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HIGHTECH PATIENT

समझदार और हाइटेक पेशेंटःअब सर्जरी से डर नहीं लगता.

आर्थिक संपन्नता और चिकित्सा के क्षेत्र में कंप्युटर टेक्नोलॉजी के आने से बीमारी को लेकर मरीजों की सोच में काफी परिवर्तन आया है. नेट पर सूचनाओं की उपलब्धता के कारण बड़ी से बड़ी बीमारी में भी ये न तो डरते हैं, न ही घबड़ाते हैं. खतरनाक बीमारी की हालत में भी हिम्मत और विवेक से काम लेते हैं. किसी भी बीमारी के बारे में ये पहले से ही इंटरनेट को खंगाल चुके होते हैं. और पहले से ही उन्हें सारा कुछ पता होता है. सबसे अच्छा और बड़ा बदलाव यह आया है कि पेशेंट जानते हैं कि खुद नीम—हकीम बन इलाज करने या नीम—हकीम के पास जाकर पैसा और समय बर्बाद करने से अच्छा है सही समय पर सही जगह जाएं. इसीलिए आजकल कहा जाता हे कि आज का पेशेंट काफी समझदार और हाइटेक हो गया है और बिना किसी डर—भय का पूरे आत्मविश्वास के साथ अपने चिकित्सक से मिलते हैं और बड़ी से बड़ी सर्जरी कराकर लौट जाते हैं.

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हैदराबाद के चिन्मय की 30 वर्षीय पत्नी सरिता की दाहिनी ओवरी में अल्ट्रासाउंड से ट्‌यूमर का पता चला. गाइनोकोलॉजिस्ट ने सर्जरी करा लेने की सलाह दी. चिन्मय ने हैदराबाद के ही एक सुपरस्पेसलिटी सेंटर को पत्नी की सारी रिपोर्ट ई—मेल की. दो घंटे के अंदर जवाब आ गया—‘‘लेप्रोस्कोपिक सर्जरी से ट्‌यूमर निकाला जायेगा अत्यंत छोटा चीरा लगाकर. सब मिलाकर सात हजार का खर्च आयेगा.'' आगे लिखा था—‘‘दिन भर निगरानी में रखने के बाद शाम को छुट्‌टी दे दी जायेगी.'' पति—पत्नी दोनों को लेप्रोस्कापिक सर्जरी के बारे में सारा कुछ मालूम था. इसलिए दोनों को न कोई डर लगा ,न कोई परेशानी हुई. सुविधानुसार अपना नाम रजिस्टर कराकर शनिवार की सुबह ऑपरेशन कराकर शाम को सरिता घर लौट गयी. रविवार को आराम के बाद पति—पत्नी दोनों काम पर लौट गये. अगले सप्ताह बायोप्सी रिपोर्ट ई—मेल से मिल गयी. ट्‌यूमर कैंसर नही था,साधारण गांठ थी. अतः रही—सही चिंता भी दूर हो गयी.

मुंबई के एक प्रसिद्ध मित्तल उद्योगपति—परिवार के तीस वर्षीय पुत्र सुधीर को शादी के देा साल के बाद भी जब संतान—सुख नहीं मिला तो एक प्रसिद्ध इन्फर्टिलिटी सेंटर में पति—पत्नी दोनों ने संपर्क किया. करीब साल भर तक इन्फर्टिलिटी का इलाज चला. इसके बावजूद जब कोई फायदा नहीं हुआ तो विदेश जाने की सोची. पैसे की कोई समस्या नहीं थी, न ही साधनों की. किस देश में इस रोग का सबसे अच्छा इलाज होता है—छानबीन करने पर पता चला कि अमेरिका जानेवाले कोई भी दंपत्ति निराश होकर नहीं लौटते.

