सड़कछाप - 15 New

सड़कछाप

(15)

अमरेश ने नींव की खुदाई शुरू कराके अपने नाना की शरण ली। उनसे पांच हजार की मदद मांगी और ये भी कहा कि ये मदद नहीं बल्कि उधार होगा और हालात माफिक होते ही वो इस रकम को लौटा देगा। उसकी मौसियों, मौसों के प्रखर विरोध के बावजूद लोकपाल तिवारी ने साहस करते हुए सबके सामने उसे दो हजार और अकेले में पांच सौ रुपये देते हुए कहा”इसे लौटाने की जरूरत नहीं है, जाओ अपना काम बनाओ, विजयी भव बेटा”। ज़िन्दगी पल-पल रंग बदल रही थी कल तक जिस नाना को लेकर उसके मन में तमाम कड़वाहट थी अब वही उसको एक बेबस बुजुर्ग नजर आने लगे। सत्यनारायण की पूजा करके उसने नींव पर ईंट जोड़कर घर के काम का श्रीगणेश कर दिया।

गांव बड़ी सावधानी से उसे देख रहा था और अचंभित था। लोग उसकी जिजीविषा पर मंत्रमुग्ध थे कि जिस उम्र में लड़के को ठीक से दाढ़ी तक नहीं उगी है उस उम्र में ये लड़का मकान बनवाने की बात कर रहा है। पुरुष मजदूरों की मजदूरी पचीस रुपया और महिला मज़दूर की मज़दूरी बीस रुपये थी। चाचा, काका, ताऊ, बाबा कहकर पुरुषों से तीन रुपये और महिलाओं को चाची, काकी, आजी कहकर दो रुपये मज़दूरी कम करवा ली। उसके जज़्बे को देखकर हर कोई सहयोग करने को राजी था। राजगीरों के साथ वो मालिक की तरह नहीं, बल्कि मज़दूर की तरह दिन-रात जुटा रहता। अमरेश दिन भर तिकड़म, उधारी और बेगार में उलझा रहता। खानदान का कोई किनारे ना लगता। रामजस निहाल बहुत थे लेकिन देने के लिये उनके पास फूटी कौड़ी ना थी। वो रात की रोटियां बना देते थे और अमरेश को गाली मिश्रित गर्व भरा आशीर्वाद देते रहते थे।

दीवाल का काम पूरा हो चुका था। छत ढाली जा रही थी तब तक अचानक अखिल पहुंचा। उसने सपाट स्वर में बिना किसी भूमिका के कहा” अमरेश घर का काम रोक दो। ये जमीन हमारी है इसका पट्टा हमारे नाम है। तुरंत काम रोक दो, वरना अच्छा ना होगा”।

अमरेश को सहसा विश्वास ना हुआ। उसने अखिल का बात जवाब नहीं दिया और उसकी बात को अनसुना करते हुए अपने काम में जुटा रहा। अपनी बात का प्रभाव ना होते देख अखिल तिलमिला गया। उसने लाठी ललकारते हुए मज़दूरों को गालियाँ देनी शुरू कर दी। उसकी गाली-गलौज देखकर अमरेश समझ गया कि मामला गंभीर है उसने काम रोक दिया और मिस्री, मज़दूर को अगले दिन आने को कहा। उसे क्रोध तो बहुत आया मगर उसने सोचा कि इस गुस्से की हालत में चाचा के घर जाना ठीक नहीं । अगर मार-पीट हो गयी तो चाचा, अखिल, महेश तीन जने और वो अकेला। खेल बिगड़ सकता है। फिर दादा का क्या भरोसा, झगड़े में साथ दें या ना दें। वो घर के अंदर जाकर लेट गया और हालात पर विचार करना शुरू कर दिया।

दिन ढलने के बाद वो हनुमन्त के घर गया। जाते ही उसने हनुमन्त और चाची के पांव छुए। दोनों ने कोई जवाब ना दिया यहां तक कि आशिर्वाद भी ना दिया। अमरेश ने माहौल को हल्का करने के लिये हंसते हुए कहा”चाचा, चाची काम काहे रुकवा दिये। तुमसे पूछ के ही तो शुरू किये थे। “

मैना ने कहा”हमने कुछ नहीं कहा था। हम तुमको रोकने वाले कौन होते हैं लेकिन घर अपनी जमीन पर बनाओ, हमारी जमीन पर नहीं। दादा का नाश-निरबंस है, हमारे नहीं जो सब तुमको सौंप दें। अपनी जमीन पर ही बनाओ”।

अमरेश उनकी बेईमानी से हतप्रभ था उसने कहा”माना पट्टा तुम्हारे नाम है। पर उसके एवज में जमीन तो पहले ही ले चुके हो। और फिर भी और ज़मीन चाहिये तो नाप लो जितना तुम्हारा पट्टा है उतनी ज़मीन अब तुमको दूसरे तरफ दे देंगे। लेकिन अब बिम्ब ढल गया, छत पड़ने वाली है तो घर तो उसी ज़मीन पर बनेगा। वो हमारी भी जमीन है। “

इस बार हनुमन्त बोले”तो अपनी ही जमीन तक सीमित रहो, हमारे पर कब्ज़ा ना करो। तुम्हारी ज़मीन कहाँ है ये अपनी महतारी औऱ रामजस दादा से पूछो। थाना-पुलिस, कचहरी तक बात जायेगी तो हम अपना कागज़ दिखाएंगे। हमारे जमीन पर ना बसो तुमको पाप लगेगा। हम तो नीच-बेईमान लोग हैं जो एक अनाथ का दो-तीन सालों का ग़ल्ला बेच कर खा गये। “

आमरेश ने अपना अंतिम अस्त्र चला”और पंचायत में जो वादा किया था उसका जवाब दो”।

मैना तड़कते हुए बोलीं”बित्ते भर का छोकरा, गज भर जबान। जाओ नहीं तो तुम्हारी जीभ खिंचवा लूंगी अमरेश। हम पंचायत-वंचायत कुछ नहीं जानते। अब जो जवाब होगा वो थाना और कचहरी में देंगे। अब भाग जा यहां से हरामी”।

अमरेश की आंखों में आंसू आ गये। वो उस जगह से लज्जित, अपमानित और हताश होकर लौटा। रामजस उस वक्त घर पे नहीं थे। एक घड़ी रात बीतने पर जब वो लौटे तो अमरेश ने रो -रोकर अपना हाल सुनाया। उसने ये भी बताया कि कैसे वो हनुमन्त और मैना के दरवाजे पर गिड़गिड़ा कर लौटा है और चाची ने उसे गाली देकर दुत्कार कर भगाया है। ये कहकर वो फूट-फूटकर, बिलख-बिलखकर रोने लगा। रामजस बेशक नशे की पिनक में थे। मगर इस अनाथ बालक का भागीरथ प्रयत्न निष्फल होते और उसका करुण क्रंदन देखकर वो भी द्रवित हो उठे। उन्होंने गालियां देते हुए फरसा उठा लिया और अमरेश से कहा”अब उस नागिन के पाप का घड़ा भर गया है। आज उसको फरसे से काट दूंगा ये कुल पाप से मुक्त हो जायेगा। तुम चिंता ना करो, तुम घर धन संभालना, मैं जेल काट लूंगा। तुम अपना घर बसाना बेटा। ये डायन पहले लल्लन को खा गयी अब तुम्हे मारना चाहती है ताकि सब धन इसको मिल जाये । आज मार डालता हूँ इसे”। ये कहकर रामजस फरसा लेकर बड़ी तेजी से मैना के घर की तरफ दौड़े। अमरेश ने दौड़ कर उनको पीछे से पकड़ लिया। नशे और क्रोध में व्यक्ति की ताकत बहुत बढ़ जाती है । अमरेश को उन्होंने झटक दिया, और आगे बढ़े। अमरेश उनको बार-बार पकड़ता और रामजस उसको बार -बार झटक देते। ऐसा बड़ी देर तक चलता रहा। अमरेश जानता था कि आज अगर दादा ने चाचा के परिवार में किसी को मार दिया या उनके परिवार में किसी ने दादा को मार दिया तो इस कुल का नाश निश्चित है। ईंट-गारे के मकान के लिये परिवार की बलि नहीं चढ़ायी जा सकती। जब वो हार गया तो उसने रामजस के पांव पकड़कर रोना शुरू किया। रामजस उसके इस काम से रुक तो गये मगर बड़ी देर तक गालियां बकते रहे और फरसा लहराते रहे। अंत में उन्हें मना कर अमरेश घर में ले आया।

रामजस लौट तो आये मगर रात भर बरामदे में बैठकर ऊंची आवाज में मैना को गरियाते-श्रापते रहे। अमरेश रात भर अपने घर की चिंता में रोता रहा, घर के साथ विवाह के सपने भी रह जाते और दो रोटी सुख से पाने का आसरा भी। उधर मैना रात भर पानी पी-पीकर कसमें खाती रही कि अमरेश को हर गाली की कीमत चुकानी पड़ेगी। अब उसका घर हर्गिज़ ना बनेगा। मैना के लिये दोनों ही कांटे थे। रामजस मरते तो ‘आगे नाथ ना पीछे पगहा”सारी संपत्ति उसे ही मिलती और अमरेश मरता तो भी उसकी संपत्ति मिलती। उस कुटिल परंतु धर्मभीरु स्त्री ने उन्हें मारने का कोई जतन तो ना किया था मगर मन में ये नाप तौल हमेशा की थी कि ये दोनों ज़िंदा ना रहें तो । उसके दो बेटे थे, जिनमें बंट कर जायदाद हल्की हो जानी थी।

अगले दिन राजगीर, मजदूर सब आये। अखिल दूर से खड़ा ताड़ रहा था लेकिन इस बार ना तो वो लाठी लेकर आया और ना ही गाली दी। अमरेश ने कारीगरों से कहा”आप लोग अभी जाइये। घर का झगड़ा है एक दो दिन में निपट जायेगा। तब मैं खुद बुलाने आऊंगा। जो हर्जा हुआ आज का उसके लिये माफी दे दो सब”। अमरेश की बेबसी और विनती सुनकर राजगीर और मज़दूर तो लौट गये लेकिन दिन चढ़ते-चढ़ते गांव के लोग जुट गये। अमरेश बड़े संयम से काम ले रहा था वो जानता था कि दादा और चाची का झगड़ा बढ़ गया तो खून-खराबा हो सकता है। गांव की जुटान में न्याय-अन्याय, सही-गलत का प्रश्न उठा तो लोग हनुमन्त के दरवाजे तक पहुंच गए। बहुत दलीलें दी गयीं मगर अमरेश और मैना टस से मस ना हुए।

हारकर फिर पंचायत बुलायी गयी, शाम तक वही सारे पंच हाज़िर हुए। ये वही हजरात थे जो चंद रोज पहले बहमी बंटवारा करके गये थे। पंच बैठे, सबका पक्ष सुना। हनुमन्त ने ज़मीन के उस हिस्से के कागज़ को पेश कर दिया। पंचायत ने कागज़ के बजाय न्याय-अन्याय की बात की। पहले की पंचायत के दिन हनुमंत की चुप्पी के लिये उसे लताड़ा और उसका बहिष्कार करने की धमकी दी। मगर पंचायत को हनुमंत की तरफ से कोई आश्वासन ना मिला। अंत में पंचायत ने एक स्वर में अपना निर्णय दिया”कल से अमरेश अपने मकान का निर्माण शुरू कराए। हनुमन्त अगर चाहें तो अमरेश से पट्टे भर की जमीन कहीं अलग ले लें। पंचायत हनुमन्त का नुकसान नहीं होने देगी। परंतु यदि हनुमन्त पंचायत की बात ना मानकर मकान के बनने में कोई बाधा पैदा करते हैं तो पंचायत उनका अधिकतम और कठोरतम सामाजिक बहिष्कार करेगी”ये कहकर पंचायत उठ गयी।

पंचायत ने तो कह दिया था मगर अमरेश का मन पार ना था। उसने अगले दिन काम शुरू ना करवाया। इस तरह दो-तीन दिन बीत गये। उधर राजगीर और मज़दूर उकताहट मचाये थे कि जल्दी काम शुरू करो या उनको जवाब दो वे कहीं और काम देखें, ये वो तबका था जो रोज कुंआ खोदता था और पानी पीता था। इनके दबाव से आजिज आकर अमरेश ने चौथे दिन काम शुरू करा दिया। काम शुरू तो हो गया मगर अमरेश आशंकित ही बना रहा कि कब कोई बाधा आ जाये। उधर रामजस दहाड़ रहे थे कि मैना या हनुमन्त काम रुकवाने आये तो वो उन्हें फरसे से काट डालेंगे। चोट खाई स्त्री कब शांत बैठती है, कल तक जहां वात्सल्य था अमरेश पर, पुत्रवत स्नेह था आज वही उसकी आंख का सबसे बड़ा कांटा था।

अमरेश ने काम तो चालू करा दिया था मगर उसे किसी अनहोनी, अनिष्ट की आशंका थी। शाम होते-होते थाने से एक सिपाही आ गया। उसने अमरेश को सीधे सपाट स्वर में कहा”अमरेश इस काम को तुरंत रोक दो, एक इंच भी काम किया तो तुमको गिरफ्तार करके ले जाऊंगा’फिर वो सिपाही राजगीर और मज़दूरों की तरफ मुखातिब होते हुए बोला”भाग जाओ तुम लोग यहां से, ये निर्माण अवैध है। दुबारा कोई काम करने आया तो मार-मार के दिमाग सही कर देंगे, भाग साले भाग यहाँ से”। सिपाही का ये कहना था कि तुरंत काम रुक गया। मज़दूर वहां से चले गए। गांव में पुलिस से बड़ा कोई साहब नहीं होता सबकी माई-बाप पुलिस।

सिपाही ने अमरेश से अकड़ते हुए कहा”तुम्हारे खिलाफ थाने में दरख्वास्त पड़ी है। ये जमीन हनुमंत की है तो तुम इस पर घर क्यों बना रहे हो?”

