ध्रुव की तारा
भाग - ३
लेखिका "अनामिका"
स्विमिंग पूल वाली शाम के बाद रात भर तारा के मन में अजीब से सवाल घूमते रहे। प्यार, पसंद या इन सब एहसासों से वह हमेशा दूर ही रही थी, इसलिए उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है। वह बस यही सोचती रही कि सिया हमेशा ध्रुव के बारे में ही क्यों पूछती रहती है? और ध्रुव भी आखिर हर वक्त सिया को चुपके-चुपके क्यों देखता रहता है? और अगर ये दोनों ऐसा करते भी हैं, तो उसे अंदर ही अंदर इतना बुरा क्यों लगता है? इन्हीं उलझनों के बीच सोचते-सोचते वह सो गई।
अगली सुबह क्लासरूम में हमेशा की तरह चहल-पहल थी। तारा अपनी डेस्क पर बैठी ही थी कि सिया हांपते हुए आई और सीधे तारा के बगल में अपनी जगह पर बैठ गई—आखिर दोनों डेस्कमेट जो थीं।
"अरे यार! आज आने में बहुत लेट हो गया," सिया ने अपनी ज़ुल्फ़ें सँभालते हुए कहा और फिर तुरंत तारा की तरफ मुड़कर पूछा, "बता न, आज ध्रुव आया है क्या?"
तारा कुछ पल के लिए शांत रही। फिर खुद को संभालते हुए बोली, "हाँ, आया है... और शायद वो भी तुम्हें ही ढूँढ रहा था। वो मेरे साथ क्लासरूम के दरवाज़े तक आया था, तो मुझे लगा शायद तुम्हें ही देखने आया होगा।"
तारा की बात सुनते ही सिया के चेहरे पर एक हल्की सी रंगत आ गई और वह थोड़ा शर्मा गई। तारा चुपचाप उसे देखती रह गई, उसे समझ ही नहीं आया कि सिया इस तरह क्यों शर्मा रही है।
तभी क्लासरूम में सर ने कदम रखा और पूरा कमरा एकदम शांत हो गया। दोनों ने अपनी-अपनी किताबें खोल लीं और पढ़ाई शुरू हो गई।
लंच ब्रेक की घंटी बजते ही क्लास में हलचल मच गई। सभी बच्चे कैंटीन की तरफ भागने लगे। तारा और सिया भी अपनी-अपनी टिफिन उठाकर कैंटीन की एक टेबल पर जाकर बैठ गईं।
तारा ने अभी अपना डिब्बा खोला ही था कि ध्रुव अचानक पीछे से आया और धप्प से तारा के बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया। बिना कुछ कहे, उसने तारा का टिफिन अपनी तरफ खींच लिया और अपना डिब्बा तारा के आगे खिसका दिया।
"यार! आज मम्मी ने फिर से वही बोरिंग आलू के पराठे दे दिए," ध्रुव ने तारा का खाना चखते हुए लापरवाही से कहा, "आज तो मैं तेरा ही लंच खाऊँगा।"
तारा ने चिढ़कर उसे घूरते हुए अपना टिफिन वापस खींचने की कोशिश की, "ध्रुव! ये क्या बदतमीजी है? अगर तुम्हें पराठे पसंद नहीं हैं, तो तुम आंटी को सीधा मना क्यों नहीं कर देते? और अगर तुमसे नहीं बोला जाता, तो लाओ मैं बोल देती हूँ! मैं रोज-रोज तुम्हारे पराठे नहीं खा सकती यार, मेरा भी वजन बढ़ रहा है!"
ध्रुव ने मजे लेते हुए उसके गाल खींचने का नाटक किया और हँसते हुए बोला, "अरे वाह गोलू-मोलू चश्मिश! पराठे खाकर वैसे भी तू पोटैटो जैसी ही लगती है, थोड़ा और खा लेगी तो कौन-सा पहाड़ टूट पड़ेगा?"
"ध्रुव के बच्चे!" तारा गुस्से में लाल हो गई और कैंटीन में ही ध्रुव को मारने के लिए हाथ उठाने लगी। ध्रुव अपनी कुर्सी से पीछे हटकर उसका मजाक उड़ाता रहा और दोनों के बीच एक प्यारी सी नोक-झोंक शुरू हो गई।
तारा और ध्रुव की इस लड़ाई को सिया चुपचाप देख रही थी। उसकी आँखें सिर्फ ध्रुव पर ही टिकी हुई थीं। उसने अपनी उंगलियों से बालों की लट को कान के पीछे समेटा और थोड़ा शर्माते हुए बेहद धीमी और मीठी आवाज़ में बोली, "ध्रुव... अगर तुम्हें पराठे वाकई पसंद नहीं हैं, तो तुम मेरा टिफिन ले सकते हो। मैं आज पास्ता लाई हूँ।"
ध्रुव ने तुरंत तारा से ध्यान हटाया और सिया की तरफ देखकर एक शैतानी मुस्कान बिखेरी, "सच में सिया? तुम कितनी समझदार और स्वीट हो यार! एक तरफ तुम हो और एक तरफ ये चश्मिश... जिसे मेरी बिल्कुल फिक्र ही नहीं है।"
"तुम्हारी फिक्र करने के लिए कोई तो होना ही चाहिए ना," सिया ने अपनी पलकें झुकाते हुए धीमी आवाज़ में कहा और ध्रुव को अपना टिफिन थमा दिया।
ध्रुव ने सिया की आँखों में आँखें डालकर मुस्कुराते हुए कहा, "फिर तो अब से मेरा लंच पार्टनर फिक्स समझूँ?"