उसने अमेरिका के एक नामी इंन्फर्टिलिटी सेंटर के चिकित्सक से इंटरनेट और ई—मेल से संपर्क किया. सारी टेस्ट—रिपोर्ट मेल करने को उन्हें कहा गया. उसने एक प्रसिद्ध टेलीमेडिसिन सेंटर से भारत में कराई गयी अपनी और पत्नी की सारी टेस्ट—रिपोर्ट स्कैन करवाकर मेल करवा दी. बारह घंटे बीतते—बीतते उक्त अमेरिकी चिकित्सक का ओपीनयन मेल से मिल गया. रिपोर्ट में यह टिप्पणी भी दर्ज थी—‘‘पति की रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी नहीं है. पत्नी के प्रजनन—अंग में थोड़ी जटिलता है. इसके लिए एक मामूली ऑपरेशन की जरूरत है. उसके बाद प्रेग्नेंसी में किसी तरह की कोई परेशानी नहीं होगी. इसके लिए मात्र 24 घंटे भर्ती रहने की जरूरत है. सुविधानुसार एप्वाइंटमेंट लेकर आ जाएं.''

उसने अमरीका जाने का निर्णय लिया. वहां के मेडिकल टूरिस्ट एजेंसी की मदद ली. एजेंसी ने चिकित्सक से एप्वाइंटमेंट लेने से लेकर ठहरने तक का सारा इंतजाम पहले से कर दिया ताकि वहां किसी भी तरह की कोई परेशानी न हो. वे नियत समय के एक दिन पहले की फ्‌लाइट लेकर अमरीका के लिए रवाना हो गये. देा दिनों के अंदर ही पत्नी का ऑपरेशन हो गया और तीसरे दिन दोनों भारत लौट भी आये. उन्हें यह भी बता दिया गया कि डिलीवरी के लिए दुबारा अमेरीका आने की कोई जरूरत नहीं है. दो महीना होते—होते उनकी पत्नी गर्भवती भी हो गई. और समय पूरा होने पर भारत के ही एक अस्पताल में एक सुंदर—सी बिटिया का जन्म हुआ. वे इस बात को लेकर काफी खुश थे कि अमेरिका जाकर उन्होंने कोई गलती नहीं की.

कैरियर जितना सेहत जरूरी

आज का मरीज सेहत के मामले में कैरियर की तरह जागरूक,होशियार और समझदार हो गया है. कंप्युटर,इंफार्मेशन टेक्नोलॉजी और शिक्षा का विकास,विस्तार और प्रचार—प्रसार के साथ ही आम नागरिकों में आर्थिक समृद्धि और वैचारिक संपन्नता भी बढती गई. नतीजा यह हुआ कि निम्न और मध्यवर्गीय लोगों में भी सेहत को लेकर सोचने, समझने और विवेचन—विश्लेषण करने की समझ विकसित होती गई. यही प्रवृति आज हर आयु,वर्ग के स्त्री—पुरूष में देखने को मिल रही है.वे इस बात को समझने लगे हैं कि कैरियर जितना सेहत जरूरी है.इसीलिए, इसको लेकर किसी भी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं होते. आज के युवा अच्छा से अच्छा इलाज चाहते है, खर्च की उन्हें कोई चिंता नहीं है.

वे इस बात को भी भलीभांति जानते हैं कि यदि अच्छा इलाज चाहिए तो कॉरपोरेट अस्पताल की ओर रूख करना होगा. सरकारी अस्पतालों पर उसे एकदम विश्वास नहीं. कॉरपोरेट अस्पतालाें के खर्चे के लिए इन्होंने हेल्थ इंश्योरेंस करा रखा है. इसलिए वे सेहत को लेकर एकदम समझौता करने के पक्ष में नहीं रहते.

बीमारी से डर नहीं लगता

बीमारी को लेकर भी इनकी सोच में काफी परिवर्तन हुआ है. बड़ी से बड़ी बीमारी में भी ये न तो डरते हैं, न ही घबड़ाते हैं. हर स्थिति का सामना मुस्तैदी से करते हैं. खतरनाक बीमारी की हालत में भी हिम्मत और विवेक से काम लेते हैं. रोगों के बारे में ये पहले से ही इंटरनेट को खंगाल चुके होते हैं.

