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चकबंदी

चकबंदी

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद स्वतंत्र भारत के प्रथम उप-प्रधान मंत्री माननीय सरदार बल्लभ भाई पटेल जो भारत के गृह मंत्री भी थे, ने सभी छोटी बड़ी रियासतों का विलय करके भारत वर्ष का पुनर्निर्माण किया, उसी समय माननीय गृहमंत्री ने जमींदारी प्रथा भी समाप्त करने की घोषणा कर दी जिससे सारी कृषि भूमि का मालिकाना अधिकार जमींदारों से निकल कर किसानों के पास चला गया।

अंग्रेजों के शासन काल में कृषि भूमि जमींदारों के पास थी, किसान उसमे खेती करते थे और जमींदार किसानों से मनमाना कर वसूलता था। वैसे भी कृषि का भविष्य मौसम पर टिका रहता था, बारिश अच्छी हो गयी तो फसल भी अच्छी हो जाती थी। फसल अच्छी होने पर जमींदार ज्यादा कर वसूलता था लेकिन जिस वर्ष सूखा पड़ जाए तब फसल खराब होने के बावजूद भी जमींदार कर वसूलता था, जिस कारण किसानों की स्थिति सदैव ही दयनीय रहती थी, किसान को इस समस्या से उबारने के लिए ही माननीय गृह मंत्री ने यह निर्णय लिया।

किसानों को जमीन का मालिकाना हक तो मिल गया लेकिन उनकी जमीन छोटे छोटे खेतों के रूप में बिखरी हुई थी। खेत में जाने के लिए रास्ता भी नहीं था और ना ही अलग अलग बिखरे पड़े खेतों में किसान सिंचाई का साधन कर सकता था।

सभी किसानों की जमीन एक ही जगह इकट्ठी कर दी जाए इसका एकमात्र उपाय चकबंदी ही था। चकबंदी यानि कि गाँव की पूरी जमीन की उपजाऊता के अनुसार उसकी कीमत लगाना, सभी किसानों की जमीन की कीमत तय करना और उनको उसी कीमत के अनुसार एक जगह जमीन देना। जहां जहां चकबंदी हो रही थी वहाँ वहाँ किसानों को एक ही जगह चक मिल रहा था, आने जाने का रास्ता मिल रहा था और किसान स्वयं सिंचाई का प्रबंध करके अच्छी फसल उगाने लगे थे।

वीरपुर गाँव में चकबंदी शुरू हुई तो पटवारी एवं कानूनगो ने गाँव में आकर डेरा डाल लिया। चकबंदी एक लंबा कार्य होने के कारण संबन्धित पटवारी व कानूनगो को तो तीन साल गाँव में हे डेरा डाल कर रहना पड़ता था। राम प्रसाद गाँव का थोड़ा पढ़ा लिखा व्यक्ति था लेकिन वह जमीन की पैमाइश का हिसाब लगाने में माहिर था, कानूनगो ने जब रामप्रसाद के इस गुण को जाना तो उसको अपने साथ लगा लिया। जमीन की पैमाइश का काम तो ज़्यादातर राम प्रसाद और पटवारी ही करते थे, पूरे दिन का हिसाब कानूनगो को लाकर दे देते थे जो जगदीश की बैठक में बैठकर सारी पैमाइश अपने रजिस्टर में चढ़ाता रहता था, उसका रहना खाना भी जगदीश की बैठक में ही था, जगदीश गाँव का संभ्रांत व्यक्ति था।

पूरे दिन के थके पटवारी निसार अहमद को राम प्रसाद अपने साथ अपने घर ले आता, वहीं पर दोनों खाना खाते एवं बैठक में थोड़ी देर बैठ कर अगले दिन के काम की योजना बना कर वहीं सो जाते। राम प्रसाद के घर पर रह कर निसार अहमद को राम प्रसाद से लगाव हो गया और उसने मन ही मन सोचा कि क्यों ना मैं सबसे उपजाऊ जमीन में राम प्रसाद का चक लगाऊँ, यह बात निसार अहमद ने राम प्रसाद को कभी बताई नहीं।

रमजान का महीना था, निसार के रोज़े चल रहे थे तो राम प्रसाद की पत्नी सुबह जल्दी उठ कर निसार के लिए खाना बना देती। दो तीन दिन ही गुजरे थे, शाम को नमाज पढ़ कर जब निसार खाना खा रहा था तो उसने राम प्रसाद से कहा, “भाई मेरे लिए चार रोटी अभी ही बनवा देना और उनको दूध में भिगो देना, मैं सुबह रोज़ा शुरू होने से पहले वही खाऊँगा।” राम प्रसाद ने काफी समझाया लेकिन निसार अपनी बात पर अडिग रहा क्योंकि वह बेवजह घर वालों को परेशान नहीं करना चाहता था अतः उस दिन से यही क्रम शुरू हो गया, राम प्रसाद के घर पर दूध की कोई कमी नहीं थी, एक गाय व एक भैंस दूध दे रही थी।

