सड़कछाप - 16

सड़कछाप

(16)

अमर बहुत व्यथित था कि कुत्ता उसका भाई औऱ कुत्ते का मल साफ करना उसका रोजगार। कल का सपना बहुत सुहा सुहाना था, सर, लेखक, लड़की जैसी नियामतें उसकी जिंदगी में दस्तक दे रही थीं मगर आज की वास्तविक जिंदगी बहुत बदरंग और बदबूदार। वो उच्च ब्राह्मण कुल में पैदा हुआ और आज उसे रोजगार में क्या करना पड़ा?अमर सर से लेकर अमर नौकर तक का गोल घेरे का सफर ज़िन्दगी ने महज कुछ ही घंटों में तय कर लिया था। वो हालात पर बड़ी सावधानी से विचार करने लगा। पिछली बार की गल्तियां उसे हर्गिज़ नहीं दोहरानी थी जैसे कि अपनी दिल्ली की हाड़ तोड़ कमाई को उसने अपने गांव के मकान में लगाया था मकान मालिक और दूल्हा बनने के लिये। लेकिन ना तो वो गांव में मालिक बन सका, ना दूल्हा और अपनी जमा पूंजी भी गंवा बैठा था और जान के लाले पड़े सो अलग से।

उसे याद आया कैसा होगा उसका गांव, कैसा होगा उसका बिना छत का मकान। दीवारें बची होंगी या हनुमन्त चाचा ने उसे पुलिस से उलझवा दिया होगा। या शायद रामजस दादा वो ईंट बेचकर गांजा पी गये होंगे। दादा, चाचा, चाची, भाई-बहन कैसे होंगे, किस हाल में होंगे?मैं उनके रास्ते का कांटा यहां चला आया तो उनके कलेजे को ठंडक पहुंची होगी। मेरी माँ वो भी तो शायद बाद में मुझसे मिलने आयी थी गांव मे। उसकी माँ को एक बच्चा और पैदा हुआ था शायद। अब दो और लड़के होंगे उसकी माँ के। अब उसका सौतेला भाई छह-सात साल का हो चुका होगा। कैसा दिखता होगा उसकी माँ का लड़का उसके जैसे साफ रंग का होगा या काले तिवारी जैसा काला-काला। नहीं जैसे मैं अपने बाप जैसा दिखता हूँ वो भी अपने बाप जैसा ही दिखता होगा। उसके खेतों की फसल के पैसे छंगा बनिया ने किसको दिये होंगे रामजस दादा को या चाचा को। और इतने सालों में कुल कितनी फसल हुई होगी। गांव उसके बारे में क्या सोच रहा होगा कि वो लौटेगा या नहीं। उसकी हाई स्कूल की मार्कशीट कौन लाया होगा?क्या नन्हे सिंह अब भी पैसा लेकर इंटर पास करा देंगे?थाने पर क्या वही सिपाही और एसओ होंगे या बदल गये होंगे। उसके नाना-नानी ज़िंदा भी होंगे या नहीं, कौन-कौन सी मौसी और मौसा नाना के घर रहते होंगें। नाना की धन-संपत्ति किसके नाम हुई होगी, ऐसे ही तमाम होनी और अनहोनी के विचार बड़ी देर तक उसको मथते रहे।

लेकिन अचानक उसके विचारों ने पलटी मारी’उसी गांव ने उसके पिता की जान ली उसकी माँ को छीना, कितने लोग उसके मरने की आस लगाए बैठे हैं गांव में कि वो मरे तो कुछ धन-सम्पत्ति हाथ में आये। ननिहाल में मौसा-मौसी की नज़र का वो कांटा है वो भी ज़ोचते होंगे कि अमरेश मरे तो उनका हिस्सा बढ़ जाए। नाना को भी तो उससे अगर प्रेम होता तो कुछ धन-संपत्ति उसके नाम कर देते, नहीं नहीं वो गांव के बारे में ना सोचेगा और ना ही गांव जायेगा। वैसे भी सबका मनचाहा हो चुका है अमरेश तो मर ही चुका है अब मैं अमर हूँ। दिल्ली में परेशानियां तो हैं मगर कोई कम से कम उसके मरने की उम्मीद पाले तो नहीं बैठा है इसलिए जो भी राह निकलेगी वो दिल्ली से ही निकलेगी। “

वो कई दिनों तक बतरा के घर नहीं गया। एक दिन उसने भल्ला को फोन किया और कहा”नमस्ते सर, विमोचन कब है, मैं भी अमरनाथ की तरह शहीद हो जाऊंगा तब आपको दूसरा अमर खोजना पड़ेगा”

