सैंतीसवाँ पन्ना Jahnavi Suman द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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सैंतीसवाँ पन्ना

सैंतीसवाँ पन्ना

-सुमन शर्मा

सैंतीसवाँ पन्ना

हिमालय पर्वत की विस्तृृत पर्वतमालाओं के मध्य से एक पगडंडी गुजरती थी। हिम से ढकी पर्वत मालाएँ, जो सुबह सवेरे की ताजा़ धाूप में, सुनहरी आभा बिखेरती हुई, फ़ूल पत्तों के साथ-साथ हर जीव जन्तु को गुदगुदा रही थी। सड़क के इर्द गिर्द देवदार के लम्बे लम्बे पेड़ खड़े इतरा रहे थे।

इन लम्बी विस्तृत पहाड़ियों के नीचे नारायण मंत्र - मुग्ध सा खड़ा था। नारायण मुम्बई में एक चलचित्र निर्माता था। अपनी फिल्मों के लिए नए-नए स्थानों की तलाश करना नारायण का शौक और पेशा दोनो ही था।

वह पतली सी पगडंउी पर रोमांचित हुआ चल रहा था। ‘‘क्या इन पर्वत श्रृखंलाओं की गोद में कोंई बस्ती है?’’ नारायण यह सोचता हुआ सर्द हवाओं से बचने के लिए स्वयं में सिमटा जा रहा था। वह कुछ ही दूर चला था, कि सड़क के किनारे चाय की केतली से निकलते हुए धुआं ने उसे अपनी ओर खींच लिया।

‘‘साहब चाय लेगें क्या?’’ घिसे पुराने, लेकिन धो कर साफ़ किए बुशर्ट-पैंट पहने, तरह-चौदह साल के लड़के के सवाल के जवाब में नारायण केवल हामी भरकर रह गया। पहाड़ से लुढ़कर गिरे तीन बड़े-बड़े पत्थरों पर जमाई हुई थी- चाय की छोटी सी दुकान। एक छोटे पत्थर पर, दो व्यक्ति पहले ही से चाय की चुस्कियाँ ले रहे थे। लड़के ने अंगोछे से दूसरे पत्थर को साफ़ करते हुए कहा, ‘‘आइए साहब बैठ जाईए।’’

पाँच सितारा हॉटल में ठहरने वाले नारायण को यह सीधाा-सच्चा स्वागत लुभा गया। लड़के ने चाय छानने के लिए जैसे ही काँच का गिलास उठाया , नारायण ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘नहीं, काँच के गिलास में नहीं। डिस्पोज़ेबल में दे दो।’’ लड़के ने कहा, ‘‘साहब इस गिलास का एक रुपया ज़्यादा लगेगा।’’ नारायण ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘तुम दो रुपए ज़्यादा ले लेना।’’ लड़के ने थरमोकोल का गिलास नारायण को थमाते हुए पूछा, ‘‘पकौड़े नहीं खाईगा?’’ नारायण सड़क के किनारे बिक रही वस्तुएँ खाने का आदि नहीं था, उसने कहा, ‘‘अरे नहीं।’’

लड़के ने अन्य ग्राहकों के लिए पकौड़े बनाने का काम प्रारम्भ कर दिया। उसने भगोने में पहले से घुले हुए बेसन में हाथ घुमा कर, तसतरी में काट के रखी सब्जियों, गोभी, आलू और हरिमिर्च को बेसन मे लपेट-लपेट कर , कढ़ाई में खौल रहे घी में डालना शुरु कर दिया। सर्द हवाओं के बीच गर्मा-गर्म पकौडों की खूशबू से नारायण मुग्ध हो गया। उसने लड़के से कहा, ‘‘अच्छा चलो पकौड़े भी खिला दो।’’ लड़के ने फ़ट से झरनी उठा कर उलट पलट कर सुनहरा होने तक पकौड़ो को तला, फि़र भगोने के नीचे दबे हुए कागज़ों में से एक कागज़ निकाल कर, उसमें चार पाँच पकौड़े रखकर उस पर मसाला बुरका और पोदीने की चटनी एक दोने में डाल कर नारायण के सामने पकौड़े परोस दिए।

पकौड़े जिस कागज़ में परोसे गए थे, उस पर बहुत ही सुन्दर लिखावट मे कुछ लिखा हुआ था। जैसे-जैसे पकौड़े उदर की भूख को तृप्त करते रहे, वैसे-वैसे कागज़ पर बिखरे शब्द, उनके पीछे छिपी कहानी के प्रति, नारायण की जिज्ञासा को बढ़ाते रहे। पकौड़े समाप्त होते ही नारायण बड़े ध्यान से उस कागज़ को पढ़ने लगा। न जाने एक-एक शब्द में कैसा जादू छिपा था। कागज़ के दाहिने ओर कोने में लिखा था--‘सैंतीसवाँ पन्ना "’ ऐसा लगता था, किसी कहानी का अंश हो।

