वो पाँच Ved Prakash Tyagi द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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वो पाँच

बूढ़ी माँ और कमरा

चम्पा को अपने बच्चों पर बड़ा विश्वास था, पति की मृत्यु के बाद बेटे, पोतों के साथ ही अपना जीवन बिता रही थी। पोते बड़े होने लगे तो घर में जगह कम पड़ने लगी। चम्पा ने अपने लिए एक बड़ा कमरा छत पर बनवा रखा था और उसमे ही रहती थी, उसका सारा सामान और पति की सारी यादें भी उसी मे बसी थीं। एक दिन बहू सविता कहने लगी, “माताजी, आप किसी छोटे कमरे में अपना समान रख लो, अब बच्चों के लिए जगह कम पड़ने लगी है, घर मे दो दो बहुए भी आ गयी है, परिवार भी बढ़ ही रहा है।“ लेकिन चम्पा ने कहा, “इस कमरे में तो मेरे जीवन भर की यादें बसी हैं अतः जीते जी तो मैं यह कमरा नहीं छोड़ सकती।“ चम्पा की यह बात सविता को अच्छी नहीं लगी और एक रात उसने मौका पाकर, जब चम्पा गहरी नींद में सो रही थी उसके मुंह पर तकिया रख कर तब तक दबाये रखा जब तक वह मर नहीं गयी। इस सब को सविता का पोता मनोज जो अभी पाँच साल का ही था, देख रहा था। सविता ने पोते को देखा तो उसके पैरों तले की जमीन खिसक गयी। वह थोड़ा संभली एवं पोते मनोज को गोद में लेकर लाड़ प्यार करने लगी। सविता ने मनोज से इस बात को भूल जाने को कहा। मनोज भी अपने दादी के प्यार में अभिभूत होकर उस समय तो सब भूल गया।

परिवार काफी बढ़ गया था, मनोज भी जवान हो गया था और सविता काफी बूढ़ी हो गयी थी। आज फिर बच्चों के लिए कमरा खाली चाहिए था। इस बार मनोज ने दादी सविता से सिर्फ एक ही बात कही, “दादी, आपको वृद्धाश्रम छोड़ आता हूँ, नहीं तो रात में तकिये का प्रयोग करना पड़ेगा“। मनोज दादी सविता को वृद्धाश्रम छोड़ कर उसका कमरा अपने बच्चों के लिए खाली करने लगा।

बंदर की चालाकी

जनपथ पर जो फलों की दुकान है, उसके आस पास काफी बंदर रहते हैं। बंदर उस पूरे क्षेत्र में भवनों और वृक्षों पर इधर-उधर घूम कर खाने का सामान ढूंढते रहतें है। फलों की दुकान से फल उठाना उनके लिए एक आसान काम है लेकिन दुकान के मालिक की सतर्कता के कारण फल उठाने में सफल नहीं हो पाते।

एक दिन जब मैं दुकान पर खड़े होकर चाय पी रहा था तब मैंने देखा कि एक बड़ा बंदर और एक छोटा बंदर साथ-साथ चले आ रहे हैं। दुकान के नजदीक पहुँच कर दोनों बंदर अलग-अलग चलने लगे। बड़े वाला बंदर दुकान के सामने से आकर फल उठाने की कोशिश करने लगा तो दुकानदार ने उसे मारने को डंडा उठाया, लेकिन अपनी आदतानुसार बंदर खों खों करके दुकानदार को डराने लगा। जिस समय बड़े बंदर ने दुकानदार का पूरा ध्यान अपनी तरफ खींच रखा था, उसी समय अवसर पाकर छोटा बंदर दुकान के पीछे से आया और केले का एक गुच्छा उठाकर पेड़ पर चड़ गया। जब तक दुकानदार उसकी तरफ दौड़ा तब तक वह पेड़ पर काफी ऊपर जा चुका था और बड़ा बंदर भी छोटे बंदर के पास ही पहुँच गया था। दोनों बंदर पेड़ पर बैठ कर आराम से केले खा कर छिलके दुकान पर फेंक रहे थे जैसे दुकानदार को चिढ़ा रहे हों और कह रहे हों कि हमें भी चालाकी आती है।

