इश्क़ की इन्तेहां सोनू समाधिया रसिक द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

इश्क़ की इन्तेहां

लेखक :_सोनू समाधिया रसिक 🇮🇳




"छोड़ो न अवि कोई देख लेगा। "



"देख लेने दो। अब तुम मेरी हो और मेरा हक़ है प्यार करने का।" - अविनाश ने दिव्या को अपनी बाहों में खींचते हुए कहा।





"मगर ऎसे प्यार कौन करता है?"





"छिप - छिप कर प्यार करने का मज़ा ही कुछ और है, है न!"





"अवि! एक बात पूछूँ।" - दिव्या ने अविनाश की गले में हाथ डालते हुए कहा।





" हाँ, पूछो न, वैसे भी तुम मेरी मंगेतर हो और हर बात जानने का तुम्हारा हक़ भी बनता है।"





"क्या तुम मुझे हमेशा इस तरह प्यार करोगे, शादी के बाद भी। "-दिव्या ने नर्वस होते हुए कहा।





" हां, यार। तुम ही मेरी सबकुछ हो, मेरी जिंदगी, मेरा प्यार, मेरी हर धड़कन पर तुम्हारा नाम है। ये तब तक है जब तक तुम मेरी हो, ये वादा है मेरा तुमसे कोई भी हमको जुदा नहीं कर सकता।"





" ओ! रियली आई लव यू अवि..... ।"-दिव्या ने अविनाश को गले से लगा लिया।





"आई लव यू टू.... "







तभी कॉलेज की घंटी बजी। तो दोनों एक दूसरे से अलग हो गए और कॉलेज के ग्राउंड की ओर देखने लगे।

वहां खड़ी दिव्या की बेस्ट फ्रेंड स्वेता उसे हाथ के इशारे से उसे बुला रही थी।





"मैं चलती हूँ, अभी ओके क्लास खत्म होने के बाद यही पर मिलती हूँ। बाय।"







" बाए, अपना ख्याल रखना ओके।" - अविनाश ने दिव्या की ओर हाथ हिलाते हुए कहा।







और फिर अपनी बाइक लेकर चला गया।

अविनाश और दिव्या की सगाई हो चुकी थी। अविनाश B.Tech पिछली साल इसी कॉलेज से कम्पलीट कर चुका था और दिव्या B.Tech फ़ाइनल इयर में थी।





"अविनाश था क्या?"





" हाँ। "







" बड़ा प्यार आ रहा था दोनों को हां" - स्वेता ने दिव्या की चुटकी लेते हुए कहा।







"अच्छा.... तेरी तो।.., हाँ सुन तेरे बॉयफ्रेंड राहुल का क्या हुआ बात हुई क्या तेरी राहुल के पैरेंट्स से.. ।" 





"अभी नहीं यार मुझे डर लगता है और राहुल भी मना कर रहा है अभी बात करने को। "





" अच्छा! कोई नहीं। बुरा मत मानना एक बात कहूँ, राहुल ठीक नहीं है तेरे लिए। "







" हां! मुझे पता है। सारी दुनिया में बस एक ही लड़का अच्छा है वो है..... ।"







" चल ठीक है, अब क्लास में चले।" - दिव्या ने स्वेता की बात बीच में काटते हुए कहा। 

दोनों क्लास में बैठ गईं। 





" तुम दोनों शादी कब कर रहे हो, मुझे तेरी शादी में मजे करना है।"







" सब्र रख अगले महीने में ओके।"







"वाओ...... यस लेट्स एंजॉय।"







छुट्टी की घंटी बजी और दोनों बाहर की ओर जाने लगी तभी दिव्या एक लड़के से धोखे से टकराकर गिर गई उसकी सारी बुक्स गिर कर बिखर गई। 

उसने उठकर देखा तो सामने उसी का क्लासमेट अर्नव था। 

दिव्या गुस्से से पागल हो चुकी थी उसने अर्नव के गाल पर एक थप्पड़ मार दिया। 





" अंधे हो दिखता नहीं है हाँ!" 





