माँ का कंकाल Ved Prakash Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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माँ का कंकाल

माँ का कंकाल – भाग एक

“माँ तुम रो क्यों रही हो? सब ठीक तो है? जरा चुप होकर पूरी बात बताओ।” आकाश ने माँ का फोन आने पर पूछा ही था कि गोमती और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। गोमती ने अपने बेटे आकाश को अमेरिका में फोन तो कर दिया लेकिन रोने के अलावा उसके मुंह से कोई आवाज निकल नहीं रही थी तभी पास खड़े चाचा ने गोमती से मोबाइल फोन लेकर आकाश को बताया, “बेटा, तुम्हारे पिताजी अब इस दुनिया में नहीं रहे, तुम जल्दी आने की कोशिश करो जिससे इनका दाह-संस्कार किया जा सके।”

आकाश, गोमती और राघव की अकेली संतान था, आई आई टी से बी-टेक और आई आई एम से प्रबंधन की पढ़ाई पढ़ कर सीधा अमेरिका चला गया था। साठ लाख का पैकेज मिला था आकाश को, उस समय गोमती कितनी खुश हुई थी, पूरे मोहल्ले में मिठाई बांटी थी और यह कहती घूम रही थी, “मेरे बेटे को अमेरिका की बड़ी कंपनी में नौकरी मिली है, साठ लाख का पैकेज मिला है मेरे बेटे को, अब अमेरिका जाएगा मेरा बेटा।” इतनी खुश तो वह जीवन में कभी हो ही नहीं पायी थी। अपने बेटे की तरक्की पर राघव भी बहुत खुश हुआ था लेकिन वह कुछ कम ही बोलता था। विश्वास नगर में राघव और गोमती पचास साल तक रहे, राघव गाँव से जब दिल्ली नौकरी करने आया तब शुरू में वहीं पर किराए पर रहा और बाद में वहीं पर एक मकान ले लिया था। उस मकान में ही गोमती को ब्याह कर लाया और उसी मकान में राघव का जन्म हुआ। विश्वास नगर में पूरा मोहल्ला राघव को जानता था, किसी भी खुशी या गम में सैंकड़ों लोग तो चुटकी बजाते ही जमा हो जाते थे लेकिन अमेरिका जाने के बाद आकाश को उस मोहल्ले में रहना अच्छा नहीं लगता था।

आकाश ने साकेत में एक बहुत बड़ा महँगा फ्लोर खरीद कर अपने माँ-बाप को वहाँ शिफ्ट कर दिया था। साकेत वाले मकान में आकर आकाश बोला था, “पापा, यहाँ से अब मुझे हवाई अड्डा भी नजदीक पड़ेगा और आप लोग भी एक अच्छी सोसाइटी में रह सकेंगे, कहाँ वहाँ यमुना पार की एक थर्ड क्लास कॉलोनी में रह रहे थे।” इसी बीच आकाश ने विश्वास नगर वाला मकान भी बेच दिया और अमेरिका वापस चला गया।

दिल्ली के साकेत वाले फ्लैट में राघव और गोमती अपने को अकेला सा महसूस करते थे। शुरू शुरू में तो विश्वास नगर से कोई न कोई मिलने चला आता था लेकिन समय के साथ-साथ यह सिलसिला भी बंद हो गया। राघव अकेलेपन के कारण अवसाद में रहने लगा और इस अवसाद के कारण ही उसको शुगर, ब्लड प्रेशर आदि बीमारियाँ रहने लगीं। नए घर में आकर राघव और गोमती ने यही सोचा था कि अब आकाश शादी भी कर लेगा।

उन्होने एक सुंदर लड़की भी उसके लिए देख रखी थी, लेकिन उनको बड़ा सदमा तब लगा जब आकाश ने वहीं अमेरिका में ही अपने साथ काम करने वाली लड़की भूमि से वहीं पर शादी कर ली और अपनी शादी के लिए अपने माँ-बाप की राय लेना भी उचित नहीं समझा। शादी करने के बाद एक बार भूमि को मिलाने के लिए जरूर लाया था, तभी दोनों समझ गए थे कि बहू उनको पसंद नहीं करती है।

भूमि अमेरिका मे ही पैदा हुई पली-बढ़ी लड़की थी जिसके माँ-बाप वर्षों पहले अमेरिका आ गए थे। भूमि अपने माता-पिता की अकेली संतान थी, करोड़ो डौलर की संपत्ति उसके माँ-बाप के पास थी। एक बड़ा सा महलनुमा घर, जिसमे अब आकाश भी रह रहा था। अमेरिकन डौलर की चमक में वह हिंदुस्तानी रुपए को बिलकुल भूल चुका था एवं भूमि के इशारों पर नाचने लगा था।

आज फोन पर माँ का ज़ोर-ज़ोर से रोना और फिर पापा के मरने की खबर सुनकर आकाश स्वयं को रोक नहीं सका और बरबस ही उसकी आँखों से अश्रु धारा बह निकली। भूमि ने आकाश के हाथ से फोन लिया और काट दिया क्योंकि वह समझ तो गयी थी कि आकाश के घर पर कुछ बुरा हुआ है।

