ध्रुव की तारा
भाग - ४
लेखिका: "अनामिका"
मिड-टर्म्स के बाद हफ़्ते भर की छुट्टियों का ऐलान हो चुका था। लेकिन बस स्टॉप पर हुई उस बातचीत के बाद तारा के मन में एक अनजाना डर तैर रहा था—एक अनजान लड़का ट्रिप पर साथ जाने वाला था, क्या यह फैसला सही रहेगा? इसी उलझन में वह और ध्रुव अपने-अपने घर पहुँचे।
ध्रुव के घर में ट्रिप की बात सुनते ही उसके माता-पिता तुरंत मान गए। आखिरकार वह लड़का था और १२th में था। असली चुनौती तो तारा के घर में थी, क्योंकि वह पहली बार बिना परिवार के दोस्तों के साथ कहीं बाहर जा रही थी।
तारा के घर के ड्राइंग रूम में माहौल काफी गंभीर था। तारा के मम्मी-पापा सामने सोफे पर बैठे थे और उनके चेहरे पर चिंता साफ़ दिख रही थी। तारा और ध्रुव दोनों उन्हें मनाने की पूरी कोशिश कर रहे थे।
"नहीं तारा, तुम अभी छोटी हो और पहली बार अकेले बाहर जाने की बात कर रही हो," तारा की मम्मी ने साफ़ इंकार किया, "हमें चिंता होती है बेटा।"
"हाँ मम्मी, लेकिन मैं अकेली थोड़ी न हूँ! ध्रुव भी तो साथ जा रहा है," तारा ने मिन्नत की।
ध्रुव ने तुरंत आगे बढ़कर कहा, "अंकल-आंटी, आप बिल्कुल टेंशन मत लो! मैं हूँ न, चश्मिश का पूरा ध्यान रखूँगा।"
तारा के पापा आनंद जी ने ध्रुव को देखते हुए कहा, "बेटा, तुम दोनों ही अभी बच्चे हो। इस साल १०th और १२th के बोर्ड्स भी हैं। ऐसे में तुम लोगों को अकेले भेजना सही नहीं लगता।"
तभी दरवाज़े से ध्रुव के पापा विजय जी ने अंदर कदम रखा। उन्होंने आखिरी बात सुन ली थी और मुस्कुराते हुए बोले, "अरे आनंद यार! किस बात पर इतना सोच रहे हो? हम दोनों भी तो कॉलेज के दिनों में ऐसे ही बेफिक्र होकर निकल जाया करते थे!"
अपने दोस्त आनंद की चिंता समझते हुए विजय जी ने तारा के सिर पर हाथ रखा, "तारा तो मेरी भी बेटी जैसी है आनंद। बच्चों का रिफ्रेशमेंट भी ज़रूरी है, पढ़ाई का स्ट्रेस कम होगा। और फिर ध्रुव साथ में है ही, मैं तुम्हें भरोसा दिलाता हूँ कि कोई दिक्कत नहीं होगी।"
अपने पुराने कॉलेज फ्रेंड विजय का आश्वासन और दोनों बच्चों की ज़िद देखकर आखिरकार आनंद जी और तारा की मम्मी मान गए। मम्मी ने मुस्कुराते हुए शर्त रखी, "ठीक है, पर हर दो घंटे में कॉल करना होगा!"
तारा की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसने ध्रुव की तरफ देखकर राहत की साँस ली और ध्रुव ने भी उसे देखकर विक्ट्री साइन बनाया।
तारा और ध्रुव अभी अपनी इस जीत पर खुश हो ही रहे थे कि तभी आनंद जी ने हाथ उठाकर उन्हें रोका।
"रुक जाओ, खुश होने से पहले मेरी एक शर्त सुन लो," आनंद जी ने गंभीर आवाज़ में कहा, "तुम लोगों को जाने की परमिशन तो मिल जाएगी, लेकिन ट्रिप की जगह मैं तय करूँगा कि तुम लोग कहाँ जाओगे।"
यह सुनते ही ध्रुव और तारा ने एक-दूसरे की तरफ देखा। हालाँकि जगह का चुनाव पापा के हाथ में जाने से उन्हें ज़्यादा फ़र्क नहीं पड़ा, क्योंकि उनके लिए सबसे बड़ी बात यह थी कि आख़िरकार उन्हें जाने की मंज़ूरी मिल गई थी। दोनों के चेहरों की मुस्कान और गहरी हो गई।
जाने का दिन आया तो तारा के पापा आनंद जी खुद तारा और ध्रुव को बस स्टॉप छोड़ने पहुँचे, क्योंकि ध्रुव के पापा को अर्जेंट काम से ऑफिस जाना पड़ गया था।
बस स्टॉप पहुँचते ही उन्हें सिया और उसके पेरेंट्स भी दिखे। सिया के साथ एक और लड़का खड़ा था—चश्मा पहने, थोड़ा गंभीर, पढ़ाकू लेकिन बेहद हैंडसम! वह सिया का कज़िन आरव था।
आनंद जी ने आगे बढ़कर सिया के पेरेंट्स को 'हेलो' कहा। बातचीत में जब सिया के पापा ने पूछा कि क्या वे एक-दूसरे को जानते हैं, तो आनंद जी ने मुस्कुराते हुए बताया, "हाँ, हम कॉलेज के ज़माने के बेस्ट फ्रेंड्स हैं और पड़ोसी भी। हमारे बच्चे भी आपस में बहुत अच्छे दोस्त हैं।"
सिया के पेरेंट्स के चेहरे पर भी अपनी इकलौती बेटी को पहली बार अकेले भेजने की घबराहट साफ़ दिख रही थी। उनकी चिंता दूर करते हुए आनंद जी ने तुरंत आश्वस्त किया, "आप बेफ़िक्र रहिए। मैंने ही इनकी ट्रिप की जगह तय की है और ये सब मेरी बहन यानी तारा की बुआ के घर जा रहे हैं।"
यह सुनते ही तारा की ख़ुशी का ठिकाना न रहा, क्योंकि उसकी बुआ बहुत कूल और प्यारी थीं। लेकिन दूसरी तरफ ध्रुव, सिया और आरव थोड़े मायूस हो गए—उन्हें लगा कि घर से दूर आज़ादी से घूमने का प्लान तो अब किसी बड़े की नज़र में ही बीतेगा!
