कबूतर बाज Ved Prakash Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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कबूतर बाज

कबूतर बाज

“बेटा! रसोइया बदला है क्या?” लाला राम दयाल ने अपने बेटे बच्चू मल से यह सवाल किया तो बच्चू लाला जी का मतलब समझ गया और उसने हाँ कह दिया। “बेटा इस रसोइये को हटा दो नहीं तो यह हमे कंगाल कर देगा।” “अच्छा पिताजी” कहकर बच्चू सीधा उस नए रसोइये के पास गया जो उसने आज ही काम पर रखा था।

“महाराज जी! लाला जी को खाने में क्या दिया था आपने?” बच्चू ने रसोइये से पूछा। रसोइया बोला, “मैंने तो जैसा आपने बताया था कि बड़े लाला जी को मूंग की दाल और फुल्का देना है, वही बना कर ले गया था। बढ़िया दाल बना कर उसमे हींग जीरे का छौंक लगा कर और फूला हुआ गरम गरम फुल्का घी लगा कर ले गया था लाला जी के लिए, और पूछने लगा कि क्या लाला जी खाने की कोई शिकायत कर रहे थे।”

बच्चू ने कहा, “अब मेरी बात ध्यान से सुनना और वैसे ही करना जैसे मैं बता रहा हूँ, दाल में दाने कम और पानी ज्यादा डालना, जब आधी कच्ची आधी पक्की रहे तो उसको चूल्हे से उतार लेना, फुल्का भी आधा कच्चा आधा पक्का रखना और याद रखना कि ना तो दाल में छौंक लगाना और ना ही फुल्के पर घी लगाना।” रसोइये को पूरी तरह समझा कर कबूतर बाज अपने कबूतर उड़ाने चला गया।

बच्चू को कबूतर पालने और शर्त लगा कर उड़ाने का बड़ा शौक था इसलिए लोगों ने उसका नाम भी कबूतर बाज रख दिया था। शर्त लगा कर कबूतर उड़ाने के लिए बच्चू दूसरे शहर में भी जाता रहता था। कबूतर बाजी की शर्तें कभी बच्चू जीत जाता तो कभी हार भी जाता था, वैसे वह जीतता कम था और हारता ज्यादा था। कबूतर बाजी के चलते बच्चू अपने कारोबार पर भी ध्यान नहीं दे पाता था और ज़्यादातर नौकरों के भरोसे ही काम चलता था।

लाला राम दयाल ने अथाह संपत्ति बनाई थी, बाजार की आधी से ज्यादा दुकाने लाला जी की ही थी और शहर के बीचों बीच महलनुमा बड़ा मकान भी लाला राम दयाल का ही था। लाला जी ने घर के चारों तरफ काफी जगह खाली छोड़ रखी थी, ऊंची ऊंची चारदीवारी करवा कर उस पर तार कसवा रखे थे जिससे कोई अनचाहा घर के अंदर ना प्रवेश कर सके।

अब लाला जी काफी वृद्ध हो गए थे उनकी एक ही संतान थी लाला बच्चू मल, जो लाला जी के कारोबार को संभालता था, संभालता क्या बस उत्तराधिकारी होने के नाते उसको यह सब करना पड़ता था जबकि उसका मन तो हमेशा ही कबूतर बाजी में उलझा रहता था।

शाम का खाना खाने के बाद लाला राम दयाल ने अपने बेटे को बुलाकर पूछा, “बेटा! रसोइया बदल दिया है?” तो बच्चू ने हाँ पिताजी कहकर जवाब दिया तो लाला जी बोले, “हाँ, यह रसोइया ठीक है, मैं शाम को उसका बनाया हुआ खाना खाकर ही समझ गया था।”

कुछ दिन बाद लाला राम दयाल जी तो चल बसे और सारी संपत्ति लाला बच्चू मल के नाम आ गयी। अब बच्चू को कोई भी रोकने टोकने वाला नहीं था।

