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मेरा घर कहाँ

मेरा घर कहाँ

लाली धोबिन की मिट्टी तभी से पलीद थी जब से उसका मरद मरा था। तीन बच्चों के संग अड्डे पर जाना और घर-घर से जाकर कपड़े समेटना अब उसके बस की बात नहीं रह गई थी। छोटा लड़का साल भर का था। कभी गरम इस्तरी पकड़ लेता तो कभी धुले कपड़े पर अपना लकड़ी का चटुवा फ़ेंक धब्बा लगा देता। तंग आकर लाली ने घरों में काम करने की ठानी। बरतन, झाड़ू और आटा गूँधने से उसके पास इतने पैसे आने लगे कि वह चैन से रोटी के साथ लहसुन की चटनी खा सकती थी।

बड़ी लड़की सोना दस-ग्यारह साल की हो रही थी। मोहल्ले के लड़कों के लिए आकर्षण का केंद्र थी। गंदे नाले के पास बसी यह झुग्गियाँ बिना पानी के बजबजाती रहती थीं। हर तरह की गाली और धंधे यहाँ के लोगों की दिनचर्या थी। फ़ैशनेबिल कॉलोनी के सामने बसी यह बस्ती अपने में एक हकीकत थी। लाली के पति राजा ने इस खाली मैदान में औरों की तरह कब्जा पाने की नीयत से झुग्गी डाली थी। गाँव में बेरोज़गारी से तंग आकर दोनों शहर की तरफ़ निकले थे। कुछ दिन चैन से गुज़रे। फि़र उसे लत लग गई पन्नी पीने की और उसी के चलते वह एक दिन नशे की हालत में चल बसा।

जवान होती लड़की को बचाने के चक्कर में लाली ने हालात के सामने हथियार डाल दिए और रोज़-रोज़ राह रोकनेवाले अधेड़ बदमाश दिगंबर दादा के घर बैठ गई। अब उसके तेवर दूसरे थे। दिगंबर का बस्ती पर दबदबा था। चाकू, कट्टा, लाठी, जंजीर उसके खिलौने थे। दिगंगबर की घरवाली को मरे चार-पाँच साल गुज़र गए थे। इस बीच दिगंबर भी औरतों को पटाते हुए और जोर-जबर्दस्ती करते-करते थक चुका था। उसे घर में रोटी के साथ पैर दबानेवाली एक औरत की ज़रूरत थी। कई महीनों तक नीम के नीचे बैठी लूली फ़कीरन के बारे में सोचता रहता कि जवान है, सुंदर है मगर दोनों हाथ---| यहीं पर वह आकर रुक जाता, जबकि फ़कीरन राज़ी थी। उन्हीं दिनों लाली जब किसी लौंडे की शिकायत लेकर आई तो उसने फ़ै़सला कर लिया कि इस धोबिन को अपने घर के घाट से कहीं जाने नहीं दूँगा।

लाली के लड़की सोना को तो तीन वक़्त खाने केा मिलने लगा तो उसकी आँखों में तरावट और बदन पर गदबदापन आने लगा। उम्र भी रस्सी कूदती तेरह पार कर चौदहवें में लग रही थी। लाली को उसकी शादी की फि़क्र थी। सोना भूख का मजा चख चुकी थी सो दिगंबर दादा के पैर दबाने, भाँग पीसने और सर में तेल दबाने पर उसे कोई ऐतरान न होता। मगर शादी से उसकी जान निकलती कि जाने कहाँ माँ भेजे और सारे दिन खटने के बाद फि़र वही रोटी और चटनी के लिए खिटखिट। मगर लाली अब उठते-बैठते उसके दिमाग़ में इन जुमलों की सुइयाँ चुभोती कि लड़की का असली घर शौहर का होता है, माँ-बाप तो बस लड़की के पालने वाले होते हैं। यही दुनिया का क़ायदा क़ानून है।

सोना का ब्याह बिरदारी को खाना खिला, बाजे-बाजे, दहेज के संग ननकू के साथ हो गया। निकाह के बाद ननकू सोना को बिदाकर अपने घर मंगोलपुरी ले गया। उसका परिवार बड़ा था। फ़फ़ूी, ताई और उसकी माँ विधवा होकर एक साथ रहती थीं और प्लास्टिक की चप्पलों के तले के तीन छेदों में पट्टा डालने का काम करती थीं। वही उनकी रोज़ी रोटी थी। ननकू सुबह जाकर आठ-दस गट्ठर तले और पट्टे के ले आता था। ननकू के पास एक कमरा था। उसी में खाना-पीना, सोना-बिछौना था।