अमरेश ने संयत स्वर में कहा”ये जमीन पुरखों की है, हमारा और दादा का भी हिस्सा है। चाचा को इसके बदले दूसरी ज़मीन मिली है। उन्होंने पंचायत में गवाही भी दी है। आप चाहो तो पंचों से पूछ लो”।

सिपाही उसकी बात से असहज हो गया”बात ना काटो नहीं अक्ल ठिकाने लगा दूंगा अभी। जो हुक्म है वो सुनो। निर्माण तुरंत रोक दो, बड़े साहब लखनऊ गये हैं। परसों थाने में आकर मिलो। कोई निर्माण किया तो गिरफ्तार कर लूंगा और पिटाई-ठोंकाई जो होगी वो अलग से”ये कहकर पुलिसवाला चला गया।

पुलिस आयी तो पूरे गांव को सांप सूंघ गया। न्याय-अन्याय की दुहाई देने वाले गांव के लोग चुप हो गये। अमरेश भी सहम गया, रामजस तो बिल्कुल काठ के उल्लू की मानिंद चुप हो गये। अमरेश भी सहम गया। वो अगले दिन पंचायत के सभी पंचों के घर बारी-बारी गया। सभी को उससे सहानभूति थी उसकी बात से इत्तिफ़ाक़ था मगर पुलिस कागज़ ही देखती है, इस बात की नसीहत सभी ने उसको दी। लम्मरदार ने तो यहां तक कह दिया कि कानून कुछ भी कहे, इस वादाखिलाफी के लिये हनुमन्त के परिवार का हुक्का-पानी बंद और उसका सामाजिक बहिष्कार जारी रहेगा। ना कोई उसके सुख-दुख में जायेगा और ना ही वो किसी के सुख-दुख में शामिल हो सकेगा। लेकिन पुलिस-कचहरी के काम में रुकावट डालने के लिये कोई भी अमरेश का सहयोग करने को राजी ना हुआ।

लम्मरदार ने अमरेश को समझाया”देखो बेटा, कागज़ ही माना जायेगा कचहरी में बाकी सब बात-जुबान पीछे रह जायेगी। अभी बहुत देर नहीं हुई है, छत तो पड़ी नहीं है। तुम नपवा लो लेखपाल से जो हिस्सा हनुमन्त का निकल रहा है उस हिस्से की बुनियाद और दीवार उखाड़कर दूसरी तरफ दीवार बढ़ाकर बना ले। वरना तुम गिरफ्तार हो जाओगे तो गांव में कोई जमानत लेने वाला नहीं मिलेगा। और जिस रामजस पर तुमको इतना घमंड है वो गंजेड़ी तुम्हारी ईंट-सीमेंट बेचकर खा जायेगा। इसलिये ये नुकसान सह लो बेटा, और कोई रास्ता नहीं है “।

अमरेश को ये सुझाव बुरा तो लगा मगर सहमति में सिर हिलाते हुए वो वहाँ से लौट आया। दो दिन तक वो पंच-प्रधान के घर के चक्कर लगाता रहा मगर उसे कहीं से भी कोई मदद हासिल ना हो सकी। अलबत्ता सभी ने उसे गिरफ्तारी से बचने की सलाह जरूर दी। वो रात को आता तो रामजस रोटियां बनाकर देते। रामजस भले ही नशेड़ी थे पर इंसान ही थे। वो भी दुखी थे कि पक्का घर बन जाता तो वो भी गर्व से रहते। पूरी ज़िंदगी उनकी छप्पर और खपरैल में निकली जा रही थी। अमरेश रोटियां लेकर बैठ तो जाता था पर उससे कौर ना निगला जाता। वक्त के मार ने उसके तन को मजबूत बना दिया था मगर मन से तो वो अभी बालक ही था। वक्त की इस क्रूर चाल से वो बेबस, हताश, और निराश था। दूसरे दिन उसने मन ही मन सोचा” कि अगर वो अभागा ना होता तो बेवक्त सिर से बाप का साया ना हटता, मां ने दूसरा विवाह ना किया होता, निरबंसी नाना ने उसका पालन-पोषण क्यों नहीं किया ?विद्या नहीं, संपत्ति नहीं, परिवार नहीं तो जीवन किस काम का। किसके लिये, वो क्यों बनाये घर। अब वो नहीं जियेगा। मर जायेगा, जिसको जो राजपाट लेना है वो ले ले । जिसका मन हो वो ग़ल्ला बेचे, जिसका मन हो वो उसके हिस्से की जमीन कब्ज़ा कर। कल मर जायेगा वो, राम छोड़िन अयोधया, जिसके मन भावे वो लेय”ये सब सोचते, रोते-सुबकते उसकी आंख लग गयी।

वो सुबह उठा तो उसने पाया कि उसकी निराशा काफी कम थी। वैसे भी नींद तमाम स्मृतियों का लोप करा देती है और निराशा को तो लील ही लेती है। प्रकृति की खुली हवा, सुबह का विहंगम दृश्य, स्नान के बाद जब उसने सूर्यदेव को अर्ध्य दिया तो जीवन की सकारात्मक सोच से उल्लासित महसूस किया उसने। ईश्वर का मनुष्य जब ध्यान करता है तो जो कुछ भी अकल्पनीय होता है उसके हो जाने का आश्वासन उसे अदृश्य शक्तियों से मिलता है। उन्हें अदृश्य शक्तियों को उसने आंखें मूंद कर याद किया और आंखे खोली तो उसे लगा मानों उसके अधबने घर की दीवारें उससे छत मांग रहीं हों। उसे लगा मानो वो अनावृत्त दीवारें उससे कह रही हों कि “मुझे ढक दो, सूर्य की गर्मी और तपिश से हम उतने ही बेहाल हैं जितने कि तुम। उसने मुस्करा कर उन दीवारों को देखते हुए खुद को तसल्ली दी कि जल्द ही वो उन दीवारों को छत देगा । वो जल्द ही इस मुसीबत से निकल आयेगा, क्योंकि ईश्वर चाहता है कि वो जिये, कामयाब हो। “

उसने एक सायकिल का इंतजाम किया और सुबह-सुबह थाने पहुंच गया। सुबह-सुबह थाने पर संन्नाटा था। कुछेक फरियादी थे भी तो इधर-उधर बीड़ी-तमाखू खा पी रहे थे। कुछेक होमगार्ड भी थे। एक सिपाही था जो अपनी मोटरसायकल साफ कर रहा था। अमरेश वहीं जाकर खड़ा हो गया। काफी तल्लीनता से गाड़ी की सफाई खत्म करने के बाद सिपाही ने देखा, लड़का अभी यहीं जुटा है। सिपाही ने पुलिसिया लहजे में डपटते हुए कहा”कौन हो तुम, यहां क्यों आये हो”?

अमरेश ने सहमते हुए कहा”नमस्ते सर, मैं पूरे शुकुल गांव के स्वर्गीय लल्लन शुक्ल का बेटा अमरेश शुक्ल हूं। मेरा मकान बन रहा था चाचा फ़र्ज़ी दरखास्त देकर काम रुकवा दिये हैं। उसी के लिये बड़े साहब से मिलना है”

सिपाही ने उसे घूरते हुए कहा”तो तुम्ही हो जिसके मां-बाप नहीं हैं। परदेस में रहते हो”।

“जी सर”कहते हुए उसने सहमति में सिर हिलाया।

“सक्सेना जी देख रहे हैं तुम्हारा केस। अभी बाथरुम में नहा रहे हैं। अभी निकलेंगे तो उनसे मिल लेना”ये कहते हुए उंगली के इशारे से एक बाथरूम की तरफ इशारा करते हुए बताया।

अमरेश उस दरवाजे के सामने जाकर खड़ा हो गया। थोड़ी देर में तौलिया लपेटे हुए मंत्रोच्चार करते एक सज़्ज़न बाथरूम से लोटा भर जल लेकर निकले। अमरेश ने लपककर उनके पाँव छुए।

सक्सेना जी ठिठक गये। उनकी हैरानी देखते हुए अमरेश ने जल्दी से कहा”सर मैं पूरे शुकुल से आया हूँ। नाम अमरेश शुक्ल है । जी आपके आर्डर पर मेरे मकान का काम रुक गया है। क्या बात हो गयी सर”?

सक्सेना पहले तो चौंके फिर धीरे से बोले”हां, हां, बेटा तुम्हारा चाचा थाने में आकर नाटक कर रहा था कि तुमने गांव में उसकी बहुत बेइज़्ज़ती कर दी। इसलिए वो और उसकी बीवी बहुत नाराज है । हमें धमकी दे रहा था कि काम रुकवाओ नहीं तो सल्फास खा लेगा। इसीलिए ये सब करना पड़ा। वैसे संक्रमणीय पट्टा है। और उस पर कोई निर्माण पहले हुआ नहीं था। मकान उसने बनाया नहीं, ज़मीन खाली पड़ी रही। उसका खुद का घर है भी। डीएम साहब को दरख्वास्त दे दो तो पट्टा खारिज हो जायेगा। “

अमरेश ने सहमति में सर हिलाते हुए कहा”जी सर, जी वो बड़े साहब, यसओ साहब से मिलना था। वो शायद कोई राह निकालें”।

सक्सेना जी ने ठंडे स्वर में कहा”कोर्ट कचहरी का मामला है। साहब उसमें क्या करेंगे। उनको सब मालूम है। उन्ही के आदेश पर मैंने सिपाही भेजा था। अब आये ही हो तो मिल लो”ये कहते हुए वो वहाँ से चले गये।

करीब दो घंटे बाद एसओ महेशचंद्र गुलाटी अपने आफिस में बैठे। वहां बहुत से फरियादी थे मगर सक्सेना जी ने अमरेश की बात उनसे बता दी थी सो उन्होंने अमरेश को बुलवाया। अमरेश ने आते ही गुलाटी के पांव छुए। गुलाटी पचास के पेंदे का एक भारी-भरकम आदमी था जिसका पेट निकला था और सर गंजा। बड़े से चेहरे पर उसकी बड़ी सी मूंछे उसके व्यक्तित्व को खासा रोबीला बना रही थीं। अमरेश को उन्होंने इशारे से बैठने को कहा। अमरेश ने उनको अपनी पूरी रामकहानी सुनायी अपने पिता की हत्या से लेकर मां का विवाह, दिल्ली का सफर और अब ये मकान। उसने गुलाटी को ये भी बताया कि उसने दसवीं की परीक्षा भी दी है।

गुलाटी ने सबकुछ धैर्य से सुना और फिर बोले”देखो अमरेश, तुम पुलिस की मजबूरी नहीं समझते। जिस जमीन पर तुमने घर बनाया है उसका बड़ा हिस्सा हनुमन्त के नाम है । उसका पट्टा है । तो इस तरह तो तुम्हारा निर्माण अवैध है। उसने दरख्वास्त दी है । कानून -कायदे से मुझे तुमको गिरफ्तार कर लेना चाहिए। तुम पर मुकदमा लिखकर तुम्हारे निर्माण को ढहा देना चाहिये। लेकिन तुम्हारी हालात पर तरस खाकर मैंने कुछ नहीं किया। तुम्हारा चाचा इतना दबाव बनाये हुए है कि थाने में सल्फास लेकर आया था कि मकान का काम रुकवाओ नहीं तो जहर खा लूंगा और सबको फंसा जाऊंगा। पुलिस को अपना काम करना ही पड़ेगा”।

अमरेश ये सब सुनकर रुंआसा हो गया उसने भरे गले से कहा”सर चाचा दो साल का हमारा गल्ला बेचकर खा गए। यही बात हमने पंचायत में कह दी तो वो हमसे बदला ले रहे हैं। पंचायत गवाह है कि उस दिन चाचा बंटवारे के वक्त कुछ नहीं बोले थे”ये कहकर अमरेश रोने लगा।