कहानी ‘चंदन दास चटौरी मल’ नामक किसी व्यक्ति पर लिखी गई है। नारायण ने चाय वाले लड़के से कहा, ‘ सारे कागज़ देना।’ लड़के ने कहा, क्या कागज़ जलाकर आग तापियेगा’, नारायण ने कहा, ‘नहीं, नहीं और पूछा, ‘ये कागज़ कहाँ से लाते हो?’ उसने जवाब दिया, ‘हमारे पिताजी लाते हैं।’ नारायण ने उलट पलट कर देखा। उस पन्नें की लिखावट जैसा दूसरा कागज़ कोई न था।

नारायण ने फि़र सवाल किया, ‘कहाँ हैं तुम्हारे पिताजी?’’ लड़के ने कहा, ‘‘आज तो यहाँ नहीं हैं। सौदा लेने के लिए वो शहर गए हैं।’’

‘क्या नाम है तुम्हारे बाबूजी का?’ नारायण ने प्रश्न किया। लड़के का उत्तर था, ‘छींटा प्रसाद।’ नारायण के चेहरे पर आश्चार्य और प्रश्न का मिश्रित भाव उभर आया। उसने लड़के से पूछा, ‘‘छींटा प्रसाद का क्या अर्थ हुआ?’’ लड़के ने उत्तर दिया, ‘जब हमारे बाबूजी छोटे थे, तब की बात है,- हमारी दादीजी कढ़ाई में पकौड़े तल रहीं थी, हमारे बाबूजी दौड़े-दौड़े वहाँ पहुँचे और गरम-गरम तेल में ठप्प से हाथ मार दिया। तेल के छींटे उनके मुँह पर पड़ गए। जले के निशान स्थाई हो गए। जभी से उनका नाम ‘छींटा प्रसाद’ पड़ गया।

नारायण ने लड़के से पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’( लड़के ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, ‘डुमरी प्रसाद।’ ‘‘डुमरी प्रसाद! इस नाम के पीछे भी क्या कोई रोचक कहानी है?’’ नारायण ने लड़के से पूछा। लड़का खिलखिला के हँस दिया। वह बोला, ‘हमें क्या पता हमारे पिताजी से पूछना।’

नारायण ने 'सैंतीसवाँ पन्ना लिखा हुआ कागज़ मोड़ कर अपनी जेब में रख लिया। उसने मुम्बई से आई अपनी टीम को फ़ोन कर, अपनी गाड़ी मँगवाई और हॉटल की ओर चल दिया।

हॉटल के जगमगाते फ़र्श और झिलमिलाते बल्ब आज उसे लुभावने नहीं लग रहे थे। उसे प्राकृतिक सौन्दर्य से भरी वह पहाड़ की तलहटी याद आ रही थी। रात का भोजन कर वह जल्दी ही बिस्तर में चला गया। सैंतीसवें पैन का जादू अभी भी उस पर चढ़ा हुआ था। गुदगुदे बिस्तर पर लेटे-लेटे वह ‘चंदन दास चटोरी मल’ की कहानी के विषय में सोच रहा था।

उस कहानी के आगे पीछेे की कहानी को जानने की जिज्ञासा के कारण उसे रात बहुत लम्बी लग रही थी, किन्तु थकावट के कारण उसे शीघ्र नींद आ गई।

कोहरे की चादर मे लिपटी पहाड़ियों के ठीक पीछे, गहरे नीले नभ में सूर्य उदय से पूर्व,छिटकती हुई लालीमा ने सुबह की दस्तक देदी थी। पत्तों पर मोती सी चमकती ओस की बूँदे भी सवेरे की गवाही दे रही थीं।

नारायण नहा धाोकर तैयार हो गया। आज उसे हॉटल में डाईनिंग हॉल में परोसे गए औपचारिक नाश्ते में ज़रा सी भी रुचि न थी। उसने अपने डईवर को बुलाय और कहा, ‘गाड़ी उसी पहाड़ी की तलहटी पर ले चलो, जहाँ कल गये थे।’( ड्राइवर ने स आदर कहा, ‘जी साहिब!’ और उसने कार का दरवाज़ा नारायण के लिए खोल दिया। नारायण के कार में बैठते ही, पहाड़ो की गोल-गोल घुमावदार सड़को पर कार चल दी। नारायण बराबर खिड़की से बाहर देख रहा था।