बेटी का फरमान

पति की प्रतिदिन शराब पीकर मार-पीट कि आदत से तंग आकर प्रीति अपने मैके आ गयी। प्रीति ने सारी बातें अपनी माँ को बताई, तब माँ ने यही सलाह दी कि कुछ दिन दूर रहोगे तो शायद दुर्गेश को अपनी गलती का एहसास हो जाएगा और वह अपनी आदतें सुधार कर तुम्हें यहाँ से ले जाएगा। एक दिन दुर्गेश प्रीति से मिलने आया और प्रीति को घर चलने के लिए कहने लगा, लेकिन बातों-बातों में दोनों के बीच गरमा-गर्मी होने लगी और दुर्गेश प्रीति के साथ मार-पीट करने लगा। यह सब देख कर प्रीति की माँ बीच-बचाव करने आई तो दुर्गेश और भी भयंकर हो गया, उसने प्रीति को छोड़ कर अपनी सास को पकड़ लिया और कहने लगा, “सारे झगड़े की जड़ तू ही है आज मैं तेरा ही काम-तमाम कर देता हूँ” और दुर्गेश ने पूरी ताकत से अपनी सास का सिर दीवार में दे मारा, प्रीति देखती ही रह गयी और दुर्गेश ने उसकी माँ को मार डाला।

दुर्गेश को पुलिस पकड़कर ले गयी, प्रीति चश्मदीद गवाह थी। प्रीति ने तय कर लिया था कि दुर्गेश को सख्त से सख्त सजा दिलवा कर रहेगी। एक दिन प्रीति के ससुर प्रीति के पास आए और प्रीति को समझाने लगे, “बेटा, माँ को तो तुमने खो ही दिया है, अब अपने पति को तो बचा लो, तुम्हारा उसके साथ जीवन भर का साथ है। सब भूल कर नए सिरे से अपना जीवन शुरू करो, मैं आश्वासन देता हूँ कि तुम्हें किसी तरह कि तकलीफ नहीं होने दूंगा।” अपने ससुर की बात सुन कर प्रीति का चेहरा क्रोध से लाल हो गया और ऐसे तमतमा गया जैसे स्वयं दुर्गा का अवतार हो, प्रीति गुस्से में भर कर अपने ससुर से बोली, “आप क्या समझते हैं कि मैं ऐसे व्यक्ति की पत्नी बनकर रहूँगी जिसने मेरी आँखों के सामने ही मेरी माँ को निर्दयता से मार डाला, दुर्गेश एक अपराधी है और उसको उसके किए अपराध की सजा अवश्य मिलेगी, मैं अबला नहीं दुर्गा हूँ प्रीति तो अब बहुत पीछे रह गयी।”

चाँद अली

‘आज तो आपको मेरे साथ चल कर मेरी फैक्ट्री को अपनी पगधुली से पवित्र करना ही पड़ेगा, जब से आप यहाँ से गए हैं मेरी आपसे पहली बार मुलाक़ात हो रही है, मैंने सभी से आपके बारे में पूछा लेकिन किसी ने कुछ भी नहीं बताया, आज तो मेरा भाग्य जग गया है जो अचानक आपके दर्शन हो गए‘ और इस तरह अपने मन के उद्गार प्रकट करते हुए चाँद अली ने अपनी बड़ी सी गाड़ी मे बैठने के लिए मुझे मजबूर कर दिया, मजबूरी बस उसका इस तरह से प्यार जताना था। अपनी बड़ी सी नई चमचमाती गाड़ी मे बैठा कर चाँद अली मुझे अपनी फैक्ट्री मे ले गया। चाँद अली की एक्सपोर्ट के कपड़े सिलने की फैक्ट्री थी जिसमे काफी मशीने लगी थीं और लगभग पचास कारीगर काम करते थे।