भल्ला ने हँसते हुए कहा”ओय नहीं पुत्तर, तू नहीं मरेगा तू अमर रहेगा। सुन आज मंगल है, शुक्रवार को हिंदी प्राचीर के कम्यूनिटी सेंटर पहुंच जइयो तीन बजे। और हां कुर्ता, पायजामा और नेहरू कट पहन के आना और जूता पंप या नागरा ही हो। एक दम टिंच होकर आना पेपर वाले भी आएंगे, फ़ोटो निकालेंगे। “

अमर ये सुनकर पुलकित हो गया वो हुलसते हुए बोला”, जी सर, याद रखूंगा आपकी पूरी बात। नमस्ते”।

भल्ला ने जो वक्त दिया था उस दरम्यान वो कवितायें रटता रहा, कुर्ता-पायजामा धोकर प्रेस करवाया। नेहरू कट भी प्रेस करवाया और नागरा के जूतों पर पालिश लगाकर उन्हें चमकदार बनाकर रख दिया। बढ़िया सेंट का भी इंतजाम किया उसने। तीन दिनों में उसने दो बार अपने चेहरे का मसाज कराया और शुक्रवार को भल्ला के बताये वक्त पर हिंदी प्राचीर पहुंच गया।

भल्ला ने उसके हुलिये को देखकर संतोष व्यक्त किया और समझाया”तुम ज्यादा वक्त चुप ही रहना, मुस्कराते रहना, धन्यवाद देते रहना और जो बात समझ में ना आये उस पर आगे बढ़ जाना। तुम्हारा लेखन, जीवन-मरण सब किताब में ही है जो भी कोई पर्सनल या लेखन पर पूछे उसे बताना कि किताब में सब डिटेल में है। इससे तुम पकड़े भी नहीं जाओगे कि ये किताब तुमने लिखी है। किताब बिकेगी तो तुम्हे नाम, पैसा सब इफरात में मिलेगा। समझ गया ना”।

“जी सर, कहते हुए अमर ने भल्ला को सहमति दी। चुप्पी और आँसू ये अमर के बड़े कारगर हथियार रहें हैं अतीत में। लेकिन चेहरे पर जब घनी दाढ़ी-मूंछ आ जाये तब रोना ठीक नहीं लगता मगर चुप्पी एक स्थायी और कारगर हथियार तो है ही जीवन के इस सफर में। चुप रहना, तटस्थ रहना और सब कुछ जानते-बुझते हुए ना जान पाने का अभिनय करना दिल्ली में कामयाबी का नुस्खा माना जाता है। दिलवालों की दिल्ली अब संगदिल लोगों से भरी पड़ी थी जहाँ हर दाग को सफेदी के उजाले से ढका जाता है।

दाग ढकने का रिवाज था सो दाग ढके जा रहे थे। जिस चारित्रिक शुचिता को छिन्न-भिन्न करके वाद के जामा हिंदी मीडिया और साहित्य को पहनाया जा रहा था उन्ही दागों और चरित्र के परखच्चों को इस समय का अंग्रेज़ी मीडिया’ दाग अच्छे हैं’कहकर बढ़ा-चढ़ा कर प्रचारित कर रहा था और नजफगढ़ के वीरेंद्र सहवाग दुनिया भर के गेंदबाजों के लिये बुरा सपना बन चुके थे। दागदार दिल्ली के अंग्रेज़ीदां इलीट क्लास की नजर हिंदी के विशाल बाज़ार पर थी सो उन्होंने हिंदी वालों को सफेदी का पैबंद लगाने के बजाय दागों पर गर्व करने की आदत और शउर सिखाना शुरू कर दिया था। उसी अंग्रेज़ीदां की एक उतरन टाइप पुस्तक का लोकार्पण हिंदी की ग्यारह पुस्तकों के लोकार्पण के साथ होना था।