उसके आंसू देखकर पुलिसवाला द्रवित होने के बजाय हत्थे से उखड़ गया। वो चीखा”चुप हो जा बे, भाग यहां से साले। दूसरे की ज़मीन कब्ज़ा करेगा। भाग, भाग जाकर अपनी दीवार उलझ ले दो दिन के अंदर। नहीं तो मुकदमा लिखकर जेल भेज दूंगा। मार -मार लाठी तेरा पिछवाड़ा लाल कर दूंगा। रांड के सांड ये हरामज़दगी यहां ना दिखा। भाग साले भाग”।

अमरेश को ऐसी प्रत्याशा नहीं थी। आंसू ने सहानभूति के बजाय उल्टा काम किया। गुलाटी की तेज आवाज सुनकर सक्सेनाजी अंदर आ गए और वो अमरेश को खींचते हुए कमरे के बाहर ले गए। सक्सेना जी धकियाते हुए अमरेश को थाने के बाहर ले गए। वहां उन्होंने भी गुलाटी की ही भाषा को दोहराते हुए कहा”भाग जा यहाँ से, दुबारा मत आना। दूसरों की ज़मीन पर अवैध निर्माण करोगे तो जेल जाओगे। कोर्ट-कचहरी करोगे तो उसका पट्टा कैंसिल हो सकता है लेकिन उसका पट्टा कैंसिल हो जाने से उसकी जमीन तुम्हें नहीं मिल जायेगी। सरकार जिसे वाजिब समझेगी उसे जमीन का पट्टा देगी, तुम्हे ज़मीन मिलने की तब भी गारंटी नहीं है। हां अगर दो दिन में अपनी दीवार नहीं उलझ लिये तो तुम पर मुकदमा हो जायेगा। जेल में सड़ोगे ज़िन्दगी खराब हो जायेगी”ये कहकर सक्सेनाजी वहां से पैर पटकते हुए वहां से चले गये।

हताश, अपमानित और हारे हुए अमरेश ने अपनी सायकिल ली और थाने से चल पड़ा। बेमकसद अनजान राहों पर वो सायकिल चलाता रहा। सुबह की सारी स्फूर्ति, ऊर्जा और उल्लास नदारद हो चुका था। कल रात के सारे बुरे ख्यालों ने उसे फिर से आ घेरा था जहाँ से उसे जीवन की कोई राह नहीं दिख रही थी और मर जाना ही बेहतर लग रहा था। चाचा ने भी तो मर जाने की धमकी देकर अपना काम करवाया था। चाचा ने मरने की धमकी दी थी क्योंकि उनके पास जीने की तमाम वजहें थीं। लेकिन वो क्यों जिये और किसके लिये जिये?एक ऐसी मां का बेटा बनकर उसी जंवार में वो, जहां उसकी माँ दूसरा विवाह करके बेइज़्ज़ती करने को बैठी है। बताओ एक बेटे को छोड़कर चली गयी और वहां दो और बेटे पैदा किये हैं’आक थू महतारी के नाम पर”ये कहकर उसने ज़ोर से थूका।

फुर्सतगंज में उसने एक अनाज की दुकान से सल्फास की गोलियां खरीदी और उन्हें जेब में रख लिया। गांव पहुंचकर उसने सायकिल वापस कर दी जिससे ली थी। वो सीधे हनुमन्त के घर के अंदर चला गया। दुपहरी का वक्त था। सब खा-पीकर लेटे-बैठे थे। सब एक ही जगह थे, हनुमन्त, मैना, अखिल, महेश, विशाखा। उसे देखते ही सब सकपका गये कि इस तनाव और तल्खी के माहौल में वो बिना बताये घर के भीतर तक चला आया कहीं किसी हथियार से हमला-वमला ना कर दे। सब चौकन्ने हो उठे। अखिल ने लाठी और महेश ने फावड़ा उठा लिया मगर विशाखा चुप-चाप ही रही। हनुमंत और मैना आशंकित थे कि क्या होने वाला है?

अमरेश उन सबकी मनोस्थिति भांप कर फीकी हंसी हंसते हुए बोला”घबराओ नहीं, मारपीट करने नहीं आया हूँ। तुम सब मेरा परिवार ही हो। चाची तुम चाचा को जहर खाने की धमकी दिलाकर मुकदमा बनाई हो। थाना-पुलिस तभी दरवाजे तक आया है। तुम चाहती हो ना कि हम मर जाएं तो तुम्हारा फायदा हो जाये। घर-ज़मीन सब तुमको मिल जाये। “

मैना नजर चुराते हुए धीरे से बोली”नाहीं बेटा, हम तुम्हारा अनभला कभी नहीं चाहे। पर हमारे आगे भी दो लड़के हैं । अपनी जमीन तुमको दे दें तो इनका क्या होगा। इनका हक ना मारो। फिर दादा का हिस्सा भी तो तुम्ही”अमरेश उसकी बात विकलता से काटते हुए बोला”नाहीं, नाहीं चाची ई तिरिया चरित्तर हमसे ना करो। तुम हमरी मौत चाहती हो हम जानते हैं। एक हमारी महतारी है जो कुकर्म करके चली गयी तब तुमको हम अपनी दूसरी महतारी समझे थे। लेकिन जब तुम हमारी मौत चाहती हो तो हम मर ही जायेंगे। तुमको तनिक ममता ना आयी कि दिल्ली में हम मेहनत-मजदूरी करके, तन-पेट काटकर कैसे चार पैसा जोड़े। मर जायेंगे तो मेरा हिस्सा भी रख लेना और दादा का हिस्सा रख लेना। अब मर जायेंगे। अखिल, महेश डरो नहीं मेरे भाइयों हम मार करने नहीं मरने आये हैं। अब राज रजो तुम सब”ये कहते हुए अमरेश वहां से निकल गया।

“सुनो बेटवा, सुनो बेटवा, ”कहती रह गयी मैना, मगर अमरेश वहां से तेजी से निकल गया। अमरेश चला तो गया मगर अपने पीछे तमाम सवाल भी छोड़ गया। सभी सशंकित थे। “अब क्या होगा, अगर ये मर गया तो थाना-पुलिस हो जायेगा”हनुमंत ये सोच रहे थे। उधर मैना सोच रही थी “कि इस लड़के ने अगर कुछ कर-करा लिया तो भगवान उसके बच्चों को इस पाप का दंड ज़रूर देंगे”। अखिल और महेश इसी बात से संतुष्ट थे कि झगड़ा नहीं हुआ सो उन्होंने लाठी और फावड़ा रख दिया। विशाखा इसी बात से सहमी रही कि “ये क्या हुआ और अब आगे क्या होगा”?

आधा घंटा बीत गया। मैना बेचैन थी उसका मन नहीं मान रहा था। वात्सल्य उमड़ा पड़ रहा था। स्त्री का स्वभाव भी अजीब होता है। कुछ देर पहले तक वो जिसे नेस्तनाबूद कर देने के मंसूबे बना रही थी अब उसके मात्र ना होने की कल्पना से ही वो सिहर उठी। उसने विशाखा को टोह लेने भेजा कि वो जाकर देखे कहीं सच में अमरेश ने कुछ कर तो नहीं लिया है। विशाखा जैसे ही गयी थी वैसे ही उल्टे पाँव रोते-बिलखते, चिल्लाते हुई आई और बोली”मम्मी, अमरेश भैया जहर खा लिहिन। वो हाथ-पैर पटक रहे हैं। टट्टी-उल्टी कर रहे हैं। मम्मी उनका बचाय लेव”।

“हे दैव, अब का होई”ये कहते हुए मैना, अमरेश के घर के तरफ दौड़ी। उसके पीछे-पीछे हनुमन्त, अखिल, महेश भी दौड़े। सब जाकर देखते हैं तो अमरेश वहीं जहर खाये पड़ा है। उसका पूरा शरीर उल्टी और दस्त से सना है, मुंह से झाग निकल रहा है। रामजस वहीं सर पर हाथ रखे किंकर्तव्यविमूढ़ से बैठे हैं। वैशाख का महीना था। खेती -पाती से खाली होकर आग उगलते सूरज के प्रकोप से बचने के लिये सब घरों में दुबके थे। बिजली की तरह ये बात पूरे गाँव में फैल गयी। भाँति-भाँति के मनुष्य जुटे तो भाँति-भाँति की संवेदनाएं। कोई अमरेश के मरने की प्रतीक्षा कर रहा था तो कोई उसके बच पाने की उम्मीद। कुछ लोगों ने संभावित अनिष्ट की आशंका में पहले ही विलाप शुरू कर दिया तो कुछ लोग अमरेश के चाचा-चाची को कोस रहे थे।

लम्मरदार ने उसे उठाकर बिठाया और खूब पानी पिलाया। पानी पिलाते गये तो उल्टी होती गयी। मैना और विशाखा हतप्रभ सी रोती रहीं। मिसिर प्रधान ने कहीं से मोटरसायकल का जुगाड़ कर लिया। मैना ने तत्काल उल्टी-दस्त धो दिया और अमरेश को नहला दिया। अमरेश के हवास बहुत सीमित थे। वो सिर्फ सबको देख रहा था, क्या हो रहा था ये उसकी समझ से बाहर था। मैना ने अखिल के कान में कुछ कहा तो वो भागते हुए अपने घर की तरफ गया और उल्टे पाँव लौट आया। उसके हाथ में एक जोड़ी कपड़े और अधखुले रुमाल में कुछ रुपये थे। बड़ी फुर्ती से अखिल के कपड़े मैना ने अमरेश को पहना दिये और धीरे से उसे अखिल की मदद से मोटरसाइकिल पर बिठा दिया। मोटरसायकल पर आगे मिसिर प्रधान बैठे, बीच में अमरेश और उसे संभालने के लिये सबसे पीछे हनुमन्त।

आगे-आगे मोटरसायकल धूल का गुबार उड़ाते चली गयी और पीछे-पीछे छोड़ गयी गांव में कयासों का दौर। गांव में किस्म-किस्म की चर्चाएं थीं, अनुमान था कि अब क्या होगा। वो मर गया तो मुकदमे में कौन-कौन फसेंगा?अमरेश के हिस्से की ज़मीन किसको मिलेगी, क्या हनुमन्त को मिलेगी या उसकी माँ सरोजा आकर ज़मीन पर कब्ज़ा करेगी। अमरेश की मौत का बदला क्या रामजस लेंगे औऱ मैना को फरसे से काट डालेंगे। या मैना, रामजस को भी मरवा कर पूरी ज़मीन हड़प लेगी। रामजस ने इस घटना के कुछ देर पहले ही इतना ज्यादा गांजा पी लिया था कि वो उठ-बैठ तक नहीं पा रहे थे नशे के कारण। वो मति शून्य थे फिलवक्त, बस सर पे हाथ धरे बैठे थे। वो ना कुछ समझ पा रहे थे ना ही कुछ बोल पा रहे थे। वो दरअसल कुछ जान ही ना पाये कि क्या हो रहा है और थोड़ी देर में कितना कुछ हो गया?वो तब भटक शून्य थे तब भी जब अमरेश ने सल्फास खाने से पहले उनके पाँव छुए थे।

मैना को कुछ भी नहीं सूझ रहा था। वो इसी अपराध बोध में मरी जा रही थी कि अगर अमरेश को कुछ हो गया तो उसे कैकयी जैसा लांछन लगेगा। लेकिन ये उसके लिये कोपभवन लेने का समय नहीं था। उसने आनन-फानन में पचास रुपये का जुगाड़ करके अखिल को अमरेश के नाना के घर भेज दिया जो वहां से कई कोस की दूरी पर था। उसे लगा कि उसे अपने अलावा भी अमरेश के करीबियों को खबर कर देनी चाहिये। उसने महेश को पति की साईकल देते हुए कहा कि “तुम जाओ और अमरेश की माँ सरोजा को खबर कर दो। वो जाना चाहें तो रॉयबरेली अमरेश के पास जाएं या उन्हें साईकल पर बैठा कर यहां लिवा लाओ। “खुद भी वो नहा धोकर पूजा करने बैठ गई और बड़ी जोर जोर से दुर्गा सप्सती का पाठ करने लगी। सांझ होने को आई मगर कोई कहीं से ना लौटा। वो सबकी राह तकते-तकते गांव के बाहर तक निकल आयी तो महेश उसे आते दिखा। उसने महेश को अकेले आते देखा तो बुदबुदाने लगी”तो क्या सरोजा जिज्जी ने आने से इनकार कर दिया। हाय रे दैव, कैसी कठकरेज औरत है। अपने फायदे के लिये लड़के को छोड़कर दूसरा विवाह कर लिया। और अब अपने ही बेटे से जान छुड़ा रही है, जिये चाहे मरे”। मैना ने महेश से उतावलेपन से पूछा”का हुआ, काहे नाही आयीं जिज्जी, का कहत रहीं। और तुमको इत्त्ती देर कहाँ लग गई। कहाँ धंस गये रहे”?