अंकित गुप्ता को अचानक थकान और कमजोरी होने लगती है. छोटे—मोटे काम में भी हांफने लगते हैं. एक कॉरपोरेट कंपनी में काम करनेवाले इस नौजवान को चिंता होने लगती है. जांच कराने पर ब्लड कैंसर का पता चलता है. वे घबड़ाने के बजाए हिम्मत जुटाकर जुट जाते हैं बीमारी के बारे में जानने के लिए. इंटरनेट खंगाल डालते हैं. और सारी जानकारी इकट्‌ठा कर इस बीमारी से लड़ने की तैयारी में जुट जाते हैं. सबसे अच्छा इलाज कहां होता है?सबसे पहले इसका पता लगाते हैं. फिर टाटा कैंसर हॉस्पिटल, मुंबई के लिए रवाना हो जाते हैं.

वे चिकित्सक से मिलकर रोग के संबंध में पूरी जानकारी लेते हैं. उसे कीमो थेरेपी कराने की सलाह दी जाती है. वे इस थेरेपी के लाभ—हानि की पूरी जानकारी ले लेते है. इन्हें इसके साइड इफेक्ट के बारे में कई तरह की जानकारी मिलती है. इससे प्रजनन—क्षमता प्रभावित होने की बात बतायी जाती है और स्पर्म बैंक में स्पर्म जमा करने की सलाह दी जाती है. ताकि भविष्य में शादी के बाद पिता बनने की राह में किसी तरह की कोई परेशानी न हो. वे कीमोथेरेपी के पहले अपना स्पर्म बैंक में जमा कर देते हैं.

इन्हें यह भी पता चलता है कि कैंसर के मरीजों को कई स्वयंसेवी संस्थाएं काफी मदद करती हैं. वे इंटरनेट से पास की स्वयंसेवी संस्था को अपनी पूरी रिपोर्ट मेल करते हैं. दो—चार घंटे के बाद संस्था के प्रतिनिधि खुद संपर्क कर कीमती मेडिसिन्स मात्र कुछ हजार में उपलब्ध करा देते हैं.

कैंसर की दवा खाते हुए भी वे चैन से नहीं बैठते हैं. इन्हें पता चलता है कि इस रोग का स्थायी निदान है—बोन मैरो ट्रासप्लांटेशन. इन्हें समझ में आने लगता है कि बिना ट्रासप्लांटेशन के इस रोग का स्थायी समाधान संभव नहीं है. वे यह भी जानते हैं कि यह काफी मंहगा इलाज है. इसमें लाखों रूपये खर्च होते हैं. इतनी बड़ी रकम आखिर आयेगी कहां से? अंकित के आगे यही समस्या थी. लेकिन,शीघ्र ही ये इसका भी निदान ढ़ूंढ लेते हैं. इंटरनेट से ही पता चला कि कैंसर के मरीजों को स्वयंसेवी संस्था ही नहीं प्रधानमंत्री,मुख्यमंत्री से लेकर सांसद और विधायक—कोष से भी आर्थिक मदद मिलती है. फिर क्या था,वे संपर्क साधना शुरू करते हैं और तीन सप्ताह के अंदर इलाज की समुचित रकम इकट्‌ठा हो जाती है. और फिर उसी अस्पताल में बीएमटी यानी बोन मैरो ट्रासप्लांटेशन करा लेते हैं. बोनमैरो उसकी मां डोनेट करती हैं. और महीना पूरा होते होते उसे इस जानलेवा और खतरनाक बीमारी से सदा के लिए छुटकारा मिल जाता है.

महज दो दशक पहले तक मरीजों को काउंसिंलिग की जरूरत पड़ती थी. बीमारियों के बारे में आम लोगों को विशेष जानकारी नहीं होती थी. कब,क्या करना है, पता नहीं होता था. थोड़ी—सी परेशानी पर घबड़ा जाते थे. अपने आप को असहाय तथा निरूपाय समझने लगते थे.लेकिन,अब पहले वाली बात रही नहीं. पहले से ही उन्हें सारा कुछ पता होता है. सबसे अच्छा और बड़ा बदलाव यह आया है कि पेशेंट जानते हैं कि खुद नीम—हकीम बन इलाज करने या नीम—हकीम के पास जाकर पैसा और समय बर्बाद करने से अच्छा है सही समय पर सही जगह जाएं.