पहले अंग्रेज़ी की पुस्तकों का लोकार्पण हुआ, अंग्रेजी में भाषण हुआ जिसमें हिंदी वालों ने अंग्रेज़ी वालों को तालियां बजाते देखकर तालियां बजाई। पूरे भाषण के दौरान अमर, निशा से थोड़ी दूरी पर बैठा रहा। दोनों एक दूसरे को कनखियों से देख रहे थे मगर जब नजरें मिलतीं तो झेंप जाते। अंग्रेज़ी पुस्तकों के लोकार्पण में हिंदी वालों को इसलिये बुलाया गया था क्योंकि अव्वल तो हिंदी वालों की भीड़ जुटाना आसान था जो कि अगले दिन के पीआर मैनेजमेंट के हिसाब से बहुत ज़रूरी था। दूसरे हिंदी प्राचीर की ये इमारत दिल्ली के तमाम प्रेस क्लबों के मुकाबले खासी सस्ती थी। अंग्रेज़ी की पुस्तकों के बाद सबके लिये तरल-गरल का इंतजाम करने की रवायत थी जो कि काफी महंगा शगल था जबकि हिंदी प्राचीर में लोग चाय-समोसे पर ही टूट पड़ते और उसी को पाकर निहाल हो जाते थे। बड़ी देर तक अंग्रेज़ी की पुस्तक पर भाषण चलता रहा और चाय-पानी के दौरान ही हिंदी की ग्यारह पुस्तकों का लोकार्पण भी शुरू हो गया। अमन देहलवी नाम के शायर खड़े हुए उनकी पुस्तक का लोकार्पण हुआ फिर तुरत-फुरत हिंदी की दस और पुस्तकों का भी लोकार्पण कर दिया गया। रचनाकार आते रहे, किताब पकड़कर फ़ोटो खिचवांते रहे लोकार्पण होता रहा।

उधर अंग्रेज़ी किताब के लेखकों और उसकी ईलीट क्लास को हिंदी के लेखकों और साहित्यप्रेमियों के बीच घुसकर चाय-समोसा खाना अपनी तौहीन लगा सो वो लोग अपनी व्यस्तता का हवाला देकर तत्काल हाल से निकल लिये। बात दरसअल ये थी कि इस पूरे लोकार्पण के बाद सभी लेखकों की एक ग्रुप फोटोग्राफी होनी थी यादगार के तौर पर। और अंग्रेज़ी के लेखकों को ये बात हर्गिज़ गवारा ना थी कि वे हिंदी के लेखकों के लोकार्पण की फोटो खिंचवाकर स्थायी तौर पर इन दीन-हीन लोगों के साथी और साक्षी बनें। उस इलीट क्लास अंग्रेज़ीदां लोगों को हिंदी के लेखकों और उसके संगी-साथियों की भीड़ की तो ज़रूरत थी अपने किताब के लोकार्पण के लिये मगर उनके साथ घुलना-मिलना पसंद नहीं था और उन्हें सुनना तो हर्गिज़ गवारा ना था।

अमर के साथ निशा की मुहावरों की पुस्तक का भी लोकार्पण हो गया। दोनों साथ-साथ लौटे। इस बार खुलकर बातें हुईं और चीजों को रामभरोसे नहीं छोड़ा गया। बाकायदा एक दूसरे से पते लिये गये और अगली मुलाकात की तजबीज की गयी। अमर ने अपनी किताब पर हस्ताक्षर करके निशा को उपहार दिया और निशा ने अपनी किताब पर दस्तखत करके अमर को तोहफा दिया। जगह मुक़र्र्रर हुई और एक दूसरे को मिलने की ताकीद की।

ये दिल्ली की जानलेवा बरसात का मौसम था, यमुना के तट पर लोगों की झुग्गियां डूब गयीं थी वो लोग सड़कों के किनारे पनाह लिये हुए थे। वैसे सड़कें तो धुली-धुली लग रही थीं और नालियां कीचड़ तथा जलभराव से बजबजा रही थीं। इस बार ना तो बतरा अमर को बुलाने आया और ना ही अमर बतरा से मिलने गया। अमर ने अब गीत-गजल की महफिलों में जाना शुरू कर दिया था और किताब की देखा-देखी प्रगतिशील कवितायें लिखना शुरू कर दिया। भल्ला ने उसे बताया था कि प्रगतिशील कविता नहीं होती है बल्कि प्रगतिशील कवि होता है । एक बार अगर किसी पर प्रगतिशील कवि होने के ठप्पा लग जाये तो फिर वो जो भी लिखे वो प्रगतिशील कविता ही होती है।

अमर जब-तब भल्ला से मिलने जाता। भल्ला उसे अपनी किताबों के वितरण में लगा देता। अमर के जरिये भल्ला के जितनी किताबों का वितरण होता उसके आधे पैसे भल्ला रख लेता था और आधे अमर को मिलते। भल्ला प्रकाशन में चौतरफा खेल करता था। लेखक से तीन सौ प्रतियां छापने का पैसा लेता और उसी फर्मे पर छह सौ किताबें छाप लेता। वो तीन सौ किताबें वो गोदाम में छिपा देता और लेखक की तीन सौ प्रतियों में से भी तीस किताबें ले लेता कि आलोचकों को भेजनी है ताकि किताब का प्रचार-प्रसार हो । लेखक अपनी अमरता की चाह और संभावित बिक्री की उम्मीद उसे किताबें सौंप देता था। भल्ला वो सारी किताबें बेच लेता था कुछ अपने बूते पर कुछ अमर के जरिये।