सोना नई दुल्हन थी। तीन विधवाओं के बीच खाना पकाना, सजना-सँवरना और पति के संग कुछ घंटे अकेले कमरे में रहना उसकी जिम्मेदारी थी। बाहर धूप या छाँव में बेठ तीनों काम करतीं और दोपहर में पाँचों साथ खाना खाकर कुछ देर सुस्ताते थे। यह िज़ंदगी सोना ने कभी जी नहीं थी। उधर झुग्गियों में खेलकर बड़ी हुई फि़र पाँच-दह साल की थी जब से घर-घर इस्त्री के कपड़े माँ-बाप के साथ माँगने जाती और जब दिगंबर दादा की रखैल की बेटी कहलाई तो अकड़कर चलना सीख गई। परेशान करने वाले लड़कों की उसने ऐसी ख़बर ली थी कि वह सोना को देख रास्ता बदल लेते थे। यह शादी भी दिगंबर दादा के दबदबे के चलते हुई थी। ननकू पहले नशे की पुड़िया बेचता था। एक दिन पुलिस पकड़कर ले गई थी। उस समय दिगंबर जाकर छुड़ा लाया था। वहाँ की मार से डरकर उसने स्मैक के धंधे से तौबा कर ली थी। अब जो शरीफ़ बना तो उसे सोना का चटपट हर एक से बात करना, हँसना-बोलना बहुत अखरता था। खासकर तब जब सब जानते थे कि सोना की माँ लाली धोबिन दिगंबर दादा की रखैल है।

सभी जानते थे कि दंगे-फ़साद में लूट का माल दिगंबर के घर भरा था। इस बार जो बम फ़टा तो दिगंबर उसमें उड़ गया। लाली की दुनिया उजड़ गई। उसको डर ने घेर लिया कि कहीं उसको बस्तीवाले लूट न लें या फि़र दिगंबर का दाहिना हाथ कहलाने वाला रग्घू उसको अपनी रखैल न बना ले। अब हालात ऐसे थे नहीं जो उसे किसी मर्द की ज़रूरत पड़ती। इसलिए वह झटपट सीमापुरी में मकान ले पहलवान की ट्रक पर सारा सामान लदवा रातों-रात झुग्गी छोड़कर भाग ली। हफ्तों उसने अपनी खैर-ख़बर सोना को न दी। सच पूछा जाए तो वह अब अपनी िज़ंदगी को अपनी तरह जीना चाहती थी। उसके पास माल काफ़ी था। दोनों लड़कों का नाम वह स्कूल में लिखवा चुकी थी। रोज़ के खर्चे के लिए उसने कपड़े इस्त्री करने फि़र शुरू कर दिए थे। इससे मोहल्ले में जान-पहचान जल्दी बन गई और यह बताने में भी आसानी हुई कि उसका पति राजा पुलिस लाइन में धोबी था। मरने के बाद नौकरी गई सो इस मोहल्ले में आन बसी।

सोना को ननकू ने जब मोहल्ले के जवान लड़कों के संग कई बार हँसते-बोलते देखा और मना करने पर भी कहा न माना तो उसने सोना की जमकर पिटाई कर दी, बदले में सोना ने भी ननकू के सर पर बेलन दे मारा। तीनों विधवाओं ने ऐसी लड़की कहाँ देखी थी, जो मियाँ को पीटकर रख दे| सो उठते-बैठते बुरा-भला कहतीं। दिगंबर के मरने से वह डर भी खत्म हो गया कि सोना मायके जाकर उसकी शिकायत करेगी। और अब तो उसकी माँ भी लापता है। ऐसी हालत में जो होता है वही हुआ। बढ़ती लड़ाई से तंग आकर ननकू ने सोना को घर से निकाल दिया। उसने जब अपने कपड़े और बिस्तर माँगा तो जवाब में सबने मिलकर उसके गहने भी उतरवा लिए और उसे धमकाया कि यह उसका घर नहीं है। जो फि़र यहाँ क़दम रखा तो पैर काट दिए जाएँगे।

