रुही Ved Prakash Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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रुही

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लंदन में जब भी मुझे शाम को घूमने का मौका मिलता तो मैं घर से निकल कर सीधा उस तरफ निकल जाता जहां पर पूरे रास्ते के दोनों ओर लंबे लंबे देवदार के पेड़ खड़े थे, लेकिन वहाँ तक पहुँच नहीं पाता क्योंकि वह जगह घर से थोड़ा दूर थी फिर भी मेरी प्रबल इच्छा होती कि मैं कम से कम एक बार वहाँ जाकर उस जगह की सुंदरता को देखूँ।

एक दिन मैं हिम्मत हिम्मत करके वहाँ पहुंचा तो गिरजाघर के घंटे की आवाज आने लगी, उस रास्ते के अंत में एक गिरजाघर था........

गिरजाघजार के साथ ही एक कब्रिस्तान भी था और कब्रिस्तान के बाहर एक शहीद स्मारक भी बना था, जिस पर उस क्षेत्र के सभी शहीदों के नाम लिखे थे जो प्रथम विश्व युद्ध या और किसी भी युद्ध में शहीद हुए थे.........

अचानक ही मेरी नजर एक नाम पर पड़ी W T Imagine जो 1947 में भारत में शहीद हुआ था, मैं सोचने लगा, ‘1947 में भारत में अंग्रेज़ सैनिकों का कोई काम ही नहीं था और न ही कोई युद्ध हो रहा था........’

उस शहीद के बारे में मेरी जिज्ञासा बढ़ रही थी और मैं सोच रहा था, ‘ऐसा क्या हुआ होगा जो एक अंग्रेज़ सैनिक को शहीद होना पड़ा........’

घर से काफी दूर आ गया था, थक भी गया था, मैं वहीं शहीद स्मारक के सामने एक बेंच पर बैठ गया........

हवा तेज चल रही थी, देवदार के लंबे लंबे वृक्ष हवा में झूम रहे थे, हल्की ठंड थी, मैंने ओवेरकोट और मफ्लर से खुद को ढका हुआ था........

ना जाने कब मैं उस शहीद के बारे में सोचते सोचते विचारों में खो गया........

एक आदमी मेरे पास बेंच पर आकर बैठ गया, देखने में सैनिक लग रहा था........

“तुम मेरे बारे में सोच रहे थे?”

मैं आवाक सा उसकी तरफ देखता रहा.......

“हाँ मैं ही हूँ W I Imagin”

अब मैं वहाँ से उठ कर जाना चाहता था लेकिन उठ नहीं पा रहा था.........

“क्यों जानना नहीं चाहोगे मेरे बारे में?”

मैं चुप रहा, लेकिन उसने बताना शुरू कर दिया, वह बोलता गया और मैं सुनता रहा, इसके अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था।

“जब भारत आज़ाद हुआ उस समय में लाहौर में तैनात था........

रुही को मैं बहुत प्यार करता था और उससे शादी करके वहीं बस जाना चाहता था........

एक दिन रुही कहने लगी कि इमेजिन तुम्हारा देश तो बहुत खूबसूरत है........

मैंने उससे कहा हाँ बहुत खूबसूरत है लेकिन तुम तो उस से भी ज्यादा सुंदर हो........

और तुम्हारा देश तो तुमसे भी ज्यादा सुंदर है........

मैं चाहता हूँ तुमसे शादी करके यहीं बस जाऊँ........

जब भी समय मिलता हम दोनों इच्छोगिल नहर के किनारे मिला करते थे

तभी भारत आज़ाद हो गया और सभी अंग्रेज़ भारत छोड़ कर वापस इंग्लैंड आने लगे लेकिन मैंने मना कर दिया........

भारत का बंटवारा हुआ और लाहौर पाकिस्तान में आ गया........

सभी हिन्दू रातों रात पाकिस्तान छोड़ कर भागने लगे, रुही के परिवार ने भी लाहौर छोड़ दिया........

पाकिस्तान के मुसलमान किसी भी हिन्दू को जिंदा नहीं छोड़ रहे थे, बच्चों और बूढ़ों को निर्दयता से मार रहे थे, जवान औरतों के साथ समूहिक बलात्कार करके उनको बड़े ही घिनौने ढंग से मौत के घाट उतार रहे थे........

नवनिर्मित पाकिस्तान की सेना उन सभी दुराचारियों का साथ दे रही थी, लेकिन मुझे स्वयं पर क्रोध आ रहा था, चाह कर भी मैं कुछ नहीं कर सकता था........

तभी मुझे रुही का परिवार दुराचारी राक्षसों से घिरा हुआ दिखा........

कुछ लोग रुही को पकड़ कर घसीट रहे थे और नारे लगा रहे थे मारो काफिरों को.........

मैं देख ना सका और तभी मैंने रुही को बचाने के लिए उन लोगों को मार डाला.......

मैंने रुही और उसके परिवार को वहाँ से बच कर भाग जाने के लिए कहा लेकिन मुझे पागल कातिलों दुराचारियों की भीड़ में घिरा देख कर रुही जाने को तैयार नहीं थी।

मैंने उन वहशी धर्मांध भीड़ से रुही और उसके परिवार को किसी तरह निकल कर भारत जाने वाली रेलगाड़ी में चढ़ा दिया........

