही मिनटों में वो लखनऊ जंक्शन के अंदर होती है और अंदर अपनी ट्रैन का टाइम टेबल चेक करती है।वो पूरी खचाखच भरी हुई एक ऐसी जगह है जो चौबीस घंटे ऐसी ही रहती है।जहां लोग आते है जाते हैं..। ट्रैन अगले पंद्रह मिनट में स्टेशन से रवाना होगी देख अर्पिता अपने माता पिता को बता देती है।

अर्पिता के पिता : ठीक है लाली। एक काम कीजिये आप दोनो प्लेटफॉर्म पर जाकर इंतज़ार कीजिये मैं कुछ ही देर में टिकट लेकर पहुंचता हूँ।

नही पापा, आप देख रहे है न कितनी लंबी लाइन है लेडीज वाली लाइन जरा छोटी है सो हम जाकर टिकेट लेते है।आप और मां जाकर स्टेशन पर ट्रैन में हमारा इंतज़ार कीजिये।हम अभी दस मिनट में टिकट ले पहुंचते है।अर्पिता ने सामने देखते हुए कहा।
ठीक है लाली कह उसके माता पिता वहां से चले जाते है और वो जाकर अपनी लाइन में लग जाती है।और इंतजार करते हुए इधर उधर देखने लगती है।उसकी नजर सामने जाकर एक खंभे के पास खड़े शख्स पर ठहर जाती है ...


क्रमशः...


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Suresh

Suresh 8 महीना पहले

Usha Dattani Dattani

Usha Dattani Dattani 10 महीना पहले

Hardas

Hardas 11 महीना पहले

Meena Verma

Meena Verma 11 महीना पहले

Vandnakhare Khare

Vandnakhare Khare 1 साल पहले