समझदार हो गया है मरीज

पहले केवल डॉक्टर का बोर्ड देखकर मरीज इलाज कराने पहुंच जाते थे. डॉक्टरी के लिए एमबीबीएस होना काफी था. आज मरीज ज्यादा सतर्क और सावधान हो गया है.यह देखते हैं कि जिस डॉक्टर के पास जा रहे हैं,उसकी डिग्री क्या है? क्या केवल एमबीबीएस है? एम डी, एमएस,डीएम, एमसीएच डिग्री है कि नहीं. आज का मरीज विशेषज्ञ चिकित्सक से ही इलाज कराना चाहता है.वे न्यूरोफिजिशियन तथा न्यूरोसर्जन के बीच के अंतर को भी जानने लगेे हैं. ये जानते हैं कि न्यूरोसर्जन के पास किस स्थिति में जाना है और न्यूरो फिजिशियन के पास किस बीमारी में. पेट की तकलीफ होने पर गैस्ट्रो इंटेरोलॉजिस्ट के पास ही जाना पसंद करते हैं. हार्ट डिजीज में कार्डियोलॉजिस्ट,किडनी रोग के लिए नेफ्रोलॉजिस्ट और डायबीटीज के इलाज के लिए डायबीटोलॉजिस्ट से ही इलाज कराते हैं.

मरीज तथा चिकित्सक दोनों को एक दूसरे के प्रति नजरिये में भी काफी बदलाव देखा जा रहा है. पहले मरीज और चिकित्सक के बीच दूरी काफी थी. संवादहीनता की स्थिति रहती थी. न तो मरीज अपनी समस्या खुलकर कह पाते थे, न चिकित्सक सही समाधान बता पाते थे. इससे चिकित्सक को भी परेशानी होती थी. मरीज तो परेशान होता ही था. अब, इसमें काफी परिवर्तन देखने को मिल रहा है. मरीज अब,चिकित्सक से संपर्क करने में नहीं हिचकते. चिकित्सक के मोबाइल नंबर से लेकर ई—मेल आई डी तक होता है उसके पास. परेशानी की हालत में संपर्क करना नहीं भूलते. यह परिवर्तन हर उम्र और वर्ग में देखने को मिल रहा है.

आज का मरीज ऐसे डॉक्टर के पास जाना चाहता है जो आमने—सामने बैठकर उसकी बात को पूरी तरह सुने,उसकी समस्या को ईमानदारीपूर्वक सुने और व्यक्तिगत रूप से उसके संपर्क में रहे. आज का पेशेंट डॉक्टर से ‘हाईटच केयर' चाहता है. मरीज चाहता है कि व्यक्तिगत रूप से चिकित्सक उसे प्रिफंरेंस दे,उसकी इज्जत करे और उसकी जरूरत को सुने. पहले की तरह खड़ूस,गुसैल और कम बोलने और मरीज की पूरी बात न सुननेवाले डॉक्टर के पास एकदम जाना नहीं चाहते हैंं.आज मरीज फिजिशियन के साथ बेहतर संबंध चाहते हैं. क्योंकि मरीज अपनी बीमारी और दवाई के संबंध में पूरी जानकारी चाहते हैं. वे जानते हैं कि इसके लिए दोनेां के बीच अच्छा तालमेल हो, तभी यह संभव हो पायेगा. यह सच है कि किसी मरीज को बीमारी तथा दवाई के बारे में जितनी ज्यादा जानकारी होगी,बीमारी केा ठीक होने में उतना ही कम समय लगेगा. डॉक्टरों को भी इलाज करने में विशेष परेशानी नहीं होगी.

हाइटेक डॉक्टर को प्राथमिकता

आज का पेशेंट हाइटेक डॉक्टर की खोज में रहता है. वे ऐसे डॉक्टर के पास जाना चाहते हैं जो मरीजों के साथ मोबाइल,इंटरनेट,फेसबुक,ट्‌यूटर आदि से पूरी तरह जुड़े रहे. वे अप्वाइंटमेंट के लिए न तो घंटों लाईन में खड़े रहना चाहते हैं,न ही डॉक्टर से दिखाने के लिए इंतजार करना चाहते हैं. इनके पास इतना समय नहीं है. ये सारा काम फटाफट निबटाना चाहते हैं. इसीलिए आज के युवा मरीज फोन,ई—मेल से नंबर लगानेवाले डॉक्टरोें को प्राथमिकता देते हैं. वे चाहते हैं कि जिनके पास वे इलाज कराने के लिए जा रहे हैं,बाद में भी उसके साथ सीधा संपर्क में रहे. वे चाहते हैं कि डॉक्टर हमेशा संपर्क में रहे. किसी भी तरह की परेशानी होने या जरूरत पड़ने पर तुरंत संपर्क किया जा सके.