अमर को महत्व और इज़्ज़त चंहुओर मिल रही थी। भल्ला और साहित्यिक आयोजनों से कामचलाउ पैसे भी मिल रहे थे और अब प्रेम भी मिलना शुरु हो गया था जो उसके जैसे प्रेम से वंचित इंसान के लिये संजीवनी बूटी से कम ना था। निहाल विहार की सब्ज़ी मंडी में निशा अक्सर उससे मिला करती थी। वैसे तो निशा अक्सर अकेले ही अमर से मिला करती थी लेकिन एक दो बार वो अपनी माँ के साथ भी अमर से मिली थी। पहली बार जब करीब पैंतालीस के उम्र की एक महिला से अमर को निशा ने मिलवाते हुए कहा-

“इनसे मिलो अमर ये मेरी मम्मी हैं श्रीमती रेवती देवी”

अमर सकपका गया लेकिन उसने शांत स्वर में कहा”नमस्ते आंटी जी, ”।

रेवती हंसते हुए बोली”खुश रहो अमर, सुना है बहुत अच्छे लेखक हो और आदमी भी बहुत अच्छे हो, निशा हमेशा तुम्हारी और तुम्हारे कविताओं की तारीफ करती रहती है। “

अमर की घबराहट जाती रही उसने मुस्कराते हुए पूछा”कितना अच्छा आदमी हूँ मैं, निशा ने कैसे जान लिया। और आपने पढ़ी हैं मेरी कवितायें, क्या खासियत है उनमें”?

निशा ये सुनकर शर्मा गयी मगर रेवती हँस पड़ी उसने कहा”अमर मैं तो पढ़ी-लिखी नहीं हूं ज्यादा। बस नाम लिख लेती हूं और हिसाब-किताब जोड़ लेती हूँ तो कविता कहाँ से समझूँगी। रही तुम्हारी दूसरी बात तो लड़कियों-औरतों को ये बात बहुत जल्दी पता लगा लेने की शक्ति भगवान दिए हैं कि कौन कैसा है और क्या चाहता है। बस वो मुलाहिज़ा में बोलती नहीं हैं मगर जानती सब हैं। खैर किसी दिन घर आओ”।

“जी आंटी, ज़रूर”कहकर अमर ने उन दोनों से विदा ली।

चंद रोज बाद ही अमर के निशा के घर जाने की सूरत निकल आयी। जब निशा ने अपनी छोटी बहन उषा के जन्मदिन पर उसे निमंत्रित किया। अमर ने दो दिन बाद के मुकर्रर वक्त पर हाज़िर होने की हामी दे दी।

अमर ने रिवायत के मुताबिक एक मिठाई का डिब्बा और एक जन्मदिन का केक खरीदकर निहाल विहार के नाके पर निशा से मिला। निशा उसे तमाम टेढ़े-मेढ़े रास्तों से गुजारकर अपने घर ले गयी। अमर बड़ी सतर्कता से उन रास्तों को अपने दिमाग में मार्क करता रहा ताकि वो लौट भी सके आसानी से और कभी पहुँचना चाहे तो पहुँच भी सके, फिर सतर्कता तो दिल्ली का बाशिंदा होने की पहली शर्त है जिसे अमर ने अपने किरदार में पेवस्त कर लिया था।

निशा का घर बहुत छोटा था मगर दो तल्ले का था। उसकी माँ रेवती मिली तो अमर ने उसे अपने हाथ के डिब्बे पकड़ाते हुए कहा”नमस्ते आंटी जी, लीजिये आपकी शिकायत दूर कर दी”।

रेवती ने उसे हाथ के इशारे से चुप रहने को कहा और निशा से कहा”इन्हें ऊपर ले जाओ”।

निशा ने इशारे से अमर को अपने पीछे आने को कहा तो अमर उसके पीछे-पीछे ऊपर के तल्ले पर गया। ऊपर भी एक छोटा सा कमरा, उसी से एक तरफ सटा छोटा सा किचन और दूसरी तरफ बाथरूम। कमरा करीने से सजा हुआ था और मिजाज से जनानखाना लगता था। तब तक रेवती भी ऊपर आ गयी ! उसने कहा”निशा के पापा आज आये हैं, ये बहादुरगढ़ की एक फैक्ट्री में काम करते हैं। चौकीदार हैं मगर बरसों से एक फूटी कौड़ी नहीं देते घर पे। सब दारू में उड़ा देते हैं। हफ्ते-दस दिन में एक आध बार आते हैं। आज ना जाने कैसे आ गए। तुम लोग बैठो मैं उनके सही करके आती हूँ”।