उस दिन कबूतर बाजी में बच्चू मल पचास हजार रुपए की शर्त हार गया। इतना पैसा उसके पास नहीं था तो उसने एक दुकान जो हमेशा बंद पड़ी रहती थी, पैसों के बदले में उस व्यक्ति को दे दी जिसने शर्त जीती थी। बच्चू तो कभी अपनी बंद पड़ी दुकानों मकानों को खोल कर भी नहीं देखता था बस जरूरत पड़ने पर एक एक करके उनको बेचता रहता था और कहता था, “मुझे क्या जरूरत है कुछ करने की, मेरे पिताजी की छोड़ी हुई संपत्ति को पूरा जीवन भी बेचता रहूँगा तो भी काफी बच जाएगी।”

बच्चू मल का यह निट्ठला पन ही दूसरों के लिए फायदे का सौदा बन जाता था। जो बंद दुकान बच्चू मल ने पचास हजार रुपए की शर्त हार कर दे दी थी, उस दुकान को बच्चू मल ने कभी खोल कर भी नहीं देखा और ना ही यह जानने की कोशिश की कि कहीं दुकान में कोई सामान भर कर तो बंद नहीं कर दी थी? और वही हुआ कि जिसने दुकान ली थी उसको तो कई गुना लाभ मिल गया, जैसे ही उसने दुकान खोली तो पाया कि दुकान में पता नहीं कब से सरसों की बोरियाँ भर कर लगा रखी थी। चूंकि सरसों चाहे कितने दिन रखी रहे खराब नहीं होती बल्कि पुरानी सरसों और भी बढ़िया हो जाती है। जब उस व्यक्ति ने उस सरसों के भंडार को बेचा तो वह एक लाख रुपए में बिक गया और इस तरह उसने उसी दिन से कबूतर बाजी छोड़ दी एवं उस दुकान में एक शानदार मिठाई की दुकान खोल ली और नाम रखा, “बच्चू मल शुद्ध देसी घी की मिठाई” उसका पुश्तैनी हलवाई का काम था अतः दुकान बढ़िया चल निकली।

उधर बच्चू का समय खराब चल रहा था, एक एक करके सभी दुकाने शर्तों में हारता जा रहा था, जुआ खेलने की आदत और पड़ गई थी। बच्चू की इन आदतों से तंग आकार उसकी धर्म पत्नी रामवती बीमार भी रहने लगी, बच्चों की तरफ भी ध्यान नहीं दिया जा रहा था, बच्चू तो बच्चों और पत्नी की तरफ ध्यान देता ही नहीं था, उसको कबूतर बाजी से फुर्सत मिलती तो घर परिवार या संपत्ति की तरफ ध्यान लगाता।

अंग्रेज़ भारत छोड़ कर जा रहे थे, देश आज़ाद हो गया था लेकिन रामवती तो एक औरत थी जो घर की चारदीवारी में कैद थी उसको आज़ादी कहाँ मिली थी, वह तो आजादी के पहले भी बच्चू को समझा नहीं सकी थी और न ही आज़ादी के बाद समझा सकी थी। आज़ादी के बाद जमींदारी प्रथा समाप्त कर दी गयी, सारी ज़मीनें किसानों के पास चली गयी, किसानों के पास से लगान के रूप में आने वाली मोटी रकम भी अचानक बंद हो गयी, ऐसे में कारोबार को संभालना, नौकरों को तंख्वाह देना मुश्किल हो गया और सभी वफादार कहे जाने वाले नौकर धीरे धीरे लाला बच्चू मल यानि कबूतर बाज को छोड़ कर चले गए।

