ध्रुव की तारा - भाग 26 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ध्रुव की तारा - भाग 26

ध्रुव की तारा
भाग - २६
लेखिका "अनामिका"
​रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर गूँजती अनाउंसमेंट और ट्रेन की सीटी के बीच एक खामोश हलचल मची हुई थी। तारा का मन भारी था; उसके कदम आगे तो बढ़ रहे थे, लेकिन दिल वहीं ध्रुव के पास ठिठक जाना चाहता था। पिता की कड़वी हिदायत और ध्रुव की दी गई कसौटी ने उसे वापस लौटने पर मजबूर तो कर दिया था, पर ध्रुव को इस हाल में छोड़कर जाना उसके लिए बेहद तकलीफदेह था।
​ध्रुव मुस्कुराने की पूरी कोशिश कर रहा था, लेकिन उसके अंदर भी एक अजीब सी घबराहट और खालीपन तैर रहा था। पिछले दो सालों में कंपनी में उसका काम बेहद शानदार रहा था; जॉब अब परमानेंट हो चुकी थी और ऑफिस में उसके प्रमोशन और सैलरी हाइक की बातें भी जोरों पर थीं। करियर का यह मोड़ उसके लिए बहुत अहम था और वह इस बेहतरीन अवसर को छोड़ भी नहीं सकता था। लेकिन इस सच्चाई का दूसरा पहलू यह था कि अब उसे इस शहर में पूरी तरह अकेला रहना होगा। पिछले दो सालों से अपनी पढ़ाई के साथ-साथ तारा ही तो थी, जिसने ध्रुव के घर, उसकी सेहत और उसकी बिखरी हुई ज़िंदगी को इतनी सादगी से संभाल रखा था।
​ध्रुव जानता था कि तारा के बिना सब कुछ मैनेज करना उसके लिए आसान नहीं होगा, लेकिन अपनी इस घबराहट की एक शिकन भी वह तारा के चेहरे पर नहीं आने देना चाहता था। तारा खुद अंदर से टूट रही थी, ऐसे में अगर वह कमजोर पड़ता तो तारा कभी चैन से घर नहीं लौट पाती।
​तारा की नम आँखों में छिपी फिक्र को पढ़ते हुए ध्रुव ने बड़ी नरमी से उसके दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। चेहरे पर एक झूठी पर तसल्लीबख्श मुस्कान लाते हुए उसने कहा, "तारा, यूँ उदास मत हो। अब मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूँ जो अपना ध्यान न रख सके। तुमने मुझे बहुत संभाल लिया, अब थोड़ा खुद का, अंकल-आंटी का... और हाँ, कभी-कभी मेरे मम्मी-पापा का भी ध्यान रख लेना। मैं सच में यहाँ सब ठीक से मैनेज कर लूँगा।"
​ध्रुव के मुँह से अपने माता-पिता के साथ-साथ उसके माता-पिता का ख्याल रखने की बात सुनकर तारा के सब्र का बांध टूट गया। तारा ने भारी मन से सिर हिलाया, लेकिन उसकी आँखों से छलकता हर एक आँसू बिना कहे बहुत कुछ बयाँ कर रहा था। तभी दूर से आती ट्रेन की गड़गड़ाहट ने दोनों के बीच के उस भावुक पल को तोड़ दिया। ट्रेन के प्लेटफॉर्म पर आकर रुकते ही ध्रुव ने भारी मन से तारा का सामान बोगी में रखवाया।
​ट्रेन की खिड़की से तारा ने आंसुओं से भरी नज़रों से ध्रुव को देखा, जो मुस्कुराते हुए उसे अलविदा कह रहा था। जैसे ही ट्रेन ने धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ी, ध्रुव का वो मुस्कुराता चेहरा पीछे छूटने लगा और तारा एक अनजाने डर और अपने पिता के सामने खड़े होने की कसक लेकर अपने शहर की ओर निकल पड़ी।