सोना एक बार फि़र सड़क पर बेसहारा खड़ी थी। बाप और पति का घर का जादू झूठा साबित हुआ। माँ का पता नहीं था। उसका दूर का चचा नीतिबाग में इस्त्री का काम करता था। पिता के मरने के बाद एक-दो बार आया था। वही एक सहारा बचा था। रोती-धोती वह मंगोलपुरी से नीतिबाग, बिना बस का किराया भरे, पहुँच गई। बड़ी-बड़ी कोठियों के बीच वह चाचा को कहाँ ढूँढ़ें| एक-दो फ़ल के ठेलेवालों से उसने पूछा कि रमजान धोबी को जानते हो| जवाब न में मिला। आखि़र में थककर वह पेड़ के नीचे बैठ गई, जिसके पास किसी घनश्याम धोबी का अड्डा था। कुछ देर बाद घनश्याम कपड़े देकर लौटा तो सोना ने उससे रमजान के बारे में पूछा।

”तू कैसे जानती है उसे|“
”वह मेरा चाचा है, मेरे अब्बा राजा का दूर का रिश्तेदार। उसके मरने पर आया था।“
”तू---|“
”मैं सोना हूँ। मेरा ब्याह मंगोलपुरी के ननकू के साथ माँ ने किया था। उसने मुझे मारपीट कर निकाल दिया। माँ जाने कहाँ चली गई है दिगंबर दादा के मरने के बाद। अब मेरा सहारा कोई नहीं है, कहाँ जाऊँ|“
”मेरे झोंपड़े चल---वहीं रह। आखि़र मेरी भी कोई जिम्मेदारी बनती है न।“
”मतलब तू---“ अकड़कर खड़ी हो गई सोना।

”मैं रमजान हूँ। नाम बदल लिया है। सुख से रहता हूँ। घरवाली गाँव गई है। झोंपड़ी में रह ले कुछ दिन। काम ढूँढ़ दूँगा किसी कोठी में---“ रमजान ने हँसकर कहा। उसकी बात सुन सोना की चढ़ी साँस की गति मि)म पड़ी और गुज्स्सा काफ़ूर हुआ।

रमजान चाचा ऊर् घनश्याम प्रेस वाले की झोंपड़ी जो कुछ दूर पर थी, वहाँ जाकर सोना ने चैन की साँस ली और भर गिलास चाय बना पी और बिखरे बरतन, कपड़े को समेटने में लग गई। उसका माथा अभी घूमा हुआ था। िज़ंदगी के इस बदलाव से अभी वह समझौता नहीं कर पा रही थी। दुःख-सुख तो लगा ही रहता है, मगर इतनी उठा-पटक भी कैसी कि सर से छत ही छिन जाए और कहने को कोई घर न बचे।

कुछ दिन इस इंतज़ार में गुज़र गए कि शायद ननकू उसे लेने आ जाए और बात रफ़ा-दफ़ा हो जाए। इस बीच रमजान ननकू के घर दो बार हो भी आया, मगर वे सोना को वापस बुलाने पर किसी तरह राज़ी न हुए। रमजान की परेशानी यह थी कि चार हफ़्ते बाद घरवाली मय तीन बच्चों के टपकने वाली थी। सोना को देखकर उसका माथा फि़र जाएगा। सोना को कहीं काम मिल नहीं रहा था। तंग आकर एक दिन सोना ख्जुद मंगोलपुरी गई ताकि लड़लड़ाकर अपना हक़ जमाए और फि़र से रहना शुरू कर दे। मगर वहाँ पहुँचकर उसके हाथों के तोते उड़ गए।

घर के सामने झिलमिल पन्नियों का नन्हा-सा छत्तुर बना था। औरतें गाना गा रही थीं। सामने बड़े पतीलों पर कुछ चढ़ा था। सोना जो और आगे बढ़ी तो देखा ननकू दूल्हा बना बैठा है और पास में गठरी बनी लाल कपड़ों में दुलहन। अंदर से उठा उसका गुज्स्सा उसके सर पर चढ़ गया। पैरों की चप्पल उतार उसने पीछे से जाकर ननकू के सर-पीठ पर जी-भर कर जमाई। ख्जुशी का माहौल थम गया। कई पल तक किसी के समझ में नहीं आया कि यह हुआ क्या, दूल्हे का सेहरा, हार नोचकर किसने फ़ेंका। दुलहन भी घूँघट उठाकर हैरत से शौहर को पिटता देख रही थी।