अमर हैरान हुआ उसकी हैरानी देखकर निशा ने कहा”आपको ये सब अजीब लगता है ना। मेरे पापा का नाम रामनरेश है लेकिन ना तो वो राम हैं और ना नरेश। किराया भी हमीं लोगों से लेकर ये बहादुरगढ़ वापस जाएंगे। घर चलाने के लिये मम्मी टिफ़िन सर्विस चलाती हैं। दस-बारह मजदूर सुबह से लेकर दोपहर तक यहां नीचे खाना खाने आते हैं। दोपहर बाद तक रसोई और बर्तन की साफ-सफाई चलती रहती है। शाम से ही फिर रसोई चालू हो जाती है, कोई दिन ढले ही आ जाता है तो कोई देर रात तक आता है खाने। फिर अगर कोई आदमी मछली या मुर्गा ले आये तो मम्मी को उसे भी बनाकर खिलाना पड़ता है, पैसे के लिये वो भी बनाना पड़ता है जबकि मम्मी खाती नहीं है। पापा ही नहीं बल्कि मज़दूर कई बार दारू भी पीते हैं फिर आपस में मारपीट, गाली-गलौज भी करते हैं, मम्मी को भी गालियां देते हैं, उन्हें एक दो बार चोट भी लगा दिए। लेक़िन हम मज़दूरों को भगा नहीं सकते उन्हीं से हमारा घर चलता है। मम्मी बहुत कुछ सहती हैं नीचे लेकिन कभी भी उन्होंने हम दोनों बहनों को नीचे की दुनिया की आंच नहीं आने दी”ये कहते-कहते निशा के आंखों के कोर भीग गये।

आंख तो अमर की भी नम हो गयी निशा को रोते देख और उसकी जिंदगी का हाल सुनकर। उसने सोचा एक ये माँ है जो पूरी दुनिया से अकेले लड़ रही है अपनी औलाद की खातिर। दूसरी तरफ उसकी माँ है जो अपने फायदे की खातिर उसे पूरी दुनिया से लड़ने के लिये अकेला छोड़ गयी। अमर को विचारमग्न देखकर निशा ने कहा”सब मम्मी ही झेलती हैं। खिलाना-पिलाना हिसाब करना और वसूली करना हर मज़दूर के घर-घर जाकर। मुझे सिर्फ सब्ज़ी लाने भेजती हैं क्योंकि उस वक्त भी उनकी रसोई में कोई ना कोई मौजूद ही रहता है या कोई खाने के लिये आने वाला होता है”।

अमर की तन्मयता भंग हुई क्योंकि जीने पर किसी के आने की पदचाप उसने सुनी। अचानक उसके सामने सजी-धजी गोरी चिट्टी लड़की हाज़िर हुई जिसके बाल रेशमी थी। अमर ने उसको देखा तब तक निशा बोल पड़ी”ये मेरी छोटी बहन है उषा मुझसे सिर्फ ग्यारह महीने छोटी, आज इसी का जन्मदिन है”।

अमर ने मुस्कराते हुए कहा”हैप्पी बर्थ डे उषा, मैं अमर हूँ”

उषा ने हँसते हुए कहा”थैंक यू अमर जी, आप को कौन नहीं जानता । फिर निशा तो या तो सब्ज़ी की बात करेगी या आपकी। सो आपका नाम और मंडी की सब्ज़ी दोनों हमको रट गया है’ये कहते हुए उषा ठहाका लगाकर हंसी तो उसके मोतियों से दांत झिलमिला उठे।

उषा अमर का लाया हुआ केक और मिठाई का डिब्बा पाकर निहाल हो उठी। वो अमर से बहुत बेतकल्लुफ होकर मिली। अमर उसके रंग-रूप पर हैरान रह गया कि इस काली-कलूटी माँ-बेटी के बीच में ये गोरी लड़की कहाँ से आ गयी। उषा और अमर ने ऐसे चुहल की मानों वो जीजा-साली हों। पहली ही मुलाकात में उनके बीच की झिझक दूर हो गयी। उषा की तरफ से झिझक दूर होने की एक वजह ये थी कि अमर उसके बाप के अलावा पहला पुरुष था जो इस घर की दूसरी मंजिल तक आया था।