उस पुराने स्थान को पहचानने में उसे तनिक भी देर न लगी। उसने डईवर से कहा, ‘‘बस, बस। यहीं रोको।’’ नारायण उतर कर , उसी पगडंडी पर चल दिया।

दालचीनी वाली चाय की खुशबू दूर से ही आ रही थी। नारायण के वहाँ पहुँचते ही, चाय वाले लड़के ने मुस्कुरा कर उस का स्वागत किया और बिना कुछ बोले चाय का गिलास उसे थमा दिया। नारायण ने लड़के से पूछा, ‘‘कहाँ हैं तुम्हारे पिताजी?’’ लड़के ने चाय की केतली आग पर रखते हुए कहा, ‘‘बाबूजी तो आज भी नहीं आएगें।’’

नारायण कुछ झुंझलाकर अपनी जेब से "सैंतीसवाँ पन्ना" लिखा कागज़ निकालता है । वह लड़के से पूछता है, ‘‘बस्ती किस ओर है?’’ लड़का बिना कुछ बोले उँगली से एक ओर ईशारा करता है। नारायण उसी दिशा में बढ़ जाता है।

सबसे पहले उसे कुछ छात्र दिखाई दिए। उसने उन्हें, वह कागज़ दिखाते हुए पूछा, ‘‘क्या तुम्हारी किसी किताब में यह कहानी है?’’ उनमें से एक छात्र ने उत्सुकता पूर्वक ,कागज़ को , अपने हाथ में लिया। उसकी कूछ पक्तियों को पढ़ कर, छात्र ने 'नहीं' में सिर हिलाया और चल दिया।सफ़ा नारायण को वापिस सौंप दिया।

बस्ती में केवल दो ही स्कूल थे। नारायण ने दोनों के अध्यापकों से सफ़ा नम्बर चौबीस के विषय में जानने की कोशिश की,लेकिन सैंतीसवे पन्नें की कहानी का कोई सुराग नहीं मिला।

नारायण कहाँ हार मानने वाला था। बस्ती के प्रत्येक घर में जाकर नारायण ने सैंतीसवे पन्ने के विषय में, जानने का निश्चय किया ।

दस बारह घरों में निराशा हाथ लगने के बाद, वह पीपल वाली गली के एक ऐसे मकान में पहुँचा जहाँ आँगन में गहरा सन्नाटा और कमरे में घोर अँधेोरा था।

उसके दरवाज़ा खटखटाने पर अंदर से एक बूढ़ी औरत की आवाज़ आयी, ‘‘कौन है?’’ नारायण ने कहा, ‘‘मैं एक अजनबी हूँ अम्मा।’’ यह सुनकर बिस्तर पर लेटी हुई बुढ़िया उठकर बैठ गई और तकिये के नीचे रखे अपने चश्मे को ढूँढने लगी। तब तक नारायण भी भीतर पहुँच गया था।

नारायण ने आगे बढ़कर चश्मा अम्मा को पकड़ा दिया। अम्मा के चेहरे पर एक विचित्र तेज़ था। नारायण ने अम्मा से क्षमा माँगते हुए कहा, ‘‘अम्मा! मैंने व्यर्थ आप का समय लिया। मैं तो इस कागज़ पर लिखी हुई, आधाी अधाूरी कहानी को पूरा करने के लिए सब के द्वार पर जा रहा हूँ।’’

अम्मा ने जिज्ञासा वश उस कागज़ की ओर देखा। नारायण उसे वापिस जेब में रखकर, बाहर जाने के लिए जैसे ही मुड़ा, तो अम्मा ने उसे टोका, ‘‘अरे मुझे भी तो दिखाओ, कौन सी कहानी अधाूरी है।’’ नारायण ने अनमने भाव से कागज़ अम्मा की ओर बढ़ा दिया। अम्मा ने कागज़ हाथ में लेकर जैसे ही उस पर निगाह डाली, वह आश्चार्य से खिल उठी, ‘‘यह तो मेरा सफ़ा है।’ नारायण आश्चार्य चकित होकर अम्मा का मुँह ताकने लगा।

अगले ही क्षण वह चिंतित होकर बोली, ‘‘तुम्हें यह कहाँ मिला?’’ नारायण कुछ समझ नहीं सका। अम्मा ने हाथ से टटोल कर अपनी लाठी उठाई और लड़ख्ड़ाती हुई दीवार में बनी एक अलमारी के पास पहुँची। वह अलमारी में रखे सामान को उलट पलट कर कुछ ढूँढ रही थी। ‘‘अरे मेरे कागज़ कहाँ चले गए?’’ बोलते हुए उसकी आवाज काँपने लगी। वह रुआँसी होकर बोली, आने दो शाम को उस छींटा प्रसाद को आज उसकी अच्छी तरह ख़बर लेती हूँ ।’