पचास मील लंबा हरिद्वार का रास्ता था और इस रास्ते के सभी गांवों मे लाला राम दयाल का जमींदारा था। हुआ यूं कि लाला राम दयाल प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या को अपने रथ में सवार होकर हरिद्वार गंगा स्नान के लिए जाते थे, अपनी प्रत्येक यात्रा के दौरान लाल राम दयाल रास्ते में पड़ने वाले किसी एक गाँव को खरीद लेते थे, इस तरह लाला जी ने पचास मील लंबे रास्ते के सारे गाँव खरीद लिए और लगान उगाहने के लिए मुंशी जी को छोड़ दिया। इस तरह लाला जी का रथ अपने घर से निकल कर हरिद्वार तक अपनी ही जमीन में चलता था लेकिन रास्ते के बीच में पड़ने वाला एक गाँव अभी भी लाला जी की जमींदारी से बाहर था।

एक दिन जब लाला जी का रथ हरिद्वार जा रहा था तो बीच में वह गाँव भी पड़ा। उस गाँव में एक किसान अपने खेत में पानी सींच रहा था तो लाला जी के रथ से पानी की नाली के किनारे टूट गए, रथ आगे बढ्ने लगा तो किसान ने आवाज लगाकर पानी की नाली ठीक करने को कहा। रथवान रथ से उतर कर नाली ठीक करने लगा तब किसान ने उसको मना कर दिया और कहा, “नाली तो लाला ही ठीक करेगा।” तभी लाला राम दयाल रथ से उतर कर आए और फावड़ा लेकर पानी की नाली ठीक कर दी। रथ आगे बढ़ गया और हरिद्वार पहुंचा, हर की पैड़ी पर स्नान करके वापस चल दिये घर के लिए लेकिन घर पहुँचने से पहले लाला जी ने वह गाँव भी खरीद लिया और अब पूरा घर से हरिद्वार तक का रास्ता लाला जी की अपनी जमीन में था, अपने जमींदारे में था।

आज आजादी मिलते ही अचानक लिए गए एक फैसले ने पूरे जमींदारे से पूरी जमीन से लाला जी के परिवार को बेदखल कर दिया और लगान के रूप में होने वाली मोटी आमदनी बंद हो गयी।

रामवती और दुखी रहने लगी थी और उसके दुख के कारण उसके शरीर में कैंसर जैसी बीमारी ने प्रवेश कर लिया। बच्चू मल को अपनी पत्नी की भयंकर बीमारी की भी चिंता नहीं थी और वह अपने कबूतर बाजी के शौक में ही मस्त था। रामवती आखिरी साँसे गिन रही थी, मरने से पहले आखिरी बार पति के दर्शन करने के लिए बार बार संदेश भिजवाने पर भी लाला बच्चू मल नहीं आए क्योंकि उसने पैंजनिया वाली कबूतरी पर आज एक बड़ा दांव लगा रखा था।

इंतज़ार करते करते रामवती ने प्राण त्याग दिये, इधर रामवती के प्राण निकले उधर पैंजनिया कबूतरी भी अचानक आसमान से जमीन पर आ गिरी और मर गयी, लाला बच्चू मल अपनी आखिरी संपत्ति भी हार गए थे।

आज लाला बच्चू मल के पास कुछ न बचा था, सब कुछ खतम हो गया था। जीवन में कबूतर बाज़ी के सिवा न तो कुछ सीखा था और न ही कुछ किया था। लाला बच्चू मल को “बच्चू मल शुद्ध देसी घी की मिठाई” वाली दुकान पर बर्तन साफ करने की नौकरी मजबूरी में करनी पड़ी।

एक बार एक आदमी अपने दोस्तों को दुकान पर पार्टी देने के लिए ले गया और उसने लाला बच्चू मल को पहचान लिया जो वहाँ पर लोगों के जूठे बर्तन धो रहा था, तब उसने अपने दोस्तों को दुकान और बर्तन धोने वाले का क्या रिश्ता विस्तार से बताया। कुछ दिन बाद बच्चू मल जी की मृत्यु हो गयी जो अपने बच्चों को भी कंगाली की हालत में छोड़ गयी, इस तरह एक कबूरत बाज का अंत हो गया।

अब उसका बड़ा बेटा बस ड्राईवर बन गया और एक प्राइवेट बस चलाने की नौकरी करके घर को संभालने की कोशिश में लग गया।