"सॉरी यार।" 





"क्या सॉरी हां, मुझे सब पता है तुम जैसे लफ़ंगों की आदत जहां लड़की देखी बस हो गए शुरू लड़कियों को छेड़ते हुए शर्म नहीं आती तुम्हें, माँ बहन नहीं है तुम्हारे.... ।" 







"माँ बहन पर मत जाओ यार मैंने कहा ना यार गलती से टकरा गया था कसम से। सॉरी।"







" जानबूझकर काम करते हो और बोलते हो ग़लती हो गई। मैंने तुझे क्लास में भी नोटिस किया है तू वहाँ भी मुझे घूरता है! तू निकल यहां से अब ओके। "-दिव्या ने अर्नव को चेतावनी देते हुए कहा। 







"दिव्या यार तु पगला मत अब चल यहां से..। "-स्वेता दिव्या को खींचकर बाहर ले जाती है, जहाँ अविनाश उसका वेट कर रहा था। 

स्वेता ने अविनाश को सारी बात बता दी। 

अविनाश और दिव्या दोनों बाइक से अपने घर को निकल पड़े। 





" दिव्या इतना गुस्सा ठीक नहीं है, उससे गलती हो गई तो समझा देती, अगर नहीं समझता तो मुझसे बोलती ऎसे थप्पड़ क्यूँ मारा उसे।" 



"मेरा मूड ठीक नहीं है अभी घर जाकर बात करें।" 



"ओके जी।" 



"अवि,बाइक रोकना थोड़ा।" 



"क्या हुआ?" - अविनाश ने हैरान होते हुए कहा। 



"सामने जो लड़का खड़ा हैं न वो कल मुझपर गंदे कमेंट कर रहा था और मुझे छेड़ा भी इसने। "-दिव्या ने हितेश की ओर इशारा करते हुए कहा। 





"अच्छा! रुको अभी समझाता हूँ, इसकी माँ की....... ।"-अविनाश गुस्से से हितेश की ओर बढ़ा। 



अविनाश ने हितेश के पास जाकर उसने चार पांच थप्पड़ जड़ दिए। 





"तूने कल उस लड़की को छेड़ा, हां! वो मेरी होने वाली पत्नी है। आज के बाद ध्यान रखना अगर उसकी तरफ आँख उठाकर भी देखा न तो समझ लेना आँखे निकाल लूँगा। "





अविनाश ने हितेश मे एक और थप्पड़ मारा जिससे वो जमीन पर गिर पड़ा। 

अविनाश दिव्या को लेकर वहां से चला गया। हीतेश जमीन पर अपने गाल पर हाथ रखे हुए अभी तक उन दोनों को घूरे जा रहा था। 





दूसरे दिन... 



स्वेता और दिव्या कॉलेज के पार्क में बैठी थी कि तभी दिव्या की नजर कॉलेज के बाहर सड़क पर पड़ी जहां पर हितेश कुछ लड़कों के साथ खड़े होकर कॉलेज के लड़कों और लड़कियों से कुछ पूछ रहा था। 



"स्वेता उधर देख वो लड़का कौन है?" 



"कहां?, अच्छा वो हीतेश है। उसे कौन नहीं जानता। वह हिटर के नाम से फेमस हैं।" 



"पता है इसने परसों मुझे छेड़ा था।"

 

"क्या?, तूने कुछ किया तो नहीं न!" 



"नहीं ।" 



"थैंक गॉड उसका यही काम है लड़कियों को छेड़ना। और हां तेरी जैसी हॉट और ब्यूटीफूल लड़की को देखकर कोई भी छेड़ देगा। "



" आगे सुन न!"



