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भूली का स्वप्न

Paresh Barai

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भूली का स्वप्न

चन्दनपुर गाँव मेँ मीठी नदी के किनारे एक सुंदर से घर में भूली नाम की एक बहुत प्यारी लड़की रहेती थी। भूली के माता पिता काफी गरीब थे, वह पूरा दिन महेनत मजदूरी कर के घर चलाते थे। नन्ही भूली अपने माता पिता की दुलारी थी। खिलोनों से खेलना, गाने गाना और घूमने जाना भूली को बहुत पसंद था। भूली नें एक खरगोश भी पाला था। भूली उसे प्यार से बालू पुकारती थी। भूली दिल की मासूम और मन की साफ लड़की थी। भूली को अगर कोई डांटे या कुछ कहे तो उसे बहुत जल्दी बुरा लग जाता था। भूली को रात में स्वप्न भी आते थे।

एक रात भूली को स्वप्न आया की...

नदी के किनारे पर स्थित जंगल में सोने के पंख वाले बहुत सारे पक्षी हैं। और उस जंगल में पके हुए सुंदर, स्वादिष्ट फलों के पैड भी हैं। भूली नें स्वप्न में यह भी देखा की वहाँ पर नन्हें नन्हें बंदर, पैडों की डालियों से लटक कर मन मोहक करतव कर रहे हैं। भूली स्वप्न में ही उस मनमोहक जंगल में आगे बढ्ने लगती है...

नन्ही भूली का स्वप्न आगे बढ़ा…

भूली नें एक गिलहरी को अपने हाथ में लिया और पास पड़ी हुई मूँगफली उसे खिलाने लगी। तभी अचानक एक सुंदर हिरण भूली के पास आया, और वह जैसे भूली को अपना सिर सहेलाने को बोल रहा हो। धीरे धीरे कर के समस्त जंगलों के प्राणी वहाँ भूली के पास एकत्रित हो गए, जैसे की कोई आतिथेय अतिथि का स्वागत करता हो। अपने पास इतने सारे प्राणियों को देख कर पहेले तो भूली को डर महेसूस हुआ, पर वहाँ के सारे प्राणी हिंसा भूल कर भूली को मिलने आयें हो ऐसा बर्ताव कर रहे थे।

कुछ देर तक भूली उन सभी जंगल के निवासी प्राणी और पक्षियों के साथ बैठी रही, तभी भूली को प्यास लगी। भूली नदी से पानी पीने के लिए नदी पर नीचे जुकी... तो अचानक नदी से विकराल मगरमच्छ बाहर आया। परंतु उसने भूली को कुछ नहीं किया और वह नदी किनारे बैठ गया। भूली नें नदी का शुद्ध पानी पिया तो उसे ऐसा लगा की जैसे अमृत पिया हो।

फिर उसने पैड से तोड़ तोड़ कर अपने मनपसंद फल खाना शुरू किया। पेट भर गया तो भूली जंगल के प्राणियों और पक्षियों के साथ खेलने लगी। भूली को तो आनंद आ गया उसे तो जैसे स्वर्ग जैसी जगह और बहुत सारे दोस्त मिल गए। तभी अचानक भूली के चहेरे पर सूर्य देव की किरणें पड़ी और भूली का स्वप्न टूट गया...

रात में देखे हुए सुंदर स्वप्न की बात भूली अपनी माता को बताने लगी। भूली की माता नें कुछ देर उसकी बातें सुनी फिर वह अपने काम में जुट गयी। भूली अपने खरगोश बालू के साथ खेलने लगी। पर उसका मन उस मनमोहक जंगल की और ही था। उसे वहाँ जाना था, ताकि वह हकीकत में उस सुंदर जगह को देख सके और सारे पशु, प्राणीओं से फिर से मिल सके। भूली नें अपनी माता से कहा की वह उसे वहाँ खेलने के लिए ले कर जाए। पर उन्होने साफ माना कर दिया और भूली को समजाया की अनजान जगह, अनजान पानी, और अनजान व्यक्तियों का भरोसा करना नहीं चाहिए।

पूरा दिन बार बार एक ही रट लगा रही नन्ही भूली जब मान नहीं रही थी तो, उनकी माता नें भूली को डांट कर सुला दिया। उस रात फिर से भूली नें वह स्वप्न देखा... भूली दौड़ कर उस जंगल में चली गयी। और पिछली रात की तरह उस रात भी उसने खूब मज़ा किया। अगले दिन उठते ही भूली नें फिर से रट पकड़ ली की उसे जंगल वाले पशु पक्षी दोस्तों के पास खेलने जाना है। अब भूली की माँ उस से तंग आ चुकी थी। उसने ना चाहते हुए भी भूली को धीरे से चांटा मार दिया ताकि वह बेफिजूल की ज़िद्द छोड़ दे।

भूली रोते हुए अपने कमरे में चली गयी। और अपने खरगोश को हाथ में ले कर उदास बैठ गयी। उसकी माँ को लगा की कुछ देर में उसे टॉफी खिला कर या नाश्ता खिला कर मना लूँगी। लेकिन जब भूली को मनाने के लिए उनकी माता नें दरवाजा खोला तो भूली अपने कमरे से गायब थी। और उसका नन्हा खरगोश भी वहाँ नहीं था। भूली की माँ नें फौरन अपने पति को घर बुला लिया। और दोनों उसे हर जगह खोजने लगे। पूरा दिन बीत गया पर नन्ही भूली और उसके खरगोश का कुछ पता नहीं चला।

