जल ही जीवन है Pawnesh Dixit द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

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जल ही जीवन है

“जल ही जीवन है”

जल ही जीवन है का नारा देते- देते अब वह राहगीर थक चुका था| अपने मोहल्ले से यात्रा शुरु की थी बेचारे ने तंग गलियों से होता हुआ आस पास के इलाकों से जन समूह के नाम पर इक्का –दुक्का ही लोगों तक अपना सन्देश पहुँचाने में वो कामयाब हो सका था | उसके नारों पर कोई एक टक निगाह डालकर उसके चश्मे को देखता तो कोई उसके कुरते को और कई जगह तो उसकी साइकिल ही चर्चा का केंद्र बन गयी थी |

सब लोग यही कह रहे थे कि पहिया बाबु टूटा चश्मा लगा कर निकले हैं रथ यात्रा पर! अरे कोई इन्हें बताये तो सही कि ऐसे अलख जगाने से अलख नहीं जगती इसके लिए पहले दम होनी चाहिए शरीर में और मन में भी अटूट विश्वास होना चाहिए का डायलोग एक बुजुर्ग ने फेंक के ऐसे मारा था कि जैसे सारी उम्र समाजसेवा के बिस्तर में लोट लोट कर समाज की सारी सिलवटें ही दूर कर दी हों| और बेचारा इसलिए कहा जाएगा उस राहगीर को जिसको न ठीक से खाने की सुध, न सोने की सुध ,न माथे पर पसीने पोछने की सुध बस तन मन धन से अपना नारा बुलंद करते हुए जब जब वो जहाँ जहाँ से निकलता ऊँची आवाज़ में बस एक ही बात गून्जती वो थी बस “जल ही गंगा है , जल से ही आगे दंगा है”

नेताओं की राजनीति ने इसे भी रंगा है” बचाओ इसे इसी से ही हमारा शरीर चंगा है “ | एक आदमी ने जब इसे सुना तो उससे न रहा गया बोल उठा भई! ठीक है तुम अपने नारे से जनता को आंदोलित करने का प्रयास कर रहे हो पर ये तो तुमने ऐसा नारा बुलंद किया है कि जैसे तुम कोई कवि हो या कोई बहुत बड़े गप्पू ! अरे

छोटा-मोटा स्लोगन उठाया होता ताकि हम लोग भी आसानी से इसे बोलते हुए तुम्हारे साथ कदम से कदम मिलाते | पीछे से कोई बोला अरे अभी ये नया छोकरा है इत्ती समझ कहाँ ? कहाँ से आ रहे हो तुम? और इतने कम लोग क्यूँ है ? तुम्हारे आन्दोलन में | भैया जाओगे कहाँ भोंपू बजाते हुए एक और ने चुटकी ली | देखने वाली बात ये थी कि राहगीर के चेहरे पर उत्तेजना तो दूर मुस्कराहट के भाव थे | वो मौन रहा और एक एक पर्चा तीनों के हाथ में पकड़ा दिया और जल ही जीवन कहते हुए आगे निकल गया अपने कुछ साथियों के साथ| वो सब भी अभ्यस्त हो चुके थे इस तरह की उपेक्षित और अनर्थक प्रतिक्रिया के , हालांकि शुरु में थोड़ा गुस्सा जरूर था लेकिन वो भी निकल गया जैसे जैसे यात्रा आगे बढ़ती गयी और दूसरी बात लगातार साइकिल चलाने से वे थक भी चुके थे तो आवाज़ कहाँ से निकलती ?उसे तो बस एक ही बात याद थी वो थी जल ही जीवन है का अर्थ लोग सच्चे दिल से समझ सकें एक राज्य से दूसरे राज्य में जब वो पहुंचा तो सोचा सभा भी करनी चाहिए सरकारी जल विभाग के सामने |

जैसे तैसे उसने इंतजाम किया पंडाल लगाया कुर्सी मेज लाउडस्पीकर बैनर बोर्ड वैगेरह व्यवस्थित किये गए |कुछ बोल पता इससे पहले ही गली के बच्चों ने धमाचौकड़ी मचाने का कार्यक्रम शुरु कर दिया | एक इस कुर्सी पर दूसरा उस कुर्सी पर एक पंडाल के खम्भे पर और बचे-खुचे हो-हल्ला मचाने लगे | किसी तरह सबको बाहर खदेड़ दिया गया ,बेरिकेडिंग की गयी कि इतने में एक शरारती बच्चे ने माइक का तार ही ब्लेड से काट दिया | और भाग खड़ा हुआ |