" हां। "



" कल ये अकेला मुझे रास्ते में दिखा तो मैंने अविनाश को बोल दिया तो उन्होने इसकी खूब पिटाई की। "





" क्या? अब वो तुम दोनों को नहीं छोड़ेगा। शायद वो तुझे ही ढूंढ रहा है। मेरी बात मान तू निकल अभी और हाँ उस रास्ते से अब कभी मत जाना तुम दोनों। "



" क्यूँ यार। "



" अरे यार वो हिटर है मतलब डॉन यहां का उसके चाचा MLA है। वो मार देता है और लड़कियों का रैप भी कर देता है लेकिन आज तक उस पर कोई केस दर्ज कर नहीं हुआ। समझी न तु।"





दिव्या काफ़ी डर चुकी थी अब वो दूसरे रास्ते से घर जाने लगी। उसने अविनाश को कुछ नहीं बताया। 



कुछ दिनों बाद.... 



 दिव्या और स्वेता अपने एक्जाम देकर क्लास से बाहर निकली और अविनाश का इंतज़ार करने लगी। 

तभी दिव्या को पीछे से किसी ने छुआ तो दिव्या ने तुरंत मुड़कर देखा तो एक भिखारी का बच्चा था जो भीख मांग रहा था। 





"क्या है बेटा।" 



"दीदी पैसा देदो!" 



"पैसे का क्या करोगे आप।" 



"खाना खा लेंगे दीदी बहुत दिनों से भूखा हूँ।" - बच्चे ने दिव्या के पैर पकड़ लिए। 



"बस बस.... पैर छोड़ मेरे और चल मेरे साथ दुकान पर जो भी खाना हो पेट भरके खिलाउंगी।" 



" दिव्या क्या कर रही है तू, इनका यही रोज का काम है। छोड़ इसे यही और चल।" 



"नहीं यार आज मेरा एक्जाम बड़ीया गया है तो ये काम तो बनता है।" 



दिव्या उस लड़के को लेकर दुकान पर पहुंची और उसको भर पेट खाना खिलाया। 



तब तक अविनाश अपनी बाइक लेकर वहां पहुंच गया। 



"मुझे नहीं पता था कि तुम गुस्सैल के अलावा ये नेक काम भी करती हो। "



" अच्छा जी तो आज पता चल गया न आपको।"



" हाँ। "



" ओह! शिट। अविनाश तुरंत बाइक बेक लो प्लीज, क्विक।" 



"क्यूँ क्या हुआ बताओगी कुछ मुझे।" 



"पहले तुम जल्दी से बाइक दूसरे रास्ते पर लो।" 





बातों ही बातों में दोनों उस रास्ते पर पहुच गए थे जहाँ रास्ते में हितेश का घर पड़ता था। 

अविनाश बाइक को बेक करके चला ही था कि उसे बाइक रोकनी पड़ी। सामने हितेश कुछ लड़कों के साथ सामने सड़क पर खड़ा था सभी लड़कों के पास हॉकी और डंडे थे। 

अविनाश और दिव्या के लिए बहुत देर हो चुकी थी। दिव्या बहुत डर चुकी थी। 



"तुम यही रुकना मैं अभी आया।" 



"अकेले मत जाओ अविनाश वो लोग बहुत खराब है! प्लीज अविनाश ।" 



"रुको तो दिव्या बात तो करनी पड़ेगी न, कूल डाउन जस्ट रिलैक्स कुछ नहीं होगा अभी आता हूँ बात करके तुम यही रुकना ओके।" 



"बी केरफुल ओके अवि।" 



"हम्म्म्म...।" 



अविनाश हितेश के पास पहुंच जाता है। 



"क्या हुआ? तेरे को एक बार में समझ में नहीं आता क्या? "-अविनाश का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। 





" अबे! छोटे। देख साला मुझे, मेरे ही एरिया में फिर से धमका रहा है। "-हितेश बगल में खड़े अपने दोस्त से हँसते हुए कहा। 





