मे और मेरे अह्सास - 10 Darshita Babubhai Shah द्वारा कविता में हिंदी पीडीएफ

मे और मेरे अह्सास - 10

मे और मेरे अह्सास

भाग- १०

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बात को भुलाना आसाँ होता l
याद को भुलाना आसाँ होता ll

चांदनी मे डूबी हुई महकती l
रात को भुलाना आसाँ होता ll

नशीली निगाहों से पिया हुआ l
जाम को भुलाना आसाँ होता ll

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दिल की बात बताने का आसां ज़रिया है ये शायरी l
देख लोगों का हाल ए दिल बता देती है ये शायरी ll

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कुछ तो है दर्मिया जिस पे पड़दा है ।

वर्ना नजरमें आपकी कुछ बात होती है ll

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हाथ छुटे भी तो रिश्ते नहीं टूटा करते l
जिस्मोंकी दूरीसे रिश्ते नहीं टूटा करते ll

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किसी को मारने के लिए l
खंजर की जरूरत नहीं होती है l
एक कातिल नजर ही काफी हैं l
किसी को मारने के लिए ll

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चेहरा दिल की किताब है l
उसे महसूस कर सकते हैं ll

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ना जाने कब खत्म होगी ये महामारी l
जान कितनों ले जाएगी ये महामारी ll

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सुना है आपने खत में लिखा था हाले दिल l
लो हम ने भी पढ़ लिया तुम्हारा हाले दिल ll

क्यों आज तक चुपचाप सहते रहे दर्दों गम l
कभी कह न पाए जुबा से तुम्हारा हाले दिल ll

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तेरा कर्म ही तेरी पहचान है l

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शिकार करने के लिए आए थे l
खुद शिकार हो रहे हैं ll
दिल का हाल जानने आए थे l
खुद की पहचान भूल गये हैं ll

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लोकडाउन

मे और मेरे अह्सास लिखते लिखते l
मेरी डॉकडाउन हो गई है ll
लोकडाउन है खत्म हो ही नहीं रहा l
मेरी डॉकडाउन हो गई है ll

बस ट्रैन, प्लेन, मोल, थियेटर, होटल l
पानीपुरी सब कुछ बंध है l
घर का काम करते करते कमर टूट गई l
मेरी डॉकडाउन हो गई है ll

आफिस, बैंक, पोस्ट, कूरियर, दुकाने l
सलून - पार्लर सब बंध है l
चाय,दूध,नास्ता,लंच,डिनर चालू रहता है l
मेरी डॉकडाउन हो गई है ll

सुबह देरी से उठाना, रात को देरी से सोना l
आदत सब बिगड़ती जा रही है l
दूध - शब्जी - राशन की डिमांड बढ़ गई है l
मेरी डॉकडाउन हो गई है ll

लूडो, केरम,तास, हाऊसी कितना खेले l
ऑनलाइन - ऑफलाइन भी खेला l
कविता लिखी, किताबे पढ़ी, पेंटिंग किया l
मेरी डॉकडाउन हो गई है ll

बेडरूम - ड्राइंग रूम - किचन - बाल्कनी l
के चलकर काट लिये l
नीद से उठकर खाना खाया फिर सो गया l
मेरी डॉकडाउन हो गई है ll

स्कूल की छुट्टियां इतनी लंबी हो गई l
मम्मी की हालत खास्ता हुई l
घर-घरवालों को सँभालते कमर दर्द हुआ l
मेरी डॉकडाउन हो गई है ll

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सीने में दर्द उठा है l
पल ही जैसे रूका है ll

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चाहे कितनी ही पढ़ी लिखी क्यों ना हो l
रोटी की गिनती में हमेशा गलती करती है "माँ " ll

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बढ़ सको तो बढ़ो आगे l
चढ़ सको तो चढ़ो आगे ll

कही तो ब्रेक लगानी होगी l
रुक सको तो रुको आगे ll

ये जिंदगी एक कहानी है l
लिख सको तो लिखो आगे ll

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जो भी लिखती हूँ दिल की बात लिखती हूँ l
सोच समझकर लिखना मुजे नहीं आता है ll