पल-भर बाद दृश्य दूसरा था। तीनों विधवाएँ सोना का झोंटा पकड़ बकरी की तरह उसे इधर-उधर घसीट रही थीं। दूल्हा जब जरा होश में आया। किराये पर ली चमचमाती शेरवानीर का कॉलर उधड़ा देखा और पगड़ी को कीचड़ में लोटता तो उसका पारा सातवें आसमान पर जा चढ़ा। लातों की बारिश उसने सोना के कूल्हे-पीठ पर इस तरह करनी शुरू कर दी जैसे धोबी-घाट पर कपड़े पछाड़ता हो। यह हाल देख लड़की वाले परेशान हो उठे। दुलहन जाकर माँ से लिपट गई और बाक़ी लोग दुम दबाकर भागने लगे। तभी अधमरी सोना को नाली के पास छोड़कर ननकू तैश में पलटा और चूल्हे के पास से चाकू उठाकर उसने ससुरालवालों को दिखाकर उसी जुनूनी कैफि़यत में चिल्लाकर सबसे कहा, ”कोई जाने न पाए वरना सर धड़ से अलग कर दिया जाएगा।“

कौन से हज़ारों मेहमान थे। कुल पंद्रह-बीस की भीड़ थी। जान किसे प्यारी नहीं होती सो सब दम साधकर बैठ गए। तीनों विधवाओं ने टीन की कुरसी पर दुलहन को बिठाया और लाल दुपट्टे को साफ़ा ननकू के सर पर बाँध उसे दूसरी कुरसी पर बिठा पहले की तरह ढोलक लेकर बैठ गईं। सोहाग के गाने की तान में लोगों की खुसुर-पुसुर गुम हो गई। सोना ने कराह कर सर उठाया तो देखा वहाँ कुछ भी नहीं बदला था। फि़र अपने को ताका जहाँ बहुत कुछ बदल चुका था। किसी तरह उठकर लड़खड़ाती खड़ी हुई और बस स्टॉप की तरफ़ बढ़ने लगी।

सोना जख्मी कबूतरी की तरह टूटे डैनों के संग जब रमजान के पास पहुँची तब तक वह एक बोतल संतरा चढ़ा नशे में धुत्त औंधा पड़ा था। सोना ने हल्दी का लेप ख्जुद ही चोटों पर लगाया और चुपचाप लेटकर सोचने लगी कि वह कई दिनों तक चलने-फि़रने के काबिल नहीं रह पाएगी, वरना कल से वह भी एक मेज़ डाल इस्त्री का अड्डा बना लेती। मगर अब तो---सुबह जब रमजान की आँख खुली तो सोना को बुखार में तपते देखा। डॉक्टर ने इंजेक्शन लगा कुछ दवाएँ दीं, जिससे सोना रात तक सँभल गई और बुखार भी उतर गया। रमजान का दिल लड़की के लिए दुःख रहा था। उसकी माँ को कहाँ ढूँढ़े जो सोना को जाकर उसके सुपुर्द कर दे। सारे दिन अड्डे पर इसी उधेड़बुन में रहा।

पीली कोठी में सोना को झाड़ू-पोंछे की नौकरी मिल गई थी। उससे पहले उसने इस्त्री करना चाहा तो कपड़ा जला डाला। िज़ंदगी में अपना खानदानी पेशा कभी किया हो तो जानती। वह तो बस कपड़ा जमा करने का काम जानती थी, जो रमजान को पसंद न था। वह कोठीवालों को जानता था। साहब लोगों-से शाही आदतों के उनके नौकर और ड्राइवर होते हैं तो भी वह सोना को रोक नहीं सकता था। आखि़र उसकी घरवाली के लौटने में दो दिन बाकी थे। इस बीच सोना ने मालकिन को ख्जुश कर गैरज में सोने की इजाजत ले ही ली। यह जानकर रमजान ने राहत की साँस भरी।

सोना अब पूरे अठारह साल की हो रही थी। इस बीच उसने छह-सात ठिकाने बदले थे। जहाँ जमने लगती वहीं से उखाड़ दी जाती। इस कोठी में भी हज़ारों काम मुफ्त करती कि रात को बंद जगह सोने को मिल जाए। झाड़ू-पोंछा कर जब गरम प्याला, चाय पीती तो भूखी अतड़ियाँ ऐंठने लगतीं। बँधा-बँधाया खाने का हिसाब तो था नहीं, कभी कोठी से मिल गया तो कभी रमजान ने अपनी रोटी उसे थमा दी। मगर उधर जब उसके हाथ में दो सौ के नोट आए तो उसने दोपहर को पिछवाड़ेवाले ढाबे पर दो रोटी और साथ में मिली दाल खानी शुरू कर दी। कपड़ा, चप्पल, शाल मेम साहब की उतरन मिल गई थी। चादर भी बिछाने को उन्हीं ने दे दी थी। िज़ंदगी में ठहराव-सा आ गया था।