महेश उनके गुस्से से सहम गया। उसने डरते-डरते कहा”सरोजा चाची लखनऊ गई हैं अपने मरद के साथ। उनका पेट में पथरी हो गया है। कल ही गयी हैं आज आने वाली रहीं। उनके घर गए तो ई बात पता लगी। वही लोग बताये कि हमारी ही सड़क से वो लौटेंगी वहीं सड़क पर खड़े रहना और रोककर बता देना। तब से सड़क पर ही खड़ा था। सब इक्का, रिकसा, टेम्पो देख डाला। वो नहीं मिलीं। अंधेरा हो गया तब वहां से चला। इक्केमान बता रहा था कि अब आज कोई भी गाड़ी लखनऊ से नहीं आएगी। कल सुबह वो शायद पहली गाड़ी से आएं। तब कल फिर चले जायेंगे बुलाने”।

मैना को तसल्ली हुई कि लड़के ने गल्ती नहीं की। उसने महेश से कहा”अच्छा ठीक है, राम कल तक रक्षा करें अमरेश की। तुम मेरे साथ प्रधान के घर चलो। वहां देखें कुछ खबर मिले शायद मरेश की। हे भगवान, हे देवी भगवती रक्षा करना महतारी अमरेश की। “

मां-बेटा दोनों प्रधान के घर पहुंचे तो देखा रामजस पहले से वहां मौजूद थे। मैना उन्हें देखकर कुछ असहज हुई मगर रामजस ने उसे कुछ नहीं कहा बस सिर पर हाथ धरे चिंतामग्न बैठे रहे। मैना को आशंका हुई रामजस की चुप्पी पर ऐसा तो नहीं अमरेश को कुछ हो गया हो और पुलिस ने हनुमंत को पकड़ लिया हो। अब उसे अमरेश के साथ -साथ अपने पति की भी फिक्र होने लगी। मैना प्रधान के घर के भीतर गई तो वहां सामान्य गति से कामकाज हो रहा था। उसे बड़ा अजीब लगा वो तुरंत बाहर निकल आयी उसने महेश से फुसफुसाते हुए कहा”दादा से पूछ, अमरेश की कुछ हाल-खबर मिली है क्या”।

महेश ने तपाक से पूछा”दादा, अमरेश भैया की कुछ खबर मिली है का”?

रामजस ये सुनते ही आगबबूला हो गये। वो तुरंत महेश को गरियाने-श्रापने लगे। गाली-गलौज सुनकर प्रधान का युवा बेटा विष्णु मिसिर निकल आया जो अपनी दबंगई के लिये खासा चर्चित था गांव में। उसे देखते ही रामजस चुप हो गये। उन तीनों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई।

माहौल को भांपकर विष्णु भारी स्वर में बोला”खबर मिली है कि वहां भी कई उलटी करा दिये हैं। लेकिन ज़हर पेट में चला गया था। ग्लूकोज़ चढ़ाये हैं। अभी ज़िंदा है अमरेश। आज रात सकुशल बीत जाएगी तो जान बच जाएगी। हालत खराब है उसकी डॉक्टर कुछ नहीं कर सकते । रॉयबरेली ले जाते तो थाना पुलिस हो जाता। यहीं पास के एक डॉक्टर के यहाँ भर्ती किये हैं। अब तुम सब घर जाओ रात भर देवता-पित्तर मनाओ। शायद अमरेशवा बच जाएगा। नहीं तो अनाथ की मौत की हत्तीयारी लगेगी तुम सबको। तुम तो मैना काकी इस पाप की नरक में भी जगह नहीं मिलेगी तुमको। और रामजस काका तुम भी जाओ, घर पे ही रहना। गांजा-वांजा ना पी लेना। पता चले रात-बिरात लाश आये तो तुम गांजा पिये पड़े हो। जो लाश आ गयी तो तुरंत जला देना। नहीं तो थाना-पुलिस हो जायेगा। फिर तुम्हारा मामला तो पहले से थाने में है। बंधोगे सब, जेल में मरोगे सब। अब जाओ हियां से। सब घर पर ही रहना, कभी भी ज़रूरत लग सकती है”।

विष्णु मिसिर की सलाह, चिंता और चोट भरे वाक्यों को सुनकर तीनों अपने घर लौट आये। रात प्रार्थनाओं और आदेशों में गुजरी। अगले दिन दोपहर तक ना कोई आया और ना कोई गया। मैना ने अचानक देखा कि हनुमन्त और अखिल चले आ रहे हैं। पति और पुत्र को सकुशल वापस आते देखकर उसकी जान में जान आयी। दोनों आये तो उनके चेहरों पर थकान तो थी मगर विषाद नहीं। पानी-पीने के बाद मैना की अधीरता को ताड़ते हुए हनुमंत ने बगैर पूछे बताया कि”अमरेश बच गया है। अब वो खतरे से बाहर है। रात भर हम तीनों एक प्राइवेट डॉक्टर के यहाँ पड़े रहे। प्रधान कल रात को ही लौट आये थे। दोपहर को डॉक्टर ने अमरेश को डिस्चार्ज कर दिया था। उसके नाना उसे अपने साथ अपने गांव ले गए हैं अब कुछ दिन वो वहीं रहेगा। “ये सब सुनकर मैना की जान में जान आई तभी हनुमन्त ने कहा”हम लोग कल से ही भूखे हैं जाओ कुछ खाना-पानी का इन्तेजाम करो। तब तक मैं नहा लेता हूँ। विशाखा तू जाकर रामजस दादा को बता दे कि अमरेश अब ठीक है और अपने नाना के साथ ननिहाल चला गया है”। विशाखा ये बात बताने रामजस के घर चली गयी। तब तक सरोजा अपने पति के साथ पहुंची। बिना कुछ कहे सुने वो मैना को अंक में लेकर फुट-फूटकर, बिलख-बिलखकर रोने लगी। बड़ी देर तक दोनों औरतें रोती रहीं। जब वो रोकर अलग हुईं तब हनुमन्त ने सरोजा का अभिवादन किया और बताया “अमरेश अब ठीक है और उसके नाना उसे अपने साथ ले गये हैं। तुम चाहो तो वहां जाकर उनसे मिल सकती हो”।

सरोजा ने वहां पानी भी नहीं पिया और अपने पुत्र का घर देखने चली गयी। वो वहां गयी तो बदहवास सी ईंटों और दरवाजों को सहलाने लगी मानो उसके लाल की बनवाई हुई हर बेजान वस्तु उसका लाल ही हो। जुग्गीलाल ये सब दूर खड़े चुपचाप देखते रहे। जुग्गीलाल, रामजस का स्वभाव जानते थे कि वो तुरंत गाली-गलौज पर उतर आएंगे और बखेड़ा खड़ा कर देंगे। सरोजा उस घर की चौखट पर बैठकर जी भर कर रोई। “अरे हमार बच्चा, अरे हमार बच्चा”का पीड़ा मिश्रित विलाप उसने बहुत देर तक किया। रामजस उसे देखकर चौंके तो मगर बोले कुछ नहीं कि दुखियारी, अभागी स्त्री को रो लेने दो। सरोजा रामजस की तरफ बढ़ी तो रामजस अपने स्थान से उठ पड़े और अपने कमरे के भीतर जाकर दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। सरोजा उसी कमरे के दरवाजे को पकड़कर दादा, दादा कहकर रोती रही जिस कमरे में वो जिबह हुई थी मगर रामजस नहीं पसीजे और उन्होंने दरवाजा नहीं खोला। रोती-बिलखती सरोजा को जुग्गीलाल अपने साथ लिवा ले गया।

सरोजा इस घर के लिये भी त्याज्य थी और मॉयके से भी त्याज्य। मॉयके में भी थू-थू थी कि विधवा पुत्री ने अपनी मर्ज़ी से विवाह कर लिया। भले ही ये विवाह लोकपाल की अनुमति से हुआ था मगर किया तो सरोजा ने था। इसलिये वो अब हंसी और बहिष्कार झेल रही थी मॉयके में। लेकिन औलाद का मोह जो भी ना करा दे स्त्री से उसने जुग्गीलाल से कहा”चलो मुझे अमरेश के पास चलना है अभी। अब अपने लाल को अपने से दूर नहीं रखूंगी। अपने कलेजे में रख लूंगी उसको। हाय मेरे लाल तुमने कौन दुख ना उठाये”ये कहकर वो फिर रोने लगी।

जुग्गीलाल उसे समझाते हुए बोला”बात को समझो सरोजा। धीरज धरो, अमरेश अब ठीक है। लेकिन माहौल अभी ठीक नहीं है। तुम वहां जाओगी तो बवाल होगा। बवाल होगा तो उसी टेंसन में अमरेश फिर कोई अनर्थ ना कर डाले। मरने-वरने की फिर कोशिश करे तो?अब वो ठीक है कुछ दिन बीतने दो सब नार्मल हो जाये तब चलेंगे। “

जुग्गीलाल की ये बात काम कर गयी। बेशक सरोजा की ममता बहुत हिलोरें मार रही थी और वो अमरेश को देखने के लिये बहुत व्यग्र थी। लेकिन फिर आत्महत्या का प्रयास ना करे इस अनहोनी के डर से उसने मॉयके जाने का खयाल त्याग दिया।

अमरेश ननिहाल में एक हफ्ता रहा । लोगों के सवाल और सहानुभूति से वो आजिज हो गया। बेशक शरीर कमजोर था मगर जिद बड़ी थी। उसने नाना से तीन सौ रुपुये लिये और दिल्ली चल पड़ा। गांव ने उसे मार डालने का प्रयास किया था इसलिये गांव उसके लिये मर चुका था। अब उसे गाँव की संपत्ति का ना कोई मोह रह गया था ना चिंता। वो अब गांव के चक्रव्यूह से निकलना चाहता था हर हाल में।

अमर दिल्ली पहुंचा तो अपने फूफा से भी नहीं मिला। वो सीधे भाटिया सेठ के गोदाम पीरागढ़ी पहुंच गया। उसने काम मांगा तो भाटिया ने कहा”देख अमरेश इस वक्त बंदे ज़रूरत से ज्यादा हैं सो मैं तुझे रख नहीं सकता। नौकरी के लिये थोड़ा इंतजार कर। कुछ बंदे गांव जाएंगे तो तुझे रख लेंगे। तब तक तू दूसरा काम भी देख ले। हां जब तक तुझे कोई काम नहीं मिल जाता तब तक तू गोदाम में रह सकता है। खर्चा-खुराकी के लिये पैसों की ज़रूरत पड़े तो ले लेना”।

अमरेश ने भाटिया से तीन सौ रुपये उधार ले लिया। रहना-खाना गोदाम में था सो कोई खास खर्चा भी नहीं थी। उसके पुराने साथियों ने उससे तब तक खुराकी लेने से इंकार कर दिया जब तक उसका कहीं काम नहीं लग जाता। अमरेश को नौकरी की कोई जल्दी ना थी उसका मन हर पुरानी चीज से ऊब गया था। हर पुराने इंसान, पुराने रिश्ते, पुरानी जगह से उसका मन बिल्कुल खिन्न हो गया था। हर किसी नए शख्स या चीज को देखकर उसका दुख थोड़ा कम होता और जीवन में उत्साह का संचार होता मगर हर पुरानी चीज उसे अतीत में ले जाती जिससे उसके घाव फिर हरे हो जाते। उसका दिल अब भाटिया के गोदाम में भी नहीं लग रहा था और ना ही वो टेंट हाउस की लाइन का काम करना चाहता था। अचानक एक दिन उसके फूफा का फोन आया भाटिया सेठ के गोदाम पर । उधर से उसके फूफा ने पूछा”कैसे हो बेटा, मिलने भी नहीं आये सुना है कोई काम भी नहीं पकड़े अभी। गांव का सब हाल मालूम हुआ हमको”।

अमरेश ने उनको फोन पर ही अभिवादन किया”पाँय लागी फूफा, छोड़ो गांव की बात। हां इधर खाली हैं अभी। बात ये है कि टेंट लाइन का काम करने का मन नहीं है”।

उधर से उसके फूफा ने कहा”ओखला में एक नौकरी है। हमने बात कर ली है। प्रेस में है। चाहो तो कर लो, साफ-सुथरा काम है। पैसा भी है। काम सीख लोगे तो आगे बहुत अच्छा रहेगा। पता नोट करो”।

