ध्रुव की तारा - भाग 7 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ध्रुव की तारा - भाग 7

ध्रुव की तारा

भाग - ७

लेखिका "अनामिका"

छुट्टियाँ खत्म होने के बाद स्कूल का पहला दिन आ गया। तारा और ध्रुव रोज़ की तरह एक साथ पैदल ही स्कूल जा रहे थे।

​तभी रास्ते में सिया भी आती हुई दिखी। उसने दूर से हाथ हिलाया और मुस्कुराते हुए उन दोनों के पास आ गई।

​"और बताओ, छुट्टियाँ खत्म! ट्रिप का नशा उतरा कि नहीं?" सिया ने आते ही हँसकर पूछा।

​तारा ने उत्साह में कहा, "अरे यार, ट्रिप के सारे फोटोज़ इतने कमाल के आए हैं न! देखकर मज़ा आ गया।"

​सिया ने थोड़ा हैरान होकर पूछा, "क्या? फोटोज़ मिल भी गए? तुम लोगों ने देख भी लिए?"

​"हाँ, हम दोनों ने तो परसों ही ध्रुव के लैपटॉप पर सारे फोटोज़ साथ बैठकर देख लिए," तारा ने सहजता से बताया।

​यह सुनते ही सिया का चेहरा थोड़ा उतर गया। उसके दिल में फिर से जलन की टीस उठी। उसने शिकायत भरे लहजे में कहा, "वाह! तुम दोनों ने साथ में तस्वीरें देख भी लीं और मुझे बताया भी नहीं?"

​ध्रुव ने बेफ़िक्री से हँसते हुए बात हवा में उड़ानी चाही, "अरे सिया, वो तो तारा घर आ गई थी तो हमने साथ में देख लिए, इसमें बुरा मानने वाली क्या बात है!"

​लेकिन तारा सिया के चेहरे के भाव समझ गई। माहौल को संभालते हुए उसने तुरंत कहा, "कोई बात नहीं सिया, ध्रुव के लैपटॉप में ही तो हैं सारे फोटोज़। तुम आज शाम को ध्रुव के घर आ जाना, आराम से बैठकर देख लेना।"

​तारा की बात सुनते ही ध्रुव की आँखें चमक उठीं। सिया उसके घर आने वाली है, यह सोचकर ही वह एक्साइटेड हो गया। ध्रुव ने तुरंत कहा, "हाँ-हाँ सिया! बिल्कुल आ जाओ, साथ में चाय-नाश्ता भी हो जाएगा।"

​सिया का मूड भी तुरंत ठीक हो गया और वह ध्रुव की तरफ देखकर मुस्कुराई, "ठीक है फिर, शाम का डन!"

​ध्रुव और सिया के बीच फिर से वही शरारती बातें और हल्की-फुल्की फ्लर्टिंग शुरू हो गई। अपने बगल में ध्रुव को सिया के इतने करीब और खुश देखकर तारा का दिल एक बार फिर भारी होने लगा। वह अनकंफर्टेबल महसूस करने लगी और उन दोनों को बातें करता छोड़, चुपचाप कदम बढ़ाकर उनसे थोड़ा आगे चलने लगी।

अभी पूरा शाम का ढलना बाकी ही था। हल्की-सी सुरमई धूंध के बीच सिया, तारा के घर के दरवाजे पर खड़ी घंटी बजा रही थी। तारा ने जैसे ही दरवाजा खोला, सिया को सामने देख उसके चेहरे पर हैरानी तैर गई, "अरे सिया! तुम यहाँ?"

