ध्रुव की तारा - भाग 25 Anamika द्वारा प्रेम कथाएँ में हिंदी पीडीएफ

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ध्रुव की तारा - भाग 25

ध्रुव की ताराभाग - २५ लेखिका "अनामिका" ​ध्रुव के ग्रेजुएशन खत्म होते ही ज़िंदगी की रफ्तार अचानक दोगुनी हो गई थी। कॉर्पोरेट वर्ल्ड का अनुशासन, देर रात तक चलने वाली थकाऊ मीटिंग्स और कभी-कभी नाइट शिफ्ट्स... ध्रुव पूरी तरह से अपनी नौकरी की उलझनों में सिमट कर रह गया था। अब उसके पास तारा के लिए न तो पहले जैसी लंबी बातें करने का वक्त था, और न ही कैंपस में साथ बैठने की फुर्सत।​लेकिन तारा को ध्रुव से कोई शिकायत नहीं थी। उसने इस दूरी को दूरी नहीं, बल्कि ध्रुव के सपनों का एक पड़ाव माना। तारा अपनी पढ़ाई के बीच वक्त निकालकर कभी चुपके से ध्रुव के लिए घर का बना लंच भिजवा देती, तो कभी उसके अपार्टमेंट पहुँचकर उसकी अलमारी और बिखरे कमरों को संभाल देती। ध्रुव जब भी रात को थका-हारा अपने घर लौटता, तो साफ़-सुथरा कमरा, टेबल पर रखा खाना और तारा का लिखा एक छोटा सा नोट उसकी दिनभर की सारी थकान हर लेता। उस वक्त ध्रुव के दिल से बस एक ही आवाज़ निकलती—ज़िंदगी में चाहे कितने ही फैसले गलत हुए हों, लेकिन तारा को चुनना उसकी ज़िंदगी का सबसे बेहतरीन फैसला था।​दूसरी तरफ, तारा के दिल में एक अजीब सी हलचल रहती थी। जिस ध्रुव को उसने बचपन से बेहद बेफिक्र, हँसमुख और आजाद परिंदे की तरह उड़ते देखा था, आज उसी ध्रुव को अपने करियर के लिए इतनी कड़ी मेहनत करते, अपनी सेहत को दरकिनार करते और गंभीर होते देखना उसके लिए एक नया अनुभव था। ध्रुव का यह संघर्ष तारा के दिल में एक मीठा सा दर्द जगा देता था—एक तरफ उसके मन में ध्रुव की मेहनत के लिए बेइंतहा सम्मान था, तो दूसरी तरफ उसे बेफिक्र ध्रुव की याद भी आती थी। यह अहसास सिर्फ प्यार का नहीं था, यह दो परिपक्व दिलों के एक-दूसरे के रंग में ढलने की एक बहुत ख़ूबसूरत शुरुआत थी।कॉलेज की छुट्टियां शुरू हो चुकी थीं, हॉस्टल धीरे-धीरे खाली हो रहा था, लेकिन तारा ने इस बार घर न लौटने का फैसला किया। ध्रुव का दिन-रात काम में जुटे रहना, खुद की सेहत को नजरअंदाज करना और उस बेफिक्र इंसान को यूं वक्त से पहले गंभीर होते देखना तारा से देखा नहीं जा रहा था। उसने तय किया कि वह हॉस्टल में ही रुकेगी और ध्रुव का ध्यान रखेगी।​जब घर से माँ सुधा का फोन आया, तो तारा ने बिना किसी झिझक के अपनी बात रख दी। माँ का दिल तो बेटी की भावना को समझ गया और उन्होंने खामोश सहमति दे दी, लेकिन पास खड़े पिता आनंद जी का दिल भारी हो गया। ऐसा नहीं था कि उन्हें ध्रुव पर भरोसा नहीं था या दोनों के रिश्ते से इंकार था—वे खुद ध्रुव को बहुत मानते थे—लेकिन एक पिता का मन अपनी जवान बेटी को लेकर थोड़ा सुरक्षात्मक हो ही जाता है। उनके मन में किसी तरह की कड़वाहट नहीं, बल्कि एक अजीब सी कसमकस और बेटी के दूर रहने का खालीपन था।