"साला किसे बोला तू हां," - अविनाश ने हितेश की शर्ट की कॉलर पकड़ते हुए कहा। 



अविनाश कुछ और कुछ कहता तब तक पीछे से उसके सर पर एक लड़का डंडे से वार कर देता है। 





" अविनाशऽऽऽऽऽ........!"-यह देखकर दिव्या के मुँह से चीख निकल गई और वह अविनाश की ओर दौड़ पड़ी। 





" साले को फोड़ दो। बहुत हाथ फड़फड़ाते हैं इसके मारों साले को जब तक इसके होश ठिकाने न आ जाए।" - हितेश ने अपनी कॉलर को ठीक करते हुए गुस्से में कहा। 





अविनाश कुछ कर पाता तब तक उस पर ३,४ लड़कों ने उसको पीटना शुरू कर दिया। 



दिव्या सभी को रोते हुए रोकने की कोशिश करने लगी, मगर किसी ने भी नहीं सुनी। 





" रुक जाओ यारों, अब क्या बेचारे की जान लोगे क्या? इन मोहतरमा की भी सुन लो।" - हितेश ने सभी को रोकते हुए कहा। 





"प्लीज! माफ़ कर दो।" - दिव्या ने गिङगिङाते हुए कहा। 





"अरेऽऽऽरे जानेमन चाँद जैसे चेहरे पर आँसू अच्छे नहीं लगते।" - हितेश ने दिव्या के आंसू पोंछते हुए कहा। 





हितेश को झटका लगा तो उसने नीचे देखा कि उसका पैर अविनाश के हाथ में है। 

हितेश ने एक झटके से अपना पैर खींच लिया और एक लात अविनाश को मारी जिससे अविनाश गिर गया। 



" और मारो साले को, इतना मारो की सारी अकड़ निकल जाए।" 





"नहीं ऽऽऽऽऽ.... ।प्लीज।" - दिव्या अविनाश की ओर दौड़ी। 





"तुम कहाँ जा रही हो जान। इधर आओ न मेरी बाहों में। उसे मरने दो।" - हितेश ने दिव्या की बाँह पकड़ कर अपनी ओर खींचते हुए बोला। 





"छोड़ो मुझे।" - दिव्या खुद को हितेश से छुड़ाने की कोशिश करने लगी। 





"मेरी तो सुन पहले, बस एक दिन के लिए मेरे साथ चल , फिर तु जो चाहेगी वो मिलेगा। अविनाश को भी माफ़ कर दूँगा कसम से। "-हितेश ने दिव्या की कमर को अपने हांथों में कसते हुए कहा। 







"तूने अपनी शक्ल देखी है कभी आईने में, कुत्ते जैसी है और ख्वाब मेरे देख रहा है। तेरे जैसी शक्ल पर मैं थूंकूं भी न थू.... ।"-इतना कहते हुए दिव्या ने हितेश के मुंह पर थूक दिया। और अविनाश की ओर देखा वो बेसुध हो गया था। 

जैसे ही हितेश ने अपना चेहरा साफ़ किया तभी दिव्या ने एक थप्पड़ मारा जिससे हितेश गिर पड़ा और वो अपनी इन्सल्ट देख कर लाल पीला हो गया। 







" तेरी तो मैं, रुक! दोस्तों इस साली को पकड़ो। इसे अपनी सूरत पर ज्यादा ही गुरूर है। अभी बताता हूँ।" - हितेश दौड़कर अपनी कार की ओर गया। 



दिव्या को लड़कों ने पकड़ लिया और हितेश बापस आया तो उसके हाथ में एक बॉटल थी, जिसमें तेज़ाब था। उसने दिव्या के चेहरे पर तेजाब डाल दिया। और अपने दोस्तों के साथ वहां से फरार हो गया। 

दिव्या का चेहरा तेजाब के हमले से बुरी तरह जल चुका था। 

वह दर्द से तड़पती रही और हेल्प के लिए चिल्लाती रही मगर वहां खड़ी भीड़ में से कोई भी नहीं आया और न ही किसी ने पुलिस को सूचना दी। 



