ध्रुव की तारा - भाग 27 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ध्रुव की तारा - भाग 27

ध्रुव की तारा

भाग - २७

लेखिका "अनामिका"

​विजय जी ने घर लौटते ही ध्रुव का नंबर मिलाया। कुछ ही घंटियों के बाद ध्रुव की थकी हुई लेकिन खुशमिज़ाज आवाज़ गूँजी, "हाँ पापा, कहिए! सब ठीक तो है न?"

​"सब ठीक है बेटा, बस तेरी याद आ रही थी तो कॉल कर लिया। सुना, काम कैसा चल रहा है? अब तो जॉब भी परमानेंट हो गई, प्रमोशन और हाइक की पार्टी कब दे रहा है?" विजय जी ने सहज होने की कोशिश करते हुए बात शुरू की।

​"बस पापा, काम बढ़िया चल रहा है। आप जब कहेंगे, पार्टी तैयार है," ध्रुव ने मुस्कुराते हुए कहा।

​थोड़ी देर तक दफ़्तर की भागदौड़, खाने-पीने और छुट्टियों को लेकर दोनों के बीच यूँ ही हल्की-फुल्की बातें होती रहीं। लेकिन ध्रुव, जो अपने पापा को किसी दोस्त की तरह समझता था, भांप गया कि वे सिर्फ़ हाल-चाल पूछने के लिए फ़ोन नहीं किए हैं। उनकी आवाज़ की हिचकिचाहट बता रही थी कि बात कुछ और भी है।

​"पापा... अब घुमाइए मत। साफ़-साफ़ बताइए क्या बात है? आप कुछ कहना चाह रहे हैं," ध्रुव ने सीधे मुद्दे पर आते हुए पूछा।

​विजय जी ने एक गहरी सांस ली, "बेटा, बात आनंद और तारा की है। आनंद अभी तक तारा से ठीक से बात नहीं कर रहा है। वह तुम दोनों के रिश्ते को लेकर और समाज की बातों से थोड़ा चिंतित है..."

​ध्रुव ने गहरी सांस ली और बोला, "पापा, आप चिंता मत कीजिए। आप किसी को कुछ मत बताइएगा, ख़ासकर मम्मी को तो बिल्कुल भी नहीं!"

​"अच्छा! और मैं जो यहाँ स्पीकर पर पूरी बात सुन रही हूँ, उसका क्या?" पीछे से अचानक सुमन जी की कड़क आवाज़ आई।

​ध्रुव चौंक गया, "पापा! यार... आपने स्पीकर ऑन कर रखा था? मम्मी के पेट में कोई बात पचती है क्या! अब यह जाकर सीधा सुधा आंटी को बता देंगी और सारा प्लान बिगड़ जाएगा।"

​"अरे! मैं क्यों बताने लगी? मुझे अपनी बहू की चिंता नहीं है क्या?" सुमन जी ने नकली गुस्से में कहा।

​"ठीक है मम्मी, तो पहले मुझसे प्रॉमिस कीजिए कि आप यह बात किसी से शेयर नहीं करेंगी," ध्रुव ने कहा। सुमन जी के वादा करने के बाद ध्रुव ने गंभीरता से आगे कहा, "पापा, मेरी छुट्टियाँ मंज़ूर हो चुकी हैं। मैं जल्द ही घर आ रहा हूँ। अंकल-आंटी या तारा से शादी की बात चलाने से पहले, मैं खुद तारा को ढँग से प्रपोज़ करना चाहता हूँ। जब वह हाँ कह देगी, तभी आप आधिकारिक तौर पर रिश्ता लेकर उनके घर जाइएगा।"

​ध्रुव की बात सुनकर सुमन जी की उत्सुकता का ठिकाना न रहा। वे तुरंत फ़ोन के पास आकर बोलने लगीं, "सरप्राइज़ प्रपोज़ल! अरे वाह ध्रुव, यह तो बहुत बढ़िया आइडिया है। तू कब आ रहा है? छुट्टियाँ किस दिन से अप्रूव हुई हैं? तेरी ट्रेन की टिकट हो गई क्या?"

​"देखा पापा! मैं इसीलिए मम्मी को बताने से मना कर रहा था," ध्रुव ने सिर पकड़ते हुए कहा, "आपने फ़ोन स्पीकर पर रखकर मेरा पूरा प्लान बिगाड़ दिया।"

​विजय जी ने भी चुटकी लेते हुए सुमन जी को टोका, "सुमन, ज़रा सब्र रखो! जिस तरह तुम अभी से इतनी उत्साहित हो रही हो, मुझे तो डर लग रहा है कि तुम अभी जाकर सुधा को सब बता न दो।"

​सुमन जी ने झेंपते हुए खुद को थोड़ा काबू में किया और लाड़ से बोलीं, "अच्छा-अच्छा, अब चिढ़ाओ मत मुझे! ध्रुव, तू बस यह बता कि इस सरप्राइज़ में हमारी कोई मदद चाहिए क्या?"