विक्की एक कॉरपोरेट कंपनी में काम करता है. घर में मां—पिता जी हैं. पिता जी हार्ट अटैक झेल चुके हैं. मां का दस सालों से डायबीटीज है. खुद भी छोटी—मोटी समस्याओं से जूझता रहता है. मां—पिता जी इलाज पास के एक कारपोरेट अस्पताल में चलता है. इसलिए चार—पांच महीने में उन्हें फॉलो अप के लिए जाना पड़ता है.

अब विक्की मां—पिता के इलाज को लेकर थोड़ा में टेंशन नहीं लेता. उसने उस हॉस्पिटल के डॉक्टर का मोबाइल नंबर तथा ई—मेल आइडी ले रखा है. मां पिता जी को थोड़ी बहुत परेशानी होने पर वह अस्पताल के चक्कर नहीं लगाता. समस्याओं को मेल में डाल देता है. घंटा—दो घंटा में जवाब आ जाता है. मां को भी सुगर की जांच के लिए बार—बार लैब का चक्कर लगाना नहीं पड़ता है. घर में ही ग्लूकोमीटर है. डॉक्टर जांच की विधि बता दिये हैं. बीच—बीच में मां खुद सुगर टेस्ट कर लेती हैं. पिछले सप्ताह ही मां के रक्त में सुगर काफी ज्यादा हो गया तो विक्की ने फट से एक मेल डॉक्टर को भेज दिया. दो घंटा के भीतर जवाब आ गया कि पर्ची में लिखी दो नंबर की गोली को दो बार की जगह तीन बार खानी है.

पिता जी को बीच—बीच में ब्लड और यूरीन टेस्ट कराने की जरूरत पड़ती है. एक लैब से उसने बात कर रखी है. एक फोन पर टेक्नीशियन घर पहुंच कर सैंपल ले जाता है. महज 50 रूपये ज्यादा लेता है. न लैब जाने का झंझट न रिर्पोट लाने का टेंशन. विक्की को मेल से रिपोर्ट मिल जाती है.

अधिकारों के प्रति आयी है जागरूकता

पहले मरीजों को अपने अधिकारों के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. आम आदमी की तो बात ही छोड़िये पढ़ेलिखे लोग भी नहीं जानते थे कि मरीजों को भी किसी तरह का अधिकार प्राप्त है. लेकिन जैसे—जैसे शिक्षा का प्रचार—प्रसार होता गया,लोगों में इसके प्रति जागरूकता आती गई. अब तो स्थिति यहां तक आ गई है कि बड़े—बड़े अस्पताल भी मरीजों के इस अधिकार को समझने लगे हैं और जरूरत पड़ने पर हर तरह की जरूरतें पूरा करने को तैयार रहते हैं.

अब, दिल्ली के विवेक को ही लीजिये. उसके पिता को पित्त की थैली में पथरी है. इसकी सर्जरी करवानी है. वह शहर के पांच—सात अस्पतालों को सारी जांच रिपोर्ट को मेल कर खर्चे के बारे में तहकीकात करते हैं. खर्चे के साथ—साथ अस्पताल में किस विधि से सर्जरी की सुविधा है, कितने दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहना होगा और मरीज कितने दिनों में पूरी तरह ठीक हो जायेगें, इस तरह की सारी जानकारी इकट्‌ठा करते हैं. इसके लिए उसे कई—कई बार मेल और फोन करना पड़ा. वे तो यह भी पूछना नहीं भूले कि क्या बिना सर्जरी का इलाज संभव नहीं है. लेकिन, उन्हें बताया जाता है कि इसका केवल एक ही इलाज है—सर्जरी. इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है.