नारायण ने कहा, ‘‘छींटा प्रसाद? कहीं वह चाय-पकौड़े वाला तो नहीं?’’ अम्मा ने वापिस बिस्तर पर बैठते हुए कहा, ‘ हाँ वही तो है- छींटा प्रसाद।’ नारायण ने कहा, लेकिन यह माज़रा क्या है?’ अम्मा ने मटके की तरफ़ ईशारा किया। नारायण ने एक गिलास पानी भरकर अम्मा को दे दिया। अम्मा ने पानी पीकर बताना शुरु किया। ‘‘मैंने आठवीं कक्षा तक पढ़ाई की है। उसके बाद मेरी शादी हो गई। मेरे ससुराल वाले गरीब किसान थे। यहाँ पढ़ाई का कोई महत्त्व नहीं था। धीरे -धीरे मैं भी खेती बाड़ी में रम गई। समय बीतता गया और मेरा परिवार बढ़ता गया। नए सदस्य परिवार में जुड़ते रहे और मैं बूढ़ी हो गई।

अब, जबकि मैं अपने पोते के साथ, बहुत खुश थी, अपने बचपन की बाते याद कर उसे कहानियाँ सुनाती थी, और जीवन में सबसे अधिक सुखद समय व्यतीत कर रही थी, ठीक उसी समय यह पावन नदी जो सदियों से गाँव के लोगों की प्यास बुझाती है, न जाने गाँव वालों पर क्यों क्रोधित हो गई।

दस साल पहले ऐसी बाढ़ आई की अपने साथ आधे से ज़्यादा गाँव को बहा ले गई। मेरा तो सब कुछ बह गया, मेरा परिवार मेरी खुशियाँ, मेरा प्यारा सा पोता। सब बहा ले गई, यह नदिया।’’

अम्मा एक साँस में बोलती जा रही थी। शायद अब तो उसकी आँखों से आँसू भी सूख चुके थे। वह बोली, ‘‘बस रह गया तो यह पत्थर का मकान और निर्जीव सा मेरा शरीर।’’

नारायण अम्मा की सब बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। अम्मा ने ठंडी आह भरते हुए कहा, ‘‘मैं अपने पोते को ‘चंदन दास चटोरी मल’ की कहानी सुनाती थी, जिसे सुनकर वह बहुत हँसता था।

उसके जाने के कुछ साल तक तो मुझ में और मेरे घर के पिछवाड़े की पहाड़ी में कोई अंतर नहीं रह गया था। बाद में, मैं कुछ सँभली।

मैंने बाजार से कुछ काग़ज़ मँगवाकर वो कहानियाँ उन कागज़ों पर लिख दी। यह सोचती थी, मेरा पोता इस धारती पर पुनर्जन्म लेगा और यह कहानी पढ़कर शायद मुझे याद करेगा । मैं इस की किताब छपवाना चाहती थी। लेकिन जहाँ गई, निराशा हाथ लगी। लोग मुझ पर हँसते थे। जहाँ जाती, लोग कहते ‘बुढ़िया अपने पोते के गम में पागल हो गई है। ऐसे छपती है क्या किताब?’

नारायण ने अम्मा को बीच में टोकते हुए पूछा,:‘यह छींटा प्रसाद कौन है?’’ अम्मा ने कहा छींटा प्रसाद का घर नदी के बहुत समीप था। बाढ़ में उसका परिवार तो बच गया, मगर घर बह गया। मैंने उसके परिवार को अपने घर में शरण दे दी। उसे छत मिल गई, मुझे दो समय की रोटी । ’’ अम्मा ने फिर से पानी की घुँट पी और बोली, छींटा प्रसाद शहर में किसी किताब छापने वाले को जानता है। लेकिन वह इस काम के लिए बहुत पैसा माँगता है। मैंने छींटा प्रसाद से कह दिया था, कि मेरे मरने के बाद इस मकान को बेच कर मेरी किताब छपवा देना और वह मान गया था।’( नारायण ज़ोर से चिल्लाया, ‘‘वह तो इन कागज़ों में पकौड़े बेच रहा है।’’ अम्मा ने रोते हुए, अपना सिर पकड़ लिया। नारायण ने अम्मा को दिलासा देते हुए कहा, ‘‘मैं अभी छींटा प्रसाद से सारे कागज़ वापिस लाकर देता हूँ ।’’

