Ek thopa hua sangraam books and stories free download online pdf in Hindi

एक थोपा हुआ संग्राम

एक थोपा हुआ संग्राम

योगिता विस्मित थी. शादी के बाद, औपचरिकताओं का सिलसिला तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा था. विवाह के नाम पर रिसेप्शन, पतिदेव के दोस्तों ने पहले ही रखा था. फिर हुआ एक ‘गेट टुगेदर’- नवविवाहित युगल की तरफ से. ऑफिस के सहकर्मी, परिवार सहित पधारे- एक दूसरे आयोजन में. यहाँ तक तो ठीक था; पर सबसे ज्यादा असहज, वह क्लब के फंक्शन में हुई. क्योंकि उसके पति ऋषभ का सपाट निर्देश था- “आज तुम्हारा मेकअप ऐसा होना चाहिए कि तुम ही सबसे सुंदर लगो” बात उसे कुछ जमी नहीं. उसकी सुन्दरता पर रीझकर ही तो, ऋषभ ने उसे पसंद किया था. सगाई के बाद, जब वे लॉन्ग ड्राइव पर जाते- उसका मंगेतर, पंकज उदास की एक ख़ास गजल, बारम्बार रिप्ले करता, “अच्छी सूरत को संवरने की जरूरत क्या है, सादगी भी तो कयामत की अदा होती है...”

तब योगिता खूब समझती कि वह गाना, उसी के लिए बजाया जा रहा है. वो दीवानापन, कहीं एक खूबसूरत भरम तो नहीं था? ‘स्यूडो कल्चर’ की चमक में- धुंधला रहा था जो. जलसे के दौरान, बॉस की पत्नी से, परिचय हुआ; “मीट माई वाइफ मैम. यू नो- शी इज इ ग्रेट कुक! कभी हमारे घर आइये खाने पर....वैसे थोडा- बहुत गा भी लेती है, पर सबके सामने गाने में...शाई फील करती है!” फटाफट बता दिया था, ऋषभ ने.

“ओह” मिसेज़ बॉस ने चहककर कहा, “ ‘लेडीज़ मीट’ में- शी कैन गिव अस, सम कुकिंग टिप्स...ऑर समटाइम्स कुकिंग डेमो एज वेल! यू नो- अगर वो चाहे तो, हमारे कोरस सोंग में पार्टिसिपेट भी कर सकती है- यू सी... न्यू इयर सेलीब्रेशन के लिए, वी आर प्रिपेयरिंग ए ग्रुप सोंग...”

“श्योर मैम” जवाब में उसके पतिदेव बोले - गर्व से फूलते हुए. सुनकर खीज हो आई थी योगिता को! ऋषभ तो माँ की ‘टोन’ में बोल रहे थे . ऐसे ही माँ भी ‘लड़के वालों’ के सामने, उसे किसी बिकाऊ सामान की तरह पेश करती थी. लेकिन शादी के बाद... क्यों फिर से वही?!! ऋषभ ही क्यों, क्लब में तीन और बन्दे थे- जिनकी नई नई शादी हुई थी. वे भी अपनी अपनी बीबी का, बढ़ चढ़कर ‘महिमामंडन’ कर रहे थे! जो भी हो, इन चारों ‘न्यूली- वेडेड कपल’ का वहां मौजूद भीड़ से परिचय कराया गया, क्लब की तरफ से उन्हें एक एक ‘बुके’ मिला, ‘बेस्ट विशेज’ के साथ. स्टेज पर मौजूद उन जोड़ों को देखकर, लोगों में कानाफूसी शुरू हो गयी.

“विनोद की बीबी गोरी जरूर है, पर थोड़ी मोटी है”

“और सुबोध वाली तो सांवली लग रही है...लेकिन सुना है बहुत दहेज़ लायी है!”

“सबसे ज्यादा स्मार्ट रंजन वाली है”

“पर स्टाइल कुछ ज्यादा मार रही है”

“मैं तो कहूं हूँ- सबसे प्यारी ऋषभ की घरवाली है”

“प्यारी- माई फुट, मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं “

“नई नई है- शर्माती होगी...धीरे धीरे ही खुलेगी हम सबसे”

लेकिन इस बात से, ज्यादातर महिलाएं असहमत थीं. योगिता का कम बोलना, उन्हें अखर जरूर रहा था. यहाँ तो वैसी ही बात हो गयी- “बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना!” उन्हें कौन समझाता,” अरे देवियों, जाओ पहले अपना अपना घरबार देखो...दूसरों के मामले में टांग ना अडाओ!”