दोनों बहनें ऊपर की मंज़िल पर ही सोती थीं। दो तख्त जोड़कर बिस्तर लगाया गया था जिनमें रेवती अपनी बेटियों के साथ सोती थी। अगर कभी रामनरेश आ जाता था तो उस दिन रेवती नीचे अपने पति के साथ ही नीचे के कमरे में सोती थी। जिसकी दो वजह थी एक तो शारीरिक संसर्ग दूसरा रामनरेश पीने के बाद गाली बहुत बकता था जो कि रेवती के लिये असहनीय था कि उसकी जवान बेटियां इतनी गंदी गालियों की गवाही बनें। रामनरेश शराब पीने के बाद खूब तमाशा करता और रेवती को पूरी रात नोचता-खसोटता रहता।

उन्ही तख्तों के बिस्तर पर अखबार बिछा कर केक काटा गया और ‘हैप्पी बर्थ डे टू यू”भी गाया गया। उषा के लिये ये रोमांचकारी अनुभव था कि जिससे वो कभी मिली ही नहीं सिर्फ उसके बारे में बातें सुनी थी वो शख्स उसके लिये केक और मिठाई लाया है। पूरे माहौल में आकर्षण था। निशा निहाल थी कि एक प्रगतिशील कवि उसके जीवन में है और इस बात से उसके परिवार को कोई निषेध नहीं है। अमर दिल्ली में पहली बार किसी घरेलू फंक्शन में था और ये अनुभव उसके लिये अनूठा था। रेवती मुतमईन थी कि उसकी बेटी के जीवन में एक ऐसा पुरुष है जो उसके पति जैसा नहीं है।

रेवती को उसके पिता ने रामनरेश के पल्ले बांध दिया था जो दिखता तो रावण जैसा था मगर जेब से भिखारी था। लगभग भिखारी उसका पिता भी रहा जो छह बहनों और दो भाइयों के बीच उसकी हर जरूरत और इच्छा में खुद को असमर्थ बताता था और कहता कि “अपने सुख और अपनी ज़रूरतें अपने पति के घर जाकर पूरी करना, यहां कुछ भी नहीं मिलेगा”। पूरा अभावग्रस्त बचपन अभावग्रस्त, तन-पेट काटकर गुजरा कि शायद पति के घर मिले तो कुछ हालात सुधरें। लेकिन पति ऐसा मिला रेवती को, जो कि किसी स्त्री के लिये दुःस्वप्न से कम ना था। पिता के घर अभाव था लेकिन पति के घर जीवन नर्क से भी बदतर। जब तक कुछ समझ पाती तब तक ताबड़तोड़ दो लड़कियां गोद में। कमाई ढेला भर भी नहीं। वो बार-बार भागकर मॉयके जाती और अपने पिता से मिन्नतें करती उसे और उसकी बेटियों को मायके में रहने दें, हर बार टका सा जवाब “बेचे घोड़ का कोई साथी नहीं होता”। रेवती ये भी कहती कि ‘मेरी परवरिश ना करो, यहीं-कहीं मेहनत-मजदूरी करके पड़ी रहूंगी, वहाँ रहूंगी तो उसका नशेड़ी पति उसको बेच देगा या मार देगा”। लेकिन वही रटा-रटाया जवाब “बेटी मॉयके में रहकर मज़दूरी करे या मुस्तक़िल मॉयके में रहे तो बेइज़्ज़ती”। रेवती जान चुकी थी कि ये उसका कुरुक्षेत्र है और इस समर में वो अपने ही बल-बूते पर बच सकेगी। इज़्ज़त के दायरे में, घरेलू औरत की पहुँच में शायद ही कोई ऐसा रोजगार हो जो उसने ना किया हो। दिल्ली जो ज़िंदा गोश्त की शायद सबसे बड़ी मंडी हो और पति बेचने पर आमादा। वहाँ कैसे वो खुद और अपनी बेटियों को बचाकर इस दर तक पहुँची है ये बात या तो वो जानती थी या उसका ईश्वर।