“भूमि! चलने की तैयारी करो हमें अभी इसी समय दिल्ली के लिए निकलना है, मैं टिकट का प्रबंध करता हूँ।” आकाश भूमि को यह सब कहकर स्वयं लैप-टॉप खोल कर बैठ गया टिकट के इंतजाम के लिए। शुक्रवार की शाम थी और शनिवार रविवार को भूमि ने आकाश के साथ अपने मम्मी-पापा को घुमाने का प्रोग्राम बना रखा था इसीलिए भूमि की इतनी जल्दी अमेरिका से दिल्ली नहीं जाना चाह रही थी अतः बोली, “आकाश! मूर्खों जैसी बातें मत करो, हम अमेरिका में हैं और चाह कर भी इतनी जल्दी नहीं जा सकेंगे कि तुम दाह-संस्कार अपने हाथों से कर सको। जून का महीना है, भयंकर गर्मी है, कोई भी उस मृत शरीर को इतने दिनों तक रखने की राय नहीं देगा। हम रविवार के बाद किसी भी दिन चलेंगे।

कल हम मम्मी-पापा के साथ योजनानुसार समुद्र-तट पर घूमने चलेंगे, तुम्हारा मन भी ठीक हो जाएगा। वह तो मर चुके हैं, अब तुम जल्दी जाओ या देर से, उनको तो जिंदा नहीं कर दोगे, जो यहाँ जिंदा हैं उनको हमने काफी पहले से घूमने के लिए कह रखा है। अब तुम फोन करके बता दो कि अभी टिकट नही मिला, चार दिन बाद आ सकेंगे तब तक आप लोग पिताजी का दाह संस्कार करवा दीजिये।”

साथ में भूमि यह भी बोली, “जून का महीना है, दिल्ली की गर्मी में हमारा बुरा हाल हो जाएगा अतः जितना कम वहाँ रुकेंगे उतना ठीक रहेगा और तुम्हारे पापा को क्या ढंग से मरना भी नहीं आया, जून में मरें है, दूसरों को भी मारेंगे गर्मी में। थोड़े दिन और इंतज़ार नहीं कर सकते थे, सर्दी शुरू होने पर ही मर लेते लेकिन उन्होने तो शायद सोच ही रखा था कि मन मुताबिक बहू नहीं मिली तो किसी तरह तंग करूँ चाहे उसके लिए गर्मी में ही मरना पड़े।”

भूमि की इस तरह की बातें सुनकर आकाश को दुख तो बहुत हुआ मगर वह कर कुछ नहीं सकता था, भूमि की बात मानने के अलावा उसके पास कोई रास्ता नहीं था। आकाश ने फोन पर चाचा को अपनी मजबूरी इस तरह समझाई कि वह भी उसे सच मान गए और उसने अपने बड़े भाई का अंतिम संस्कार कर दिया। माँ राह देखती रही लेकिन बेटा नहीं आया और आया भी तो चार दिन बाद जब उनकी अस्थियाँ भी विसर्जित हो चुकी थी।

आकाश की अनुपस्थिति में उसके चाचा ही सब देखभाल कर रहे थे इसीलिए वे साकेत में ही रुक गए थे जबकि बाकी लोग सुबह आकार शाम तक वहीं रुकते फिर विश्वास नगर चले जाते। विश्वास नगर से साकेत था भी बड़ी दूर लेकिन जहां अपनापन व प्रेम हो वहाँ दूरी नहीं देखी जाती। चौथा, दसवां और तेरहवीं आदि की सभी प्रक्रियाएं पूरी हो चुकी थीं, बाकी सभी लोग जा चुके थे, बस चाचा ही रुके हुए थे।

चाचा बोले, “आकाश बेटा! तुम्हें जब अमेरिका में ही रहना था तो तुमने विश्वास नगर का घर बेच कर भैया भाभी को यहाँ अंजान जगह पर लाकर अकेला छोड़ दिया, वहाँ रहते तो हम लोगों के साथ इनका भी मन लगा रहता।” आकाश तो कुछ नहीं बोला लेकिन भूमि को यह बात सहन नहीं हुई एवं बड़े ही कड़वे लहजे में बोली, “आप लोगों को अच्छी ज़िंदगी जीने की आदत नहीं है न, वहीं गंदी बस्ती में कीड़े-मकोड़े की तरह रहने की आदत जो है। आकाश ने क्या बुरा किया जो अपने माँ-बाप को एक अच्छा जीवन जीने का मौका दिया।” बहू की इस तरह की बातें सुनकर चाचा भी विदा लेकर चले गए। जिसने सब कुछ किया उसको ही भूमी ने इस तरह बेज्जत कर दिया और आकाश चुप रहा।

अगले भाग में पढे, माँ साथ गयी या............