भूली तो अपने प्रिय जंगल में चली गयी थी। इस बार वह अपने खरगोश बालू को भी साथ ले गयी थी। भूली दौड़े जा रही थी, दौड़े जा रही थी। अंधेरा हो गया पर उस जंगल में उसे वैसा कुछ भी ना दिखा जैसा उसने स्वप्न में देखा था। कुछ देर मेँ भयानक जंगली जानवरों की घुरराहट सुनाए देने लगी। डर के मारे अब भूली वापिस लौटना चाहती थी, पर वह रास्ता भटक चुकी थी। तभी अचानक भूली को एक हिरण दिखा।

भूली उसके पास जाने लगी पर वह दौड़ कर अंधेरे में दूर चला गया। पैडों पर बंदर भी मौजूद थे। पर वह कोई करतव नहीं दिखा रहे थे, वह तो सिर्फ भूली को देख कर गुस्से से घुररा रहे थे। भूली को यह सब देख कर रोना आने लगा। उसे प्यास भी लगी थी। पर नदी का पानी इतना दूषित था की उसे पिया नहीं जा सकता था। भूली भूखी भी थी, उसे खाना खाना था। वह फल के पैड ढूँढने लगी, पर वहाँ फल के पैड इतने ऊंचे थे की वहाँ भूली का पहुँच पाना नामुमकिन था।

अंधेरे में खोयी हुई नन्ही भूली रोये जा रही थी। उसका खरगोश बालू भी अब परेशान हो चला था। भूली के सपनों की दुनियाँ से, वास्तविक हकीकत काफी अलग और डरावनी थी। अंधेरे में अचानक भूली को दो चमकती आँखें दिखी और भूली को डरावनी गर्जनायेँ भी सुनाए देने लगी। वह एक बड़े सिर वाला खूंखार शेर था।

भूली उसे देख कर और उसकी गर्जनाएं सुन कर इतनी डर गयी की उसका खरगोश बालू उसके हाथ से छूट गया। और वह खुद भी डर के मारे जमीन पर गिर पड़ी। शेर उसकी और दबे पाँव आने लगा, उसे अपनी और आता देख कर भूली खड़ी हो कर अंधेरे में बे तहाशा दौड़ने लगी। शेर उसके पीछे तो नहीं आया पर भूली कहाँ पीछे मूड कर देखने वाली थी। वह करीब एकाद किलो मीटर तक दौड़ती चली गयी। और फिर भूली अंधेरे में एक छोटे से खड्डे में फिसल कर गिर पड़ी। रात में भूली उसी छोटे से खड्डे में पड़ी रही। भूली को वहीं नींद आ गयी।

भूली नें वहाँ सोते हुए फिर से स्वप्न देखा।...

इस बार भूली को स्वप्न में जंगल नहीं दिखा उसे उसकी माँ दिखी जो उसे समजा रही थी की “अनजान जगह, अनजान पानी, और अनजान व्यक्तियों का भरोसा कभी नहीं करना चाहिए।”

यहाँ... भूली की माँ को पता था की भूली बार बार जंगल में घूमने जाने की बात किए जा रही थी, इस लिए उसे पता था की वह जंगल की और ही गयी होगी। भूली के माता-पिता और गाँव के अन्य लोग रात में ही भूली को खोजने जंगल में निकल पड़े थे। सूर्यदेव के उदय होने से पहेले ही उन्होने नन्ही भूली को ढूंढ लिया।

अपनी माँ को देख कर भूली फौरन उनके आँचल से लिपट गयी और खूब रोने लगी। भूली की माँ नें भी रोते हुए अपनी लाड़ली, दुलारी बेटी को बाहों में समेट कर चूम लिया, और उसे सब मिल कर जंगल से वापिस घर ले आए।

भूली ने अपना सबक अब सीख लिया था, की जो चिज़े स्वप्न में दिखती हैं वह हकीकत में भी वैसी ही हों ऐसा ज़रूरी नहीं होता। और भूली नें अपनी माँ की दी हुई शिक्षा भी गांठ बांध ली, की “अनजान जगह, अनजान पानी, और अनजान व्यक्तियों का भरोसा कभी नहीं करना चाहिए।”

सार-

इस कहानी से हमे सीख मिलती है की, माता पिता की डांट से नाराज़ हो कर कोई ऐसा कदम नहीं उठाना चाहिए की बाद में हमे पाश्ताना पड़े। हमारे बड़े हमसे अधिक अनुभवी होते हैं। अगर वह हमे कोई सीख देते हैं तो हमे उस पर गौर ज़रूर करना चाहिए। कहानी के पात्र “भूली” नें तो अपना सबक याद कर लिया अब आप भी याद कर लें की “अनजान जगह, अनजान पानी, और अनजान व्यक्तियों का भरोसा कभी नहीं करना चाहिए।” इनसे हमेशा सचेत रहेना चाहिए।

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Author – परेश बाराई (registered Author member of Matrubharti)

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