अमरेश ने पेन लेकर एक कागज पर पता नोट किया और अगले दिन वो हरचरन भल्ला के सामने हाज़िर था। हरचरन भल्ला पैसों के मामले में एक घुटा हुआ व्यापारी था मगर स्वभाव से नरम दिल और उदार था। अमरेश ने समझा था बिजली वाला प्रेस जिससे कपड़े इस्तरी किये जाते हैं वहां कोई काम होगा मगर यहां तो किताबें और अखबार छपते हैं। ये बात उसे चकित कर रही थी कि जिन किताबों और अखबारों को वो जमीन पर गिरने पर सिर-माथे पर लगाता था वो यहां रद्दी की तरह कमरों में ठुंसी पड़ी हैं और दिन में तमाम लेबर उस पर आराम फरमाते हैं। भल्ला ने उसे चार सौ रुपये महीने की पगार पर रख लिया। उसका काम प्रेस की किताबों और अखबार की सप्लाई में सहयोग देना था। माल को बंधवाना, गाड़ी पर ले जाकर लोड करना फिर जहां-जहां गाड़ी जाये वहां जाकर माल को खाली कराना। जिस दिन गाड़ी नहीं आ पाती थी। उस दिन उसे दस-बारह किलोमीटर साईकिल चला कर प्रिंटिंग प्रेस के तमाम सैंपल, केमिकल इधर से उधर लाने और पहुंचाने होते थे। यहां रहने का बंदोबस्त ना था मगर अस्थायी तौर पर रात को प्रेस में डेरा जमाए था। भाटिया के गोदाम में वैसे भी रहने की मुफ्त सुविधा थी चाहे वो भाटिया की नौकरी करे या ना करे लेकिन वो भाटिया के गोदाम में अब रहना नहीं चाहता था। क्योंकि भाटिया के गोदाम में सभी टेंट वालों को भाटिया के अलावा भी लोग नौकर ही समझते थे। भले ही उधर चोरी और बख्शीस से कुछ आमदनी बढ़ जाती थी मगर यहां पढ़ा-लिखा साफ -सुथरा समाज था।

अमरेश ने ये बात नोट किया कि हिसाब-किताब के अलावा खुद भल्ला भी ऑफिस में कुछ ना कुछ पढ़ता-लिखता रहता था। प्रिंटिंग प्रेस में एक से एक विद्वान लोग आते कवि, लेखक, प्रोफेसर। इसके अलावा भी किस्म -किस्म के लोग आते रहते जादू-टोने की किताबें छपवाने वाले, चमत्कारी अंगूठी और पोस्टर छपवाने वाले। भल्ला कुछ तो अपने नाम से छापता और उसकी बाकायदा रसीद-पर्ची भी बनाता। मगर कुछ वो बिना नाम के भी छापता और जिनसे वो बढ़िया पैसे बनाता था। जैसे-जैसे अमरेश भल्ला का विश्वासपात्र होता गया वो गुर भी जानता गया और उसे इस अवैध कमाई में हिस्सा भी मिलने लगा। उसके सामने अश्लील साहित्य का भेद कुछ यूं खुला कि रात को वो प्रेस में ही रहता था। तो इस साहित्य की छपाई रात को दुकान बंद करके बत्ती बुझा कर मोमबत्ती की रोशनी में की जाती थी ताकि पुलिस का छापा वगैरह ना पड़े। दूसरी बात इस छपाई में बेहद वफादार वर्कर लगते थे और इनके पैकेट भी रात को ही बना कर सील कर दिये जाते थे ताकि सुबह जब प्रेस खुले तो सब साफ़-सुथरा रहे। इसी प्रेस में रात्रि प्रवास से वो भी इस प्रिंटिंग, पैकिंग का विशेष काम करता और विशेष लाभ भी प्राप्त करता।

पढ़ने की लत अमरेश ने दुबारा लगा ली थी फिर अब तो वो किताबों की खान में था। हिंदी साहित्य में ये समय अतुकांत कविताओं के उफान का था। ऐसी कवितायें जिन्हें आप शुरू से अंत तक पढ़ जायें तो ये भी नहीं जान पायेंगे कि ये गद्य हैं पद्य। कमाई बढ़ी तो अमरेश ने भाटिया का उधार चुकता करके नजफगढ़ में बसने को सोचा। नजफगढ़ वास्तव में एक गांवनुमा जगह थी जो दिल्ली के महानगर के रुतबे को जबरदस्ती ढो रहा था। ना पक्की सड़क, ना पेयजल का इंतजाम, ना ठीक से बिजली आती थी और ना कोई खास शहरी आबादी। उजड्ड लोगों की बस्ती परमपुरवा जहां तमाम इनामी बदमाश रहते थे। बिल्लू बादशाह, डोगी चौधरी, मुन्नी लौंडी,, सबके सब जरायम पेशा वाले इनामी। वहीं उसने एक कमरा ले लिया दो सौ रुपया महीना पर एक दूसरे बंदे धनेश के साथ। धनेश एक ट्रक पर खलासी था जो हफ़्ते-दस दिन पर आता और फिर एक दो दिन रहकर चला जाता जहां-जहां उसका ट्रक जाता।

भल्ला के पास काम करते हुए उसे तीन वर्ष बीत गये, तभी उसके संपर्क में विनयशील बतरा आये। विनयशील बतरा डॉक्टर थे और एक मेडिकल जर्नल भी निकालते थे। उसी के प्रकाशन के सिलसिले में प्रेस में अक्सर आया जाया करते थे। विनय बतरा मंगोलपूरी में रहते थे और मीराबाग में अपना घर बनवा रहे थे। उन्हें शंका थी कि जिस ठेकेदार से वो अपना घर ठेके पर बनवा रहे थे वो उनकी ईंट, सीमेंट और सरिया चुरा-चुराकर बेच रहा था। ठेका सिर्फ मज़दूरी का था सामान का नहीं। अगर हज़ारों की मज़दूरी तय थी तो हजारों का गोलमाल भी हो रहा था बिल्डिंग मैटेरियल में। बतरा को एक ईमानदार आदमी की सख्त जरूरत थी जो उसके सामान की देखभाल कर सके। काफी दिनों से वो ये बात भल्ला से कह रहा था। अमरेश पर बतरा की और बतरा पर अमरेश की नज़र थी मगर पहल दोनों में किसी ने नहीं की। एक दिन अमरेश बतरा को जर्नल पहुंचाने गया तो उसने पूछा”अमरेश, मुझे एक आदमी की तलाश है, एक नौकरी है मेरे पास, है कोई नजर में”?

अमरेश ने कहा”काम क्या है, पगार कितनी होगी”?

बतरा ने कहा”काम कुछ खास नहीं है बस देखभाल करनी है। सुपरवाइजर का काम समझो, पांच-छह सौ तक पगार दे दूंगा। “

अमरेश ने कहा”ठीक है एक दो दिन में पता करके बताता हूँ कोई ठीक-ठाक आदमी मिले तो”।

अमरेश ये कहकर वहां से चला आया। वो दिल्ली के दांव-पेंच बड़ी तेजी से सीख रहा था। उसने उसी दिन भल्ला से अपनी बात कही”सेठ जी, अब मेरी पगार बढ़ा दीजिये। इतने में पुरता नहीं आता”।

भल्ला ने पूछा”कितना बढ़ा दूं कम से कम”?

अमरेश ने कहा’कम से कम दो सौ रुपये, नहीं तो काम करना मुश्किल है”।

भल्ला हंस पड़ा वो बोला”देख भैया, तू अभी काम कर सोच कर बताता हूँ। “

अमरेश जब शाम को काम खत्म करके लौटने लगा तो भल्ला ने उसे बुलाया”देख अमरेश, आमदनी तो तेरी हो ही रही है। ऊपर से कितना कमा लेता है तू फिर दो सौ की क्या बिसात। लेकिन मैं तेरी पगार नहीं बढ़ा सकता। सोलह बंदे मेरे पास काम करते हैं एक की बढ़ाऊंगा तो सबकी बढ़ानी पड़ेगी यार। तू समझा कर। सौ-पचास मेरे से अलग से ले लिया कर। मगर पगार नहीं बढ़ा सकता तेरी, फिर सबकी बढ़ानी पड़ेगी”।

अमरेश ने धीरे से कहा”ठीक है तब और क्या”?

ये कहकर वो चल दिया तो भल्ला उसके पीछे-पीछे आया । उसने अमरेश को रोककर कहा”चल बेटे, तेरी ज़िद है तो पचास रुपये बढ़ाये देता हूँ लेकिन मेरी प्रॉब्लम को समझ “।

“ठीक है, ”कहकर अमरेश वहां से चला आया।

अगले दिन अमरेश भल्ला के यहां काम पर नहीं गया। वो बतरा के पास पहुंच गया और उसने छह सौ रुपये में बतरा की नौकरी करने की हामी भर ली। बतरा को ठीक अमरेश ही चाहिये था क्योंकि भल्ला ने कई बार अमरेश की खूब तारीफ की थी काम और वफादारी के मामले में। उसकी उम्मीद की मुताबिक अमरेश उसके झांसे में आ चुका था।

विनयशील बतरा, पेशा डॉक्टरी का मगर उसमें सारी संवेदनाएं मर चुकी थीं। उसमें ना विनय था और ना ही शील। उसने अमरेश से माइंडगेम खेलते हुए कहा”तुममें छः सौ रूपये पाने की काबलियत अभी नहीं है। और अगर छह सौ कमाने हैं तो बहुत मेहनत करनी पड़ेगी। दिन-रात प्लाट की साइट पर रहना पड़ेगा। क्योंकि चोरी तो कभी भी हो सकती है। जब प्लाट पर कोई काम नहीं होगा तो मेरे घर और क्लीनिक पर अगर कोई ज़रूरी काम होगा तो उसे करना पड़ेगा”।

अमरेश ने “जी सर कहकर हामी भर ली।

बतरा ने कुछ सोचने के बाद कहा”मैं तुम्हें जानता नहीं हूँ तुम्हारा कोई जमानतदार भी नहीं है। इसलिए तुम्हारी पहले तीन महीने की तनख्वाह मेरे पास जमा रहेगी। अगर तुमने कोई चोरी-चकारी की या तुम्हारी लापरवाही से कोई चोरी या नुकसान हुआ तो मैं तुम्हारी पगार से पैसे काटूंगा। “

अमरेश को ये बात नागवार गुजरी उसने प्रतिवाद किया”चोर नहीं हूँ साहब मैं। लेकिन काम मैं आपका करूंगा और तनख्वाह आप जमानत पर रखे रहेंगे तो मैं जियूँगा कैसे”?

बतरा ने मुस्कराते हुए कहा”क्यों, तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं कुछ बचत के क्या?ना हों तो भल्ला से उधार ले लो। मैं सैलरी दूंगा तो उसको लौटा देना। पैसे तो तुम्हे मिलेंगे ही बस ईमानदारी से अपना काम साबित करके दिखाओ। कुछ भी पैसे नहीं हैं तुम्हारे पास क्या”?

अमरेश ने रुआँसे स्वर में कहा”सर, डेढ़-दो सौ रुपये हैं। लेकिन भल्ला साहब उधार क्यों देंगे वो तो और उल्टे नाराज हो जाएंगे कि मैंने बिना बताए उनका काम छोड़ दिया। पगार ना सही, खर्चा-पानी आप दे दीजियेगा”।

“डन”बतरा ने कहा और अमरेश की नौकरी पक्की हो गयी। ये नजफगढ़ के नवाब वीरेंद्र सहवाग के उभार के दिन थे जिसे लोग नजफगढ़ का तेंदुलकर भी कहा करते थे। उसी दिन नजफगढ के परमपुरवा में भल्ला अमरेश को खोजते-खोजते उसके कमरे पर पहुंचे और बिना किसी भूमिका के बोले”देख बेटा अमरेश, तेरी ज़िद मानते हुए मैंने तेरी तनख्वाह सौ रुपये और बढ़ा दी है । अब इससे ज्यादा मैं अफोर्ड नहीं कर सकता। समझा कर यार, मेरे पास सोलह बंदे हैं”।

अमरेश ने हँसते हुए कहा”आपको परेशान होने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैंने दूसरी नौकरी खोज ली है”।

भल्ला तड़कते हुए बोला”किसकी प्रेस में खुराना, नेगी या गुप्ता। उनकी तो मैं ऎसी की तैसी कर दूंगा और तुझे भी चैन से बैठने नहीं दूंगा। पूरे ओखला में प्रिंटिंग लाइन में तुझे मैं चैन से जीने नहीं दूंगा”।

अमरेश ठहाका लगाते हुए बोला”शांत रहो भल्ला साहब। मैंने प्रिंटिंग लाइन ही छोड़ दी है। दूसरी लाइन में नौकरी कर ली है। अब मैं कंस्ट्रक्शन साइट पर नौकरी करूंगा। वहां दो सौ रुपये पगार ज्यादा है”।

भल्ला ने हैरानी से पूछा”वहाँ क्या करेगा, ईंट-बालू ढोएगा क्या, इंजीनियर तो तू है नही फिर वहां करेगा क्या”?

“ईंट-बालू ढोने वालों की निगरानी”अमरेश ने ठंडे स्वर में कहा।

भल्ला ने उतावलेपन से पूछा”कहाँ की कम्पनी है, किसकी साइट है?”