  • रेवती की बेबसी अमर जैसी नहीं थी वो चाहकर भी खुदकुशी नहीं कर सकती थी क्योंकि उसके मरते ही रामनरेश अपने लालच में उसकी बेटियों को बेच डालता। कई बार उसने कल्पना भी की और हर कल्पना में सिहर-सिहर गयी कि वो अपनी बेटियों को मारकर खुद मर जाये। उसके दुर्भाग्य से उसकी बेटियां अपना जीवन क्यों खोयें, शायद उनके भाग्य में सुख बदा हो, वो हर हाल में उन्हें पाल-पोस कर जवान करेगी अगर वो कुछ बन भी ना पायीं तब भी यदि उन्हें सही जीवनसाथी मिल गया तो भी उनकी ज़िंदगी की तमाम समस्याएं सुलझ जाएंगी। अपने पिता के एक गलत निर्णय से रेवती ने अपने जीवन में इतने दुख उठाये थे कि उसने शुरू से ये तय कर रखा था कि वो अपनी बेटियों का जीवनसाथी चुनने का अधिकार खुद देगी, फिर जब निशा की ज़िंदगी में अमर की आमद शुरू हुई तो उसने निशा को ताकीद कर दिया था कि काफी ठोंक-बजाकर रॉय-मश्विरा करके ही किसी निर्णय पर पहुंचना। सो जिस उम्र में लड़कियां अपनी माँ से खौफ खाती हैं और सब कुछ छिपाती हैं, निशा हर बात ना सिर्फ़ माँ को बताती थी बल्कि मार्गदर्शन भी लेती थी। दोनों का रिश्ता तो माँ-बेटी जैसा था मगर व्यवहार सहेलियों जैसा था। निशा और उषा में कोई खास पर्देदारी तो ना थी मगर निशा इस बात को लेकर बहुत सजग रहती थी कि उसके किसी गलत चाल-चलन का छोटी बहन गलत अनुकरण ना करे। इसलिये वो उषा से स्नेह के बावजूद एक गरिमापूर्ण दूरी बनाये रखती थी । निशा इस बात का बहुत खास ख्याल रखती थी कि उषा को “क्या नहीं जानना है”। इसके अलावा निशा इतनी सजग और संतुलित रहती थी कि उसकी किसी गलती से उसकी माँ को कोई दुख ना हो क्योंकि वो जानती थी कि उसकी माँ ने जीवन में उसके लिये बहुत भयानक दुख उठाये हैं। इसलिये उसने अपनी बेटियों से शुरू में ही बता दिया था कि उन्हें उनके जीवनसाथी चुनने की पूरी छूट होगी । निर्णय की आज़ादी और पेट पालने की आत्मनिर्भरता दिल्ली में एक स्त्री के नजरिये से बहुत ज़रूरी होता है, क्योंकि उसका नशेड़ी पति हर छठे-छमाही रोजगार छोड़कर बैठ जाता था। पति निठल्ला घर में बैठा, घर में फांके चलते फिर उपवास होता। वो दूसरों के घरों में कामकाज करने जाती तो लोगों की निगाह उसके काम पर कम बल्कि जवानी पर ज्यादा रहती थी। उसे कोई हुनर आता नहीं था सो उसने खाना बनाना और खिलाना ही अपना हुनर मान लिया। इस बेदिल और भयावह दिल्ली में उसने इस तरह दिन काटे थे मानों पांडवों का अज्ञातवास हो।
  • रामनरेश जब घर पर होता तो मज़दूरों से उधारी लेकर नशा कर डालता और फिर उनसे गाली-गलौज और मारपीट करता था। अव्वल तो इससे ग्राहक बिदक जाते थे दूसरे उसकी ली हुई उधारी रेवती को खाना खिला-खिलाकर चुकानी पड़ती थी। बमुश्किल पिछले कुछ सालों से वो बहादुरगढ़ की नौकरी में टिका हुआ था रामनरेश। बन्द फैक्ट्री की चौकीदारी में नशा-नशेड़ियों की जमात लगाए रहता ना कोई रोक ना टोक। यही आज़ादी उसे वहां रोके रहती थी। रेवती के इरादों ने उसे कामयाब बनाया भले ही कम -कम। इसीलिए निशा एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही थी महज छह सौ की तनख्वाह में और उषा एक ब्यूटी पार्लर में काम भी सीख रही थी और थोड़ी बहुत कमाई भी कर रही थी। दिल्ली में कभी कोई एक रोजगार को पकड़कर नहीं बैठता सब ऊपर की कमाई के लिये हाथ-पांव मारते रहते हैं। इसलिये निशा छोटे बच्चों को घर पर ट्यूशन पढ़ाती थी और भल्ला जैसे प्रकाशकों के यहाँ छिट-पुट रोजगार भी कर लिया करती थी, और उषा अपनी व्यक्तिगत सेवाएं भी देती थी वो मोहल्ले में जिसे ज़रूरत होती उसके घर जाकर ब्यूटी पार्लर की सेवा दे आती, ये कमाई कभी-कभार मगर अच्छी हुआ करती थी।
  • उषा लोगों को सुंदर रखने का काम करती थी और खुद भी खासा बन संवर कर रहती थी। जबकि निशा के नयन-नक्श कुछ खास नहीं थे और उसके दांत भी थोड़ा आगे को निकले हुए थे। जैसा उसका रोजगार वैसा ही उसका रहन-सहन और पहनावा। उसमें कोई विशेष आकर्षण ना था मगर युवती होने की कशिश अवश्य थी जिसकी गन्ध ही पुरुषों को आकर्षित करने के लिये पर्याप्त थी।
  • उस रात हँसी-ठहाकों और खिलखिलाहटों के कई दौर उस घर में चले। इस घर ने इतनी प्रफुल्लता शायद ही कभी देखी हो। उषा ये बात जान चुकी थी कि भले ही अमर यहाँ निशा के बुलावे पर आया है लेकिन अब वो निशा के बजाय उसको ही ज्यादा देख रहा है। ये सब काफी देर तक चला तो निशा ने भी नोटिस किया औऱ थोड़ी सी असहज भी हुई। उसने खुद को समझाया कि ये उसके और अमर के बीच कोई मियां-बीवी का रिश्ता थोड़े ही है, गर्लफ्रेंड और बॉयफ्रेंड का रिश्ता बनने की शुरुआत भर है और दिल्ली में ऐसी शुरुआत का अंत होना बहुत आम बात थी। वास्तव में वो असहज तो थी मगर पहली मुलाकात में उसे उन दोनों की चुहल में शक-सुबहा की कोई ठोस वजह ना नजर आयी। क्योंकि उषा ने सिर्फ अमर के कपड़ों पर सेंट छिड़क दिया था और उसकी एवज में अमर ने उषा को एक पेन गिफ्ट कर दी, जो वास्तव में वो निशा को देने के लिये लाया था।
  • देर रात अमर उस घर से लौट तो आया मगर अपने साथ तमाम खुशगवार अरमान भी लाया था। वो रास्ते भर और कमरे पर पहुँच कर इत्र को रह-रहकर सूँघता रहा और वो अपनी शर्ट के उस हिस्से यानी बांह को बार -बार सहलाता रहा मानो वो निशा के शरीर को सहला रहा हो, उसकी कल्पना में चेहरा बदल गया, अब ये चेहरा उषा का था जिसके बदन को वो सहला रहा था। उषा-या निशा, निशा या उषा सब कुछ गड्डमगड्ड था। नैतिकता के तकाजों से असहज होकर उसने कल्पना में चेहरा देखना मुनासिब नहीं समझा और नारी शरीर को कल्पनाओं में सहलाकर खुद को गुदगुदाता रहा।