महिलाये ही क्यों, पुरुष भी उत्सुकता से, उन ‘नयी लड़कियों’ पर आँखें गडाए थे. शादीशुदा आदमी, ज्यादा कुछ नहीं कह रहे थे (जो होना था सो हो ही गया, अब कमेन्ट करके फायदा?!) कुंवारे जरूर चर्चा कर रहे थे( उनके लिए रास्ता अभी खुला हुआ था) विनोद, सुबोध, रंजन और ऋषभ के बीच अनजाने ही “ मेरी शर्ट तेरी शर्ट से सफ़ेद कैसे” वाली तर्ज पर “ मेरी वाली तेरी वाली से .....” टाइप की होड़ लग गयी थी. ये नए ज़माने के लड़के भी अजीब होते हैं! बीबी न हो- नयी बाईक हो मानों; जो प्रतिष्ठा का प्रश्न बनी हुई थी.

बात यहीं ख़तम हो जाती तो कोई बात न थी. पर ये चारों नवयुवक, जिनकी अभी नई नई शादी हुई थी- एक अलग ही श्रेणी में आ गये; या यूँ कहें- अपना एक अलग वर्ग, बना लिया था उन्होंने...और उनकी पत्नियाँ भी चाहे अनचाहे उस वर्ग की सदस्य हो गयीं थीं. इसके चलते, उनमें इंटरैक्शन, साथ साथ उठना बैठना और आउटिंग अक्सर होते. कॉर्पोरेट समाज की यह एक बहुत बड़ी विशेषता है कि ऑफिस के सहकर्मी, ऑफिस द्वारा दी गयी आवासीय सुविधा के तहत; एक ही कॉलोनी में रहते हैं. तो क्या कार्यालय के भीतर चलने वाली प्रतिद्वंदिता, उनके पारिवारिक- सामाजिक जीवन में भी मुखर नहीं होती?

शायद हाँ...! और इस आग को बराबर हवा देतीं- परिसर की अधेड़ महिलाएं. योगिता से मिलने के बहाने आतीं और उसे कुरेदने के लिए, कुछ न कुछ बक जातीं, “रंजन की बीबी है ना- अरे वो संगीता, क्या बढ़िया पॉप- डांस करती है! तुमने भी कुछ स्टेप्स तो सीखे होंगे? क्यों न एक डांस- पार्टी करें....”

“ क्या नाम है मिसेज सुबोध का- हाँ वंदना...जब मैंने तुम्हारी कुकिंग स्किल्स के बारे में बताया तो बोली- ‘हम तो मैडम, अपने घर में कुछ काम नहीं करते थे, दस ठो नौकर जो थे; इस कुकिंग- शुकिंग के चक्कर में कौन पड़ता’ लो बताओ! गृहस्थी बसाई है और खाना पकाना तक नहीं आता....”

मिसेज विनोद उर्फ़ मालविका अपने घर को कैसे सजाकर रखती है- वह भी इन औरतों की बदौलत ही जान पाई योगिता. उसके पति के अविवाहित दोस्त भी, कुछ कम न थे- इधर की बात उधर करने में. ‘भाभी भाभी’ करते हुए आते और चाय- नाश्ते के दौरान संगीता, वन्दना और मालविका की चर्चा करते रहते. एक अजीब सा दबाव था- इन नई ‘घरैतिनों’ पर. पतिदेव के समक्ष, खुद को औरों से बेहतर साबित करने का दबाव. घुटन सी होने लगी. मानों किसी अघोषित युद्ध में- जबरन घसीट लिया गया हो! इसी क्रम में आती थीं- मालविका की ‘लो नेक’ वाली स्ट्रिप्ड ड्रेसें- जो उसकी चर्बी को काफी हद तक छुपा लेती थीं; वन्दना के स्लीवलेस ब्लॉउज़, जो लोगों का ध्यान, उसकी सांवली रंगत और साधारण नाक- नक्श से हटाकर; उसकी छरहरी देह की तरफ खींच लेते थे. रह गयीं वह और संगीता- जो देखने- सुनने में ठीक थीं फिर भी उस ‘महाभारत’ में प्रतिभागी बनी हुई थीं.