चाँद अली बिहार से दिल्ली काम की तलाश मे आया था, और उस समय ही उसकी मेरे से बात हुई थी, करीब दस वर्ष पुरानी बात है कि चाँद अली आकर मेरे पैरों मे गिर पड़ा था एवं बार बार विनती कर रहा था कहीं पर नौकरी लगवाने के लिए। मैं सरकारी नौकरी में था तो उसको ऐसा लगता था कि मैं उसको कहीं भी सरकारी नौकरी मे लगवा दूंगा, इसीलिए वह बार बार मेरे से विनती करता था, ‘साहब मेरी नौकरी लगवा दो’।

उन दिनों हमारे विभाग मे मजदूरी का काम करने वाले लड़कों को दिहाड़ी पर रखते थे, लेकिन उसके लिए भी वह शर्तें पूरी नहीं कर पाया और दिहाड़ी मजदूर की नौकरी से भी वंचित रह गया शायद यह उसके लिए कोई शुभ संकेत था क्योंकि भगवान अगर किसी को कोई बड़ा लाभ देना चाहता है तो उसको छोटे लाभ से वंचित कर देता है और यही चाँद अली के साथ भी हुआ। मुझे भी कुछ अच्छा नहीं लग रहा था कि मैं उस युवा की कोई सहायता नहीं कर पाया। एक दिन मेरी पत्नी सिलाई मशीन पर कुछ सिलाई कर रही थी, तभी चाँद अली आ गया, वह अक्सर आता जाता रहता था, पड़ोस में ही किराए पर रहता था। चाँद अली ने मेरी पत्नी को सिलाई मशीन पर काम करते देखा तो कहने लगा, “दीदी आप हटो यहाँ से, मैं सिल कर दूंगा आपको कपड़े” मैंने पूछा, “क्या तुम सिलाई जानते हो?” तब उसने बताया, “हाँ साहब मैं तो सब तरह के कपड़े सिल लेता हूँ, हमारा तो यह पुश्तैनी काम है।”

अगले दिन मैं चाँद अली को लेकर बाज़ार गया और वहाँ से उसको एक पैरों वाली सिलाई मशीन दिलवाई, जो उस समय करीब ढाई सौ रुपये की थी, पैसों का भुगतान मैंने कर दिया। चाँद अली कहने लगा, “साहब अब मैं इसका क्या करूंगा।” तब मैंने उसको बताया, “तुम्हें सिलाई का काम देने के लिए मैंने एक एक्सपोर्ट कंपनी में बात की है।” और मैंने उसको समझाया की तुम अपनी पूरी मेहनत और लगन से काम करोगे तो काफी तरक्की कर जाओगे। अगले दिन मैं चाँद अली को लेकर उस कंपनी में गया और वहाँ मैनेजर से उसका परिचय करवा दिया।

इस बात को गुजरे दस वर्ष हो गए थे और मैं सब कुछ भूल गया था लेकिन आज चाँद अली से अचानक मेरी मुलाक़ात हुई तो सब कुछ मेरी आँखों के सामने घूम गया। मुझे बड़ी प्रसन्नता थी कि मेरा बोया हुआ बीज बड़ा पेड़ बन गया था जो अपने साथ-साथ और पचास लोगों की रोजी-रोटी का साधन बना हुआ था।

रक्षा-बंधन पर चाँद अली घर आया, साथ में एक बड़ा सा डिब्बा था, मेरी पत्नी से राखी बँधवाई और उसको उपहार स्वरूप वह बड़ा सा डिब्बा दिया जिसे खोला तो देखा एक नई तकनीक वाली सिलाई मशीन थी। मैंने उसको इतना कीमती उपहार देने को मना किया तो कहने लगा, “भाई साहब, आप इस बारे में कुछ नहीं बोलेंगे, यह तो हम दोनों भाई बहन के बीच की बात है।” ऐसा कहकर उसने मुझे चुप करा दिया।