कुछ देर में दिव्या भी बेहोश हो कर अविनाश के पास गिर पड़ी। 



कुछ ही देर में वहां पुलिस पहुंच गई। पुलिस को लेकर दिव्या की फ्रेंड श्वेता आई थी। 

दिव्या और अविनाश को अंबुलेंस में सिटी हॉस्पिटल में रैफर कर दिया। 

             पुलिस के द्वारा की गई पूछताछ में वहां खड़ी भीड़ में से किसी ने भी हितेश का नाम नहीं लिया। इसका कारण हितेश का भय था। 

     पुलिस ने अपरचित लोगों के नाम से FIR दर्ज कर ली और दिव्या, अविनाश के होश में आने का इंतजार करने लगी। 





अविनाश को २ दिन बाद होश आ गया, लेकिन दिव्या की हालत अभी भी गंभीर बनी हुई थी। 





"डॉक्टर, कैसी है? मेरी बेटी।" - दिव्या की माँ ने पूछा। 





"दिव्या की हालत बहुत ही नाजुक है, उसका चेहरा ८०%जल चुका है और हाथ भी। उसे ICU में रखा गया है, दो या तीन दिन में होश आने की संभावना है।" 





१५ दिन बाद दिव्या को हॉस्पिटल से डिस्चार्ज कर दिया गया। अब वह ठीक थी। 

         दिव्या को रेस्ट करने के लिए कहा गया। दिव्या के साथ स्वेता और उसकी मां थी। दिव्या का चेहरा पट्टियों से अभी तक ढंका हुआ था। दिव्या ने स्वेता से चेहरे से पट्टियाँ हटाने को कहा, तो स्वेता ने मना किया तो दिव्या को कुछ अजीब सा लगा और वह खुद खड़ी होकर आईना के सामने जाकर अपनी पट्टियाँ हटाने लगी अंत में जब उसने चेहरा देखा तो वह अपने चेहरे को दोनों हाथों से ढंककर बेहताशा रोने लगी। क्योंकि उसका चेहरा बेहद बदसूरत और विकृत हो चुका था। 

        स्वेता ने उसे गले लगा लिया और उसे चुप करने लगी। 





दिव्या ने अविनाश को कॉल किया, लेकिन अविनाश ने कोई रिस्पॉन्स नहीं दिया। उसकी माँ और स्वेता ने उसे रोका पर दिव्या फिर भी नहीं मानी। उसे अपने अविनाश पर पूरा भरोसा था। क्योंकि अविनाश उसे बहुत प्यार करता था। 





दिव्या के २१ - २२ बार कॉल करने के बाद अविनाश ने फ़ोन उठाया। 



"हैलो! बोलो दिव्या।" 



"तुम कहाँ थे, कितनी देर से कॉल ट्राइ कर रही हूँ, मैं।" 





"वो एक्चुअली मैं बिजी था।" 





"तुम मुझे देखने नहीं आए हां, इग्नोर भी कर रहे हो, मुझे पता है सब तुम ये सब क्यूँ कर रहे हो? तुम जानते हो कि मैं आज भी तुमसे प्यार करती हूं। मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाऊँगी। - इतना कहते ही दिव्या फूट फूट के रो पड़ी। 





"दिव्या रो मत, प्लीज मेरी बात सुनो पहले।" 



"हाँ बोलो, क्या तुम अब प्यार नहीं करते?" 