​"नहीं मम्मी, मैं वहाँ आकर खुद सब तैयारियाँ कर लूंगा," ध्रुव ने मुस्कुराते हुए कहा, "बस आप दोनों से एक ही गुज़ारिश है कि मेरे आने की बात या इस प्रपोज़ल का ज़िक्र किसी के सामने मत कीजिएगा।"

​ध्रुव बिना किसी को बताए चुपचाप शहर पहुँच गया। जैसे ही उसने घर का दरवाज़ा खटखटाया, सामने खड़े विजय जी और सुमन जी की आँखें खुशी से भर आईं; इतने सालों बाद बेटे को अपने सामने देखकर सुमन जी की ममता छलक पड़ी और उन्होंने उसे गले से लगा लिया। थोड़ा आराम करने के बाद, सबने मिलकर तारा के परिवार को रात के खाने पर आमंत्रित करने की योजना बनाई।

​सुमन जी तुरंत सामने वाले घर में सुधा जी के पास पहुँचीं और मुस्कुराते हुए बोलीं, "आज शाम हमारे घर आप सबका डिनर है, ध्रुव अचानक वापस आ गया है उसी की खुशी में।" यह सुनते ही पास खड़ी तारा की धड़कनें तेज़ हो गईं; उसने मन ही मन सोचा कि ध्रुव ने उससे इतना बड़ा सरप्राइज़ छुपाया कैसे? एक तरफ मन में हल्की सी शिकायत थी, तो दूसरी तरफ मिलने की बेताबी। तारा बिना एक पल गँवाए ध्रुव के घर की तरफ भागी, लेकिन पूरे घर का चक्कर काटने के बाद भी उसे ध्रुव कहीं नज़र नहीं आया।

​उधर, सुमन जी का दिल तो अपनी भावी बहू के लिए बेहद भावुक था ही। ध्रुव और विजय जी की हिदायत के बावजूद वे खुद को रोक न सकीं और सुधा जी को धीरे से फुसफुसाकर एक छोटा सा संकेत दे दिया, "फिक्र मत करो सुधा, आज रात आनंद की सारी चिंताएँ दूर हो जाएँगी... बात पक्की समझो।" सुधा जी यह इशारा समझ गईं और जब उन्होंने यह बात आनंद को बताई, तो उनके चेहरे का तनाव अचानक गायब हो गया।

​लेकिन तारा की बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी। ध्रुव को न पाकर वह वापस अपने घर लौटी, जहाँ सुमन जी अभी भी सुधा जी से बातें कर रही थीं। तारा ने घबराकर पूछा, "आंटी, ध्रुव कहाँ है? पूरे घर में तो कोई नहीं है।" सुमन जी ने हैरान होकर कहा, "अरे! वह तो अपने कमरे में सो रहा था, अब कहाँ चला गया?" तारा ने तुरंत अपना फ़ोन निकालकर ध्रुव को कई बार कॉल और मैसेज किए, लेकिन दूसरी तरफ से कोई जवाब नहीं आया। सुमन जी ने किसी तरह अपनी मुस्कान छुपाते हुए तारा को संभाला, "पता नहीं बेटा, बिना बताए अचानक आ गया और अब गायब है... तू चिंता मत कर, आ जाएगा शाम तक।"

​रात को डिनर का वक्त हुआ। तारा अपने माता-पिता के साथ ध्रुव के घर पहुँची, लेकिन ध्रुव अब भी वहाँ नहीं था। दोनों परिवार हॉल में बैठकर आराम से बातें कर रहे थे, पर तारा का मन बुरी तरह बेचैन था। दिनभर में न कोई बात हुई थी, न कॉल का जवाब आया था। तभी अचानक तारा के फ़ोन की स्क्रीन जगमगा उठी। स्क्रीन पर ध्रुव का मैसेज था— "हमारे पुराने ठिकाने पर तुरंत आओ, मुझे तुमसे कुछ बहुत ज़रूरी बात करनी है।" मैसेज पढ़ते ही तारा का दिल तेज़ी से धड़कने लगा और एक अनजाने डर से उसकी घबराहट बढ़ गई... आखिर ध्रुव उसे इस वक्त अकेले कहाँ बुला रहा था?

सत्ताईसवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....