निसार अहमद ने राम प्रसाद का चक गाँव के नजदीक सबसे उपजाऊ जमीन में लगा दिया हालांकि वह जमीन महंगी थी और क्षेत्रफल में कम मिलती लेकिन उपजाऊ व नजदीक होने के कारण पटवारी जी राम प्रसाद को वही जमीन देना चाहते थे।

गाँव के सभी किसानों की जमीन और नए चक की योजना बनाकर पटवारी निसार अहमद ने जब कानूनगो के सामने रखी तो कानूनगो ने तुरंत ही राम प्रसाद के चक पर लाल कलम फेर दिया एवं राम प्रसाद को एक ऐसी जमीन में चक दे दिया जो गाँव से करीब तीन मील दूर थी एवं वहाँ पर कुछ भी पैदा नहीं होता था। पटवारी निसार अहमद ने बहुत विनती की मगर कानूनगो टस से मस नहीं हुआ और यह बात निसार अहमद के दिल को लग गयी। निसार अहमद बीमार रहने लगा, जब ज्यादा बीमार हो गया तो पटवारी निसार अपने गाँव चला गया, राम प्रसाद इस सारी घटना से अनभिज्ञ था, जब इस बात को कुछ दिन बीत गए …

एक दिन एक लड़का आकर राम प्रसाद से मिला और उसने अपना परिचय दिया, “ताऊ जी! मैं पटवारी निसार अहमद का बेटा हूँ, अब्बा ने मुझे आपको बुला लाने के लिए भेजा है वह सख्त बीमार हैं एवं चल फिर नहीं सकते, आप मेरे साथ मेरे गाँव चलें।”

राम प्रसाद तुरंत ही निसार अहमद के गाँव के लिए चल पड़ा, निसार के गाँव में जाकर देखा कि निसार खाट पकड़े है चल फिर भी नहीं सकता। उसकी ऐसी हालत देख कर राम प्रसाद बड़ा दुखी हुआ। निसार ने राम प्रसाद को अपनी चारपाई के नजदीक बैठाया और बताने लगा, “भाई! मैंने तुम्हारा चक गाँव के पास वाली सबसे उपजाऊ जमीन में लगाया था लेकिन कानूनगो ने मेरे ही सामने तुम्हारे चक को काट कर गाँव के सबसे दूर वाली जमीन में लगा दिया जहां कुछ भी पैदा नहीं होता था, चारों तरफ झाड़ झंखाड़ खड़े थे, भाई मुझे माफ कर देना मैं तुम्हारे नमक का कर्ज़ अदा नहीं कर सका।”

राम प्रसाद की आँखों से टप टप आँसू बहने लगे और रोते हुए पटवारी निसार से कहा, “पटवारी जी! इस बात को आपने अपने दिल में ही दबाये रखा और इस हालत में पहुँच गए, मुझे उसी दिन बता देते तो शायद यह सब नहीं होता। कानूनगो ने मुझे जमीन तो देनी ही थी, बेदखल तो कर नहीं सकता था, जैसी भी दी है उसमे मेहनत करके उसको ही उपजाऊ बना लेंगे लेकिन आप अपने दिल से यह नमक के कर्ज़ व फर्ज़ वाली बात बिलकुल निकाल दें।”

राम प्रसाद पटवारी निसार अहमद को अपने घर ले आया, अच्छे से अच्छे वैद्य को दिखाया, खूब सेवा की तो पटवारी निसार अहमद ठीक हो गया, तब तक राम प्रसाद ने अपने चक से सारे झाड़ झंखाड़ निकाल कर सिंचाई के लिए वहाँ एक ट्यूब वेल लगवाया और ज़्यादातर जमीन में गन्ने की फसल बो दी। अच्छी सिंचाई, खाद और देखभाल से फसल बड़ी अच्छी हुई।

एक दिन राम प्रसाद पटवारी निसार अहमद को अपनी बैलगाड़ी में बैठा कर अपना नया चक दिखाने ले गया। उस जमीन में इतनी अच्छी गन्ने की फसल देखकर निसार आश्चर्यचकित रह गया और उसको जो आत्मग्लानि का भाव था वह पूरी तरह समाप्त हो गया।

शाम को खाना खाने के बाद निसार अहमद ने कहा, “राम प्रसाद आज मैं बहुत खुश हूँ और अब स्वस्थ भी हो गया हूँ, सुबह मैं अपने गाँव जाऊंगा क्योंकि अब मैं निश्चिंत हो गया हूँ, अब मेरी समझ में आ गया है कि मेहनती और ईमानदार आदमी को कोई भी हरा नहीं सकता और ना ही उसको किसी की सहानुभूति की आवश्यकता होती है।”

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