जब कभी ऋषभ, दबी जबान से विनोद, सुबोध या रंजन की बीबियों की तारीफ करता तो योगिता कुलबुला उठती. इसलिए नहीं कि वह उनसे जलती थी, बल्कि इसलिए; क्योंकि पति के लहजे में उसे- जलने की बू आने लगी थी! वह तो अपनेआप को खुशनसीब मानती थी कि उन दोनों ने एक दूसरे को, ठीक से जान- समझकर अपनाया था- सारे गुण- दोषों के साथ. उसने सपने में भी न सोचा था कि अरेंज्ड मैरिज की तरह, उनकी लव मैरिज को भी ऐसे इम्तेहान से गुजरना होगा; जिसमें दोनों पार्टनर एक- दूजे को इम्प्रेस करने में लगे रहते हैं, जिसमें वे एक दूजे को पूरी तरह से काबू में ले लेना चाहते हैं. जिसमें वे जताना चाहते हैं कि अपने साथी के लिए, वे ही सबसे अधिक सुयोग्य हैं!! विवाह के शुरूआती वर्षों में, जब दैहिक- आकर्षण चरम पे होता है, जीवन साथी साथ बंधा रहता है- कमर में खुंसे चाभी के गुच्छे की तरह!

इन सुनहरे दिनों में, पति का ध्यान; परायी औरतों की ओर जाना, कुछ ठीक न लगा योगिता को. क्यों सदा स्त्री को ही, खुद को साबित करना पड़ता है? क्यों सदा उसे ही, पुरुष को रिझाने के जतन करने पड़ते हैं?? वह भी चाहे तो पति में हजार खोट निकाल सकती है- परन्तु उसके हिस्से में तो, साध्वी जैसी प्रतिबद्धिता ही आती है; समाज का यह दोगलापन, कहीं गहरे कचोटता है; आहत करता है! योगिता का मन विद्रोह कर उठा. उस द्रोह को उद्वेलित करने लगीं -मालविका की लो नेक वाली स्ट्रिप्ड ड्रेसें, वंदना के स्लीवलेस ब्लॉउज़, संगीता के व्यवहार में उतर आई बनावट और.....और खुद उसके मन की हलचलें!!

उसे याद आया कि जब छोले जल जाते थे तो माँ बड़ी सहजता से, पापा को बता देती कि वह छोले मिसेज अग्रवाल ने भेजे हैं और पापा बिना किसी हील-हुज्जत के, उन्हें चट कर जाते; बल्कि तारीफ़ भी करते, “बढियां बने हैं”. वाह री पुरुष जाति...जिसे परायी पत्तल का भात, हमेशा ही बड़ा दिखायी देता है! योगिता ने मन ही मन कुछ सोचा और एक रणनीति तैयार की. उस रणनीति के तहत, वह घर का काम निपटाकर; अपनी समवयस्का सहेलियों से मिलने चल देती. यह सहेलियां और कोई नहीं, उसके साथ ‘रेस का घोडा’ बनी हुई संगीता, मालविका और वन्दना थीं. बार बार मिलने से, वे आपस में खुलने लगीं. परस्पर सुख- दुःख का आदान प्रदान हुआ और संवेदनाओं के सूत्र, स्वतः ही जुड़ गये.

परन्तु उनके पतियों को इस ‘मेल- मिलाप’ की खबर तक न थी. क्योंकि यह सब तब होता, जब वे लोग अपने काम- धंधे में लगे होते. योगिता ने प्रयास करके, अपनी इन सखियों को, परस्पर मैत्री की प्रेरणा दी. उसका प्रयास फलीभूत हुआ. चारों युवतियों के बीच का दुर्भाव, छंटने लगा था धीरे धीरे...और उसके स्थान पर नई दोस्ती के अंकुर फूटने लगे. इससे एक लाभ ये हुआ कि परायी स्त्री को ढाल बनाकर, उनके पति जो तीर उन पर छोड़ते थे – वह उन्हें, अब उतना नहीं कचोटता था. फिर किसी दिन मालविका ने, एक झकझोर देने वाला रहस्योद्घाटन किया. उसने, उनके पतियों को आउटहाउस में बतियाते सुना था. सुबोध कह रहा था, “ भई मजा आ गया, जबसे मैंने योगिता भाभी के लुक्स की तारीफ की है, वन्दना का बहुतेरा समय; सजने संवरने में बीतता है”