अमरेश ने धीरे से कहा”वो सब छोड़िये, आप मेरा हिसाब कर दीजिये। वहां मेरी शुरू के तीन महीने की तनख्वाह जमानत के तौर पर जमा रहेगी। तब तक के लिये मेरे पास खाने-पीने को और मकान का किराया देने तक को पैसे नहीं हैं। “

भल्ला ने शुष्क स्वर में कहा”कल आफिस आ जाना देखता हूँ क्या हो सकता है?अभी कुछ नहीं हो सकता। “

अमरेश ने बहुत विनीत स्वर में कहा”सेठ जी, कल नहीं परसों आऊंगा। आप नाराज मत होइये मुझ पर बिना वजह। ये भी सोचिए कि परदेस में दो पैसे कमाने और इसी पापी पेट की वजह से पड़ा हूँ”।

भल्ला उसकी इस बात से पसीज उठा और “ओके माई सन, आल दी बेस्ट”, कहकर मुस्कराते हुए चला गया। अगले दिन अमरेश बतरा के मीरबाग वाले प्लाट पर गया और उसने पूरे दिन वहाँ डयूटी की। उसने ये बात ताड़ी कि उसके आने से ठेकेदार नाखुश और अनमना है लेकिन उसने अपना बर्ताव सबके प्रति सहिष्णु और संतुलित ही रखा। शिवमंदिर के लड़कों के साथ हुए बवाल की घटना को वो दोहराना नहीं चाहता था कि जहाँ लाभ में आंच आये तो दुश्मनी जानलेवा हो जाती है।

अगले दिन वो भल्ला से मिलने गया। भल्ला ने उसका हिसाब-किताब करके उसे पांच सौ सत्तर रुपये दिये। अमरेश ने वो पैसे रखने के बाद भल्ला से चुहल करने की नीयत से कहा”सेठ जी, दो सौ रुपये उधार दे दीजिये, मीरबाग में एक रूम देखा है उसकी पगड़ी देनी है”।

भल्ला ने उसकी बात सिरे से खारिज करते हुए कहा”ना, ना उधार नहीं देता मैं। फिर अब तो तू मेरा वर्कर भी नहीं रहा सो एडवांस या उधार की तो तेरे से अब कोई बात ही नहीं हो सकती। हां मगर एक जुगाड़ है जिससे तू पैसा कमा सकता है”।

अमरेश को फिर विनोद सुझा, उसने कहा”वो कैसे, लेकिन मेरी नौकरी छोड़ने की बात मत करना। इसके अलावा कोई जुगाड़ हो तो बताइये”।

भल्ला ने उसे देखते हुए संजीदगी से कहा”ना बेटा, तू अपनी नौकरी करता रह। उसे छोड़ने की कोई ज़रूरत नहीं। तू है अपना भरोसे का बंदा इसलिये मैं तेरे को ये आफर दे रहा हूँ। बात ये है कि अमरनाथ तन्हा नाम का एक कवि अपनी कविताओं की पुस्तक छपवाने के लिये कुछ पैसा एडवांस दे गया था। मेरे उसके बीच कोई लिखा-पढ़ी तो हुई नहीं थी। फिर वो बंदा अपने गांव चला गया। शायद बिहार के किसी सिवान जिले का था। अब सुनाई पड़ रहा है उसके गांव में हैजा फैल गया था और वो भी उसमें मर गया। दो साल से वो आया नहीं। आठ महीने पहले जब उसकी किताब तैयार हो गयी तो मैंने प्रूफ और बाकी पैसों के लिये उसका पता लगाने की कोशिश की तब ये खबर मिली कि अब वो इस दुनिया में रहा ही नहीं। उसकी किताब लगभग तैयार है । बस फ्लैप बदलना है। उस किताब की एक हज़ार कापियां हैं सबका सर्कुलेशन हो जाएगा”।

अमरेश ने उत्कंठा से कहा”मुझे क्या करना है। आपकी बात मैं कुछ समझ नहीं पाया”।

भल्ला ने उसे समझाते हुए कहा”तुम्हें कुछ खास नहीं करना है। इस किताब को ले जाओ और इसकी कवितायें एक सादे कागज पर मुझे लिखकर दे दो। जिससे कल को कोई मामला हो तो ये तो साबित हो जायेगा कि ये पाण्डुलिपि तुमने मुझे अपनी हैंडराइटिंग में तुमने मुझे लिख कर दी थी तो इस हिसाब से कागज़ में भी मेरा हाथ पक्का हो जायेगा। वैसे कुछ होगा नहीं आगे और फायदा हम दोनों का होगा”।

अमरेश अब भी कुछ नहीं समझा उसने हारकर और खीझकर कहा”मुझे क्या-क्या करना होगा और मेरा फायदा क्या होगा”?

भल्ला ने रहस्यमयी स्वर में कहा”जितना कहा है उतना लिख कर दे दो। अपनी एक फोटो भी दे दो। अमरनाथ गौतम तन्हा को मैं अमर तन्हा बना दूंगा। तुम आज से अपना नाम अमर रख लो और वही कहलवाना शुरू कर दो। वैसे भी ये अमरेश नाम बहुत देहाती है। हो सकता है इस नाम के अपशकुन की वजह से ही तुम्हारे जीवन में सारी परेशानियां हों। अब तुम अपना नाम अमर रख लो ये नाम फैंसी भी रहेगा और फायदेमंद भी। शायद नया नाम तुम्हारे लिये शुभ हो और तुम्हारी किस्मत बदल दे। “

अमरेश ने अनभिज्ञता से कहा”कैसे बदला जाता है नाम, मुझे नहीं पता”।

भल्ला ने उसे समझाया”अभी सिर्फ बोलचाल में अपना नाम बदलो और बाद में लिखा-पढ़ी में भी तुम्हारा नाम बदल देंगे। “

अमरेश को ये बात जंच गयी कि हो सकता है उसके जीवन की दिक्क़तें उसके इस अभागे नाम की वजह से हो। हो सकता है नया नाम उसके जीवन में कुछ खुशियां लेकर आये। उसने भल्ला की बात मान ली, वो अधबनी किताब और सादे पन्ने भल्ला के आफिस से ले आया। वो दिन भर बतरा के प्लाट की नौकरी और रात को भल्ला की दी हुई पाण्डुलिपि की हाथों से नकल लिखता। उसका लिखने का अभ्यास कम था इसीलिए उसे कई ड्राफ्ट बदलने पड़ते। लेकिन सात-आठ दिन बाद वो अपनी एक पांडुलिपि और रंगीन फ़ोटो भल्ला को दे आया। भल्ला ने उसे पांच सौ रुपये दिये और ताकीद किया कि अब वो दिल्ली में अमर बनकर रहने की आदत डाले तो उसे ऐसे तमाम इनाम-इकराम मिलते रहेंगे।

वाह रे दिल्ली, जिस आफिस में वो महज एक महीने पहले चार सौ रुपये महीने की नौकरी करता था और जिसका मालिक दो सौ रुपये की तनख्वाह बढ़ाने में आनाकानी कर रहा था उसने बिना कहे ही पांच सौ रुपये दे दिये। ये अमरेश से अमर बनने के शुरुआती उपहार थे। अमरेश से अमर बनने की पहली सीढ़ी ये थी कि जो लोग उसे बतौर अमरेश जानते थे उनसे पिंड छुड़ाया जाये और नई जगह पर नई पहचान बनायी जाये। उसने अपना किराये का कमरा बदल लिया और बतरा के मीरा बाग वाले प्लाट से थोड़ी दूरी पर एक कमरा ले लिया। इन दिनों ये पूरा इलाका सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बंद हुए कारखानों की वजह से उजाड़ और सुनसान था। इन कारखानों से मसीनें निकाल ली गई थीं, उनमें उत्पादन बंद था सो वो भूतिया खंडहर की मानिंद थीं। उन कारखानों में दो सौ रुपये में बड़ी आसानी से रहने का ठिकाना मिल गया उसे। तमाम चौकीदार तो उसे महज सौ रुपये में उसे अपने साथ रहने को कह रहे थे ताकि चोरी-चकारी की कोई घटना हो तो तो दूसरा कोई मददगार भी वहां मौजूद रहे।

बतरा के प्लाट पर बड़ी तेजी से काम चल रहा था। एक-एक ईंट, सीमेंट की बोरी और सरिया तक वो गिन डालता उन्हें कॉपी में लिखता फिर कितनी दीवार में चिनी गई और कितनी अवशेष है इसका मिलान करता तो गालिबन प्लाट पर हेराफेरी का गोरखधंधा बिल्कुल रोक दिया था उसने। कभी-कभार वो बतरा के प्लाट पर भी रुक जाता था। जिस दिन बालू और गिट्टी का ट्रक माल गिराता था। जब तक माल उठकर सड़क से बतरा के प्लाट के अंदर नहीं पहुंच जाता था तब तक पब्लिक प्लेस पर पड़ा हुआ माल पब्लिक, पब्लिक प्रॉपर्टी की तरह इस्तेमाल करती थी। उसके सामने ही लोग ईंट, बालू उठाकर ले जाते लेकिन शिवमंदिर वाली घटना अभी भी उसके जेहन में ताज़ा थी इसलिये वो चुप रह जाता।

दिन रात बालू-गिट्टी की निगरानी से आजिज आकर बतरा का ठेकेदार उसके मकान का काम छोड़कर चला गया। बतरा इस घटना से नाराज होने के बजाय खुश हो गया उसे संतोष हुआ कि उसका शक सही निकला। उसने अमरेश की पीठ थपथपाई और बोला

“अमरेश तुम मेहनत से काम करो मैं तुम्हे आदमी बना दूंगा। मैं तुम्हारी मेहनत और ईमानदारी से बहुत खुश हूँ। ये इनाम तुम मेरी तरफ से रखो”कहते हुए उसने अमरेश को सौ का नोट दिया।

अमरेश ने सहर्ष वो नोट लेते हुए कहा”सर, मेरी तनख्वाह चालू कर दीजिये। अब तो आपको तसल्ली हो गई। और हां सर मेरा नाम अब अमर है ये अमरेश नाम बड़ा देहाती लगता है”।

बतरा मुस्करा पड़ा कि लड़के को दिल्ली की हवा लग गई है। तकदीर नहीं बदल पा रहा है तो अपना नाम ही बदल रहा है। उसने हँसते हुए कहा”ओके, ओके मिस्टर अमर। खर्चा-पानी ना हो तो ले लो लेकिन सैलरी तो तीन महीने बाद ही मिलेगी। बतरा जो कहता है उसपे कायम रहता है”।

अमर ने मन ही मन बतरा को गाली दी लेकिन चेहरे पर मुस्कान लाते हुए कहा”ओके सर”। यही इस दिल्ली का दस्तूर था बतरा के जाने के बाद अमर सोचने लगा”साले बतरा, जब तेरा यकीन मुझ पर जम गया है तब क्यों तू मेरी तनख्वाह जमानत के तौर पर रोके हुए है। नौकरी मैं तेरी करूंगा और पैसा कहीं और से लाऊंगा। ये नहीं होगा। भल्ला के दिये पैसों से बतरा की नौकरी नहीं भुगतान है। जहाँ पर नौकरी होगी खर्चा भी वहीं से चलेगा, सवाल है कैसे”।

बतरा उसे कभी-कभी मंगोलपुरी भी बुलाता था। उसने अमर को मीरबाग से मंगोलपुरी आने के लिये एक पुरानी साईकल भी दे रखी थी। वो वही साईकल लेकर निकला और बड़ी दूर तक चक्कर काटता रहा। रिंग रोड पर उसे एक निर्माणाधीन मकान मिला। वहां के मालिक से उसने बात की तो वो समझ गया कि ये लड़का क्या चाहता है। उसने साठ रुपये बोरी पर सीमेंट का रेट तय कर लिया। हर तीसरे-चौथे दिन वो एक बोरी सीमेंट बतरा के प्लाट से सायकिल पर लादता और जाकर रिंग रोड पर बेच आता। ईंटे बेचने के लिये जो छोटे-मोटे दुकानदार भट्टी या अस्थायी अतिक्रमण करने का प्रयास करते उनको चुना अमर ने। उनसे पहले तय कर लेता और दस-बारह ईंटे एक बार में उन तक पहुंचा देता और डिमांड ज्यादा होती तो कई बार। गिट्टी का खरीदार उसे एक सड़क छोड़कर ही मिल गया था। इसलिये वहां भी वो सायकिल से बोरी-दर-बोरी गिट्टी पहुंचा देता। छह सौ की तनख्वाह में उसने छह सौ का मैटेरियल बेच डाला और बतरा को कानोंकान खबर तक ना हुई। लेकिन हर हफ्ते वो बतरा से पचास-साठ रुपये ज़रूर मांग लेता कि किराने वाले के राशन और ख़िरची-मिर्ची का उधार चुकाना है वरना बतरा को शक हो जाता कि वो जी कैसे रहा है।