​सिया ने खिझते हुए हँसकर कहा, "अरे यार, मैं बुरी तरह कंफ्यूज हो गई! तुम दोनों के घर इतने आमने-सामने हैं कि मुझे लगा यही ध्रुव का घर है।"

​तारा के दिल में एक अजीब सी असहजता कौंधी, पर उसने खुद को संभालते हुए मुस्कुराकर कहा, "कोई बात नहीं, अंदर आ जाओ।"

​सिया खुशी-खुशी अंदर चली आई। जैसे ही वह हॉल में पहुँची, उसकी नज़रें दीवारों पर सजे तस्वीरों के फ्रेमों पर टिक गईं। तारा के माता-पिता के साथ ध्रुव और उसके परिवार की ढेर सारी हँसती-खिलखिलाती तस्वीरें लगी थीं। सिया के मन में खटका हुआ—'ये लोग तो मेरी उम्मीद से कहीं ज़्यादा एक-दूसरे के करीब हैं!'

​तारा उसे अपने कमरे में ले गई। कमरे में कदम रखते ही सिया का मूँह खुला का खुला रह गया। कमरे का हर कोना, हर दीवार ध्रुव और तारा की बचपन से लेकर अब तक की यादों से भरी पड़ी थी—कहीं कोई फनी फेस बनाती तस्वीर, तो कहीं ढेरों मासूम मोमेंट्स। जो सिया ध्रुव को अपना बनाने के सपने बुन रही थी, उस ध्रुव का तारा की जिंदगी के हर कोने पर कब्जा देखकर सिया के अंदर जलन की टीस अचानक तेज हो गई।

​जलन छिपाते हुए सिया ने कमरे का जायजा लिया और सहज बनने का नाटक करते हुए पूछा, "वैसे... तुम्हारे घर में कोई दिख नहीं रहा? आंटी-अंकल कहाँ हैं?"

​"पापा अभी ऑफिस से नहीं लौटे हैं," तारा ने अलमारी सही करते हुए जवाब दिया, "और मम्मी? वो तो ध्रुव की मम्मी के साथ शॉपिंग पर गई हैं।"

​सिया का चेहरा थोड़ा गंभीर हुआ। उसने दीवारों की तरफ इशारा करते हुए सीधा सवाल दाग दिया, "तारा, तुम्हारे पेरेंट्स तुम दोनों की दोस्ती को लेकर कुछ कहते नहीं? मेरा मतलब है... किसी लड़के की इतनी सारी तस्वीरें तुम्हारे कमरे में हैं, दीवारों पर चिपकी हैं, तो कुछ टोकते नहीं?"

​तारा ने सादगी से मुस्कुराकर कहा, "अरे नहीं, ऐसी कोई बात ही नहीं है। हम दोनों बचपन से साथ पले-बढ़े हैं, परिवार जैसे ही हैं।"

​अभी दोनों की बातचीत चल ही रही थी कि आमने-सामने के घरों वाली खिड़की से ध्रुव की जानी-पहचानी बुलंद आवाज गूंजी, "अरे चश्मिश! यहाँ आ जा!"

​तारा और सिया ने खिड़की की तरफ देखा। ध्रुव अपने कमरे की खिड़की में खड़ा हाथ हिला रहा था। वह तारा के कमरे में सिया को देखकर थोड़ा हैरान हुआ, फिर हँसते हुए बोला, "अरे सिया! तुम वहाँ क्या कर रही हो? मैं तो तुम्हारा अपने घर पर इंतजार कर रहा था! और सुन तारा, मम्मी का फोन आया था, दोनों मम्मीयाँ सीधे मेरे घर ही आ रही हैं। तुम दोनों भी जल्दी यहाँ आ जाओ!"

​सिया के चेहरे पर वापस मुस्कान लौट आई। तारा ने एक हल्की सांस भरी और सिया से बोली, "चलो, ध्रुव के घर चलते हैं।" और दोनों ध्रुव के घर की ओर बढ़ गईं।

ध्रुव के घर की चौखट लाँघते ही सिया के मन में एक अनजानी सी बेचैनी तैरने लगी। उसे लगा था कि शायद यहाँ माहौल कुछ अलग होगा, लेकिन उसे क्या मालूम था कि जिस सच से वह भागना चाह रही थी, वही सच इस घर के हर कोने में उसका इंतज़ार कर रहा था...

सातवां भाग समाप्त, कहानी जारी है....