नारायण ताबड़-तोड़ उस चाय वाले की तरफ़ दौड़ा। वहाँ जाते ही उसने भगोने के नीचे रखे सारे कागज निकाल लिए। लेकिन वहाँ सारे कागज़ समाचार पत्र से, काटे हुए थे। नारायण उनमें से जल्दी-जल्दी लिखे हुए कागज़ ढूँढ रहा था। चाय वाले लड़के ने कहा, ‘‘बाबूजी क्या हो गया?’’ नारायण ने कहा, ‘बुढ़िया अम्मा के हाथ से लिखे हुए कागज़ कहाँ है?’ लड़के ने पूछा, ‘‘कौन से कागज़?’’ नारायण ने कहा, ‘ज़्यादा भोले बनने की ज़रुरत नहीं है। अरे! वहीे जिसमें कल तुम पकौड़े दे रहे थे।’ लड़के ने कहा, ‘‘ वो सब कागज़ तो कल आपने देखे ही लिए थे। वो सब खप गये। आज तो मेरी माताजी रद्दी वाले से और कागज़ लकरे आई हैं।’’

नारायण ने गुस्से से, लड़के को झंझोड़ दिया। उसने लड़के से पूछा, ‘तुमने बुढ़िया अम्मा की अलमारी से कागज़ क्यों निकाले?’ लड़के ने रोते हुए कहा, ‘‘बाबूजी मेरा कोई दोष नहीं है, मुझे क्षमा कर दो। मेरे पिताजी शहर जा रहे थे, उन्होने ही मुझे कहा था, ‘‘ कागज़ कम पड़ जाएँ तो अलमारी से ले लेना।’’

नारायण उल्टे क़दम अम्मा के पास लौट आया। निराश आँखों से अम्मा दरवाजे पर टकटकी लगाए हुए थी। नारायण को खाली हाथों लौटा देखकर वह बोली,‘‘मैं तो पहले से ही जानती थी अब वो कागज़ नहीं मिलेगें।’’ नारायण ने कहा, ‘कोई बात नहीं अम्मा जी! आप मुझे सुनाना अपनी सब कहानियाँ मैं उन पर फिल्म भी बनाउँगा और किताब भी छपवा दूँगा।’’ अम्मा की आँखों में खुशी के आँसु झिलमिला ने लगे। नारायण ने अम्मा से विदा लेते हुए कहा, ‘‘कल कैमरा लेकर आउँगा, अपनी पसंद की खूबसूरत साड़ी पहनना। बालों में गजरा लगाना, मैं सब लेकर आऊँगा।’’

अगले दिन नारायण सवेरे बहुत जल्दी उठकर तैयार हो गया। उसने अपनी टीम को पहले से ही निर्देश दे दिया था। सुबह के सात बजे सब निकल गए, अम्मा के घर की ओर। नारायण वहाँ पहुँचा तो अम्मा के घर के बाहर भारी भीड़ लगी हुई थी।

नारायण ने अम्मा से कहा, सबसे पहले ‘चंदन दास चटोरी मल’ की कहानी सुनाओ।

कहानी समाप्त होते ही, नारायण ख़ुशी से चिल्लाया,‘अम्मा अब सब कुछ ठीक हो जाएगा।’

वह आगे बताता है, ‘दस वर्ष पूर्व एक फ्लिम की शूटिंग के दोरान, पास की नदी में एक लड़का बहता हुआ आया, जिसे मैं अपने घर ले गया था। वह अपना नाम, गाँव का नाम सब भूल चूका था । बस उसे तो ‘चंदन दास चटोरी मल’ कहानी की कुछ पंक्तियाँ याद थी , जो आपके सैंतीसवे पन्नें पर लिखी हैं, और याद थी , बालों में गजरा लगाए, अपनी दादी माँं। वह बालक, जले हुए गालों के व्यक्ति का ज़िक्र भी, कभी कभी करता था । छींटा प्रसाद मुझे हूबहू ,वैसा ही लगता है। नारायण ने अम्मा से कहा ,"मुझे पूरा विशवास है अम्माजी वह बालक ,जो नदी के साथ बहता हुआ आया था ,आपका ही पोता है। मैं उसे लेकर शीघ्र लौटूंगा।

अम्मा से विदा ले, नारायण वहाँ से चला आया।

अम्मा की आँखे डबडबा रही थी, और हाथों में लहलहा रहा था, सैंतीसवाँ पन्ना ।

सुमन शर्मा

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