उसने अपना घर बदल लिया था और वो ये बात जानता था कि भल्ला उसे खोज रहा होगा। एक महीने बाद एक दिन वो भल्ला से मिलने गया। अब साइकिल थी उसके पास, हर जगह वो साइकिल से ही जाता था। उसका अंदाज़ा सही था।

भल्ला ने कहा”कहाँ था तू, मैं तुझे तेरे कमरे तक खोज आया यार। मुझे लगा तू भी तो अमरनाथ की तरह गायब हो गया। मुझे फ़िर कोई दूसरा जुगाड़ करना पड़ेगा। “

अमर ने हँसते हुए कहा”मैं अमरेश से अमर बन रहा था और उसी के चक्कर में हर पुरानी चीज से पिंड छुड़ा रहा था। पुराने लोग और पुरानी जगह सब छोड़ दी”।

भल्ला ने चहकते हुए कहा”वेलडन पुत्तर, ”ये देख कहते हुए उसने अमर को छप कर आयी हुई किताबें दिखायी जिसमें बड़े-बड़े अक्षरों में उसके नाम के साथ उसकी फोटो छपी थी,, लिखा था अमर तन्हा, युवा प्रगतिशील कवि,,, और संग्रह का नाम” जख्म हँस रहे हैं’। अमर ये सब देखकर चकित और रोमांचित हो गया। टेंट हाउस के प्लेट-चम्मच गिनने से किताब के कवर तक पहुंचने का सफर किसी दिवास्वप्न के सरीखा था। उसे मानो काठ मार गया था वो चुप ही रहा।

भल्ला ने बेपरवाह स्वर में कहा”ये किताब ले जाओ, दो-तीन कॉपी और चार-छह दिन खूब पढ़ लो। कुछ दिनों में एक लोकार्पण समारोह रखूंगा। उसके बात धन्धे की बात होगी”ये कहते हुए भल्ला ने उसे दो सौ रुपये और दिये। अमर किताबें लेकर वहां से लौट आया। अपने कमरे पर अब अकेला रहता था वो अब। वो ये बात जान गया था कि जिन ऊंचे-नीचे रास्तों से वो दिल्ली में कामयाबी के अभेद्य दुर्ग को जीतना चाहता था उसमें तमाम राज होंगे और उस राज को छिपाने के लिये एक अदद अलहदा और महफूज़ छत की दरकार होगी। इस शहर में राज को राज रखना भी एक हुनर है, फिर राज छिपाने का शउर और हुनर हो तो फिर सोने पर सुहागा जैसी बात होती है।

चंद महीनों बाद भल्ला को उसने एक दिन टेलीफोन किया । वैसे भल्ला की ताकीद के मुताबिक वो हर दस दिन पर उसे फ़ोन करके पूछ लिया करता था कि” आगे कोई काम तो नहीं है। उस दिन भल्ला ने बताया”, तीन दिन बाद तेरी किताब का लोकार्पण है, तैयार हो जा पुत्तर”।

अमर ने हैरानी से कहा”लोकार्पण, वो क्या होता है”?

भल्ला ने हंसते हुए जवाब दिया “अभी भी बिल्कुल भैया का भैया है तू। कोई बात नहीं, जिस दिन लोकार्पण होगा उसी दिन समझा दूंगा”। बस तब तक तुम एक काम करो किताब की सारी कवितायें याद कर लेना। तुम्हें अपने संग्रह जख्म हँस रहे हैं कि हर कविता जुबानी याद होनी चाहिये। तीन दिन बाद फिर फ़ोन कर लेना तब मैं तुम्हें सही टाइम और जगह बता दूंगा। तब तक एक काम और कर डालो। तुम एक कुर्ता-पायजामा और एक नेहरू कट का जुगाड़ कर लो। तुम कवि नहीं हो तो कम से कम कवि नजर तो आओ। और हां, फीते वाला जूता मत पहनना उस दिन पंप शू या नागरा पहन कर आना”ये कहते हुए भल्ला ने फोन काट दिया।

बतरा के प्लाट पर अमर काफी वक्त बिता चुका था और उसका काफी सारा सीमेंट, सरिया और बिल्डिंग मटेरियल बेच चुका था। उसने ये सुनिश्चित किया था कि वो ये सामान बतरा के मकान के दो-तीन किलोमीटर की रेंज में ना बेचे। तीन महीने बाद बतरा ने उसकी तनख्वाह चालू तो कर दी थी मगर शुरू के तीन-महीने की तनख्वाह अब भी बतरा ने दबा रखी थी और मकान का काम पूरा हो जाने के बाद ही देने को कहता था।

लोकार्पण टलता रहा इस बीच साल गुजर गया। बतरा के मकान का काम पूरा हो गया तो वो नये घर में शिफ्ट हो गया और अपने पुराने घर को मरीज भर्ती करने की जगह बना दी। बतरा की प्रैक्टिस बहुत अच्छी थी। दिन में वो सरकारी अस्पताल में नौकरी करता था। शाम को तीन दिन वो सीमापुरी और तीन दिन मंगोलपुरी में बैठता था। सीमापुरी में उसका बहुत पुराना क्लीनिक था जहाँ उसके सहायक सीताराम सिंह उसका काम देखते थे। सीताराम सिंह एक उदार निस्संतान वृद्ध थे। मंगोलपुरी से बतरा मीरबाग शिफ्ट हो गया तब मंगोलपुरी के क्लीनिक पर अमर को ड्यूटी देनी पड़ती थी।

बतरा ने मंगोलपुरी से मीरबाग शिफ्ट होने से पहले अपने कुत्ते स्नेकी को मीरबाग लाकर छोड़ दिया था ताकि स्नेकी नए माहौल के लिये अभ्यस्त हो जाये। स्नेकी को लाने से पहले एक दिन बतरा को चुहल सूझी। उसने अमर को बुलाया और कहा-

“अमर अब तुम थोड़ा और जिम्म्मेदार हो जाओ। तुम पर मेरा विश्वास जम गया है। अब इस घर में तुम्हारा एक भाई भी आ रहा है जिसकी पूरी जिम्मेदारी तुम पर है “।

अमरेश चौंकते हुए बोला”मेरा भाई, क्या वो भी जाति का पंडित है । फिर आपके घर में कैसे। आप तो पंजाबी हैं”। नाम क्या है उसका शुक्ला है तिवारी या मिसिर?”

बतरा ने हँसते हुए कहा”आयेगा तो मिल लेना उसका नाम, जाति, गोत्र सब पूछ लेना। लेकिन ये मान लो कि है तुम्हारा भाई तो तुम्हारे जैसा ही होगा। उसका पूरा ख्याल रखना। “

अमर निहाल हो गया कि “चलो उस अनाथ का कोई तो भाई मिला उसने सोचा कि देखते हैं कैसा है वो गांव वाले जैसा तो नहीं है। लेकिन आज बतरा को उसकी इतनी फिक्र कैसे हो गई। जल्दी ये सीधे मुंह बात नहीं करते, फिर ऐसे कैसे इतनी मेहरबानी करने लगे। ठीक है अपने कमरे में ही उसको रख लूंगा। शुक्ला हुआ तो अच्छी बात है और शुक्ला ना हुआ तो भी बाभन तो होगा ही । तो फिर उसे साथ रखने में कोई बुराई नहीं है । एक से भले दो हो जाएंगे फिर रहना, खाना-पीना सब मिल बाँटकर करेंगे। “

अमर इसी उधेड़ बुन में उलझा रहा कई दिनों तक। काफी दिनों बाद कार से बतरा आया और अपने साथ एक कुत्ता भी लाया । उसने पूरे घर का मुआयना किया और फिर चुपचाप बैठ गया। अमर को थोड़ा अजीब लगा, थोड़ी देर बाद जब उसे बर्दाश्त ना हुआ तो उसने बतरा से पूछा”

सर आप कह रहे थे कि मेरा कोई भाई-बंधु आने वाला है। क्या हुआ, अभी तो वो आया नहीं”।

बतरा ने मुस्कराते हुए कुत्ते को सहलाया और कहा”यही है तुम्हारा भाई स्नेकी। इसे डॉग समझने की गलती मत करना। ये मेरे बेटे जैसा है और तुम्हारे भाई जैसा है । अब तुम्हे अपने भाई का पूरी तरह से ख्याल रखना है। इसे कुछ होने ना पाये। इसे नई जगह के तौर-तरीके सिखा दो जैसे कि सुसु, पाटी। कैसे और कहां रहना है ये सब भी सिखा देना। सात हजार में आया है ये”। दिल्ली में डॉग की चोरी बहुत होती है अगर इसकी चोरी हो गयी तो सारी जिम्मेदारी तुम्हारी। तुम्हें सालोसाल नौकरी करके इसका हर्जा-खर्चा चुकाना होगा। इसलिये खूब होशियार और अलर्ट रहना”।

अमर ने बड़ी तन्मयता से बतरा की बातें सुनी और कमरे से बाहर निकल आया । उसे इस बात से बहुत चोट पहुंची थी कि बतरा ने उसे कुत्ते का भाई समझा था यानी उसकी हैसियत बतरा की नज़रों में एक कुत्ते से ज्यादा नहीं थी। बतरा उसे नौकर समझता तब भी गनीमत थी मगर कुत्ता समझा यानी कि इंसान और जानवर में कोई फर्क नहीं,,, वाह रे दिल्ली”।

उसका मन बहुत व्यथित हुआ, ज़िन्दगी जो दिन ना दिखाये। इंसान की नजर में इंसान और कुत्ते के बीच कोई फर्क ना रहा। इस बात से वो बहुत बेचैन हुआ। शाम को ड्यूटी के बाद जब वो कमरे पर आया तो उसका मन हर चीज से उचटा हुआ था। बड़ी देर तक वो यूँ ही अंधेरे में पड़ा-पड़ा निराशा के सागर में गोते लगाता रहा। तन और मन दोनों को दर्द बढ़ता जा रहा था। कहीं चैन ना मिला तो उठकर टंकी की टोटी खोल दी। टंकी के नीचे तब तक बैठा रहा जब तक पानी आना बंद नहीं हो गया। खाना बनाने का भी मन ना हुआ तो उसने सोचा चलकर कुछ बाहर खा लिया जाये। बड़ी देर तक वो दिल्ली की सड़कों पर निरुद्देश्य घूमता रहा। उसका जी कुछ भी खाने को नहीं हुआ, हालाँकि भूख उसे लगी थी।

अचानक एक जगह वो रुक गया वहाँ श्रीमद्भागवत गीता का प्रवचन चल रहा था। प्रवचन में कम ही लोग थे लेकिन जो लोग थे वो सुनने में ही ध्यान लगाये थे क्योंकि जो बाबा प्रवचन दे रहे थे वे बड़े सहज और प्रभावशाली ढंग से प्रवचन सुना रहे थे। अमर वहां जाकर बैठ गया। बहुत वर्षों बाद वो किसी मंदिर के भीतर आया था। ईश्वर में उसकी कुछ आस्था भी जगी वरना माँ के विवाह के बाद उसने कभी ईश्वर को उसने याद नहीं किया और उसका ये मानना था कि ईश्वर ने कभी उसकी भी सुधि नहीं ली। अलबत्ता पाप और पुण्य की तुला पर वो सदैव खुद को तोलता रहा था। लोगों से अभिवादन में ‘जय राम’कहता रहा और पीड़ा के क्षणों में “हाय राम”कहता रहा। इससे अधिक उसका राम से कभी वास्ता ना रहा।

वैसे तो प्रवचन में ना तो कुछ उसे रुचिकर लगा था और ना ही कुछ उसे समझ में आया था। लेकिन बालू-सीमेंट और चोरी -बेईमानी से कुछ माहौल बदला तो उसे अच्छा लगा और पंडाल का माहौल उसे कुछ देर तक बहुत भाया। प्रवचन के बाद प्रसाद वितरण हुआ तो प्रसाद खाकर ही कमरे पर लौट आया। रास्ते में उसे ना तो भोजन की तलब हुई ना ज़रूरत। उस रात उसने खाना नहीं खाया फिर भी ना तो उसके पेट में भूख थी और ना ही मन में भटकन।

अगली सुबह वो काम पर गया तो स्नेकी को अपना भाई समझ कर अपना लिया। जुबान का तीर इंसान ने चलाया था तो फिर इस बेजुबान का क्या दोष?वो स्नेकी को नहलाता-धुलाता, उसे घुमाने ले जाता, दोनों वक्त का खाना उसे देता, उसे सुसु-पाटी के तौर तरीके सिखाता। उसके शौच या भूख के सिग्नल को अमर अच्छी तरह से समझता। लेकिन अमर ये नहीं समझ पाता कि उस घनी आबादी में कुत्ता कैसे सुरक्षा के काम आ सकता है?

