ध्रुव की तारा - भाग 5 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ध्रुव की तारा - भाग 5

ध्रुव की तारा

भाग - ५

लेखिका "अनामिका"

​बुआ ने मुस्कुराते हुए सबका स्वागत किया, "अरे बच्चों, आओ-आओ, अंदर आ जाओ! बिल्कुल शर्माने की ज़रूरत नहीं है, इसे अपना ही घर समझो। तारा, तुम सिया को लेकर अपने कमरे में चली जाओ। और तुम दोनों लड़के... सामने वाले कमरे में शिफ्ट हो जाओ। जल्दी से फ्रेश हो जाओ, तब तक मैं खाना लगाती हूँ।"

​कमरों में जाने के बाद ध्रुव से खुद पर काबू नहीं रखा गया। वह तारा के पास आकर धीरे से बोला, "यार चश्मिश, तू तो सच बोल रही थी! तेरी बुआ तो दूर-दूर से बुआ लगती ही नहीं हैं, कितनी कूल हैं!"

​सिया ने भी अपनी गलती मानते हुए कहा, "हाँ यार तारा, सॉरी! हमें लगा था कि हम पर हर वक्त कोई निगरानी रखेगा।"

​तभी आरव, जो अब तक शांत था, एक हल्की सी मुस्कान के साथ बोला, "वैवैसे... क्या यह सच में तुम्हारी सगी बुआ हैं? मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा!"

​आरव की इस बात पर सब हँस पड़े। पहली बार उसका यह मज़ाकिया और बेफ़िक्र रूप देखकर साफ़ था कि वह भी अब इस ग्रुप में घुलने-मिलने लगा है।

​सब हँसी-मज़ाक कर ही रहे थे कि ध्रुव की नज़र आरव पर पड़ी। उसने ध्यान दिया कि आरव बार-बार तारा को ही देख रहा है और उसी से बात करने की कोशिश कर रहा है। ध्रुव को याद आया कि रास्ते भर बस में भी आरव की नज़रें तारा पर ही थीं। यह नोटिस करते ही ध्रुव के मन में एक अजीब सी बेचैनी होने लगी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसे यह सब इतना अनकंफर्टेबल क्यों लग रहा है!

सफ़र की थकान की वजह से वह पूरा दिन आराम में ही बीत गया।

​अगली सुबह हॉल में एक खूबसूरत नज़ारा था। तारा अपनी बुआ की गोद में सिर रखे लेटी थी और बुआ लाड से उसके बालों में उँगलियाँ फिरा रही थीं। तभी ध्रुव, सिया और आरव वहाँ पहुँचे। तारा तुरंत उठकर बैठ गई।

​बुआ ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "सुनो बच्चों, यहाँ पास ही एक बहुत खूबसूरत और शांत बीच (Beach) है। वहाँ की सुबह का नज़ारा अद्भुत होता है, तुम सबको आज वहीं से शुरुआत करनी चाहिए!"

​सबका उत्साह बढ़ गया और वे जल्दी से तैयार होकर बीच की तरफ निकल पड़े।

​समुद्र की उठती लहरें, सुनहरी धूप और ठंडी हवा ने सबका मन मोह लिया। बीच पर घूमते हुए आरव तारा के पास आया और बड़े सहज अंदाज़ में उससे हँसी-मज़ाक करने लगा। आरव की बातों पर तारा खुलकर मुस्कुरा रही थी। दोनों की यह कैज़ुअल बातचीत दूर खड़े ध्रुव की नज़रों से छिपी नहीं रही। आरव को तारा के इतने करीब देखकर ध्रुव के मन में अजीब सी तल्खी घुल रही थी।

​दूसरी तरफ, सिया मौका पाकर ध्रुव के साथ हल्की-फुल्की फ्लर्टिंग कर रही थी और ध्रुव भी आरव को दिखाने या अपना ध्यान भटकाने के लिए सिया के साथ वैसे ही बात करने लगा।

​तारा ने जब ध्रुव और सिया को एक-दूसरे से ऐसे हँस-हँसकर बातें करते देखा, तो उसका दिल बैठ गया। वह समझ नहीं पा रही थी कि ध्रुव को किसी और के करीब देखकर उसे इतना दर्द और अनकंफर्टेबल क्यों महसूस हो रहा है। लहरों के शोर के बीच, चारों के दिलों में अनकहे अहसासों का एक नया तूफ़ान उठ रहा था।

सफ़र की थकान की वजह से वह पूरा दिन आराम में ही बीत गया।

​अगली सुबह हॉल में एक खूबसूरत नज़ारा था। तारा अपनी बुआ की गोद में सिर रखे लेटी थी और बुआ लाड से उसके बालों में उँगलियाँ फिरा रही थीं। तभी ध्रुव, सिया और आरव वहाँ पहुँचे। तारा तुरंत उठकर बैठ गई।

​बुआ ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, "सुनो बच्चों, यहाँ पास ही एक बहुत खूबसूरत और शांत बीच (Beach) है। वहाँ की सुबह का नज़ारा अद्भुत होता है, तुम सबको आज वहीं से शुरुआत करनी चाहिए!"

​सबका उत्साह बढ़ गया और वे जल्दी से तैयार होकर बीच की तरफ निकल पड़े।

​समुद्र की उठती लहरें, सुनहरी धूप और ठंडी हवा ने सबका मन मोह लिया। बीच पर घूमते हुए आरव तारा के पास आया और बड़े सहज अंदाज़ में उससे हँसी-मज़ाक करने लगा। आरव की बातों पर तारा खुलकर मुस्कुरा रही थी। दोनों की यह कैज़ुअल बातचीत दूर खड़े ध्रुव की नज़रों से छिपी नहीं रही। आरव को तारा के इतने करीब देखकर ध्रुव के मन में अजीब सी तल्खी घुल रही थी।

​दूसरी तरफ, सिया मौका पाकर ध्रुव के साथ हल्की-फुल्की फ्लर्टिंग कर रही थी और ध्रुव भी आरव को दिखाने या अपना ध्यान भटकाने के लिए सिया के साथ वैसे ही बात करने लगा।

​तारा ने जब ध्रुव और सिया को एक-दूसरे से ऐसे हँस-हँसकर बातें करते देखा, तो उसका दिल बैठ गया। वह समझ नहीं पा रही थी कि ध्रुव को किसी और के करीब देखकर उसे इतना दर्द और अनकंफर्टेबल क्यों महसूस हो रहा है। लहरों के शोर के बीच, चारों के दिलों में अनकहे अहसासों का एक नया तूफ़ान उठ रहा था।

लहरें आकर उनके पैरों को छूकर लौट रही थीं, लेकिन दोनों के दिलों में उठती उथल-पुथल शांत होने का नाम नहीं ले रही थी। ध्रुव खुद सिया के साथ फ्लर्ट करके अपना ध्यान भटकाने का नाटक कर रहा था, पर उसका मन लगातार तारा और आरव पर ही अटका था।

​उधर तारा यह समझ ही नहीं पा रही थी कि हमेशा मज़ाक करने वाला ध्रुव आज सिया के इतने करीब क्यों दिख रहा है और यह बात उसे अंदर तक क्यों चुभ रही है। ढलते सूरज के साए में, दोनों बिना समझे एक अजीब से अनकहे रिश्ते और जलन के घेरे में उलझ रहे थे।

पांचवा भाग समाप्त, कहानी जारी है....