तारा अपने घर के दरवाज़े पर खड़ी हुई और उसने झिझकते हुए बेल बजाई। कुछ ही पलों में माँ ने दरवाज़ा खोला और दो साल बाद अपनी बेटी को सामने देख उनकी आँखें ख़ुशी से भर आईं।
​"तारा! मेरी बच्ची..." माँ ने उसे कसकर गले से लगा लिया और अंदर लाकर सोफ़े पर बिठाया। उसका चेहरा सहलाते हुए बोलीं, "कितनी दुबली हो गई है तू! वहाँ ठीक से खाती-पीती भी थी या नहीं? अब आ गई है न, मैं सब संभाल लूँगी।"
​माँ का यह दुलार पाकर तारा की आँखें भर आईं और वह उनके कंधे पर सिर रखकर बोली, "माँ... आपकी बहुत याद आती थी।"
​अभी माँ उसे चुप करा ही रही थीं कि पिता कमरे से बाहर आए। तारा ने उम्मीद भरी नज़रों से उनकी तरफ़ देखा, लेकिन उन्होंने बिना कुछ कहे, बस एक ख़ामोश नज़र उस पर डाली और वापस अपने कमरे में चले गए। पिता का यह ठंडा व्यवहार देखकर तारा हैरान रह गई और बस चुपचाप उन्हें जाते हुए देखती रही।
पिता की ख़ामोशी तारा के लिए किसी सज़ा से कम नहीं थी, लेकिन इस बीच ध्रुव का हर लंच टाइम और शाम का कॉल ही उसके चेहरे पर मुस्कान वापस लाता था। ध्रुव भी अकेलेपन से जूझ रहा था, पर तारा के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी बखूबी निभाते हुए उसने पूरे दिल से उसकी हिम्मत बढ़ाई। ध्रुव के कहे अनुसार, तारा अपने साथ-साथ उसके माता-पिता का भी पूरा ध्यान रख रही थी। घर का माहौल शांत ज़रूर था, पर पिता आनंद की वह अनकही चुप्पी हर बीतते दिन के साथ भारी होती जा रही थी।
​एक दिन आख़िरकार विजय (ध्रुव के पिता) से और चुप नहीं रहा गया। उन्होंने बेहद संजीदगी से अपने दोस्त आनंद से पूछ ही लिया, "आनंद, तुम कब तक तारा से ऐसे दूरी बनाए रखोगे? मैं समझ सकता हूँ कि बेटी का अचानक ऐसा फैसला किसी भी बाप को अचरज में डाल सकता है, पर तुम उससे बात क्यों नहीं कर रहे?"
​आनंद ने एक गहरी साँस ली और खिड़की के बाहर देखते हुए अपनी चुप्पी तोड़ी, "विजय, हमें भले ही इन दोनों ने कुछ न बताया हो, पर हम जानते हैं कि ध्रुव और तारा एक-दूसरे को चाहते हैं। मुझे तुम्हारे बेटे से कोई शिकायत नहीं है। बचपन से लेकर आज तक उसने तारा की जिस तरह हिफ़ाज़त की है, उससे बेहतर जीवनसाथी उसके लिए कोई हो ही नहीं सकता।"
​आनंद का गला भर आया, उन्होंने आगे कहा, "पर ज़माना बहुत जल्दी उँगलियाँ उठाता है विजय। बिना किसी नाम के रिश्ते को यह समाज कब तक सही नज़रों से देखेगा? बस इसी बात की फिक्र मुझे चुप कराए बैठी है।"
​विजय जी ने अपने दोस्त के कंधे पर हाथ रखा और मुस्कुराते हुए बोले, "बात बिल्कुल जायज़ है आनंद। सुमन और मैंने तो तारा को मन ही मन अपनी बहू मान ही लिया है। अब जबकि ध्रुव की जॉब भी परमानेंट हो चुकी है और वह सैटल है, तो इस मामले को ढील देने का कोई मतलब नहीं। तुम बेफ़िक्र रहो, मैं आज ही ध्रुव से सीधी बात करता हूँ।"
छब्बीसवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....