ये तो पक्का हो गया कि पित्त की थैली का एकमात्र इलाज सर्जरी है. लेकिन, किस विधि से और किस अस्पताल में सर्जरी करायें, इसका निर्णय होनेा बाकी था. अंत में, सिंगल इंसीजन लेप्रोस्कोपिक विधि से सर्जरी कराने का निर्णय लिया गया. अपनी सुविधानुसार विवेक ने अपने पिता की एक कारपोरेट अस्पताल में सर्जरी करा आये.

विवेक ही नहीं, उनके पिता को इस बात को लेकर खुशी है कि सर्जरी के लिए विशेष चक्कर नहीं लगाना पड़ा और न ही किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हुई.

दवाइयों के बारे में जागरूकता

एक समय था जब मरीज को दवा के बारे में किसी तरह की कोई जानकारी नहीं होती थी. डॉक्टर कुछ बताते नहीं थे. खुराक बगैरह के बारे में केमिस्ट जो भी बताते थे, उसी पर भरोसा करते थे. अधिकतर मरीजों को यह भी पता नहीं रहता था कि आखिर रोग क्या है. जो दवाइयां उन्हें दी गई हैं या जो खा रहे हैं, उनका काम क्या है, जटिलताएं क्या हैं. किन दवाइयों को बीच में छोड़ देने पर किस तरह का नुकसान हो सकता है. कई बार उन्हें यह भी पता नहीं रहता था कि किस दवा को कितना महत्व दिया जाए.

लेकिन आज ऐसी स्थिति नहीं है. दवाइयों को लेकर भी आज मरीज काफी सतर्क रह रहे है. पर्ची में लिखी दवाइयों के बारे में चिकित्सक से खाने के डोज से लेकर लाभ—हानि के बारे में इत्मीनान हो जाना चाहते हैं. इसके साइड इफेक्ट के बारे में भी जानकारी लेना नहीं भूलते. आज का युवावर्ग किसी भी तरह का समझौता करना नहीं चाहते. डॉक्टरों पर भरोसा के साथ—साथ सलाह या परहेज का पूरी तरह पालन भी करते हैं.

एक चिकित्सक के शब्दों में—‘‘ आज का मरीज काफी स्मार्ट और होशियार हो गया है. वे हर बात को सुनते ही नहीं,अमल में भी लाते हैं. थोड़ी—सी भी परेशानी होने पर न तो संपर्क करने में हिचकते हैं, न ही पूछने में. दवाइयों के बारे में सबकुछ जान लेना चाहते हैं. डोज,साइड इफेक्ट्‌स से लेकर खानपान और परहेज तक. हर तरह से इत्मीनान होने के बाद ही मेरे पास से उठते हैं.'' वे आगे बताते हैं कि यह सब डेवलपमेंट इधर के दशक में देखने को मिल रहा है. यह मेरे लिए ही नहीं, मरीज के लिए भी शुभ संकेत है. क्योंकि इससे अंततः मरीज को ही फायदा होता है. समय की वचत तो होती ही है, मरीजों को संतुष्टि भी होती है. फिजूलखर्ची भी नहीं होती. ऐसी स्थिति में डॉक्टर को इलाज करने में सहूलियत होती है. मरीज को विश्वास भी काफी बढता है. इससे मरीज को अपनी बीमारी की गंभीरता को समझने का मौका मिलता है. और स्वास्थ्य —लाभ में भी ज्यादा समय नहीं लगता. शीघ्र ठीक हो जाता है..

अंत में, मरीज और चिकित्सकाें के बीच बेहतर संबंध से अंततः मरीजों को ही फायदा होता है. इसके लिए जरूरी है कि मरीजों को अपनी बीमारी तथा दवाओं बारे में पूरी जानकारी हो. ऐसा इलाजरत चिकित्सक भी चाहते हैं. चिकत्सक इस बात को अच्छी तरह जानते हें कि किसी मरीज को बीमारी तथा दवाई के बारे में जितनी ज्यादा जानकारी होगी,बीमारी केा ठीक होने में उतना ही कम समय लगेगा और चिकित्सकों को भी इलाज करने में विशेष परेशानी नहीं होगी.