एक दिन स्नेकी ने दोपहर में डॉक्टर के बेड पर ही शौच कर दिया। अमर ने इस बात के लिये स्नेकी को काफी दिन तक ट्रेन्ड किया था। उसके ‘शू स्नेकी शु’कहने पर स्नेकी अमर के निर्देशानुसार दौड़ पड़ता और जिधर-जिधर अमरेश की उंगली जाती उधर-उधर वो दौड़ता-भूँकता रहता। इसी तरह जब अमर “छू स्नेकी छू”कहता तो वो उसी जगह शौच कर देता। दोपहर बाद जब बतरा क्लीनिक चला गया और उसकी पत्नी बाज़ार तब अमर ने बतरा के बेडरूम में स्नेकी को बेड के बीचोबीच ले जाकर जब अमर ने “छू स्नेकी छू”कहा तब स्नेकी ने बतरा के बेड के बीचोबीच शौच कर दिया।

बाज़ार से लौटकर बतरा की पत्नी घरेलू कामों में उलझ गयी। अमर जानता था कि बतरा तो बहुत रात को लौटेगा। अमर ये भी जानता था कि वो अगर घर में मौजूद रहा तो बतरा या उसकी पत्नी कुत्ते का मल उसी से फिंकवायेंगे इसलिये उसने वहां से खिसकने की सोची। वो किचन में गया जहाँ पर बतरा की पत्नी मोसंबी का जूस तैयार कर रही थी।

अमर ने कराहने का अभिनय करते हुए कहा”मैडमजी, मेरे पेट में भयंकर दर्द है। उल्टी और दस्त की भी प्रॉब्लम हो रही है। अगर रात-बिरात मेरी तबियत और भी बिगड़ गयी तो कल भी शायद ना आ सकूंगा। आप सर को बता दीजियेगा”।

बतरा की पत्नी ने ‘ओके’कहा और ये सुनते ही अमर वहां से बिजली की गति से निकल गया ताकि फिर से उसे बतरा की पत्नी पुकार ना सके। वो जानता था कि बतरा उसे कुत्ते से भी गया-गुजरा समझता है लेकिन वो भी इंसान है। कुत्ते की भावना, सुख-दुख का बतरा को इतना खयाल है मगर भले से भी बतरा ने कभी उसका सुख-दुख जानने का प्रयत्न नहीं किया।

अगले दिन अमर आधे दिन तक घर रहा। दिल उकताने लगा तो वो भल्ला से मिलने ओखला की राह ली। वो ओखला पहुँचा तो भल्ला ऑफिस में नहीं था। अलबत्ता उसके केबिन में एक लड़की बैठी हुई थी। उसके हाथ में एक फ़ाइल थी जिसमें कई पन्ने बाहर झांक रहे थे। अमर ने उसे देख कर अनदेखा कर दिया । मगर वो लड़की अचानक बोल पड़ी-

“अरे आप अमर सर हैं ना। अमर तन्हा जी, सर आपकी किताब अक्सर यहां भल्ला सर की टेबल पर रखी रहती है। मैंने पढ़ी है आपकी कवितायें। आप बहुत अच्छा लिखते हैं सर”।

अमर ने ‘सर’ शब्द सुना तो वो अवाक रह गया। ज़िन्दगी में पहली बार उसने सम्मानसूचक शब्द सुना था। कुत्ता, कमीना, हरामी, माँ-बहन की गाली, रांड का जना, अभागा, जैसी ना जाने कितनी गालियों से रोज उसका पाला पड़ता था। दुत्कार, फटकार, अवहेलना उसके जीवन का स्थायी भाव बन चुके थे। पिछले बहुत वर्षों के दिल्ली के जीवन में या तो गुरूपाल ने उसे ‘बेटा, बाबू ‘जैसे शब्दों से उसके घावों पर फाहे रखे थे या आज फिर ‘सर’।

अमर ने उस लड़की को गौर से देखा, चटख काला रंग, छोटी गोल पकौड़े जैसी नाक, दरम्याना कद, बड़ी-बड़ी चमकदार बोलती आंखें और बालों पर बड़ा सा जूड़ा। अमर ने उससे सतर्कता से पूछा-

“आप कौन हैं”?

“जी मैं निशा नंदिनी हूँ। मैंने मुहावरों का संकलन तैयार किया है। भल्ला सर के कहने पर। ग्यारह सौ हिंदी के मुहावरे हो गये हैं। अब ये किताब छप रही है। मैं कभी-कभार कवितायें भी लिखती हूँ। मगर आपकी तरह प्रगतिशील नहीं लिख पाती अभी मैं छंद वाली कवितायें ही लिखती हूँ। सर, आपकी कवितायें बहुत ही प्रगतिशील और विचारों में उत्तेजना भर देने वाली होती हैं”वो लडक़ी उत्साह में बोली।

अमर ने भल्ला के ऑफिस से निकलना ही उचित समझा। वो इस जगह नौकरी कर चुका था अगर कोई पुराना वर्कर मिल गया तो इस लड़की के सामने उसकी पोल-पट्टी खुल सकती थी। वो

आफिस से बाहर निकल आया। आज वो अपनी सायकिल नहीं लाया था इस होशियारी में अगर बतरा उसके पीछे-पीछे उसके कमरे तक पहुंच जाए और उसे ये पता लगे कि अमर साइकिल चला रहा है तो उसकी भद पिट सकती थी। बतरा ताड़ सकता था कि स्नेकी का मलत्याग करना और फिर अमर का गायब होना एक शातिराना चाल है। वो बाहर आया तो निशा भी उसके साथ निकल आयी। उनके बस स्टॉप एक ही थे। उसने निशा से पूछा-

“आप कहाँ रहती हैं?”

निशा ने सकुचाते हुए उत्तर दिया”निहाल विहार में”।

वे दोनों साथ में एक ही बस में साथ लौटे। अमर ने निशा के बस के टिकट के पैसे दिये। ट्रैफिक जाम और सिग्नल के झंझावतों से जूझ कर जब बस उनकी साझी मंजिल पर पहुँची तब तक उन दोनों ने अपनी रामकहानी काफी हद तक एक दूसरे को सुना दी। दोनों समवय थे और किसी विपरीत लिंग से पहली बार इतना खुल कर बतियाये थे सो कहीं ना कहीं आकर्षण की एक चिंगारी उनमें सुलग उठी थी। मगर दिल्ली के बाशिंदे एक मुलाकात में कहाँ इतनी जल्दी खुलते हैं। सो आगे की मन की गांठें कैसे खुलेंगी यानी अगली मुलाकात कब होगी ?इस सवाल का जवाब रामभरोसे था।

अमर जब अपने कमरे पर पहुंचा तो उसका अनुमान सही निकला कि उसकी पीठ पीछे बतरा उसके घर की दरयाफ्त करने आया था। पड़ोसी ने ये भी इत्तला दी कि बतरा ने इस बात को करेद कर पूछा था कि “क्या अमर साइकिल चला कर कहीं गया है”?कुछ देर उसने कमरे पर आराम किया निशा उसका पीछा छोड़ ही नहीं रही थी उसकी खुशबू और इल्हाम वो अपने आसपास ही महसूस कर रहा था। बतरा आकर जा चुका था उसने साइकिल निकाली और इस रंगीन दिल्ली की सैर पर निकल पड़ा। इस संगीन उम्र में पहली बार वो किसी लड़की से सटकर इतनी देर तक बैठा रहा था। उसके सेंट की खुश्बू, उसके यौवन की मादक गंध, उसके मांसल शरीर को यदा-कदा छू जाने का रोमांच, अनजाने में उसने जो छुआ उसकी सिहरन उस लड़की की आंखों में खुद के लिये इज़्ज़त सब कुछ तो मानो वो अपने साथ ही ले आया था। रह-रहकर वो अपने उन हाथों को चूम लेता था जो निशा को छू आये थे। ये रात बड़ी खुशनुमा थी। जब अपनी आंखों में वो दिल्ली की रंगीनियों को उतार चुका तब वो एक पंजाबी ढाबे पर रुक गया। वहां उसने छककर भोजन किया और गाना गाते-सीटी बजाते हुए अपने कमरे पर लौट आया।

अमर की रात बड़ी रोमांटिक गुजरी। उसके ख्वाबों में तमाम दिलफरेब नजारे आते-जाते रहे। इन ख्वाबों ने सुबह ख्यालों का जामा पहना और खुली आँखों ने भी इस खुशियों में साथ दिया कि मुमकिन है ये सब। अगले दिन की सुबह भी उतनी ही लुभावनी लग रही थी। ‘सर’का उच्चारण वो भुला नहीं था। ऐसा लगता था मानो ये उच्चारण उसके शरीर से उसी तरह लिपट गया हो जैसे कल उस लड़की से दिलफरेब मुलाकात। उसे सब कुछ बहुत अच्छा लग रहा था। ज़िन्दगी इतनी भी बुरी नहीं है जितनी वो समझ रहा था। गाते-गुनगुनाते और खुद को “अमर सर, अमर सर’उच्चारित करते वो बतरा के घर के सामने पहुंचा। वो थोड़ी देर धूप में खड़ा हो गया ताकि उसके चेहरे की कांति और उल्लास कुछ कम हो जाये वरना डॉक्टर बतरा की नजर झट उसे ताड़ लेगी कि ये मरीज नहीं मजनूं है। जब वो पसीना-पसीना हो गया तो हांफते हुए घर में दाखिल हुआ। उसने देखा कि बतरा लॉन में बहुत ही शांत और संयत बैठा हुआ है और उसकी पत्नी भी चुपचाप है।

अमर ने उन दोनों से बुझे स्वर में कहा”नमस्ते”,

बतरा बोला”खुश रहो, अब तुम्हारी तबियत कैसी है। मुझे जब तुम्हारा हाल पता लगा तब मैं तुम्हारे कमरे पर भी गया था। दवा-इंजेक्शन सब साथ ले गया था, मगर तुम घर पर थे ही नहीं। कहाँ गये थे खैर ये सब छोड़ो अब तुम ठीक हो ना?”

अमर ने रोनी सूरत बनाते हुए धीरे से कहा”जी अब ठीक हूँ कुछ। थोड़ा आराम है तभी तो ड्यूटी पर आया हूँ। “

बतरा अपने स्थान से उठा और अमर से बोला”मेरे साथ आओ”।

“जी’कहते हुए अमर उसके पीछे-पीछे हो लिया। बतरा उसे अपने बेडरूम में ले गया और बेड की तरफ इशारा करते हुए बोला-

“ये देख रहे हो, जानते हो ये क्या है’?

अमर ने कुत्ते के मल की तरफ देखा फिर उसने सर झुका लिया। बतरा चाशनी भरे स्वर में कहा-

“अमर तुम जानते हो कि मैंने तुममें और स्नेकी में कभी भेदभाव नहीं किया, तुम दोनों मेरे बच्चे हो। मगर मुझे बहुत दुख और अफसोस है कि तुम मुझे अपना नहीं समझते”।

अमर उसकी मंशा समझ रहा था उसने बतरा के इस दांव का तुरन्त प्रतिवाद किया”नहीं सर, ऐसा नहीं है मैं भी आपलोगों को अपना परिवार मानता हूं। आपलोगों के सिवाय कौन बैठा है मेरा इस दुनिया में’।

बतरा ने चाशनी भरे लफ्जों से अपनी बात आगे बढ़ाई”अगर तुम हमें अपना मानते तो अपने भाई का ख्याल नहीं रखते। उसे अच्छी आदतें नहीं सिखाते। स्नेकी तुम्हारा भाई है लेकिन देखो उसने क्या बदतमीजी की है। अब छोटे भाई को सुधारने की ज़िम्मेदारी तो बड़े भाई की है। तुम सिखाओ उसे गुड मैनर्स”।

“जी”कहकर अमर ने अपनी सहमति दी। बतरा ने शुष्क स्वर में कहा-

“जानते हो अमर, हम दो दिन से अपने बेडरूम में नहीं सोये। मैं और मेरी पत्नी, सिर्फ इसलिये कि तुमको तुम्हारी ज़िम्मेदारी का एहसास कराया जा सके। आज तुम अपने एक भाई को नहीं संभाल पा रहे हो, कल को तुम्हें परिवार, तुम्हारे बीवी बच्चे संभालने होंगे तब क्या करोगे?”

अमर निरुत्तर हो गया, बतरा बाज़ी जीत चुका था वो लेकिन वो संयत स्वर में बोला”बेटा अपने भाई का ख्याल रखो और अपनी जिम्मेदारियों को समझो। तुम और स्नेकी इस घर के बच्चे हो। जाओ ये साफ कर दो”

अमर ने सर झुका लिया और बिना कुछ बोले काम में जुट गया। थोड़ी देर में उसने साफ-सफाई कर दी फिर बतरा को बिना बताये उसके घर से चला आया।

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Nishant 3 सप्ताह पहले

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Dilip Bhappa 10 महीना पहले

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Annu 10 महीना पहले

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Manpreet Bhangu 10 महीना पहले

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Monica Sharma 10 महीना पहले

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