"सुनो तो यार पहले। तुम सब जानती ही हो और मेरे मॉम डेड ने तुम्हें हॉस्पिटल में देख लिया है और मैंने भी तो अब ........ ।" 





"तो अब क्या बोलो न.... ।" - दिव्या अभी तक रोए जा रही थी। 





"सॉरी यार मेरी सगाई और कहीं हो गई है। अब मैं तुमसे शादी नहीं कर सकता।"





" प्लीज ऎसा न कहो अवि,आई लव यू सो मच ... मैं तुम्हारे बिना कैसे जीउंगी।"





" सॉरी यार मैं अपने पैरेंट्स के फैसले के खिलाफ नहीं जा सकता, अब फोन मत करना मुझे प्लीज।" 





"रुको, मैं अभी तुम्हारे घर आ रही हूँ। "





" व्हाट पागल हो क्या पहले मेरी बात सुनो! दिव्या मेरे घर मत आना.... हैलो.. हेलो... सिट ।"-अविनाश अपनी पूरी बात कह पाता तब तक दिव्या फोन रख चुकी थी। 



          दिव्या ने स्वेता के साथ के साथ अविनाश के घर पहुंच गई। 





" अंकल, अविनाश कहाँ है?"





"यहाँ क्यूँ आई हो दिव्या, मैंने मना किया था फिर भी ये क्या पगालपन है हां।"





" ऎसा कैसे कर सकते हो अविनाश तुम। तुम मेरे लिए अपने पैरेंट्स के फैसले के खिलाफ गए थे न अब क्या हुआ।" - दिव्या की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे। 





"मुझे कुछ नहीं सुनना प्लीज, दिव्या यहां कोई तमाशा मत करो। चली जाओ यहां से।"





" क्यूँ चली जाऊँ अवि... तुमने मुझसे प्यार किया और मैं भी तुमसे बेइंतहा प्यार करती हूं।"-दिव्या ने अविनाश की आँखो में आँखे डालकर कहा। 



"तिल का ताड़ मत बनाओ ओके, प्यार करता था, मगर अब नहीं करता। अपनी मर्जी से चली जाओ बरना... "





" बरना क्या अवि धक्के देकर निकालोगे हाँ, वो प्यार की कसमें, वादे सब झूठे थे न बोलो।"





" हाँ, क्योंकि तुम वो दिव्या नहीं हो, ये तुम भलीभांति जानती हो, जाओ यहाँ से बाहर लोग खड़े हैं, प्लीज मेरी तौहीन मत कराओ।"-इतने कहकर अविनाश अंदर के लिए मुड़ा तो दिव्या ने उसके पैर पकड़ लिए। 



" प्लीज अवि मैं तुम्हारे हाथ जोड़ती हूँ, मुझे यूँ अकेला मत छोड़ो, मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगी! "-इतना कहते ही दिव्या अपना सर जमीन पर रखकर बिलख बिलख कर रो पड़ी। 





"ये क्या ड्रामा है, बहुत ही बदतमीज हो, हाँ। एक बार मैं सुनाई नहीं देती तुमको। एक हद होती है यार। ये कोई जबरदस्ती थोड़े ही है, अपना फेस देखा है तुमने, आईना में। तुम ऎसे नहीं मानोगी चलो तो.... ।"-अविनाश ने गुस्से में रोती हुई दिव्या का हाथ पकड़ा और उसे खींच कर अपने गेट के बाहर धकेल दिया। 

       

             दिव्या अचेत सी जमीन पर पड़ी अविनाश के लिए रोती रही अविनाश ने एक भी बार उसकी तरफ नहीं देखा और गुस्से में अपने गेट बंद कर लिए। 

दिव्या के आसपास कई लोग इक्कठे हो गए। स्वेता दिव्या को समझाने की कोशिश करती रही, पर दिव्या पर जैसे कोई असर ही नहीं पड़ा। 





दिव्या पड़ी बस अविनाश के गेट की ओर देखे और रोए जा रही थी। उसकी आँखो से अश्रु धारा उसके जले हुए हांथों के निशानों पर गिर रहे थे, जो उसे तेजाब से भी ज्यादा कष्टकारी महसूस हो रहे थे, आज उसके प्यार ने उसे धोखा दे दिया था, जिसे वो जान से भी ज्यादा चाहती थी। उसके बिना जैसे उसके जीवन का कोई वजूद ही नहीं रहा। उसे उसके प्रेमी ने ठुकरा दिया। जिसके लिए उसने अपनी सुंदरता कुरवाँ कर दी थी। अब कौन उसे सहारा देगा। 



