ध्रुव की तारा - भाग 6 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ध्रुव की तारा - भाग 6

ध्रुव की तारा

भाग - ६

लेखिका "अनामिका"

दिन भर की भागदौड़ के बाद रात के सन्नाटे में तारा अकेली बालकनी में खड़ी थी। सामने आसमान में चाँद-सितारे चमक रहे थे और ठंडी हवा के हल्के झोंके चेहरे को छू रहे थे। तारा उस खूबसूरत नज़ारे को निहारते हुए दिन भर की बातों में उलझी थी। उसके दिमाग में बस यही सवाल घूम रहा था—जब ध्रुव और सिया एक-दूसरे के करीब होते हैं, तो उसके दिल में यह अजीब सी टीस क्यों उठती है?

​"यहाँ अकेली क्या कर रही हो, चश्मिश?" ध्रुव की आवाज़ से उसकी सोच का सिलसिला टूटा। वह धीरे से उसके पास आकर खड़ा हो गया।

​"बस, यूँ ही... मौसम बहुत अच्छा था तो यहाँ चली आई," तारा ने अपनी घबराहट छुपाते हुए कहा।

​कुछ देर खामोशी रही, फिर ध्रुव ने मन में दबी उत्सुकता रोक न पाते हुए पूछा, "अच्छा एक बात बताओ, यह तुम्हारी कौन सी बुआ हैं? तुमने इतने सालों में कभी इनका ज़िक्र नहीं किया और न ही मैंने इन्हें कभी तुम्हारे घर देखा।"

​तारा ने एक गहरी साँस ली और आसमान की तरफ देखते हुए बोली, "ये मेरी इकलौती बुआ हैं, ध्रुव। इन्होंने कभी शादी नहीं की और यहाँ अकेली रहती हैं। दरअसल, खानदान के ज़्यादातर लोग इनसे नाराज़ रहते हैं, इसलिए ये किसी के घर नहीं जातीं।"

​"क्यों? ऐसा क्या हुआ?" ध्रुव ने चौंककर पूछा।

​"मुझे भी पूरा सच नहीं पता, पर जितना मम्मी-पापा से सुना है... बुआ किसी से बेहद प्यार करती थीं, लेकिन वो एकतरफ़ा ही था। उन्होंने कभी किसी को नहीं बताया कि वो कौन था और न ही आज तक परिवार में किसी को यह पता चल पाया। इसी बात को लेकर घर में बहुत झगड़े हुए थे और बुआ ने ज़िंदगी भर अकेले रहने का फ़ैसला कर लिया। अब बस पापा, मम्मी और मैं ही इनसे बात करते हैं, बाकी रिश्तेदारों ने तो इनसे दूरी बना ली है।"

​ध्रुव चुपचाप तारा की बात सुनता रहा। बालकनी में पसरी खामोशी के बीच दोनों बुआ के इस अनकहे दर्द और अपनी-अपनी उलझनों में खो गए।

​अगली सुबह, यादों से भरा बैग और मुस्कुराते चेहरे लेकर चारों घर वापसी के लिए रवाना हो गए।

​जब बस शहर के बस स्टॉप पर रुकी, तो सामने का नज़ारा देखकर तारा की आँखें खुशी से चमक उठीं। जाते वक्त तारा के पापा छोड़ने आए थे, लेकिन इस बार तारा के पापा को दफ़्तर में ज़रूरी काम आ गया था, इसलिए उन दोनों को लेने ध्रुव के पापा—विजय जी—खुद अपनी गाड़ी लेकर पहुँचे थे।

​बस से उतरते ही ध्रुव के पापा ने तारा के सिर पर प्यार से हाथ रखा और उसका बैग खुद उठाकर गाड़ी में रखते हुए मुस्कुराकर बोले, "कैसी रही ट्रिप मेरी बेटी की? ध्रुव ने कोई परेशानी तो नहीं खड़ी की न?" तारा ने हँसते हुए सिर हिलाया।