एक रात जब सोना गहरी नींद सो रही थीं तो उसे सपने में लगा कि उसकी माँ उसे सीने से लिपटा प्यार कर रही है। फि़र उसे लगा कि दो मज़बूत बाँहें उसे अपने कसाव में पकड़ रही हैं। इतने दिनों बाद पति का स्पर्श उसे सोते में भी सुख दे रहा था। तभी ठंड की झुरझुरी से वह जाग उठी। अँधेरे में उस पर कोई झुका थ। उसकी गरम साँसें उसके चेहरे को छू रही थीं। ख्जुशबू का एक झोंका बहा। सपनों और नींद ने सब कुछ धुँघला-सा दिया मगर यह ख्जुशबू| ननकू के पास से तो पसीने की गंध आती थी---|

”कौन---कौन|“ सहमती-सी सोना बोली।
”चुप---किसी को पता भी नहीं चलेगा---उठ चल मेरे कमरे में, वहाँ नरम बिस्तर है आराम से लेटना---उठ।“
”छोटे साहब!“ चौंक पड़ी सोना।

पीठ सहलाते हाथों को उसने झटका और उछलकर खड़ी हो गई। मरदाने हाथों की जकड़न बढ़ी तो उसने बाजुओं पर अपने नुकीले दाँत गाड़ दिए। दर्द की शिद्दत से गिरफ्त ढीली पड़ी। मगर उसी के साथ एक जोरदार चाँटा सोना के गाल पर पड़ा। उसकी आँखों के सामने तारे टूटे। वह लड़खड़ा कर दीवार से टकराई। तभी उसे महसूस हुआ कि हाथों की वहशत फि़र साँप बन उसे जकड़न में ले रही है। कुछ देर वह साँस रोके बेजान-सी खड़ी रही। उसे बेहोश जानकर छोटे साहब ने उसे जमीन पर लिटाया और---तभी उसने पूरी ताकत से लात सीने पर मारी और कार और साइकिल के औजारों के बीच से कुछ उठाया और भरपूर हाथ से छोटे साहब के सर पर दे मारा।

गुलाबी ठंड में सड़क के किनारे बैठी सोना जाड़े से काँप रही थी। उसे अपने कपड़ों की गठरी और चादर याद आ रही थीं। उसने बहते आँसुओं को पोछा और थका बदन घसीटा। पौ फ़टने से पहले उसे यह इलाका छोड़ना पड़ेगा। पता नहीं छोटे साहब का सर फ़टा या---पुलिस में रपट लिखवाई गई तो वह बच नहीं पाएगी। कहाँ जाए| सड़क के किनारे चलते-चलते उसके बदन में गरमी आई। पैर में कुछ चुभने से उसे रुकना पउ़ा। काँटा निकालते हुए उसे अपने बाप की झुग्गी का ख़याल आया। बाप की याद से वह वहीं बैठे-बैठे फ़फ़क पड़ी। न वह मरता न उन सबकी गत लगती।

वह बस्ती बदली नहीं थी। बिना पानी के गंदगी से बजबजाती हुई उसकी झुग्गी का कहीं कोई पता नहीं था। आबादी बढ़ने से झोंपड़ियों की तादाद बढ़ गई थी। आधे से ज़्यादा लोग नए थे। पुराने अपना कब्जा बेच कहीं चले गए थे। वहाँ से जब निराश लौटने लगी तो उसे ध्यान आया कि रग्घू दादा से मिलती जाऊँ। शायद कोई काम बन जाए। रग्घू ने उसे ठहरने की एक जगह दे दी। दिगंबर के रिश्ते से उसे थोड़ा-बहुत नकद भी दिया ताकि अपनी िज़ंदगी बसा सके। कोठियों से उसका अनुभव कड़वा था मगर काम माँगने कहाँ जाती| हार कर वहीं पहुँची और काम कर अपने ठिकाने लौट आती। पंद्रह-बीस दिनों में वह पुरानी कड़वाहट भूलकर फि़र से अपने को ख्जुश रखने लगी और उसने तय किया कि बाकी िज़ंदगी अब वह इसी बस्ती में गुजार देगी।