        कुछ समय बाद भीड़ वहां से चली गई उसी भीड़ में से एक युवक आगे अहिस्ता आहिस्ता दिव्या की ओर बड़ा दिव्या अभी तक अविनाश के गेट पर टकटकी लगाए बैठी थी, उसके सारे कपड़े मिट्टी से गंदे हो गए थे। स्वेता उस युवक को गौर से देख रही थी। वो कुछ कहती तब तक उस युवक ने दिव्या के सामने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा कि - "मुझे पहचाना, मैं अर्नव।" 



दिव्या ने ऊपर नजर उठकार देखा तो उसका क्लासमैट अर्नव खड़ा उसको देख रहा है, उसकी आँखों में भी आंसू छलक रहे थे। 



"क्या तुम मेरी हमसफर बनोगी।" 



दिव्या ने अपना चेहरा एक तरफ़ अपने हांथों पर रखकर करके रोने लगी। 



"चले जाओ यहां से क्यूँ आए हो यहाँ?, उस दिन के लिए सॉरी, वो मेरी ही गलती थी प्लीज जाओ यहां से"-दिव्या ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा। 



अर्नव घुटनों के बल बैठ गया और दिव्या के कंधों को पकड़ कर अपनी ओर मोड़ कर कहा - "बस एक बार मुड़कर मेरी आँखो में देखो। मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं, प्लीज अब मुझसे तुम्हारी और तक़लीफ बर्दास्त नहीं होती।" 





"ऎसा वो भी बोलता था, तुम सब लड़के एक जैसे होते हो, तुम भी मुझे अविनाश की तरह अकेला तो नहीं छोड़ दोगे एक दिन।" 





"कभी नहीं, तुम मेरा प्यार हो, हर मोड़ पर और हर सिचुएशन में, मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूँगा, वादा करता हूं।"







" आईम! रियली सॉरी।"-इतना कहते हुए दिव्या अर्नव से लिपट कर रो पड़ी। आज चाहत ने उसे किस मुकाम पर लाकर खड़ा कर दिया था जिसे वो अपना समझ रही थी उसी ने उसकी चाहत फीलिंग्स का ख्याल न रखा और उसे दर दर भटकने के लिए अकेला और बेसहारा छोड़ दिया। और जो बेगाना था उसी ने इश्क़ के इन्तेहां में उसका हाथ थाम लिया। 



       इस नजारे को देख कर वहां पर खड़े बचे लोग और स्वेता अपनी आंखों से आंसू नहीं रोक पाए। 







२५ साल बाद ..... 





"उमेश जी!" 





"जी, मेम।" - उमेश ने कैबिन का गेट खोलते हुए कहा। 



"जरा आप! नीचे बैठे कंडीटेड, जो इंटरव्यू के लिए आए हैं। उन में से उस ब्लैक सूट बाले को भेज दो।" - विंडो ग्लास से नीचे बैठे इंटरव्यू देने आय लोगों को देखते हुए कंपनी की ओनर बोली। 





"मे आई कम इन मेम।"





"आइए, अविनाश जी, प्लीज हैव ए सीट।" 





"मेम, आप मेरा नाम कैसे जानती हो?"-अविनाश ने आश्चर्य से पूछा। 



" इससे और वैसे भी आपको कौन नहीं जानता, आप तो इस शहर के नामी बिज़नस मैन के बेटे हो। और माइ सेल्फ दिव्या सिंह माथुर।" - दिव्या ने डॉक्युमेंट दिखाते हुए कहा। 



अविनाश को नाम और आवाज पहचानी सी लगी, मगर सामने कोई और ही लड़की बैठी थी, बहुत ही खूबसूरत। 



" पहचाना मुझे!" 