​दूसरी तरफ सिया के माता-पिता दोनों उसे लेने आए थे। सिया ने जब देखा कि ध्रुव के पापा तारा को अपनी ही बेटी की तरह प्यार करते हैं और दोनों परिवारों के बीच इतना गहरा जुड़ाव है, तो उसके दिल में एक हल्की सी टीस उठी। सिया ध्रुव को पसंद करने लगी थी और ट्रिप के बाद दोनों के बीच एक अनकहा आकर्षण भी पनप रहा था। ऐसे में तारा और ध्रुव के परिवारों का एक-दूसरे पर यह अटूट भरोसा देख सिया को थोड़ी जलन महसूस हुई—उसे लगा कि तारा ध्रुव की ज़िंदगी और उसके परिवार के जितने करीब है, वहाँ तक पहुँच पाना उसके लिए आसान नहीं होगा।

​सबने मुस्कुराकर एक-दूसरे को अलविदा कहा, लेकिन सिया की खामोश नज़रों में छिपी वह जलन आने वाले दिनों के लिए एक नए मोड़ की तरफ इशारा कर रही थी।

कमरे की मेज़ पर बैठा ध्रुव ट्रिप की तस्वीरों को पलट रहा था। तभी उसकी नज़र एक अजीब सी बात पर टिकी—ज़्यादातर तस्वीरों में आरव का ध्यान सिर्फ तारा की तरफ़ ही था।

​ध्रुव अभी उन्हीं तस्वीरों को ग़ौर से देख ही रहा था कि दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई और बिना इंतज़ार किए तारा सीधे कमरे के अंदर आ गई। "मैंने नॉक किया था, मैं अंदर आ रही हूँ!" कहते हुए वह मुस्कुराकर अंदर खड़ी हो गई।

​ध्रुव ने चिढ़ाते हुए कहा, "कमरे के अंदर तो आ ही चुकी हो, अब क्या अलमारी के अंदर भी जाओगी?"

​"क्या कर रहे हो?" तारा ने मुस्कुराते हुए पूछा।

​"बस, ट्रिप की तस्वीरें देख रहा था," ध्रुव ने लैपटॉप की स्क्रीन उसकी तरफ़ घुमाते हुए कहा।

​तारा भी तुरंत उसके पास आकर बैठ गई। दोनों साथ में तस्वीरें देखने लगे। तभी ध्रुव ने तस्वीरों की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा, "अच्छा एक बात बताओ, तुमने नोटिस किया? यह आरव तुम्हें हर फोटो में ऐसे क्यों देख रहा है? तुम दोनों के बीच कुछ चल रहा है क्या?"

​तारा ने तुरंत उसे टोका, "क्या बकवास कर रहे हो ध्रुव! वो बहुत अच्छा और तमीज़दार लड़का है। हम बस नॉर्मल बातें कर रहे थे... तुम्हारी और सिया की तरह नहीं, जो पूरे रास्ते एक-दूसरे से चिपककर 'ही-ही, हू-हू' कर रहे थे!"

​तारा का यह तीखा जवाब सुनते ही ध्रुव थोड़ा झेंप गया। अपनी चोरी पकड़े जाने पर उसने चुपचाप बात घुमाना ही बेहतर समझा और दोनों फिर से तस्वीरें देखने लगे।

​तभी ध्रुव की मम्मी दरवाज़ा खोलते हुए अंदर आईं, "ध्रुव! ट्रिप से आते ही तुमने अपने सारे गंदे कपड़े..."

​तारा को वहाँ देखकर उनकी ज़बान रुक गई। फिर वे मुस्कुराते हुए तारा से बोलीं, "अरे तारा, तुम भी यहीं हो! देखो ज़रा इसे, आते ही सारे गंदे कपड़े कमरा भर में बिखेर दिए हैं। तुम भी घर जाकर यही सब करती हो क्या?"

​मम्मी को अपनी पोल खोलते देख ध्रुव शर्मिंदगी से लाल हो गया, जबकि तारा उसकी शक्ल देखकर अपनी हँसी नहीं रोक पाई।

तारा की हँसी देखकर ध्रुव बस उसे घूर कर रह गया। दिन भर की थकान और मन में उठे अनगिनत सवालों को पीछे छोड़, दोनों को पता था कि कल से वही पुरानी स्कूल की ज़िंदगी और नए मोड़ उनका इंतज़ार कर रहे हैं।

छटा भाग समाप्त, कहानी जारी है....