सोना की दूसरी शादी की बात रमजान ने एक-दो लोगों से चलाई थी जिन्होंने सोना को रमजान के घर देख पसंद किया था। मगर जैसे ही उन्हें पता चला कि यह छोड़ी हुई औरत है, उनका नजरिया ही सोना की तरफ़ से बदल गया। बिना तलाक़ वाली औरत को कौन धर में रखकर मुसीबत मोल लेगा।

”चाचा, तुम काहे इन सबके चक्कर में पड़े हो, मुझे नौकरी दिलवा दो अभी। ठिकाना मिल जाए तो दिमाग़ सही बात सोचेगा।“ सोना रमजान की परेशानी देख खीझ उठती।

धोबियों में लाली की बात किसी से छुपी न थी। कहनेवालों ने तो यहाँ तक भी कह दिया कि माँ को देखना हो तो बेटी को देखो और जो बेटी को देखना हो तो माँ को देख लो। सोना आखि़र उसी लाली धोबिन की बेटी है न, जो दिगंबर के साथ बैठ गई। तो फि़र सोना कैसे अपना घर बसाए रखती। उसे भी तो कोई न कोई पैसे वाला मर्द चाहिए होगा। तभी शौहर के घर से भागकर चाचा के घर पड़ी है। इलन सारी बातों से रमजान का दिमाग़ भनभनाने लगता था। अपने दोस्त राजा की याद उसे आती कि दोनों एक साथ गाँव से निकले थे। इस बड़े शहर की भीड़ में दोनों अलग हुए तो फि़र मौत के दिन ही वह राजा का चेहरा देख पाया था। अब जो सोना की उसी बस्ती में जमने की ख़बर रमजान को मिली तो वह बड़ा ख्जुश हुआ।

वह दोपहर भी बड़ी मनहूस थी जब बुलडोजर ने उसकी झुग्गी के संग सारी बस्ती उजाड़ दी। वह जमीन किसी ठेकेदार ने ख़रीद ली थी। वहाँ पर वह एक सिनेमाहाल बनाना चाहता था। रग्घू दादा की भी कुछ न चली और लुटा-पिटा गरीबों का काफि़ला अपने ही घर के मलबे पर रात गुजारने पर मजबूर हुआ। सोना का दिल उस रात से चहारदीवारी की चाहत से मुक्त हो गया। उसके अंदर एक नफ़रत का उबाल हर दीवार को गिरा गया। उसने मिट्टी के ढेर पर बैठे-बैठे सामने कतार से खड़े पक्के ऊँचे मकानों कोठियों को देखा। फि़र वहीं ढेर पर लेट गई। ऊपर आसमान पर तारे छिटक रहे थे। उन्हें देख सोना का दिल हलका हुआ और अंदर से एक हँसी फ़ूटी। उसकी चौकन्नी आँखें पहले से ज़्यादा चमकदार हो उठीं।

इस बस्ती के मलबे के ढेर के सामने सोना ने चलता-फि़रता ढाबा खोल लिया। सुबह से चाय भट्ठी पर चढ़ जाती और दोपहर को आलू-गोभी की सब्ज़ी के साथ रोटी बनने लगती। मजदूरों को खिलाकर जब वह परात में बचे आटे की दो लोई को अपने लिए बेलती तो सुख का एक असीमित सागर सीने में मचलता। उसका मस्त चेहरा देखकर अकसर मजदूर उसके संग ब्याह रचाने की बात कहते तो वह खिलखिलाकर हँस पड़ती। फि़र गंभीर हो पूछती एक रोटी और ले ले ताकि फ़जूल बातों की जगह न तेरे पेट में बचे न दिमाग़ में---मजदूर खिसियाकर उठ जाता और सोना जमीन पर थूक देती जैसे कह रही हो कि इस दुनिया के हर कोने पर मर्द खड़ा मिलेगा, कभी प्रेमी के रूप में तो कभी बलात्कारी के रूप में। मगर जो पति ढूँढ़ने निकलो तो एक भी कायदे का आदमी नज़र नहीं आएगा, जिसके साथ उम्र एक छत के नीचे गुजार दी जाए। मैं तो यूँ ही भली। न कोई मेरा ठौर-ठिकाना न मैं किसी घर की मालकिन। दुनिया की आबादी हूँ और हालात की शहजादी हूँ। इन मर्दों को अब कौन समझाए |

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