सिया के चेहरे पर एक गहरी लाली छा गई और वह शरमा कर मुस्कुरा दी।
तारा उन दोनों को चुपचाप देखती रह गई। ध्रुव और सिया के बीच आँखों ही आँखों में जो इशारे और मीठी-मीठी बातें (फ्लर्टिंग) हो रही थीं, वे तारा के सिर के ऊपर से निकल रही थीं। उसे यह सब समझ तो नहीं आ रहा था, लेकिन ध्रुव का अचानक उससे ध्यान हटाकर सिया से ऐसे बातें करना... तारा के दिल में एक अजीब सी चुभन पैदा कर रहा था। उसे अंदर ही अंदर बहुत बुरा लग रहा था, पर वह इस अहसास का नाम नहीं जानती थी।
मिड-टर्म एग्जाम्स खत्म हुए दो दिन बीत चुके थे और आज स्कूल में हफ़्ते भर की छुट्टियों का ऐलान हुआ था।
छुट्टी की घंटी बजते ही तारा जैसे ही कॉरिडोर में पहुँची, ध्रुव भागता हुआ उसके पास आया। उसके चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान थी। "अरे चश्मिश! सुन, फाइनली छुट्टियाँ शुरू हो गईं!"
तारा ने उसे घूरते हुए कहा, "हाँ, पता है। पर तुम इतने खुश क्यों हो रहे हो? तुम्हें तो रोना चाहिए!"
"क्यों भाई? छुट्टियों में कोई रोता है क्या?" ध्रुव ने ताज्जुब से पूछा।
"क्योंकि तुम्हारे मिड-टर्म्स के मार्क्स बहुत खराब आए हैं, ध्रुव! इसी साल तुम्हारा १२th का बोर्ड्स है और मेरा १०th का। ज़्यादा टाइम नहीं बचा है, इसलिए अपनी ये बत्तीसी बंद करो और पढ़ाई पर ध्यान दो," तारा ने उसे समझाया।
ध्रुव ने मुँह बनाते हुए कहा, "अरे यार! तू हमेशा इतना लेक्चर मत झाड़ा कर। चल, इन छुट्टियों में कहीं घूमकर आते हैं!"
"तुम्हें कहीं जाने की ज़रूरत नहीं है," तारा ने तुरंत मना कर दिया।
दोनों के बीच यह नोक-झोंक चल ही रही थी कि सिया भी वहाँ आ पहुँची। "क्या बातें हो रही हैं दोनों के बीच?"
ध्रुव ने तुरंत शिकायत की, "देख न सिया, छुट्टियों में कहीं बाहर घूमने का प्लान बना रहा हूँ और यह महारानी मना कर रही है।"
सिया ने मुस्कुराते हुए तारा का हाथ पकड़ा, "अरे चलो ना तारा! कितना मज़ा आएगा। थोड़ा रिफ्रेशमेंट भी ज़रूरी है।"
सिया के कहने पर तारा बेमन से मुस्कुरा दी और घूमने के लिए हाँ कह दिया। तभी सिया अचानक रुकी और बोली, "अरे यार! पर एक प्रॉब्लम है..."
"अब क्या प्रॉब्लम हो गई?" ध्रुव ने पूछा।
सिया ने कहा, "मेरा कज़िन आया हुआ है घर पर। अगर मैं जाऊँगी, तो उसे भी साथ लेकर जाना पड़ेगा।"
ध्रुव ने तुरंत मुस्कुराते हुए कहा, "अरे तो इसमें क्या दिक्कत है! उसे भी साथ ले चलते हैं, और मज़ा आएगा।"
तारा ने हिचकिचाते हुए पूछा, "हाँ, लेकिन वो..."
तारा की बात पूरी होने से पहले ही ध्रुव ने उसकी बात काटते हुए कहा, "अब कोई 'लेकिन-वेकिन' नहीं चश्मिश! प्लान फ़ाइनल है, सिया तुम अपने कज़िन को भी तैयार रहने को बोल देना।"
सिया ने ख़ुशी से मुस्कुराते हुए हाँ में सिर हिलाया।
तारा उन दोनों को चुपचाप देखती रह गई। उसके मन में एक अजीब सी घबराहट तैरने लगी—एक अनजाना लड़का उनके साथ जाने वाला था, जिसे उसने कभी देखा तक नहीं था। क्या यह ट्रिप सही रहेगी?"
तीसरा भाग समाप्त, कहानी जारी है....