    कल तक जिस दिल्ली में उसे तिरस्कार, अपमान और परायापन कदम-कदम पर मिलता रहा था आज वहीं वो दो-दो महिलाओं के प्रेम से अभिसिंचित हुआ था। निशा ने पहले ही करीब-करीब प्रेम का इजहार कर दिया था और उषा ने आज प्रेम भरी नजरों से उसका इस्तकबाल किया था। रिश्ता अपुष्ट हो या पुस्ट लेकिन उन दोनों युवतियों की प्रेम भरी निगाहें बड़ी देर तक उसकी नजरों में घूमती रही थीं।

    मधुमास के दिन यूँ ही खुशगवार बीत रहे थे। बतरा ने सीमापुरी में अपना विधिवत क्लीनिक स्थापित कर लिया था। लेकिन तभी उसके क्लीनिक में चोरी हो गयी। कप्यूटर और मेडिकल का बहुत सा सामान चोरी हो गया। चोरी के बाद से ही बतरा का सहायक भी गायब हो गया जो मध्यप्रदेश के इटारसी का रहने वाला था। बतरा ने पुलिस में रिपोर्ट की, काफी दौड़-धूप की लेकिन ना ही माल मिला और ना चोर। क्लीनिक तो उसे चलाना ही था क्योंकि सीमापुरी में भारी भीड़ होती थी। बतरा को एक वफादार व्यक्ति की ज़रूरत थी भले ही वो व्यक्ति अनपढ़ क्यों ना हो।

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    Dilip Bhappa 9 महीना पहले

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    Annu 10 महीना पहले

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    Dolly Parihar 10 महीना पहले

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    Manpreet Bhangu 10 महीना पहले

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    Monica Sharma 10 महीना पहले

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