उसे पकड़ते ही कि तब तक एक समुदाय आ गया जबरन घुस गया किसकी परमिशन से आपने ये नौटंकी मचा रखी है? इसका जवाब आता उसके पहले ही तंग बिजली के खम्भे पर लिपटे एक जिद्दी तार पर से चिन्गारी निकल पड़ी, ये कटिया मारने वाले की शरारत थी जिसका मकान ठीक सरकारी विभाग के सामने था या पंडाल को किसी लम्पट बच्चे ने हिला दिया हो कसके! जिसके चलते राहगीर का पूरा प्लान ध्वस्त हो चुका था |अब पंडाल में आग की लपटें निकल रही थीं और सब लोग बिना किसी अपवाद के उसको बुझाने का प्रयास कर रहे थे बस नुकसान यहाँ पर दो चीज़ों का हो रहा था एक तो आंदोलन का दूसरा उसकी रीढ़ की हड्डी का यानी ‘पानी’ का| अग्नि शामक दल भी पहुँच चुका था फिर भी सभी लोग सैकड़ों बाल्टियाँ पानी डाल रहे थे | क्यूंकि आज उनका अपना सामान भी इस आग की चपेट में आ चुका था |

आग इतना भयंकर रूप लेते जा रही थी कईयों के ठेले, टाट ,बोरियां ,कपड़े, मोटर गाड़ी सब धू-धू करके जल रहे थे | लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ़ देखी जा सकती थीं | करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद आग पर किसी तरह से काबू पाया गया लेकिन होनी को कौन टाल सकता था जितना सामान जल के राख होना था वो जल के राख हो चुका था | या अधजली हालत में कबाड़ का सामान बन चुका था |

राहगीर और उसके साथी भी लोगों की मदद करने में जुटे थे यद्यपि उनका तो सबसे ज्यादा नुकसान हुआ था | एक तो प्लान चौपट दूसरा पूरी मेहनत बर्बाद होने वाली थी क्यूंकि लोगों का सारा आक्रोश अब उन्ही पर चढ़ चुका था | वे मारने पर उतारू थे , राहगीर को महसूस हुआ कि ये लोग बिना लड़ाई झगड़े के पीछा नहीं छोड़ेंगे तभी उसकी चेतना ने उसे जगाया और उसने उन सबका सामना शांत भाव से करने को ठानी और बोला –

भाइयों ! सुनो- देखो! आज तुम लोगों ने सब अपनी आँखों से देखा है कि कैसे मेरी सभा का कार्यक्रम चौपट हुआ बच्चों को ज़िम्मेदार ठहराऊं या अपने आपको जो ऐसी जगह चुनी!अपने देश में मुझे लगा जिसकी जिम्मेवारी है जल आपूर्ति की उसको भी एक बार साथ लेने का प्रयत्न करना चाहिए या हो सके तो जगाने का प्रयास जरुर करना चाहिये| जनता जनार्दन तो हाल बेहाल होके ही सही साथ तो देगी ही| सारा पानी अपने घरों का और ये अग्निशामक दल का, सब बर्बाद हुआ केवल आग बुझाने में | अब आप समझ सकतें है कि मैं क्यूँ इस पानी को बचाने की मुहिम छेड़ता हुआ मीलों दूर से यहाँ आ पंहुचा || हजारों आग की लपटों को रोकने में लाखों पानी की बूँदें बर्बाद हो जाती हैं अगर ये पानी आज हमारे घरों में या हमारे देश में न होता , तो हमारे घर क्या हम भी जल के खाक हो गए होते!

चुपचाप उसकी बातों को सब सुन रहे थे| आज जाकर उसे वास्तव में अहसास हो गया हिम्मत हो तो आदमी के कद, औहदा ,जाति , उच्च शिक्षा आदि से कोई फर्क नहीं पड़ता जो कहना हो कर के दिखाना पड़ता है पर आज किस्मत ने उसका साथ दिया था |हिम्मतें मर्दा ,मददे खुदा की कहावत उसके लिए, उसके मिशन के लिए चरितार्थ हो चली थी |आज लोग भी समझ रहे थे कि पानी पर उसके लगाये नारे के असली मायने और उसकी दी हुयी सच्ची सीख और बात| उनकी आँखें चौंधिया रही थीं उसके दिए हुए भाषण और अपने ही जले हुए सामानों के बीच| किसी ने सच ही कहा है पैसे की एक आह ! भी मन में सच का उजाला कर ही जाती है यहाँ तो तड़प गया था पैसा !!! लोगों ने उसे धन्यवाद दिया

सोयी आँखें खोलने के लिए और एक गिलास पानी जिसको लेकर एक पल घमासान मचा हुआ था तो कभी सड़कों पर दौड़ आज बहुत आराम से पवित्र आत्मा के ह्रदय में लहराता हुआ मस्त जा रहा था | और ये पवित्र आत्मा एक आम आदमी की थी जिसने अपने मिशन में कभी भी अपना नाम ,जाति, धर्म नहीं बताया था |बताया था तो केवल देश का एक राहगीर !!खुदा भी उसके साथ हो ही गया था||