" नहीं, सॉरी मेम।" 



"ओके, तो बतायीये। जॉब क्यूँ करना चाहते हो और इसी कंपनी में ही क्यूँ?"



" मेम वो मैं खुद के लिए, जॉब करना चाहता हूं, ताकि मैं खुद पर निर्भर रह सकूं और इस शहर में आपकी कंपनी ही फेमस है।" 





"मैडम अगर इजाजत हो तो अंदर आ जाऊँ? अरे! अविनाश तुम यहाँ कैसे?"-अर्नव ने अविनाश से पूछा। 



अविनाश भौचक्का रह गया। उसे सब माजरा समझ में आ गया। 



" तुम दिव्या हो? ऎसा कैसे हो सकता है? "-इतना कहते ही अविनाश चेयर से खड़ा हो गया। 





" हाँ, मैं वही दिव्या हूँ, जिसे तुमने धक्का मारकर बाहर कर दिया था, अकेला और बेसहारा, ये देखो।" - दिव्या ने अपने हाथ पर जले का निशान बताते हुए कहा। 





"पर तुम्हारा चेहरा तो..... ।"





" वो सब मेरे प्यार, मेरे हसबैंड अर्नव ने दिया है।आज मैं जो भी हूँ, वो सब अर्नव की वजह से हूँ, इन्होने ही अपना सब कुछ दाँव पर लगाकर मुझे नयी जिंदगी दी है।" 



"वो क्या है न यार, शादी के बाद मैंने दिव्या की फेस सर्जरी कराई थी कनाडा में, उसके बाद दिव्या ने अपनी मेहनत से मेरी जिंदगी जन्नत बना दी उसी की मेहनत का नतीजा है कि करोड़ों-अरबों की कंपनी के मालिक हैं हम दोनों।"-अर्नव ने दिव्या का माथा चूमते हुए गले लगा लिया। 





अविनाश के पैरों तले जमीन ही खिसक गई वो बुत बना खड़ा रह गया। 



" तुम्हारा क्या हुआ अवि... ।" 





" बोलो अवि, तुम्हारा तो पापा का बिज़नस था और शादी भी हो गई थी।"





" पापा की मौत के बाद मेरा बिज़नस डूब गया, मैं बर्बाद हो गया, मेरा इस दुनिया में कोई भी नहीं रहा और मेरा डिवोर्स हो गया और आधी प्रॉपर्टी मेरी बीवी ले गई। मुझे माफ़ कर दो दिव्या।" - अविनाश का दर्द उसके आंसुओं में छलक पड़ा। वह दिव्या के सामने घुटनों के बल बैठ गया और हाथ जोड़ कर फूट फूट कर रो पड़ा।





" क्या किया तुमने, जो माफ़ी मांग रहे हो, तुमने तो मुझे प्यार का सही मतलब सिखाया था, कि लोग कितने मतलबी हैं, आज कल प्यार केवल जिस्म की सुंदरता देखकर किया जाता है। तुमने भी मुझे मेरे बदसूरत चेहरे की वजह से ठुकरा दिया था, तुम सिर्फ़ मेरी खूबसूरती से प्यार करते थे बस, लेकिन मैंने तुम्हें बहुत प्यार किया। मेरा ही कसूर था जो तुमसे प्यार कर बैठी और प्यार की भीख मांगने तुम्हारे दरवाजे पर चली गई।"-दिव्या इतना कहते हुए रो पड़ी। 



" मुझे माफ़ कर दो प्लीज।"-अविनाश हाथ जोड़े रोय जा रहा था। 



दिव्या आँसू पोंछते हुए खिड़की से बाहर की ओर देखने लगी। 





अर्नव ने अविनाश को उठाया और उसे अपनी कंपनी में जॉब दिलाने का आश्वासन दिया। 

     

                     🥀समाप्त 🥀



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