झूठे का मुंह काला

अरविंद अपने पिता गोविंद को झूठी मन-घडन्त बातों से लोगों का मन बहलते देखता तो उसका मन भी करता कि वह भी कुछ ऐसा झूठ बोले जिसे लोग सच मन लें। लोगों को इस तरह की झूठी बातें सुनने में बहुत आनंद आता अतः गोविंद भी चटखारे लेकर झूठ को ऐसे सुनता जैसे सच हो। अरविंद बचपन से अपने पिता की इस तरह की झूठी बातें सुनता आ रहा था। एक दिन गोविंद के बेटे अरविंद ने भी अपने पिता की तरह लोगों के बीच जाकर कहा, “आज मैंने आसमान में एक जलता हुआ दिया उड़ते देखा।” अरविंद ने सोचा था कि लोग उसको बात पर विश्वास करेंगे लेकिन उसकी बात पर किसी ने भी विश्वास नहीं किया उल्टे उसको झूठा कहकर शर्मिंदा भी कर दिया। अरविंद को इस बात से बड़ा दुख हुआ और वह निराश होकर सोचने लगा, ‘मेरे पिताजी इन्ही लोगों को जब सौ प्रतिशत झूठी बात को सच बना कर सुनाते है तो ये सब उसका आनंद लेते हैं, मैंने तो पहली बार ही झूठ बोला था, किसी ने भी विश्वास नहीं किया।’ अरविंद ने मायूस होकर सारी बात पिताजी को बताई तब गोविंद ने बेटे को समझाया, “बेटा, तुमने अपना झूठ तर्कपूर्ण ढंग से लोगों के सामने नहीं रखा। झूठ को सच बनाने के लिए तर्क देना पड़ता है। अब देखना मैं कैसे तुम्हारे झूठ को सच बनाऊँगा और लोग तुमसे अपने गलत व्यवहार के लिए माफी भी मांगेंगे।” गोविंद जब शाम को लोगों के बीच बैठ कर बातें कर रहा था तो उसने बताया, “भाइयों, आज एक महिला जैसे ही देवता पर दिया जलाकर पीछे हटी तभी उस जलते हुए दिये को एक कौआ अपनी चोंच मे दबाकर आसमान में उड़ गया, दिया ऊपर तक जलता ही रहा,” जैसे ही उसने अपने बेटे के झूठ को तर्कपूर्ण तरीके से लोगों के सामने रखा तो सब उसको सच मान गए और पछताते हुए कहने लगे, ”हाँ भाई यही बात अरविंद ने भी हम सब को बताई थी लेकिन हम सब ने तो उसकी बात को झूठ माना और उसे झूठा भी कहा भाई हमें माफ कर देना।” अरविंद भी चुपचाप खड़ा सारा वार्तालाप सुन रहा था। वह समझ गया कि झूठ को सच बनाने के लिए तर्क देना पड़ता है।

इस तरह अपने पिता के सान्निध्य में अरविंद झूठ बोलने मे पारंगत हो गया। अरविंद जान गया था कि भीड़ उसके झूठ पर पूरा विश्वास कर लेती है अतः उसने तय किया कि वह राजनेता बनेगा। अरविंद अपने झूठे भाषणों के सहारे बड़ा राजनेता बन गया लेकिन वह झूठ बोलने के अलावा कुछ भी नहीं करता था। धीरे-धीरे लोगों के सामने उसकी सच्चाई आने लगी और वो समझ गए कि वे लोग एक झूठे और मक्कार आदमी के झांसे मे आ गए हैं। लोग अपनी भूल पर पछता रहे थे एवं मौका देख रहे थे कि कैसे अरविंद को सबक सिखाएँ तभी कुछ ऐसा हुआ कि एक सच को झूठ साबित करने के लिए अरविंद लोगों को उकसाने का काम करने लगा। लोग तो पहले से ही उसके खिलाफ थे अतः मौका मिलते ही सबने मिलकर अरविंद को घेर लिया एवं लात-घूंसों से मारना शुरू कर दिया, और उसका मुंह भी काला कर दिया। पुलिस ने बीच में आकर उसको बचाया लेकिन तब तक लोग उसकी हर एक हड्डी तोड़ चुके थे एवं एक झूठे मक्कार को सबक सिखा चुके थे। इसीलिए तो कहते हैं,

“सच्चे का बोलबाला झूठे का मुंह काला।”