आतताइयों की भीड़ ने रेलगाड़ी पर हमला बोल दिया और मैं अकेले ही उन आतताइयों की भीड़ से लड़ते हुए मर गया........

अब समझ गए ना 1947 में मैं भारत में कैसे शहीद हो गया?”

और वह सैनिक मेरे पास से उठकर सीधा कब्रिस्तान की तरफ चला गया........

मैं उसको जाते हुए देखता रहा........

रात बहुत हो चुकी थी, मैं घर नहीं पहुंचा तो बच्चों को चिंता होने लगी और बेटा मुझे खोजते हुए मुझ तक पहुँच गया.......

बेटे ने मेरे कंधे पर हाथ रख मुझे हिलाया तो मेरी नींद टूटी........

“पापा! आज क्या यहीं सोने का विचार था, मैं तो शायद यहाँ तक पहुँच भी नहीं पाता अगर आपने उस दिन इस जगह को देखने के बारे में मुझसे कहाँ ना होता........”

“हाँ चलो, घर पहुँच कर मैं तुम्हें सब बताऊँगा, अब घर चलते हैं।”

घर पहुँच कर मैंने सारी बात बेटे को बताई।

अगले दिन मैं और मेरा बेटा फिर उस जगह पर आए तब मैंने बेटे को उस शहीद W T Imagin का नाम दिखाया........

बेटे ने गिरजाघर के कार्यालय में जाकर उस शहीद के घरवालों का पता ले लिया, “रुही इमेजिन अबोट लैंगले”........

रुही नाम जानकार हमारी जिज्ञासा और बढ़ गई और हम दोनों अबोट लैंगले के उस घर पर पहुँच गए........

अबोट लैंगले के उस घर में हमारी मुलाक़ात एक नब्भे साल की वृद्ध महिला से हुई, जिससे बेटे ने अँग्रेजी में रुही के बारे में पूछा........

शायद यह देख कर कि हम भारतीय हैं उसने हमसे हिन्दी में कहा, “हां जी मैं ही रुही हूँ।”

हमने रुही को अपना परिचय दिया और थोड़ी देर इमेजिन के बारे में कुछ पूछने की आज्ञा चाही........

रुही ने हमें घर में बैठा लिया, घर में अकेली थीं, इतनी वृद्ध होकर भी वह तीन कप कॉफी बना लायी.......

कॉफी बहुत अच्छी बनी थी, कॉफी के सिप लेते हुए मैंने पिछली रात वाली पूरी कहानी रुही को सुनाई........

मेरे द्वारा सुनाई गयी कहानी सुनकर रुही आश्चर्यचकित रह गयी कि मैं उनके बारे में इतना कुछ कैसे जान गया और उसको पूरा विश्वास हो गया कि मुझे ये सारी बात इमेजिन की आत्मा ही बताकर गयी है.........

रुही यह सोच कर थोड़ा दुखी भी हो गयी कि इमेजिन आज तक उससे नहीं मिला जबकि वह तो घंटो घंटो उसकी कब्र पर भी बैठी रहती है।

रुही ने थोड़ा संयमित होकर 1947 की उससे आगे की घटना बताई......

“हम दोनों में इतना प्यार था कि एक दूसरे के बिना हम रह नहीं सकते थे और एक बार तो हम सारे बंधन तोड़ कर एक दूसरे में समा गए, शादी करते उससे पहले ही बँटवारे का तूफान आ गया और हम जुदा हो गए........

भारत पहुँचने के कुछ दिन बाद मुझे पता चला कि मैं इमेजिन के बच्चे की माँ बनने वाली हूँ, तब मेरे घर वालों ने गर्भपात करवाने की काफी कोशिश की लेकिन मैं नहीं मानी, मेरे पास मेरे प्यार की निशानी थी जिसे मैं खोना नहीं चाहती थी........

मैंने इमेजिन के बारे में पता किया तो बताया कि वह वहीं लाहौर में वहशी भीड़ से आप लोगों को बचाते हुए शहीद हो गया, उसने रेलगाड़ी को वहाँ से सुरक्षित निकलवा दिया जिससे हजारों लोगों की जान बच गयी लेकिन उस भीड़ ने इमेजिन के जान ले ली........

जब मैंने अपने और इमेजिन के बारे में बताया और बताया कि मैं उसके बच्चे की माँ बनने वाली हूँ तो ब्रिटिश हाइ कमीशन ने मेरा ब्रिटेन आने का प्रबंध कर दिया........

यहाँ पहुँच कर मैं इमेजिन के माँ बाप से मिली और वे यह जान कर बहुत खुश हुए कि मैं उनके पोते की माँ बनने वाली हूँ........

अब तो हमारा वह बेटा सत्तर साल का हो गया है और उसके अपने पोते पोतियाँ हैं........

लेकिन मुझे जीवन भर यही दुख रहा कि काश! मुझे पहले पता चल जाता कि मैं माँ बनने वाली हूँ और मैं इमेजीन को बता सकती ........”

अगले दिन मैंने इमेजीन की कब्र पर जाकर रुही की इच्छा उसको सुनाई........

तब बाद में रुही ने बताया कि पहली बार इमेजीन उसको सपने में आया और बड़ी देर हमने बात की ........

बाद में वह यह कह कर चला गया कि अब मैं खुश हूँ, संतुष्ट हूँ, जा रहा हूँ और बस देखते देखते आसमान की तरफ चला गया।