सिया के पेरेंट्स ने राहत की साँस ली। और ठीक तभी, हॉर्न बजाती हुई बस आकर रुक गई।
बस आकर रुकी तो सभी ने अपने बैग उठाए और बस में चढ़ने लगे। सीटें ढूँढते ही ध्रुव और सिया एक साथ खिड़की वाली सीट पर जा बैठे। तारा वहीं खड़ी रह गई। उसे उम्मीद थी कि ध्रुव उसके साथ बैठेगा, लेकिन अब मजबूरी में उसे आरव की बगल वाली सीट पर बैठना पड़ा। आरव उसके लिए बिल्कुल अनजान था, इसलिए वह थोड़ी असहज महसूस कर रही थी। हालाँकि, उसने ध्रुव से कुछ नहीं कहा। संयोग से, चारों की सीटें आसपास ही थीं—आगे-पीछे।
जैसे ही बस शहर की सीमा पार कर आगे बढ़ी, ध्रुव पीछे मुड़ा और धीमी आवाज़ में तारा से बोला, "क्या यार चश्मिश! एक जेल से निकले नहीं कि दूसरे में बंद होने जा रहे हैं! छुट्टियाँ एंजॉय करने का सारा मज़ा किरकिरा हो गया। अब हर वक्त बुआ जी की नज़र हम पर ही रहेगी।"
सिया ने भी तुरंत ध्रुव की हाँ में हाँ मिलाई, "हाँ यार, मुझे तो लगा था हम आज़ाद पंछी की तरह घूमेंगे।"
आरव चुपचाप सुनता रहा। वह अभी-अभी इस ग्रुप से जुड़ा था, इसलिए चुप रहना ही बेहतर समझ रहा था।
तारा दोनों का उतरा हुआ चेहरा देखकर मुस्कुराई और उन्हें दिलासा देते हुए बोली, "तुम दोनों फालतू में टेंशन ले रहे हो! तुम्हें मेरी बुआ के बारे में नहीं पता, वह बहुत ज़्यादा कूल हैं। एक बार उनसे मिलोगे न, तो अपनी बात वापस ले लोगे।"
लंबा सफ़र हँसी-मज़ाक और हल्की-फुल्की बातों में कट गया और आखिरकार बस अपने गंतव्य पर पहुँच गई।
बस स्टैंड पर बस से उतरते ही तारा ने दूर से हाथ हिलाया। वहाँ उन्हें रिसीव करने एक बेहद स्टाइलिश औरत खड़ी थी। उन्हें देखते ही ध्रुव और आरव दोनों हक्के-बक्के रह गए! मॉडर्न लुक, चेहरे पर गजब का कॉन्फिडेंस और बेमिसाल खूबसूरती... उन्हें देखकर कोई कह ही नहीं सकता था कि वह तारा की बुआ हैं! ध्रुव ने आँखें फाड़े तारा की तरफ देखा, मानो अपनी कही बात पर मन ही मन पछता रहा हो।
बुआ ने मुस्कुराते हुए आगे बढ़कर तारा को गले लगा लिया और बाकी तीनों पर एक नज़र डाली। उनकी चमकती आँखों में एक अजीब सी शरारत थी, जिसे देखकर ध्रुव समझ गया कि यह ट्रिप बोरिंग तो बिल्कुल नहीं होने वाली। लेकिन क्या यह 'कूल बुआ' वाकई उनकी हर हरकत को नज़रअंदाज़ करने वाली थीं, या फिर इस ट्रिप में कोई नया ट्विस्ट उनका इंतज़ार कर रहा था?
चौथा भाग समाप्त, कहानी जारी है....