“और मालविका ने जबसे, संगीता भाभी की डांसिंग स्किल्स के बारे में जाना है...डांस सीखने की जिद करने लगी है ..हा हा- अच्छा ही है ; स्लिम हो जाएगी”

“इन औरतों को जलाने- तडपाने का एक दूसरा ही मजा है...इसके साथ, प्यार की खुमारी बढती ही चली जाती है” इस बार ऋषभ बोला था. “हाँ यार! बिलकुल सही कह रहे हो....औरतें तो वैसे ही जलकुकड़ी होती हैं और इसी से- जल्दी झांसे में भी आ जाती हैं!!” रंजन का कहना था. तो स्पर्धा अब, ‘एन्जॉयमेंट’ के स्तर तक पहुँच चुकी थी! अहम का टकराव, अब रूप बदलकर; कुछ और ही हो गया था !! यह पुरुष, अपनी शिक्षित पत्नियो को भी- जहालत में धकेल रहे थे... उन्हें मोहरा बनाकर खेल खेल रहे थे...उनके वजूद को, कठपुतली बनाने की जुगत में- किसी तानाशाह की तरह, हावी होने के लिए!!! तुरत फुरत सब सखियों ने मिलकर, पतियों को सबक सिखाने की योजना बना डाली.

जब ऋषभ ऑफिस से लौटता, योगिता की कोई न कोई सहेली; अक्सर बैठी हुई मिलती. कभी वंदना, कभी मालविका तो कभी संगीता. उसे देखते ही योगिता कोई न कोई जुमला उस पर उछाल देती, “वंदना ने कल ढेर साडी शौपिंग की है ...मुझे भी शौपिंग पर ले चलो ना- सुबोध भाई की तरह!!”

“मालविका के साथ, विनोद भाई ने बहुत मेहनत करवाई है – घर को सेट करने में ....एक तुम हो कि कुछ करते ही नहीं!”

“मुझे भी संगीता की तरह वो मेले वाला एंटीक पीस चाहिए...क्यों न आज ही चले?!”

यही नहीं वे लोग पतियों को ‘मेस’ में खाने की ताकीद करके, साथ घूमने निकल जातीं और देर तक लौटतीं. धीरे धीरे ऋषभ, इन सबसे आजिज़ आ गया था. एक दिन कह उठा, “क्या बात है? आजकल मेरे लिए, तुम्हारे पास बिलकुल टाइम नहीं है!”

“तुम्हारे लिए ही तो कर रही हूँ यह सब. किसलिए की है दोस्ती- तुम्हारे फ्रेंड्स की बीबियों से?... इसीलिए तो कि उनसे वह सब कुछ सीख सकूं- जो मुझे नहीं आता और जिसकी वजह से, ‘कॉम्प्लेक्स’ होता है तुम्हें!”

“ क्या मतलब?!”

“मतलब मालविका से इनटीरियर डेकोरेशन और संगीता से ‘गेट- अप’ सुधारने की टिप्स ले रही हूँ...वंदना के साथ शौपिंग एक्सपीरिएंस भी. यू नो इट्स ग्रेट!”

“व्हाट इज ग्रेट अबाउट दिस?” ऋषभ ने चिढ़कर कहा, “दे डोंट नो एनीथिंग...क्या ख़ाक सिखाएंगी तुम्हें?!!”

“पर तुम्हीं तो उनकी तारीफ़...!”

“आई वाज़ क्रेजी- टू हैव सेड दोज थिंग्स”

“बट यू नो... इट हर्ट्स!!” योगिता ने मौका नहीं चूका था और तब ऋषभ को हथियार डालने ही पड़े. वह थोड़ी देर को चुप लगा गया; फिर सोचकर बोला, “ठीक है मेरी माँ! अब कभी उनकी चर्चा नहीं करूंगा ...पर तुम भी इस तरह टाइम वेस्ट करना बंद करो”

“एज यू विश!!!” योगिता ने कंधे उचका दिए थे. मन ही मन हँसते हुए वह सोच रही थी- “चलो छुट्टी मिली इस रोज रोज की कच कच से!”

अन्य रसप्रद विकल्प

शेयर करे

NEW REALESED