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सुन सको तो सुन लो दिल की धड़कनों को l
रुक सको तो रुक जाओ दिल की सुन के ll
कोई जी रहा है तुम्हें देख के l
कोई मर रहा है तुम पर ll

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अपनों का बिछड़ा साया है l
ये कैसा बवंडर आया है ll

गाँव व् शहरों में हर कही l
मौत का खौफ छाया है ll

फिजाओ का सन्नाटा सुन l
ये कोई संदेश लाया है ll

उम्रभर भागदोड़ करते रहे l
घर में सुकून पाया है ll

जीवन पाठ सीखाने के लिए l
ये कुदरत की सब माया है ll

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आज के हालात मे यह संतोष रह l
और खुदा का शुक्रिया अदा कर l
रह ने को घर है, खाने के लिए रोटी है l
पहने को कपडे है, पीने को शुद्ध पानी है l
चैन की नीद सौ पा रहा है, अपने साथ है l
किसी भी बात का असंतोष ना कर l
ये वक़्त भी गूजर जाएगा ll

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राशन की कतारें है l
खुदा के सहारे है ll

मोलो मे ताले है l
फायदे में दुकाने है ll

भूख से तड़पते है l
लोग भी हमारे है ll

अपने भी डरे हुए हैं l
लावारिश जनाजे है ll

दूर तक जहां देखो l
डरावने नज़ारे है ll

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इश्क के रंग देख लिये l
जीत के रंग देख लियेll

सखी जुदाई के दिनों में l
प्रीत के रंग देख लिये ll

फागुन के होरी खेल में l
गीत के रंग देख लिये ll

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खता किसकि सजा किसको l
मजा किसकि सजा किसको ll

बेलगाम पीए जा रहे थे सब l
नशा किसका सजा किसको ll

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मे सह गया l
मे बह गया ll

चांद देखे बिना l
मे रह गया ll

दिल की बात l
मे कह गया ll

पहेली नजर में l
मे चह गया ll

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तू आदत बन गया है l
तू चाहत बन गया है ll

जमाना लोकडाउन हुआ l
तू आदम बन गया है ll

चार दिन घर क्या बैठा l
तू जानम बन गया है ll

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साथ तुम्हारा कभी ना छोड़ेगे l
हाथ तुम्हारा कभी ना छोड़ेगे ll

मुश्किल चाहे जितनी भी आए l
साथ तुम्हारा कभी ना छोड़ेगे ll

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मान चाहिए तो मान देना शिख l
जान चाहिए तो जान देना शिख ll

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कहने से बात ग़र दिल हल्का हो सकता l
पीने से जाम ग़र दिल हल्का हो सकता ll

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भूल जाओ बीती बातो को सुनो क्या कह रहा हैं वक़्त का तकाजा l
शिख लो इस पल में जीना, सुनो क्या कह रहा हैं वक़्त का तकाजा ll

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गर तुम भूल जाने का वादा करते हो l
वादा करते हैं भूल ने की कोशिश करेगे ll

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ना कोई घुट घुट के जीता l
ना कोई खून के अश्क पिता l
रोने से आज ग़र दिल हल्का हो सकता ll

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ना कोई दिल वीरा होता l
ना कोई चमन उजड़ता l
सहने से दर्द ग़र दिल हल्का हो सकता ll

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अभी अभी आऐ हो l
अभी जाने की बात न करो l
कुछ कहा सुना भी नहीं l
अभी जी भरके देखा नहीं l
देख ने तो दो चांद सा मुखड़ा l
सुन ने तो दो मीठी मधुर अवाज ।
कल ये पल फिर मिले न मिले ll

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महसूस कर सकते हो तो करो हमारी धड़कनों की शायरी l
तुम्हारी दस्तान सुनाती हैं सुनो हमारी धड़कनों की शायरी ll

******* समाप्त ********

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Jaya Dubey

Jaya Dubey 2 साल पहले

જીગર _અનામી રાઇટર
Zalak Mehta

Zalak Mehta 2 साल पहले

Doshi Gaurangkumar

Doshi Gaurangkumar 2 साल पहले

pradeep Kumar Tripathi

pradeep Kumar Tripathi मातृभारती सत्यापित 2 साल पहले