​जब ध्रुव को तारा के न जाने का पता चला, तो उसने तुरंत हॉस्टल पहुँचकर उसे समझाया, "तारा, ऐसा मत करो। अंकल-आंटी तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं, तुम्हें घर जाना चाहिए। मैं संभाल लूँगा खुद को।" लेकिन तारा अपनी बात पर अड़ी रही, "तुम अपना ध्यान नहीं रख पाते ध्रुव, और इस वक्त तुम्हें मेरी ज़रूरत है।"​जब यह बात ध्रुव के माता-पिता तक पहुँची, तो उसकी माँ का दिल तारा के इस निस्वार्थ प्रेम से भर आया। वहीं उसके पिता विजय जी, जो आनंद जी के बरसों पुराने पक्के दोस्त थे, एक अलग उलझन में पड़ गए। उन्हें खुशी तो थी कि तारा उनके बेटे का इतना ख्याल रखती है, लेकिन दोस्त के नाते उनके मन में एक झिझक भी थी। वे जानते थे कि रिश्ता भले ही तय जैसा हो, लेकिन जब तक कोई औपचारिक मुहर नहीं लगती, तब तक किसी की बेटी का यूं रुकना किसी भी पिता के मन में थोड़ी असहजता ला सकता है।​आनंद जी ने उस वक्त तो अपने दिल पर पत्थर रखकर चुप रहना ही बेहतर समझा और अपनी बेटी की ख़ुशी के आगे खुद को समझा लिया।​वक्त पंख लगाकर उड़ता गया। देखते ही देखते दो साल बीत गए और तारा का ग्रेजुएशन भी पूरा हो गया। लेकिन तारा के इरादे अब भी वही थे। ध्रुव का काम अब भी उतना ही थका देने वाला था और उसकी सेहत की फ़िक्र आज भी तारा के दिल में सबसे ऊपर थी। इसलिए जब बाकी लड़कियाँ पास-आउट होकर अपने-अपने घर लौट रही थीं, तारा ने उसी शहर में इंटर्नशिप और जॉब तलाशना शुरू कर दिया ताकि वह ध्रुव के करीब रह सके।​जब यह बात उसके घर पहुँची, तो आनंद जी के सब्र का बाँध टूट गया। अब तक जो चिंता उनके दिल के किसी कोने में दबी हुई थी, उसने गुस्से और बेबसी का रूप ले लिया। उन्होंने फोन पर कठोर आवाज़ में कहा, "बहुत हो गया तारा! अब पढ़ाई पूरी हो चुकी है। तुरंत अपना सामान समेटो और पहली ट्रेन से घर वापस आओ। अब एक दिन भी वहाँ रुकने की कोई वजह नहीं है।" तारा ने उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन इस बार पिता का फैसला अटल था।​जब ध्रुव को आनंद जी के इस गुस्से और तारा के अड़ने का पता चला, तो उसने बिना देर किए तारा से बात की। उसने तारा का हाथ थामते हुए बहुत नरमी लेकिन दृढ़ता से कहा, "तारा, अंकल अपनी जगह बिल्कुल सही हैं। उन्होंने हमेशा हमारे रिश्ते का सम्मान किया है, लेकिन अब तुम्हें घर लौटना होगा। मेरी फ़िक्र में तुम अपनी पहचान और अपने परिवार के सुकून को दांव पर नहीं लगा सकतीं। अगर तुम मुझसे प्यार करती हो, तो तुम्हें कल ही घर जाना होगा।"​तारा की आँखों में नमी थी और दिल में ध्रुव को अकेले छोड़ जाने का डर, लेकिन ध्रुव की आँखों में अपने लिए सच्चा प्यार और उसके पिता के प्रति सम्मान देखकर वह निरुत्तर हो गई।  

पच्चीसवाँ भाग समाप्त, कहानी जारी है....